Book Title: Agam 41B Ohnijjutti Mulsutt 02B Moolam
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 33
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra १० www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (३९४ ) तिरियायय उज्जुगएण गिन्हई जं करेण पासंती एयमणुधुक्खितं उघुक्तिं भवे सेसं (३९५) अच्छिनंपिय तिविहं पभू य सामी य तेणए चैव अच्छिज्जं पडिकुद्धं समणाण न कप्पए धैत्तुं (३९६) गोवालए य भयए खरए पुत्ते व धूय सुण्हाए अचियत्तसंखडाई केइ पओसं जहा गोवो (३९७) गोवपओ अच्छेत्तुं दिनं तु जइस्स भइदिणे पहुणा पाणंद खिसइ भोई रुवे चेडा (३९८) पडियरण पओसेणं भावं नाउं जइस्स आलावो तनिब्बंधा गहियं हंदि स उ मुक्को सिमा बीयं (३९९) नानिव्विद्धं लब्धइ दासीवि न भुजए रिते मत्ता दोगयरपओसं जं काही अंतरायं च (४००) सामी चारभडा या संजय दद्दूण तेसि अट्ठाए कलुणाणं अच्छेखं तुं साहूण न कप्पए घेत्तुं (४०१ ) आहारोवहिमाई जइअड्डाए उ कोइ अच्छिदे संखड असंखडीए तं गिण्हंते इमे दोसा (४०२ ) अचियतमंतरायं तेनाहड एगऽणेगवोच्छेओ निच्छुमणाई दोसा तस्स अ विद्यालऽ लंभे व जं पावे (४०३) तेणो व संजयट्ठा कलुषाणं अप्पणी व अट्ठाए घोच्छेय पओसं वा न कप्पई कप्पऽणुत्रायं (४०४) संजयभद्दा तेणा आयंती वा असंथो जइणं पिडनिति (१९४) जइ देर्ति न घेत्तव्वं निच्छुभ वोच्छेउ मा होया (४०५) घयसत्तुयदितो समणुनाया व घेत्तुणं पच्छा दें ति तयं तेर्सि चिय समणुत्राया व मुंजति (४०३) घयसत्तुगदितो अंबापाए य तप्पिया पियरो काममकामे धम्मो निओइए अम्हवि कयाई (४०७) अणिसिद्धं पडिकुठं अनुनायं कप्पए सुविहियाणं लडग चोलग जंते संखडि खीरावणाईसु (४०८) बत्तीसा सामने ते कहि पहाउं गयत्ति इअ वुत्ते परसंतिएण पुत्रं न तरसि काउंति पञ्चाह (४०९) अविय हु बत्तीसाए दिनेहि तवेग मोयगो न भये अप्पवयं बहुआयं जइ जाणसि देहि तो मज्झं (४१०) लाभिय नेतो पुट्ठो किं लद्धं नत्थि पच्छिमी दाए इयरोऽवि आह नाहं देमित्ति सहोद चोरति ( ४११ ) गिण्हण कड्ढण ववहार पच्छकडुडाह पुच्छ तहय निव्विसए अपहुंमि हुंति दोसा पहुंमि दिने तओ गहणं For Private And Personal Use Only - || ३६५॥ 385 ||३६६|| 366 ||३६७||-367 1134211-368 ॥३६९॥-368 ||39011-370 ||30911-371 ॥३७२॥। 372 ||३७३||-373 ॥ ३७४॥-374 ||३७५||975 ||३७६|| 976 ||४|| 4 ||३७७१/-977 ||३७८||-378 ॥३७९॥-378 ॥३८०।-380 132911-381

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