Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 47
________________ ४२ अनुसंधान-२१ त्रिलोकस्थितजिनगृहस्तव ॥ श्रीकुशलवर्द्धनसूरिगुरुभ्यो नमः ।। असुरसुरखयरनरनमियपयपंकयं __ नमिवि रिसहेसरं भवियकयसुक्कयं । भणीसु तिलोयठियजिणहराणं थयं . जेम मे जाइ बहुपुव्वभवदुक्कयं ॥१॥ बत्तीसलक्खा य सोहंमि(म)कप्पे वरे इसाणि अडवीसई लक्ख जिणमंदिरे । सणंतकुमारि[ए] बारसयसहसया लक्ख माहिंदे. अद्वैव वंदे सया ॥२॥ बंभलोगंमि चत्तारि लक्खा वरा जत्थ पूर्यति भत्तीइ विबुहेसरा । . सहसपन्नास वंदामि लंतग(गा)भिहे सुक्कि चालीससहसा य जिणहर महे ॥३॥ अठमे कप्पि सहसारि जिण संथुणे ____ छच्च सहसु(स्सु) वंदामि जिणभूयणे । आणए नवमि कप्पंमि तह पाणए दसमिए (दसमि) दुन्नि दुन्नि पणमामि चेइ(ई)सए ॥४॥ आरणे दिवड्डसय कप्पि एगारसे अच्चूए कप्पि सउ दिवड्ड तह बारसे । पढमि गेविज्जि तिगि इगारअहियं सयं बीयतिगि एगसयसत्तहिय चंगयं ॥५।। एगसयसोहियं अस्थि तईयं तिगं नवमि गेविज्जि अट्ठारहिय-सयतिगं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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