Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसंधान-२१ संख-धणुपमुहवरलक्खणालंकिओ, जस्स तवतेयजियहेलि गयणे ठिओ । पणयलोयस्स बहुरिद्धिसुहदायगो, जयओ(उ) सिरिनाणसायरमुणीनायगो ॥३॥ सिद्धिसीमंतिनीगाढकयनियमणो, मोहरायस्स. अइपबलबलभंजणो । जियविस्सस्स कामस्स विद्धंसगो, जयओ(उ) सिरिनाणसायरमुणीनायगो ॥४|| रागदोसाइसत्तूहिं अग्गंजिओ, मोहतरु पूढलेहाइ जिणि भंजिओ । भावभयदुक्खरासिस्स कयअंतगो, जयओ(उ) सिरिनाणसायरमुणिनायगो ॥५॥ कोहदववारिसम वाइजणदारणो, माणअइमत्तकरिभेयपंचाणणो । धम्मविहिलीणभवियाण जो त(ता)रगो, जयओ(उ) सिरिनाणसायरमुणीनायगो ।।६।। मेरुगिरिधीरगंभीर-भूविस्सुओ, सयलमुणिजायबहुहरिसकर सस्सुओ । जो सयाऽणेगगुणविउसगणरंजगो, जयओ(उ) सिरिनाणसायरमुणीनायगो ||७|| रयणिकरगच्छगयणस्स भासणकरो, जो ड(उ) कम्मक्खए तीवकयआयरो । भुवणगिहमज्झि उज्जोयकर दीवगो, जयओ(उ) सिरिनाणसायरमुणीनायगो ॥८॥ मोयजुयलोयसंथवियगुणसंचओ, असमसमयारसे अणुदिणं जो रओ । जीवअज्जीवमुहतत्तनवधारगो, जयओ(उ) सिरिनाणसायरमुणीनायगो ॥९॥ इय मुणिवइ ! तुह गुण, भवदुहखंडण, भत्तिजुत्त जे जण थुवई । सरणागयवच्छल ! गयबहुकसमल ! मुक्खसुक्ख लहु ते लहई ॥१०॥ ॥ इति पूज्याराध्य-भट्टारक-प्रभु-श्रीज्ञानसागरसूरि-विज्ञप्तिका समाप्ता ।।
श्रीकुलमण्डनसूरिविज्ञप्तिः विमलविउलतवगच्छगयणभासणवरदिणयर, सयलगुणावलिकलियकाय-तवतेयसुभासुर । नि(न)मिरमहीतललोयजायमणवंछियपूरण, सिरिकुलमंडनसूरिराय जय भवियणबोहण ॥१॥
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