Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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ओक्टोबर २००२
४३
विजयवेजयंतजयंतअवराजियं
सव्वट्ठसिद्धि पवरजिवेहि(वहि) वियराईयं (विराइयं) ॥६॥ पंचणुत्तेरविमाणेसु जिणमंदिरं
_ एगमेगं नमसामि अइसुंदरं । लक्खचुलसी य सहसा य सत्ताणुई
सव्वविमाण जिणभवण तेवीसई ॥७॥ इत्तियं सव्वसंखाय परिभासियं
उड्डलोयंमि जिणवरिहिं सुपयासियं । भवणवइमज्झि चेईहरे सुंदरे
नमिसु रोमंचभरि भरीय जोडी करे ॥८॥ सत्तेव कोडि बावत्तरीय
लक्खा भवसायर-सत्तरीय । वंतरवरजोइसी(सि)एसु दक्ख
पभणउं जिणमंदिर नत्थि संख ॥९॥ कुंडलि रुयगेसु वि माणुसंमि
नंदीसरि वेयड्डि सुरगिरिंमि । हिमवंत-सिहरि-निसढाईएसु
रिसहाइपडिमासोहीएसु ॥१०॥ सत्तुंजि गिरी(रि) सिरिउज्जयंति
साचुरि वीर नर्मु कणयकंति । संखेसरि करहेडइ पुरंमि
थंभणइ पासु जालउरि रंमि ॥११॥ अट्ठावय-गिरिवरि आबुयंमि
समेहसिहरि भरुयच्छि रंमि । इय सासय-असासयचेईएसु
तित्थेसर पणमिसु मणहरेसु ॥१२॥
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