Book Title: Agam 41B Ohnijjutti Mulsutt 02B Moolam
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 18
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra गाहा १२४ - www.kobatirth.org (१२४) अड्डाऍ अणट्ठाए छक्कायपमद्दणं तु जो कुणइ अनियाए य नियाए आयाहम्मं तयं बेर्ति Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (१२५) जाणंतु अजाणतो तहेव उ नि हिसिय ओहओ वावि जाणगमजाणगे या व अनिया निया एसा ( १२६) दव्वाया खलु काया भावाया तिनि नाणमाईणि परपाणपाडणरओ घरणायं अप्पणी हणइ (१२७) निच्छयनयस्स चरणाय विधाए नागदंसणवहोऽवि ववहारस्स उ चरणे हयंमि भयणा उ सेसाणं (१२८) दव्वंमि अत्तकम्पं जं जो उ ममायए तगं दव्वं भावे असुहपरिणओ परकम्पं अत्तणो कुण ( १२९) आहाकम्मपरिणओ फासूयमवि संकिलिट्ठपरिणामो आइयमाणो बज्झतं जाणसु अत्तकम्मंति ( १३० ) परकम्मअम तकम्मीकरेइ तं जो उ गिण्डि भुंजे तत्य भवे परकिरिया कहं नु अनत्थं संकमई ( १३१) कूडउवमाइ केई परप्पउत्तेऽवि बेति बंधोत्ति भइ गुरूदि पमतो बञ्झइ कूडे अदक्खो य (११२) एमेव भावकूडे बज्झइ जो असुभभावपरिणामो तम्हा उ असुभभावो वज्रेयव्वो पयत्तेणं (१३३) कामं सयं न कुव्वइ जाणतो पुण तहादि तग्गाही वड्ढे तप्पसंग अगिण्हमाणो उ वारेझ (१३४) अत्तीकरेइ कम्मं पडिसेवाईहिं तं पुण इमेहिं तत्य गुरू आइएयं लहु लहु लहुगा कमेणियरे (१३५) पडिसेवणमाईणं दाराणऽणुमोयणावसाणाणं जहसंभवं सरूवं सो दरहरणं पवक्खामि (१३५) अत्रेणाहाकम्भं उयणीयं असइ चोइओ भगइ परहत्येणंगारे कढतो जह न उज्झइ हु ( १३७ ) एवं खु सुद्धो दोसों देंतस्स कूडउथमाए समयत्यमजाणतो मूढो पडिलेवणं कुणइ (१३८) उवओगंमि य लाभं कम्मग्गाहिस्स चित्तरक्खडा आलोइए सुलखं मण मणतस्स पडिसुणणा (१३९) संदासो उपसिद्धो अनुमोयण कम्मभोयगपसंसा एएसिमुदाहरणा एए उ कमेण नायव्वा (१४०) पडिसेवणाएँ तेणा पडिसुणणाए उ रायपुत्तो उ संवासंभि य पल्ली अनुघोयण रायदुट्ठो य (१४१) गोणीहरण सभूमी नेऊणं गोणिओ पहे भक्खे निव्विसया परिवेसण ठियावि ते कूविया घत्वे For Private And Personal Use Only ॥१०३॥-103 ॥१२२॥ मा.-22 ॥१०४॥ 104 1190411-108 1190Eli-106 1190911-107 ॥१०८॥ 108 11१०९॥-100 11990|1-110 ||99911-111 1992-112 |199311-119 ||११४|| - 114 19941-115 199६॥-116 ॥११७॥-117 1199211-118 ७५ 199911-110

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