Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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४०
तुह जिणवरिंद ! आणा विराहिआ जं पमायदोसेणं । भवभमंतेणं मए तं मिच्छादुक्कडं होउ ॥८॥
अनुसंधान-२१
निउणमईगम आणा ववहारेणं न नज्जई कह वि । निच्छयओ पुण नियमा तुह जिण ! भणिअं पमाणं मे ||९||
मिच्छत्ततावतत्तो पत्तो तुहआणनिरुवमच्छायं ।
ता तत्थ कुण पसायं सामिअ ! विस्सामदाणा (णे ) णं ॥ १० ॥
इय वित्तो जिणपहु जिणपहसूरीहिं जगगुरू पढमो । विन्नत्तीइ पसायं निव्विग्धं कुण[उ] अम्हाणं ॥११॥
॥ इति श्रीस्तवनसम्पूर्ण: || संवत् १७१७ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १३ वार सकरे लखितं ॥छा।
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