Book Title: Agam 41B Ohnijjutti Mulsutt 02B Moolam
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 29
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir विनिपुति - (३२२) ॥२९४||-294 ॥२९५1-296 ॥२९६||-290 ॥२९७||-287 ॥२९८1-298 11२९९|1-299 ॥३००||-300 ॥३०१॥-301 ||३०२||-902 (३२२) नीयदुवारंमि धरेन सुज्झई एसणत्तिकाऊणं नीहमिए अगारी अच्छइ विलिया वऽगहिएणं (३२३) चरणकरणालसंमी अमिय आगए गहिय पुच्छा इहलोग परलोग कहेइघाउंइन लोगं (३२४) नीयवारंपिघरेभिकखं निच्छंति एसणासमिया जं पुच्छसि मज्झ कहं कप्पइलिंगोवजीवीऽहं (१२५) साहुगुणेसणकहणं आउटा तमि तस्स तिप्पइ तहेव कुक्कुडि चरंति एए वयं तु चित्रव्वया बीओ (३२६) पाओकरणं दुविहं पागडकरणं पगासकरणंध पागड संकामण कुदारपाए य छिन्ने व (३२७) रयणपईवेजोईन कप्पइ पगासणा सुविहियाणं अत्तद्विय परिभोत्तुं कपइ कप्पेअकाऊणं (३२८) संचारिमाय चुल्ली बहिं व चुलीपुरा कया तेसिं तहिरंधति कयाई उवही पूईयपाओय (१२९) नेच्छह तमिसंमि तओबाहिरचुल्लीऍसाहु सिद्धण्णे इय सोउं परिहरए पुढे सिष्टुमिवि तहेव (३१०) मच्छियधम्मा अंतो बाहि पवायं पगासमासन्नं इय अत्तद्विय गहणं पागडकरणे विभासेयं साउ (३५१) कुस्स कुणइ छिचं दारंवढेइ कुणइ अत्रं वा अवणेइ छायणंचा ठावइ रयणं व दिपंतं (३५२) जोइ पइवं कुणइव तहेवकहणं तु पुढे दुइपुढेवा अत्तट्ठिए उगहणं जोइ पईवे उ वञ्जित्ता जेइ (३३३) पागडपयासकरणे कयंमि सहसा व अहवऽणामोगा गहियं विगिंचिऊणं गेहद अचं अकपकप्पे (३३४) कीयगडंपिय दुविहंदब्वे भावे यदुविहमेक्केक्कं आयकियं च परकियं परदव्वं तिविहऽचित्ताइ (३१५) आयकियं पुण दुविहंदव्वे भावे यादव्य चुनाई मावमि परस्सऽद्वा अहयावी अप्पणा चेव (१६) निम्मालगंधगुलियावत्रयपोत्ताइ आयकइदव्ये गेलने उड्डाहो पउणेघडुगारि अहिगरणं (१५७) मंखमाई परभावकयं तु संजयटाए उप्पायणा निमंतण कीडगड अभिहडे ठविए (३१८) सागारि मंख छंदण पडिसेहो पुच्छ बहु गए वासे कयरिं दिसि गमिस्सह अमुइंतहि संयवं कुणइ (३९) दिअंते पडिसेहो को घेच्छं निमंतणंजइणं पुयगय आगएसुसंधुहईएगगेहमि ॥३०३1-30 ॥३०४||-304 ।।३०५||-306 ॥३०६-308 ॥३०७||-307 ॥३०८||-308 ॥३०९1-309 ॥३१011-310 ॥३११||-311 For Private And Personal Use Only

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