Book Title: Alok Pragna ka
Author(s): Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 55
________________ ४० ज्ञान और किया ११६. अवशेन्द्रियचित्तानां, हस्तिस्नानमिव क्रिया । दुर्भगाभरणप्रायो, ज्ञानं भारः क्रियां विना ।। आलोक प्रज्ञा का भंते ! क्या चित्त की निर्मलता के लिए ज्ञान और क्रियादोनों जरूरी हैं ? वत्स ! हां, दोनों जरूरी हैं । जिसके इन्द्रियां और मन वश में नहीं हैं, उसका आचरण हाथी के स्नान की तरह होता है । हाथी पानी में नहाता है, बाहर आते ही सूंड से कीचड़ उछाल कर अपने शरीर को भर लेता है । इसी प्रकार आचरण के बिना ज्ञान कुरूप व्यक्ति के आभरण के समान भारभूत होता है 1 आत्मदर्शी ११७. सत्यं साक्षात्कृतं येन स हि सत्याग्रही भवेत् । आत्मा साक्षात्कृतो येन स एवात्मनि जीवति ॥ शिष्य का प्रश्न था — सत्याग्रही कौन होता है और आत्मजीवी कौन होता है ? आचार्य का उत्तर था - जिसने सत्य का साक्षात्कार कर लिया है, वही सत्याग्रही हो सकता है और जिसने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, वही आत्मजीवी होता है—-आत्मा में जीता है । ११८. आत्मदर्शी जनश्चैव, त्यागीन्द्रियजयी भवेत् । अनात्मदर्शिनो लोकः, भिन्नः स्यादात्मदर्शिनः ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org


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