Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 35
________________ ३० अनुसंधान-२१ अह-निसिझाईयपंचजुत्तपरमिट्ठिसुमंता नारयखेवगरागदोसबलभेइणि दंता । नमह नमह भो भवियलोय ! सिरिमहतरपाया मुक्किय दुट्ठपमायसंग नियचित्तणुराया ॥७।। महतर सिरिचारित्तचूलविन्नत्तिऽभिरामा पढइ गणइ जे निय[य] भावसंजुत्त अकामा । विलसह ते सुह मही(हि)(य)लंमि गुरुलच्छिविसाला जायग-जण-मणवंछियत्थपूरणसुरसाला ॥८॥ ॥ महत्तराश्रीचारित्रचूलाविज्ञप्तिः समाप्ता ।। चतुर्मुखश्रीमहावीरस्तवनम् ॥ सिरिमंदिरसुंदरकायजाय, मयसंनय संनयरायजाय । भयभंजण भवदवनीरवाह, जय चउमुहगुरुमहावीरनाह ॥१॥ तुह सेवगु मुहजियसोम सोम, हुइ कोमल कोमलरोमतोम । दुहनासण सासणतायसाय, सिरिभायणु गय गयमायताय ॥२॥ जय सज्जणरंजण कोहलोह-दुहवज्जिय निज्जियमोहजोह । . सिवकामिणिकंठसुहारसार, कलकंचणरुइतणु तार तार ||३|| चिरमावयमहियलसीर धीर, जणलंभिय भवनववी(ती)र वीर । विभासुर-भासुर-चंद-वंद, नर-किन्नर-निज्जर-वंद नंद ॥४॥ मुणिपं(पुं)गव कयगुरुतोस पोस-मणवंछियमुज्झियरोसदोस । मह पूरय चूरय लक्ख लक्ख, छहजीवह निम्मियसुख(क्ख)-- दुख(सुक्ख ?) ।।५।। जय जिणवर जियरइकंत कंत, गुणसंमणिरोहण संत दंत । जमसंजमतमदुमनाग नाग, सुहसंपयपय हयरागनाग ॥६।। कर(रु) मह लहु मद्दियकम्ममम्म, सिववासय सासयरम्मसम्म । भवतारग पारग रोगसोग-हर छिडियनेहललोगभोग ।।७।। सम्मंडिय खंडियसाम काम-परिहरिय मणोहरधामराम । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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