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श्रुतसागर
वर्ष-४, अंक नं. ४, कुल अंक-४०, मई-२०१४
સમ્રાટુ સંપતિ સંગ્રહાલય - કોબા તીર્થ
પ્રાચીન યુત-તીર્થોદ્ધક, પરમ શક્ય અસંત પ. પૂ. આચાર્યદેવ શ્રીમદ્ પદ્મસાગરસૂરીશ્વરજી મહારાજાની પુનિત નિયામાં પી કોબા તીર્થ નિમણિાધીન સમા, સંપતિ સંગ્રહાલયમા ખનનવિધિ સમારોહ પસંગે
શ્રી મહાવીર જૈન આરાધના કેન્દ્ર - કોબા તીર્થ તરફથી સાદર અર્પણ.. वैशाह , वि.सं. २०००, तारीण ५-०५-२०१४, शुरुवार
"सम्राट् संप्रति संग्रहालयना नूतन भवनना खननविधि प्रसंगे
अपायेल बहुमान चित्र" आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर
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विक्रमनी सोळमी सदीमा आलेखायेल विज्ञप्तिपत्रमा जोवा मळता
अष्टमंगल अने चौदस्वप्नना मनमोहक चित्रों.
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आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर का गुप्रपत्र
श्रुतसागर
४०
* संपादक
* आशीर्वाद
राष्ट्रसंत प. पू. आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा.
हिरेन के. दोशी
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* निदेशक *
कनुभाई एल. शाह
एवं
ज्ञानमंदिर परिवार
१५ मई, २०१४, वि. सं. २०७० वैशाख वद- 9
प्रकाशक
आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर
श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर-३८२००७
फोन नं. (०७९) २३२७६२०४, २०५, २५२ फेक्स: ( ०७९) २३२७६२४९
website : www.kobatirth.org email:
[email protected]
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अनुक्रम
१. संपादकीय
हिरेन के. दोशी २. गुरुवाणी
आ. पद्मसागरसूरिश्वरजी ३. वस्तुपाल तेजपाल छंद
मुनिश्री सुयशचंद्र वि. ४. पाण्डुलिपि : एक परिचय
डॉ. उत्तमसिंह ५. संयम अभिलाषा
हीरेन जयंतीलाल महेता ६. काव्यशास्त्री यशोविजयगणि
हीरालाल र. कापडीया ७. इच्छाओ अनंत छे
कनुभाई ल, शाह ८. हस्तिनापुर तीर्थ परिचय
बीनाबेन शाह ९. पुस्तक समीक्षा
डॉ. हेमंत कुमार १०. प. पू. राष्ट्रसंत आचार्यश्री
पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. नो
कोबातीर्थथी नाकोडातीर्थ विहार कार्यक्रम ११. समाचार सार
डॉ. हेमंत कुमार
प्राप्तिस्थान
आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर तीन बंगला, टोलकनगर परिवार डाईनिंग हॉल की गली में पालडी, अहमदाबाद - ३८०००७ फोन नं. (०७९) २६५८२३५५
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संपादकीय
श्रुतसागरनो ४०मो अंक आपना हाथमां छे. नानकडा बीजमां वृक्षनी घेघूर छाया फेलायेली होय छे. नानकड़ा तणखामां दावानळना दावानळ संतायेला होय छे.
आशाना एकाद किरणमा निराशाना घोर अंधकारने चीरी नांखवानुं बळ छुपायेलुं होय छे.
शब्दो भलेने नाना लागता होय छतांय जो एने योग्य निमित्तो मळे तो ए जीवननो मंत्र बनी जतां वार लागती नथी.
बस ए ज रीते जीवनमां करेला संकल्पो पण सत्यनी जेम क्यारेय निष्फळ जता नथी. हां, एने योग्य वातावरण मळता के एने फळी- भूत थता समय लागे पण ए क्यारेय विफळ जता नथी. संकल्प साधना माटे बीज समान छे. दरेक धर्म अने दरेक दर्शन संकल्पनी शक्तिने स्वीकारे छे. दरेक परंपराए एने पोताना पारिभाषिक शब्दो आप्या हशे. पण मूळ एना स्वरूपमां कोई विशेष फेरफार जणायो नथी.
संकल्पना बळ उपर ज साधनानी ईमारत चणाय छे. सिद्धि प्राप्त करवा माटेनो दृढ मनोभाव साधक पासे न होय तो साधना सिद्धिमां रूपांतरित थती नथी. व्यक्तित्वनो विकास होय के समष्टिगत उत्थान संकल्पना प्रभावे आगळ वधी शकाय छे. ए निर्विवादित रीते सिद्ध छे. तो, चालो...
सुकृतोना संकल्पो करीए... साधनाना संकल्पो करीए..
आराधनाना संकल्पो करीए... जीवनने पवित्रतानी सुगंधथी भरीए... आ अंकनी वात :__ परम श्रद्धेय, राष्ट्रसंत, पूज्य गुरुदेवश्रीए आपेल प्रेरक प्रवचनोने गुरुवाणी हेठळ प्रकाशित कर्या छे. पूज्य गुरुदेवश्रीना आ प्रवचनो गुरुवाणी ग्रंथ हेठळ प्रकाशित थया छे. आ अंकमां पूज्य गुरुदेवश्रीए क्षमा उपर आपेल प्रवचनने प्रकाशित कर्यु छे. ढूंकी सहनशक्तिना प्रभावे आवेशग्रस्त आत्माओ माटे आ शब्दो क्षमापान जेवा बनी रहेशे.
अप्रकाशित मध्यकालीन साहित्यनी कृतिस्थानमां आ वखते वस्तुपाल-तेजपाल संबंधी अद्यावधि अप्रगट एक लघु कृति 'अज्ञातकतृक वस्तुपाल - तेजपाल छंद'
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मई २०१४
+
प्रकाशित करी छे. प्रस्तुत कृति प्रकाशनार्थे मोकलवा बदल पू. मुनि भगवंत श्री सुयशचंद्रविजयजी म. सा. नो खूब खूब आभार...
अढार पापस्थानकोनो सरळ अने संक्षिप्त परिचय कराववा अने अढारे अढार पापस्थानकोथी छूटवा माटे परमात्माने करायेली हरिगीत छंदमां रचायेली आ स्तुति आ अंकमा प्रकाशित करी छे. स्तुतिना शब्दो, ध्रुवपद अने एनो लय बधुं ज सुंदर छे. अने एटले ज वाचको माटे आ स्तुति आ अंकमा प्रकाशित करी छे,
दर अंकनी जेम आ वखते जैन सत्यप्रकाशमांथी महामहोपाध्याय श्री यशोविजयजी म. सा. नी प्रतिभाने उजागर करतो श्री हीरालालभाईनो लेख आ अंकमा साभार प्रकाशित कर्यो छे. लेखकश्रीए आ नानकडा लेखमां घणा बधा शोध स्थानो अने प्रश्नो जणावी विद्वानो अने वाचकोने आमंत्रित कर्या छे. तो साथे साथे महाप्रतिभावंत पू. महोपाध्यायजी म. सा. नी अकुंठित प्रतिभाना दर्शन पण कराव्या छे.
स्मशाननो खाडो, पेटनो खाडो, अने तृष्णानो खाडो क्यारेय पूरी शकाता नथी, समस्यामां अटवायेला जीवनने उपयोगी थाय एवा सूत्रो प्राप्त करावी आपतो लेख 'ईच्छाओ अनंत छे आ अंकमा प्रकाशित कर्यो छे. आ लेखमां आपणा जीवननी वास्तविकता अने एना प्रत्येना अभिगमने बताववा माटे ज औपदेशिक तत्त्वनो उपन्यास थयो छे ए सिवाय कोई हेतु नथी.
तीर्थ परिचय विभाग ठळ आ अंकमा हस्तिनापुर तीर्थनो परिचय आपवामां आव्यो छे. आ अवसर्पिणी काळना प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव प्रभुनुं पारणुं जे स्थळे थयुं हतुं ए स्थळ एटले हस्तिनापुर तीर्थ तीर्थ परिचय संक्षिप्त होवा छतां महद्द अंशे उपयोगी बने ए आशयथी हस्तिनापुर तीर्थनो परिचय प्रकाशित करवामां आव्यो छे. ब्राह्मीलिपिना सफळ आलेखन बाद एवो ज एक अभ्यासपूर्ण आ लेख 'पाण्डुलिपि : एक परिचय आ अंकमा प्रकाशित कर्यो छे. हस्तप्रतविद्याना अभ्यासु माटे आ लेख आशीषरूप साबित थशे.
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वाचकोना स्वाध्यायमा अने वाचन सामग्रीमा वधारो थाय ए विचारथी पुस्तक समीक्षा अंतर्गत पंन्यासप्रवर श्री यशोविजयजी म. सा. द्वारा संपादित / अनुवादित द्रव्य गुण पर्यायना रासनो परिचय प्रकाशित कर्यो छे आ लेखना माध्यमे वाचकोने द्रव्यानुयोगनुं महत्त्व अने रासना प्रकाशननो परिचय जाणवा मळशे. एमां कोई शंकाने स्थान नथी.
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गुरुवाणी
आचार्यश्री पद्मसागरसूरिजी 'मित्ती में सब भूएसु' परमात्मा ने कहा आप यह प्रतिज्ञा करिए, जगत में किसी भी आत्मा से मेरी कोई शत्रुता नहीं। क्लेश ही संसार का बीज है। जीवन को जला कर के कोयला बना देगा, राख बना देगा। सारी शांति आपकी उससे नष्ट हो जाएगी। आत्मा की सारी समृद्धि लुट जाएगी। समत्व की भूमिका चाहिए।
साढे-बारह वर्ष तक परमात्मा महावीर ने सहन किया। सारे जगत को उन्होंने कहा, जो आत्मा सहन करेगा, वही सिद्ध बनेगा।
साधना के क्षेत्र में पहले सहन करना है। कोई भी शब्द आ जाए, शब्द का पान इस प्रकार से करें कि जहर भी अमृत बन जाए, सहन करने की ऐसी शक्ति आप विकसित करें कि संसार की कोई शक्ति ध्यान-भंग नहीं कर सके। समदृष्टि को प्राप्त करने के लिए, साधना के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने के लिए, सामायिक की साधना है।
यह समत्व को प्राप्त करने की परम साधना है। धीरे-धीरे व्यक्ति उस क्षेत्र में समत्व के पथ पर आगे बढ़ता ही चला जाए फिर कोई भेदभाव नहीं रहेगा, कोई दीवार नहीं रहेगी। सारा संसार ही उसके लिए द्वार होगा। सभी आत्माओं के लिए उसके अन्दर प्रवेश संभव होगा। सभी आत्माओं को वह अपनी दृष्टि से देखेगा। सर्व को स्वयं में देखेगा। स्वयं को सर्व में देखेगा। यह मंगल दृष्टि उसमें आ जाएगी। संघर्ष की प्रवृत्ति चली जाएगी।
संगम देव प्रभु वीर को पीडित कर रहा था और परमात्मा महावीर बिल्कुल मौन खड़े रहे, जरा भी द्वेष भाव की दृष्टि नहीं। कैसी उदारता थी, सहन करने की कैसी अपूर्व शक्ति थी, तब सिद्ध बने। समभाव में यही चिन्तन कि यह बेचारा कर्मवश है, भूतकाल का कोई ऐसा कर्म उपार्जन किया है। मैं निमित्त बन करके आया हूँ।
इस बेचारी आत्मा का क्या होगा? कैसी सुन्दर भावना, कैसा मंगल चिन्तन। मुझे यह पसन्द नहीं कि इससे आपका हृदय दर्द का अनुभव करे, दूसरों की पीड़ा का आँसू आपकी आँखों से आ जाए तब समझना मैं दयालु हूँ।
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६
दूसरे का दर्द देखकर के आपकी आँख में आँसू आना चाहिए। दूसरों की पीड़ा का आपको अनुभव होना चाहिए ।
मई २०१४
-
इस आत्मा की क्या दशा है। इस दुखी आत्मा को दुख से कैसे मुक्त करूँ ? तब जाकर के साधना से सुगन्ध पैदा होती है। यही है महावीर का सम्पूर्ण दर्शन ।
जीवन की शुद्धि के लिए पहले आप सहन करना सीखें। उसमें भी सर्वप्रथम शब्द की चोट को सहन करना सीखें क्योंकि कटुता वहीं से पैदा होती है। संघर्ष वहीं से पैदा होगा। इसने ऐसा कह दिया, उसने वैसा कह दिया ।
एक महान पहुँचे हुए सन्त थे । ऋषि थे । ध्यानस्थ बैठे थे। कोई उनका परम भक्त था। बड़ी सुन्दर वस्तु लाकर अर्पण कर गया। सामने एक व्यक्ति ने जब यह नजारा देखा, मन में विचार आया कि यह कैसा सन्त है, कैसा साधु है ? कहीं कमाने जाता नहीं, खाता, पीता मजा करता है । मन में ईर्ष्या पैदा हुई। इसके भक्त वर्ग कैसे हैं? बड़ी मूल्यवान चीज लाकर सामने रख गए । झाँक कर देखता भी नहीं । बेवकूफ है। जवान व्यक्ति था, सामने आकर के नहीं बोलने जैसा बोल गया। कायर आदमी है, घर से भाग कर आ गया। बाल-बच्चों का पालन-पोषण करने की ताकत नहीं इसलिए बाबा बन गया। मुफ्त का खाना मिलता है। नहीं बोलने जैसे कटु शब्द वह बोल गया ।
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महात्मा के चेहरे पर कोई वेदना का चिन्ह नहीं। अपनी प्रसन्नता में मग्न साधना का नशा ऐसा है जो कभी उतरता ही नहीं। आप रात को शराब पीयेंगे तो उसका खुमार सुबह उतर जाएगा। परन्तु इस साधना का खुमार ऐसा है, एक बार इसे अपना लिया तो जिन्दगी में उतरे ही नहीं। संसार का दर्द या दर्द का अनुभव भी नहीं होने देता। आनंद का ही अनुभव होगा। कोई दर्द नहीं होगा । इस नशे में यह मजा है।
साधु अपनी साधना में मस्त थे। जगत से शून्य थे, क्या हो रहा है कुछ मालूम ही नहीं । परन्तु हम अपनी साधना में तो, हम सब ध्यान रखते हैं । माला मिनते समय घर की पूरी चौकीदारी रहती है। भगवान का भजन चलता हो, लक्ष्मीनारायण के मन्दिर में गए हो, जूता बाहर खोल करके आए, मन जूते में रहा। शरीर भगवान के पास ले गए, ऊपर से प्रार्थमा कर रहे हैं ।
(क्रमशः )
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अज्ञात कर्तृक श्री वस्तुपाल-तेजपाल संबंध छंद
मुनिश्री सुयशचंद्रवि.
परम श्राद्ध, धर्मनिष्ठ सचिवेश्वर वस्तुपाल तेजपाल संबंधी एक लघु अप्रकाशित कृति अत्रे प्रकाशित करी छे. छंद बंधमां रचायेली आ कृति कुल चौद कडीमां रचायेली छे. कृति नानी होवा छतां वस्तुपाल - तेजपाल संबंधी होवाथी ध्यानार्ह छे. वस्तुपाल - तेजपाले करावेला जिनालयो, सुकृतो अने ए बाबतनी विगतो आ लघुकृतिमां मुख्य स्थान भोगवे छे.
कीर्तिकौमुदी, वसंतविलास, शकुनिकाविहारप्रशस्ति, धर्माभ्युदयमहाकाव्य, सुकृतकीर्त्तिकल्लोलिनी, प्रबंधकोश, वसंतविलास, वस्तुपालचरित्र, आबुरास, सुकृतसंकीर्तन विगेरे ग्रंथोथी वस्तुपाल - तेजपालना जीवन बाबते अने एमना सुकृतोने जाणी शकाय छे. उपरोक्त साहित्यमा एमना सुकृतो अने जीवन बाबतनी सुंदर रीते प्रस्तुति थवा पानी छे. प्रायः करीने एमांथी घणा ग्रंथोना जनसामान्यनी उपादेयता माटे गुजराती, हिंदी विगेरे भाषाओमा अनुवाद पण प्रकाशित बनवा पाम्या छे.
वस्तुपाल - तेजपालना सुकृतोनी नोंध आपता 'वस्तुपाल-तेजपालनी कीर्त्तनात्मक प्रवृत्तिओ ए लेखमां श्री ढांकी साहेब लखे छे के....: एमणे निर्माण करावेल प्रासादो अने प्रतिमाओ वापीओ अने जलाशयो, प्राकारो अने प्रकीर्ण रचनाओनी संपूर्ण यादी स्तब्ध करे एवी विस्तृत अने विगतपूर्ण छे. सम्राटो पण सविस्मय लज्जित बन्या हशे एटली विशाळ संख्यामां वास्तु अने शिल्पनी रचनाओ आ महान् बंधुओ द्वारा थयेली छे :
वस्तुपाल-तेजपालना सुकृतोनी अनुमोदना ए प्रस्तुत कृतिनो मुख्य विषय छे. कृतिनी आदिमां आबूतीर्थ, आदिश्वर भगवान अने गुरुतत्त्वने प्रणाम करीने कृतिनो प्रारंभ करे छे. वस्तुपाल तेजपालना जीवन संबंधी खास कोई विगतोने समावेश न करतां एमना सुकृतो अने धर्मकार्योनी नोंध ए प्रस्तुत रचनानुं हार्द जणाय छे. प्रस्तुत कृतिमां आबूतीर्थ, शत्रुंजयतीर्थ, अने गिरनारतीर्थमां करावेला सुकृतोने प्रधानपणे स्थान आपवामां आव्युं छे.
कवि विविध ग्रंथांना आधारे के ते समये परंपराथी प्राप्त माहितीना आधारे प्रस्तुत कृतिमां वस्तुपाल - तेजपाले धर्मकार्यो पाछळ करेला सद्व्ययनी आंकडाकीय विगतोने ज प्रधानपणे स्थान आप्युं छे. (आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिरमां प्रत नं. ४५४५२, ३८६४०, ३१४५३, ३६१७३ विगेरे प्रतोमां आ प्रकारनी आंकडाकीय
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८
माहिती आपती गद्यात्मक बे-त्रण कृतिओ उपलब्ध छे. एमांथी ४५४५२ नं. नी प्रत धनेश्वरसूरिकृत वस्तुपालचरित्रना आधारे लखायेली छे. ए सिवायनी कृतिओमां आ प्रकारनो कोई खास संकेत जणायो नथी. पण संभव छे के चरित्र ग्रंथो, कथानको अने चाली आवती परंपराना आधारे ज आ प्रकारनी कृतिओनुं निर्माण थयुं हशे . जे कोई विद्वान आ कृतिओ उपर कार्य करवा मांगता होय एमणे ज्ञानमंदिरनो संपर्क करवा भलामण छे. - संपादक)
कृतिना अंते कर्तानुं नाम न होवाथी अने प्रतना अंते पण कोई प्रतिलेखन पुष्पिका के गुरुपरंपरानो उल्लेख न होवाथी आ कृतिना कर्ता विशे स्पष्ट रीते कहेतुं मुश्केल छे. कृतिनी भाषा अने रचना जोता कविनो समय लगभग १८ मी उत्तरार्ध अने १९ मी पूर्वार्ध होई शके छे. कविनुं राजस्थान बाजुनुं विचरण अने अने ए प्रदेशनी बोलीनो प्रभाव कृति वाचनमां अनुभवाय छे.
अज्ञात कर्तृक
श्री वस्तुपाल- तेजपाल संबंध छंद
मई २०१४
प्रस्तुत कृतिनी हस्तप्रत नेमि विज्ञान कस्तूरसूरि ज्ञानमंदिर सूरतनी छे. कृति संपादनार्थे प्रत आपदा बदल व्यवस्थापकश्रीनो खूब खूब आभार....
श्रीगुरुने चरणे नमी, आबूगढ प्रणमूं मनरली ।
आद (दि) नाथ प्रणमुं मनरंग, विमल साये करायो उत्तंग || १ |।
श्रीधर्मघोष उपदेश सुणी, प्रसाद कराव्यों मनरूली । थापी प्रतिमा श्रीआदिनाथ, भविजन पूजे श्रीजगनाथ ||२||
वस्तुपालें देहरु तिहां कयूँ, तेजपालने तेह ज गम्यूं । वीरवचननो रागी तेह, जेहनि (नी) करणी जिनमतें एह ||३||
-
अढार कोडयने छन्नुलाख, सेतुंजे धन खरच्यानी साख्य । अढारकोडि लख इसी द्वार, द्रव्य खरच्यों तेणे गढ गिरनार || ४ ||
तेर सहस्स तेर नवा प्रसाद, धज तोरण ज्यां घंटानाद । वीस सहेंस जीरण उद्धार, सवा लाखने बिंब सू सार ।।५।।
सोले ओगणी एक हज्जार, पोषधसाला कीद्धी सार । अढाइ कोडी सार भंडार, सुरीपदमहोछव कीधा बार | १६ ||
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श्रुतसागर - ४०
संघभगति वरसे ते च्यार, जिनपूजा कीजें त्रण वार । मुनि पांचसेने दे आहार, पडिक्कमणा बे करतो सार ।।७।। साढा बार ते यात्रा करें, से–जे अणसण उचरे | आयु थोडुं जांणी करी, वांणोतरने लखतो करी ।।८।। पूंन्य ठांमें मूझ करज्यो धन्न, अन्य थानकें करज्यो जतन्न । त्रिणस्यकोड्यने तहोत्तर कोडि, लाख सीतोतर उपर जोडि ।।९।। वली उपर द्रव्य दोय हजार, जईन कारज खरचे धन सार। वस्तुपाल पाम्यो जसवाद, आबूगढ कीधों प्रसाद ।।१०।। बारकोड्यने पन्नलाख, तिहां खरच्यां केरी भाख | देहरें आलीया सोहामणा, देरांणी जेठांणी तणा ||११|| नव-नव लाख पीरोजी जोय, खरचें घरनी नारी दोय । नेमनाथनें जोहारी करी, त्रिण भुवनें हुआ छे अती(ति)रूली ।।१२।। एकसो आठ मण पी(पि)त्तल तणि(णी), रिखभदेवनी प्रतिमा सू(सु)णी। परिकर सहित सूंदर आकार, जुहारि(री) सफल करस्यों अवतार ||१३|| बत्रीस वरसनु आउखु जेह, स्वर्गाधिक सू(सु)रवर नरपती(ति) पांमे तेह । छंद भावे भणस्ये जेह, सुख संपत पांमे तेह ||१४||
॥ इति श्रीवस्तुपाल-तेजपाल संबंध छंद संपूर्णम् ।।
ज्ञानमंदिरनु आगामी प्रकाशन * चित्तप्रदेशमा अनुभवाता संक्लेशना पावकने ठारी आपतुं शब्दनीर ___ एटले समाधान... * कर्मविज्ञान अने कर्मसिद्धांतनी पायानी समज आपतो शब्दसंवाद
एटले समाधान... प्रियदर्शननी प्रशांत कलमे आलेखायेलुं जीवनना साचा रहस्योने प्रगट करतुं पुस्तक एटले...
समाधान लेखक : प. पू. आचार्यदेव श्री भद्रगुप्तसूरीश्वरजी म. सा.
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पाण्डुलिपि : एक परिचय
डॉ. उत्तमसिंह भारतीय संस्कृति व उसका साहित्य श्रुतपरंपरा से संरक्षित होता हुआ पाण्डुलिपियों के माध्यम से सुरक्षित रहा है। छापेखाने के विकास से पूर्व स्वाध्याय व ज्ञान-प्रसार का आधार ये पाण्डुलिपियाँ ही थीं। हमारे आचार्यों, मनीषियों, साधु-साध्वियों एवं श्रुतसेवी विद्वानों ने धार्मिक प्रभावना एवं उन्नत जीवन-निर्माण हेतु सहस्रों ग्रन्थ ताडपत्र, भोजपत्र, कपडे एवं कागजों पर लिखकर भारतीय ज्ञानपरंपरा को सदियों से जीवित एवं सुरक्षित रखा है। इन पाण्डुलिपयों को अलग-अलग प्रदेशों में विविध नामों से जाना जाता है। कहीं इन्हें हस्तप्रत कहा जाता है तो कहीं मातृका, पोथी, पुस्तक, प्रत, पाण्डुलिपि, हस्तलेख, मक्तुताज, कृति, ताळितोळ, मेन्युस्क्रिप्ट आदि नामों से जाना जाता है।
एक समय ऐसा भी था जब हिन्दुस्तान को सोने की चिडिया कहा जाता था, अर्थात हिन्दुस्तान में सर्वाधिक धन-संपदा थी। उस समय इन पाण्डुलिपियों को भी प्रमुख संपदा के रूप में गिना जाता था। इसी ज्ञाननिधि के कारण हिंदुस्तान को जगद्गुरु की पदवी प्राप्त हुई।
। उस समय श्रेष्ठ लहियाओं से एक ही पाण्डुलिपि की कई प्रतिलिपियाँ तैयार करवाकर विद्वानों एवं स्वाध्यायियों को अध्ययनार्थ उपलब्ध कराई जाती थीं। यही कारण है कि आज एक ही ग्रन्थ की कई प्रतियाँ विभिन्न स्थानों पर प्राप्त हो जाती हैं। विभिन्न पाण्डुलिपि संग्रहालय भी इसी प्रवृत्ति के परिणाम हैं। पाटण, जैसलमेर, नागौर, जयपुर, बीकानेर, सूरत, छाणी, लींबडी, अहमदाबाद, कोबा, वडोदरा, पूना, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, तंजावुर, रजा-रामपुर आदि अनेक स्थानों के पाण्डुलिपि संग्रहालय भारत की सांस्कृतिक निधियाँ हैं। हमारे पूर्वजों, साधु-साध्वियों एवं श्रेष्ठियों ने इन संग्रहालयों की सुरक्षा करके संस्कृति के संरक्षण में जो योगदान दिया है वह अविस्मरणीय और आगे आनेवाली पीढियों के लिए एक प्रेरक उदाहरण है।
कहा जाता है कि कलिकाल-सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य ने हैमशब्दानुशासन की प्रतिलिपियाँ तैयार कराने हेतु चारसौ लहियाओं को एक साथ बैठाकर चारसौ प्रतियाँ तैयार कराईं और हिंदुस्तान के विविध भण्डारों में रखवा दी। जिसके कारण इस ग्रन्थ की एकाधिक प्रतिलिपियाँ आज भी ग्रन्थागारों में आसानी से मिल जाती हैं। इसी प्रकार रामायण, महाभारत, गीता, अभिज्ञान शाकुन्तल आदि
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श्रुतसागर ४०
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११
ग्रन्थों की हस्तलिखित प्रतियाँ भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती हैं। इन एकाधिक प्रतियों के आधार पर ही इन ग्रन्थों की समीक्षित आवृत्तियाँ तैयार की जा सकी हैं, जो कर्ता अभिप्रेत शुद्ध पाठ का निर्धारण करने में सहायक सिद्ध होती हैं।
मार्जिन - हाँसिया
ये पाण्डुलिपियाँ एक विशेष पद्धति से लिखी जाती थीं। इनमें शब्दों को मिलाकर लिखा जाता था, अर्थात् दो शब्दों के बीच स्थान नहीं छोड़ा जाता था । मात्राएँ भी विशेष प्रकार से लगाई जाती थीं, जिनमें अग्रमात्रा एवं पृष्ठमात्रा (खडी - पाई, पडी - पाई) का विशेष प्रचलन था । वाक्य समाप्ति या प्रसंग समाप्ति पर कोई पैराग्राफ नहीं बनाया जाता था। कुछ अक्षर विशेष प्रकार से लिखे जाते थे । पत्र के दोनों ओर मार्जिन हाँसिया छोडा जाता था। पत्र के मध्य में विविध प्रकार की मध्यफुल्लिकाएँ बनाई जाती थीं, पत्र के एक ओर पत्रांक लिखा जाता था | चित्रित प्रतों में प्राकृतिक रंगों तथा सोने-चाँदी की स्याही द्वारा प्रसंगानुरूप चित्र भी बनाये जाते थे। उस समय विशेष ध्यान रखा जाता था कि कम से कम साधन-सामग्री में अधिक से अधिक लेखन कार्य हो सके। क्योंकि साधन बहुत सीमित थे | ताडपत्र, भोजपत्र, कागज, स्याही, कलम आदि लेखन-सामग्री आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती थी। यही कारण रहा होगा कि पाण्डुलिपियों में लिखित वर्णों, शब्दों आदि के बीच में स्थान नहीं छोड़ा गया होगा । यहाँ पाण्डुलिपि स्वरूप एवं विविध नामावली का उल्लेख निम्नवत् है -
पाण्डुलिपि स्वरूप विवेचन
मूल जिह्वा क्षेत्र
मध्यफुल्लिका
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हंसपाद / काकपाद या मोर -पगलूँ आदि चिह्न
छिद्रके / चन्द्रक
मूलजिह्वाक्षेत्र : यह स्थान पाण्डुलिपि का मूल भाग होता है, जहाँ अभीष्ट ग्रन्थ लिखा जाता है। इसके ऊपर-नीचे तथा दायें-बायें योग्य रिक्त स्थान छोडा जाता है जिसे मार्जिन हाँसिया क्षेत्र कहते हैं ।
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मार्जिन - हाँसिया : हाँसिया का उपयोग प्रमादवश छूटे हुए अक्षर, पतितपाठ एवं उपयोगी टिप्पण लिखने हेतु किया जाता था । पाण्डुलिपि लेखन के
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मई २०१४
समय यदि कोई पाठ लिखना रह गया हो और वह बहुत ही उपयोगी हो तो कुछ विशेष चिह्नों द्वारा उस स्थान को चिह्नित कर इस मार्जिन - हाँसिया क्षेत्र में लिख दिया जाता था। कई बार किसी कठिन शब्द का अर्थ भी इस क्षेत्र में लिखा हुआ मिलता है।
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हंसपाद, काकपाद या मोर-पगलूँ : यह चिह्न गणित के 'X' 'गुणा' के निशान जैसा होता है, इसके माध्यम से प्रत के मूल जिह्वा क्षेत्र में यदि कुछ शब्द, वर्णादि जोडना हो तो उस स्थान पर 'A' 'V' इस प्रकार का चिह्न बनाकर मार्जिन - हाँसिया वाले क्षेत्र में काकपाद का चिह्न बनाकर उस वर्ण को लिख दिया जाता था। यह वर्ण उसी पंक्ति के सामने लिखा हुआ मिलता है जिसमें ये चिह्न बने हों । अर्थात् इस पंक्ति में जो कुछ छूट गया है या लिखे हुए को मिटाया है या लेखन में पुनरावृत्ति हो गई है तो उसे काकपाद के माध्यम से दर्शाकर प्रत के मार्जिन - हाँसिया क्षेत्र में लिख दिया जाता था । यदि छूटा हुआ पाठ अधिक हो और उसके सामने वाले मार्जिन हाँसिया में नहीं लिखा जा सकता हो तो उस पाठ को प्रत के ऊपर अथवा नीचे वाले हाँसया क्षेत्र में लिखकर उस पंक्ति के अन्त में ओ / पं. लिखकर जिस पंक्ति में उसे जोडना हो उसकी संख्या लिख दी जाती थी ।
इस चिह्न का मुख्य रूप से उपयोग होने का एक और भी कारण प्रतीत होता है, क्योंकि उस समय प्रत लेखन के साधन अत्यन्त सीमित और अल्प थे । अतः कम स्याही, कागज, ताडपत्र, भोजपत्र आदि सामग्री में अधिक से अधिक लिखना हो जाये इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था। क्योंकि उस समय एक ग्रन्थ लिखने हेतु आवश्यक सामग्री एकत्र करने में ही काफी समय गुजर जाता था। इसी लिए इन चिह्नों का सहारा लेना हमारे पूर्वाचार्यों ने अत्यन्त आवश्यक समझा होगा ।
मध्यफुल्लिका : यह चिह्न पञ्चभुज, षड्भुज या चतुर्भुज के आकार का होता है जो प्रत के मध्य भाग में बनाया हुआ मिलता है। संभवतः मध्य भाग में मिलने के कारण ही इसका नाम मध्यफुल्लिका पडा होगा। यह मध्यफुल्लिका समय के साथ और भी सुन्दर चित्रों से सुसज्जित होने लगी । यहाँ कुछ प्रतों में प्राप्त मध्यफुल्लिकाओं की प्रतिकृति निम्नवत् है :
& N
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श्रुतसागर ४०
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इस प्रकार के चिह्न कई प्रतों में अलग-अलग स्याहियों द्वारा बने हुए भी मिलते हैं। कई बार इस प्रकार का चिह्न तो बना हुआ नहीं मिलता है, लेकिन प्रत के बीचों-बीच इसी आकार का स्थान खाली छोड दिया जाता था। कागज पर लिखे हुए ग्रन्थों में विविध प्रकार की चित्रित मध्यफुल्लिकाएँ देखने को मिलती हैं। कहीं-कहीं तो लहियाओं ने अक्षरों को लिखते समय इस प्रकार से स्थान छोड़छोड़ कर लिखा है कि रिक्तस्थान में स्वतः ही मध्यफुल्लिका बनी हुई दिखाई देती है। जिसे लहियाओं की लेखनकला का उत्कृष्ट नमूना कहा जा सकता है।
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छिद्रक : अधिकांशतः ताडपत्रीय प्राचीन प्रतों में छिद्रक मिलता ही है। यह प्रत के मध्य भाग में एक छोटा-सा छिद्र होता है। इस छिद्रक का पाण्डुलिपि संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसमें एक पतली रस्सी पिरोकर ग्रन्थ के जितने फोलियो होते हैं उन्हें एकत्रित करके ग्रन्थ के उपर-नीचे लकडी के पुट्ठे लगाकर एक साथ कसकर बाँध दिया जाता था। क्योंकि प्रतों में सर्वाधिक नुकसान उनके शिथिल बन्धन' के कारण होता है । अतः इस छिद्रक के माध्यम से पत्रों को कसकर बाँध दिया जाता था, जिससे कोई पत्र खोए नहीं, पूरा ग्रन्थ एक साथ उपलब्ध हो सके या आँधी-तूफान में उसके पत्र उड न जायें। इस छिद्रक के माध्यम से एक प्रकार से कहें तो प्रत बाइण्डिंग का काम होता था ।
चन्द्रक : चन्द्रक भी प्रत के मध्य भाग में देखने को मिलता है। चाँद के जैसा दिखने के कारण इसे चन्द्रक नाम दिया गया प्रतीत होता है। छिद्रक और चन्द्रक में फर्क सिर्फ इतना है कि छिद्रक ताडपत्रीय पाण्डुलिपियों में एक छिद्र के रूप में होता है जबकि चन्द्रक कागज की पाण्डुलिपियों में छिद्र करने के वजाय उस स्थान को लाल अथवा काली स्याही से गोल चंद्र जैसा रंग दिया जाता था ।
संभवतः यह चंद्रक की परंपरा छिद्रक के बाद की है, और प्राचीन ताडपत्रीय परंपरा को जीवित रखने हेतु कागज पर लिखित प्रतों में इस चंद्रक का प्रयोग प्रारंभ हुआ होगा। क्योंकि यदि कागजीय प्रतों में भी ताडपत्र की तरह ही मध्य में छिद्र किया जाता तो वह कागज सबसे पहले वहीं से फट जाता। इसलिए कागज की प्रतों में छिद्रक के स्थान पर चंद्रक की परंपरा का विकास हुआ होगा। वैसे भी जब कागज का निर्माण हुआ तब तक हमारे प्रबुद्ध मनीषी इन कागज की प्रतों को सुरक्षित रखने के लिए अन्य विकसित साधनों का आविष्कार कर चुके थे। जैसे कि लाल कपडे में लपेट कर रखना, दाबडा, संच, कबाट, पेटी-पटारा आदि में १. तैलाद्रक्षेज्जलाद्रक्षेद् रक्षेच्छिथिलबन्धनात् । परहस्तगताद्रक्षेदेवं वदति पुस्तकम् ।।
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मई - २०१४ प्राकृतिक जडी-बूटियों के साथ रखना, वर्षात के समय में ग्रन्थों को बाहर नहीं निकालना, वर्ष में एक बार हल्की धूप में ग्रन्थों को रखना आदि।
भारतीय कला-साहित्य एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने और इसकी निरन्तरता को बनाए रखने में तीर्थक्षेत्रों, मन्दिरों, साधु-साध्वियों, विद्वानों, गुरुकुल, शिक्षण संस्थानों तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर किये गये प्रयत्नों तथा स्वाध्याय, प्रवचन, शास्त्र-सभाओं, शास्त्र-भण्डारों आदि की अहम् भूमिका रही है। किन्तु इन प्रयत्नों के उपरान्त भी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व की बहुत-सी अमूल्य धरोहर उचित संरक्षण एवं रख-रखाव के अभाव में यत्र-तत्र बिखरी हुई है। हमारी महत्त्वपूर्ण मूर्तियाँ, दुर्लभ ग्रन्थ व कलात्मक-सामग्री उचित एवं वैज्ञानिक संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रही है। ऐसे समय में हमारा कर्त्तव्य है कि हमारी कला एवं संस्कृति की अमूल्य धरोहर स्वरूप विरासत को सुरक्षित एवं संरक्षित करके भावी पीढी को हस्तान्तरित कर अपने पूर्वजों की परम्परा को बचाए रखें
और पितृ-ऋण से ऊर्ण हों। आज से लगभग दोसौ वर्ष पूर्व महाराजा सयाजीराव तृतीय के समय में वडोदरा के ज्ञानभण्डार में पाण्डुलिपियों को रखने हेतु ग्रन्थागार में अलमारियों का अभाव था तब महाराजा ने आदेश दिया कि 'आभूषणों को रखने हेतु जो अलमारियाँ राजदरबार में हैं उन्हें खाली करके उनका उपयोग मूल्यवान हस्तप्रतों को सुरक्षित रखने हेतु किया जाये। __पूर्वाचार्यों एवं विशिष्टकोटी के श्रुतधरों द्वारा आलेखित महती श्रुतसंपदा को सुरक्षित एवं संरक्षित रखना हमारा नैतिक कर्तव्य है. इस श्रुतसंपदा का संरक्षण के साथ संवर्धन एवं प्रकाशन होता रहे इसी मंगलकामना के साथ... धन्यवाद!
संदर्भ ग्रन्थ १. भारतीय प्राचीन लिपिमाला, लेखक-रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा । २. जैन श्रमणसंस्कृति अने लेखनकला, लेखक-मुनिश्री पुण्यविजयजी म.सा.। ३. प्राचीन भारतीय लिपि एवं अभिलेख, लेखक-डॉ. गोपाल यादव । ४. भारतीय प्राचीन लेखनकला और उसके साधन, हिंदी अनुवाद-डॉ. उत्तमसिंह । ५. हस्तप्रत विज्ञान, लेखक-डॉ. जयन्त पी. ठाकर। ६. हस्तप्रतोने आधारे पाठसंपादन, लेखक-डॉ. हरिवल्लभ चुनीलाल भायाणी । ७. संस्कृत पांडुलिपिओ अने समीक्षित पाठसंपादन विज्ञान, लेखक-डॉ. वसन्तकुमार भट्ट।
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प्राणातिपात
मृषावाद
अदत्तादान
संयम अभिलाषा
हीरेन जयंतीलाल महेता (राग - हरिगीत छंद) डगले अने पगले सतत हिंसा मने करवी पडे ते धन्य छ जेने अहिंसापूर्ण जीवन सांपडे क्यारे थशे करुणाझरणथी आर्द्र मारुं आंगणुं आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बर्नु! ।।१।। क्यारेक भय क्यारेक लालच चित्तने एवा नडे
व्यवहारमा व्यापारमा जूटुं तरत कहेवू पडे E. छे सत्यमहाव्रतधर श्रमण- जीवनघर रळियामj
आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ||२|| जे मालिके आप्या वगरनुं तणखलुं पण ले नहि वंदन हजारो वार हो ते श्रमणने पळपळ महीं हुं तो अदत्तादान माटे गाम परगामे भमुं आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ||३|| जे इन्द्रियोने जीवननी क्षण एक पण सोंपाय ना मुज आयऱ्या आयुं वीत्युं ते इन्द्रियोना साथमा लागे हवे श्री स्थूलभद्रतणुं स्मरण सोहामणुं आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ।।४।। नवविध परिग्रह जिंदगीभर हुं जमा करतो रह्यो धन लालसामां सर्वभक्षी मरणने भूली गयो मूर्छारहित संतोषमा सुख छे खरेखर जीवनआ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ।।५।। अबजो वरसनी साधनानो क्षय करे जे क्षणमहीं जे नरकनो अनुभव करावे स्व परने अहि ने अहीं ते क्रोधथी बनी मुक्त समतायुक्त हुं क्यारे बचें आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ।।६।।
मैथुन
परिग्रह
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10 lle
Velle
लोभ
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कलह
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जिनधर्मतरुना मूल जेवा विनयगुणने जे हणे
जे भलभला ऊंचे चडेलाने य तरणा सम गणे ते दुष्ट मान सुभटनी सामे बळ बने मुज वामणुं आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनुं ! ।।७।।
श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्रने जेणे बनाव्या स्त्री अने संक्लेशनी जालिम अगनमां जे धखावे जगतने ते दंभ छोडी सरळताने पामवा हुं थनगनुं
आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनुं ! ||८||
जेनुं महासाम्राज्य एकेन्द्रिय सुधी विलसी रह्युं जेने बनी परवश जगत आ दुःखमां कणसी रह्यं जे पापनो छे बाप ते धन लोभ में पोष्यो घणुं आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनुं ! ।।९।।
मई २०१४
·
तन धन स्वजन जीवन उपर में खूब राख्यो राग पण ते रागथी करवुं पड्युं मारे घणा भवमां भ्रमण मारे हवे करवुं हृदयमां स्थान शासनरागनुं
आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनुं ! ||१०||
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में द्वेष राख्यो दुःख उपर तो सुख भने छोडी गयुं सुख दुःख पर समभाव राख्यो, तो हृदयने सुख थयुं समजाय छे मुजने हवे, छे द्वेष कारण दुःखनुं आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनुं ! ||११|| जे स्वजन तन धन उपरनी ममता तजी समता धरे बस, बारमो होय चन्द्रमा तेने कलह साथे खरे जिनवचनथी मघमघ थजो मुज आत्मना अणुए अणु आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनुं ! ||१२||
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अभ्याख्यान
पैशुन्य
रति-अरति
श्रुतसागर - ४०
जो पूर्वभवमा एक जूटुं आळ आप्युं श्रमणने सीता समी उत्तम सतीने रखडपट्टी थई वने इर्ष्या तजु, बनुं विश्ववत्सल, एक वांछित मनलj
आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ||१३ ।।
मारी करे, कोइ चाडीचूगली ए मने न गमे जरी ६ तेथी ज में, आ जीवनमां नथी कोई पण खटपट करी
भवोभव मने नडजो कदी ना पाप आ पैशुन्यनुं आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बचें! ।।१४।। क्षणमां रति क्षणमा अरति आ छे स्वभाव अनादिनो दुःखमां रति सुखमां अरति लावी बनुं समता भीनो संपूर्ण रति बस, मोक्षमा हुं स्थापवाने रणझj आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे ब! ||१५||
अत्यंत निन्दापात्र जे आ लोकमां य गणाय छे र ते पाप निन्दा नामर्नु तजनार बहु वखणाय छे
तर्जु काम नक्कामु हवे आ पारकी पंचातनुं आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ||१६ ।। माया मृषावादे भरेली छे प्रभु! मुज जिंदगी ते छोडवानुं बळ मने दे, हुं करूं तुज बंदगी बनु साच दिल आ एक मारूं स्वप्न छे आ जीवनआ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ।।१७।। सहु पापर्नु, सहु कर्मनु, सहु दुःखनुं जे मूल छे मिथ्यात्व भंडं शूल छे, सम्यक्त्व रुडुं फूल छे
निष्पाप बनवा हे प्रभुजी! शरण चाहुं आपनुं के आ पापमय संसार छोडी श्रमण हुं क्यारे बनें! ।।१८।।
मिथ्यात्वशल्य माया-मृषावाद पर-परिवाद
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काव्यशास्त्री यशोविजयगणि
हीरालाल र. कापडिया भाषाना उद्भव पछी भाषाना स्वरूपादिनो बोध कराववा माटे तेमज ए विकृत थती अटके ते माटे जेम व्याकरणनी रचना कराय छे एम सामान्य रीते जेम मनाय छे, तेम काव्यो रचाया बाद एनी शास्त्रीय चर्चा माटे काव्यशास्त्रनी योजना संभवे एम मनातुं होय तो ना नहि. ए गमे ते हो पण एक ज व्यक्ति काव्यो पण रचे-कवि तरीके नामना मेळवे, अने साथे साथे विद्वद्भोग्य काव्यशास्त्र पण रचे एवी घटना अल्प प्रमाणमां बने.
जैन साहित्यनो विचार करीशुं तो जणाशे के आ साहित्य पण आ परिस्थितिथी पर नथी. कवि अने साथे साथे काव्यशास्त्री पण होय एवी जैन व्यक्तिओ तरीके बप्पभट्टिसूरि, "कालिकालसर्वज्ञ हेमचन्द्रसूरि, वायड गच्छना अमरचन्द्रसूरि अने न्यायविशारद न्यायाचार्य यशोविजयगणिनो हुँ उल्लेख करुं छं.
आ यशोविजयगणि प्रबळ तार्किक तरीके तेमज चार भाषाना गणनापात्र कवि तरीके जेटला सुप्रसिद्ध छे एटला काव्यशास्त्री तरीके जाणीता नथी एथी एमनो आ रीतनो परिचय आपवा हुं प्रेरायो छु अने एनुं फळ ते आ प्रस्तुत लेख छ -
यशोविजयगणिनी जे कृतिओ उपलब्ध तेमज अनुपलब्ध जाणवामां छे तेमां तो गणिए काव्यशास्त्रने अंगे कोई स्वतंत्र कृति रच्यानु जणातुं नथी. एमणे निम्नलिखित कृतिओ उपर संस्कृतमा वृत्ति रची छे -
(१) मम्मटकृत काव्यप्रकाश
(२) 'कलि.' हैमचन्द्रसूरिकृत काव्यानुशासननी स्वोपन वृत्ति नामे अलंकारचूडामणि.
आ उपरांत 'वायड' गच्छना अमरचन्द्रसूरिकृत काव्यकल्पलता उपर पण एमणे वृत्ति रची एम केटलाकनु कहेवू छे.
यशोविजयगणिए पोतानी कोई कृतिमा काव्यप्रकाश उपर पोते वृत्ति रच्यानो उल्लेख को छे खरो? बाकी प्रतिमाशतकना त्रीजा पद्यनी तेमज नवमा पद्यनी स्वोपज्ञ वृत्तिमां 'काव्यप्रकाशकार' एवो उल्लेख करी एमनो-मम्मटनो मत दर्शाव्यो
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श्रुतसागर - ४०
सद्भाग्ये काव्यप्रकाशनी वृत्तिनी एक अपूर्ण हाथपोथी मळे छे. ए बीजा अने त्रीजा उल्लासने अंगे छे.
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एमां विविध मतो दर्शावी यशोविजयगणिए पोतानो अभिप्राय दर्शाव्यो छे. जिनरत्नकोश (विभाग १, पृ. ९०) मां A Descriptive Catalogue of manuscripts in the Jain Bhandars at Pattan (Vol. I, p. १०७ ) नी नोंध छे अने ए द्वारा पाटणना भंडारमां काव्यप्रकाशनी उपर्युक्त वृत्ति होवानो उल्लेख कर्यो छे, पण आ सूचीपत्रना' आ पाना उपर तो आ वृत्तिनो उल्लेख जणातो नथी तेवं म? जो आ वृत्तिनी ताडपत्रीय प्रत पाटणना भंडारमां होय तो ए छपाववी घटे.
-
अलंकारचूडामणि उपर यशोविजयगणिए वृत्ति रची छे ए वात प्रतिभाशतक ( श्लो. ९) नी स्वोपज्ञ वृत्ति (पत्र ३०) मांनी निम्न लिखित पंक्ति उपरथी फलित थाय छे
“प्रपञ्चितं चैतदलङ्कारचूडामणि वृत्तावस्माभिः "
आवृत्ति अत्यार सुधी तो मळी आवी नथी. उपर्युक्त नवमा श्लोकना उत्तरार्धमां कह्युं छे के जे अहीं - जैन शासनमां- जिननी मूर्तिने जिनना समान न जाणे तेवा पुरुषने को पंडित मनुष्य जाणे? तेने तो शींगडां अने पूंछडा वगरनो स्पष्टपणे पशु जाणे. आ संबंधमां स्वोपज्ञ वृत्ति (पत्र ३० ) मां नीचे मुजब कथन छे -
''शृङ्गपुच्छाभावमात्रेण तस्य पशोर्वैधर्म्यम्, नान्यदित्यर्थः । व्यतिरेकालङ्कारगर्भोऽत्राक्षेपः । उपमानाद् यदन्यस्थ व्यतिरेकः स एव स इति काव्यप्रकाशकारः । न च व्यतिरेक उत्कर्ष इत्यत्रानुक्तिसम्भवः ।”
" हनूमदाद्यैर्यशसा मया पुनर्द्विषांऽ हसैर्दुत्यपथः सितीकृत:' इत्यादावपकर्षेऽपि तद्दर्शनात्। प्रपञ्चितं चैतदलङ्कारचूडामणि वृत्तावस्माभिः ।" आनो अर्थ ए छे के ते पुरुषमां अने पशुमां, शींगडां अने पूंछडाना अभाव पूरतुं ज वैधर्म्य छे - तफावत छे. अहीं 'व्यतिरेक' अलंकारथी गर्भित 'आक्षेप' छे. उपमानथी अन्यनो जे व्यतिरेक अर्थात् वैधर्म्य थाय ते ज व्यतिरेक ते 'व्यतिरेक' अलंकार छे एम काव्यप्रकाशना कर्तान
१. मुखपृष्ठ उपर आनुं नाम पत्तनस्थ प्राच्यजैनभाण्डागारीयग्रन्थसूची छे. २. "दूतपथः " ए पाठ मुद्रित पुस्तकमां जोवाय छे अने ए समुचित जणाय छे. ३. आ श्री हर्षकृत नैषधचरित ( सर्ग ९) ना १२२मा पद्यनो उत्तरार्ध छे,
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२०
मई - २०१४ कहेतुं छे. व्यतिरेकमां उत्कर्ष होवो जोईए अर्थात् अपकर्ष नहि एम कोई शंका करे तो ते योग्य नथी, केमके
"हनुमदा...सितीकृतः५.... इत्यादिमां अपकर्षमां पण 'व्यतिरेक अलंकार जोवाय छे. आ वात अमे अलंकारचूडामणिनी वृत्तिमा चर्ची छे.
आम जे अलंकारचूडामणिनी वृत्तिनो अने एमां आलेखायेली बाबतनो जेम प्रतिमाशतकनी स्वोपज्ञ वृत्तिमा उल्लेख छ तेम यशोविजयगणिनी अन्य कोई कृतिमा छे? जो होय तो ते ते उल्लेख एकत्रित करवा घटे.
प्रतिमाशतकना नवमा श्लोकने अंगे जेम अलंकारनो उल्लेख छ तेम एना बीजा पण केटलाक श्लोक माटे एनी स्वोपज्ञ वृत्तिमा उल्लेख छे.
एना आधारे वकील मुलचंद नथुभाईए प्रतिमाशतकना अने एना उपरनी भावप्रभसूरिकृत लघुवृत्तिना भाषांतरमां के जे भीमशी माणेके वि. सं. १९५९ मां मूळ सहित प्रकाशित कर्यु छे तेमां नोंध लीधी छे. आ बाबत हुं नीचे मुजब रजू करूं छु - श्लोकांक | स्वोपज्ञ वृत्ति भाषांतर
अलंकार (पत्रांक)। (पृष्ठांक)
उत्प्रेक्षा अने उपमा
स्वरूपोत्प्रेक्षा १६-१७
रूपकगर्भ अतिशयोक्ति अने असंबंधमां संबंधरूप अतिशयोक्ति काव्यलिंगथी उद्भवती अतिशयोक्ति उपमा व्यतिरेक गर्भित आक्षेप विनोक्ति, रूपक अने काव्यलिंग अने ए त्रणथी उदभवतो संकर
११
१. आनो अर्थ ए छे के हनुमान वगेरेए दूतनो मार्ग यश वडे श्वेत बनाव्यो छे. ज्यारे में (नळे)
तो ए कार्य दुश्मनोना हास्य वडे कर्यु छे एटले के हुं दुश्मनोनो हांसीपात्र बन्यो छु.
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७२
३५
श्रुतसागर - ४० श्लोकांक | स्वोपज्ञ वृत्ति | भाषांतर
अलंकार (पत्रांक) । (पृष्ठांक) ११ | ४२१
निदर्शना अने अतिशयोक्ति १६
| पर्यायोक्त अने गम्योत्प्रेक्षा जि. र. को. (विभाग १, पृ. ८९) मां अमरचन्द्रसूरिकृत काव्यकल्पलताने अंगेनी विविध वृत्तिनी नोंध छे. एमां ३२५० श्लोक जेवडी वृत्ति यशोविजये रच्यानो अने एनी एक हाथपोथी अमदावादनी हाजा पटेलनी पोळमां आवेला 'विमल' गच्छना उपाश्रयना भंडारमांना पांचमा दाबडानी बीजी हाथपोथी तरीके होवानो उल्लेख छे. आ हाथपोथी नजरे जोया विना आ वृत्ति विषे विशेष शुं कही शकाय?
बीजुं, आ यशोविजय ते प्रस्तुत न्यायाचार्य छ के केम तेनी पण तपास थवी घटे, केमके ए नामना अन्य मुनिवर थई गया छे.
आथी आ भंडारनी हाथपोथी जेने जोवा मळी शके तेम होय तेओ आ बाबत प्रकाश पाडवा कृपा करे एवी मारी तेमने सादर विज्ञप्ति छ. अहीं ए उमेरीश के वज्रसेनना शिष्य हरिए (हरिषेणे) कर्पूरप्रकर नामनी जे कृति रची छे तेनी एक टीका यशोविजयगणिए रच्यानो जि. र. को. (विभाग १. पृ. ६९) मा उल्लेख छे. तो शुं आ गणि ते प्रस्तुत न्यायाचार्य ज छे?
आ वृत्तिनी हाथपोथीओ अमदावादना डेलाना उपाश्रयना भोयतळियाना भंडारमा तेमज पहेला माळना भंडारमा होवानो अहीं उल्लेख छे.
(जैन सत्य प्रकाश, वर्ष-२२, अंक नं. ३-४)
१. अहीं मम्मटनो उल्लेख छे. २. अहीं 'हैम' एवो उल्लेख छे. आवा उल्लेखो एकत्रित कराय तो रत्नापणमा जेम “हैम'
काव्यानुशासनमांथी अवतरण अपायां छे तेम यशोविजयगणिए केटलां अने कया आप्यां छे
ते जाणी शकाय. ३. एमणे त्रिषष्टिसार रच्यानो उल्लेख कर्पूरप्रकरना अंतमा छ. शुं आ कृति कोई स्थळे छे
खरी?
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इच्छाओ अनंत छे
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कनुभाई ल. शाह
प्रभु वीरे कह्युं छे : 'इच्छा हु आगाससमा अनंतया' - इच्छाओ आकाशनी जेम अनंत छे. आकाशने कोई सीमा नथी, कोई किनारो नजरे पडतो नथी. तेवी ज रीते इच्छाओनो कोई किनारो नथी, कोई सीमा नथी. आकाशनुं एक निश्चित क्षितिज देखाय छे. आगळ चालतां ते क्षितिज पण आगळ वधतुं ज जाय छे, ए
तेज इच्छाओनुं क्षितिज खूब ज नजीक देखाय छे परंतु मानवी ज्यारे इच्छाओना क्षितिज सुधी पहोंची जाय छे. त्यारे तेने नवी इच्छाओ नजरे पडे छे, आ प्रमाणे इच्छाओनी पूर्ति थतां नवी इच्छाओ थया ज करे छे.
मानवीना मनमां एक इच्छा जन्म ले छे. ते इच्छा पूर्ण थतां ज बीजी इच्छाओनो जन्म आपो-आप ज थई जाय छे. एक इच्छा परिपूर्ण थतां बीजी इच्छा, त्रीजी इच्छा, चोथी इच्छा एम इच्छाओनी अनंत हारमाळा अस्तित्त्वमां आवती जाय छे.
पशुओ आवा आशाओना हवा महेल चणता नथी. परंतु मनुष्य अचेतन जेवो बनीने आशाओना महेल चणे छे, ज्यारे आ महेल रेतीना घरनी जेम धराशायी थई जाय छे त्यारे ते दुःखी थाय छे. मानवी आशाओना चक्करमा मानव जीवनने बरबाद करी नाखे छे. मानवी बुद्धिशाळी प्राणी होवा छतां आशा - इच्छा-तृष्णाना चक्रव्यूहमां एवो फसाय छे के तेनुं सर्वस्व नष्ट थवा छतां पण चेततो नथी.
कुदरतनो महान नियम पण जीव भूली जाय छे. प्रत्येक क्रियाने कर्मने प्रतिक्रिया होय ज छे. तमे तमारा माटे कंईपण मेळववा कर्म करो अने मेळवो, त्यां ज बात पूरी थती नथी. आ वस्तु मेळववा पाछळ जे कावा - दावा कर्या ते कर्मनुं प्रतिक्रियारूप परिणाम आवे अने नुकशान थाय, बीमारी आवी पडे त्यारे आवुं केम थयुं ? एवो प्रश्न आपणने सहेजे थाय छे. मनुष्यने दुःख अकस्मात आवी पडतुं नथी. कुदरतना नियमानुसार ज आवे छे. ते नियमनुं ज्ञान माणस प्राप्त करे, समजे अने समजीने जीवन जीवे तो दुःख तेनाथी दूर रहेशे अने नवुं दुःख आवशे पण नहि.
धन, धरा अने धणियाणी ज जीवनमां सर्वस्व नथी, सिवाय बीजुं पण घणुं समजवा जेवुं छे अने तो ज तमे आ त्रणे 'ध' कारने सुखपूर्वक भोगवी शको, अन्यथा नहि.
माणस धारे तो सर्व इच्छाओने संतोषी, तेथी उपर पण जई शके अने प्रयाणकाळे तद्दन शांत अने ईश्वरमय बनीने तेनामां भळी जई शके. पण ते माटे तेणे सौ प्रथमथी ज जीवन जीववानी कळा जाणीने तेनुं अनुसरण करवुं जोईए.
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श्रुतसागर - ४०
माणसना मनमां ईश्वरे अगणित शक्ति मूकी छे. प्रकाशनी गति सेकंडे १८६००० माइलनी छे तेनाथी पण वधु गतिमान अने शक्तिशाली मन छे. तेने योग्य रीते समजीने तेनी पासे विवेकपूर्वक काम लेवू जोइए ए ज तेनी चावी छे. __जे आशाओना दास होय छे, ते समस्त संसारना दास होय छे. जे आशाओने पोताना दास बनावी ले छे, संसार तेनो दास बनी जाय छे. शक्तिशाली मनने तेनी इच्छाओनी शृंखलामांथी बहार काढवानुं अने तेने शमन करवानी कळा मनुष्यमां आवी जाय तो, शक्तिशाळी मनने संसारना धार्मिक-सामाजिक अने शैक्षणिक कार्योमा जबरजस्त उपयोगमा लइ शकाय. ___ मनुष्य जातने बरबाद करनारी आशा ए महामारी छे, राक्षसी छे. आशा झेरनी वेल छे, जन्म-मरण- कारण पण आशा छे. सर्व दुःखोनी जनेता आशा छे. जो जीवननी आशा अमृत बनी शके तो ते झेर पण बनी शके छे.
एक कविए कह्यु छ : तृष्णा न जीर्णा, वयमेव जीर्णाः |
तृष्णा क्यारेय पण घरडी थती नथी, जीर्ण थती नथी, परंतु मनुष्य जीर्ण थई जाय छे. हकीकतमां जोइए तो जीवन जीर्ण थतानी साथे आशाओ पण जीर्ण थवी जोईए, परंतु आनाथी विपरीत ज थाय छे.
अधिकनी आशा असाध्य रोग छे, आशाओथी मुक्ति रोग मुक्ति छे.
अधिक आशाना चक्करमा भ्रमरनो केवो विनाश थाय छे तेनुं नीतिशतकना एक श्लोकमां आपेलुं दृष्टांत चित्तने हलबलावी नाखे तेवू छे. रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम् भारवानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्रीः । इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे, हा हन्त! हन्त! नलिनी गज उज्जहार ।।
अर्थात् - रात चाली जशे, सुंदर प्रभात थशे. सूर्य उदय पामशे, कमळनी शोभा हसी उठशे. ए प्रमाणे ज्यारे कमळना गर्भमा रहेलो भ्रमर विचारे छे त्यारे - अरे, अफसोस, अफसोस... हाथी कमळलताने उखेडीने खाई गयो.
सूर्यथी विकास पामनार कमळमां संध्या समये पांखडीओनी वच्चे बंध भमरो कमळनी सुगंधीना आकर्षणमा मग्न बनी जाय छे. ते पोते कमळमां पूराई जाय छे. तेणे धार्यु होत तो कमळने तोडीने ते बहार आवी शक्यो होत! परंतु ते कमळनी सुगंधीमां आशक्त बनीने बहार आववानुं विचारतो नथी. परंतु सूर्योदय थतां सुधी कमळने विकसित थवानी प्रतीक्षा करे छे. ते भमरो मधुर स्वप्नोनी लहेरमां विहरतो हतो तेवामां ज हाथी आवीने भमरा साथेना कमळने खाई गयो. भविष्यनी इच्छाओ अने आशाओना खोटा महेलोनां स्वप्नो सेवीने मानवी पोतानी परलोकनी यात्राने जमीनदोस्त करे छे.
मरण पथारीए पडेल व्यक्तिनी एक मात्र इच्छा-आशा होय छे के मृत्यु
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२४
मई - २०१४ निश्चित छे. आ पछी मने स्वर्गलोकनी प्राप्ति थाय अथवा सत्कर्मना फळरूपे मने परलोकमां सुख मळे. परंतु जीवनपर्यंत आकुळव्याकुळ करनारी आशा जीवनना अंतभागमां पण पीछो छोड़ती नथी अने मनुष्य भवने बगाडे छे. आवी ठगारी इच्छाओ-आशाओ कंई कामनी खरी? परंतु घणा माणसो आशाना वादळ पाछळ सफळतानो सूर्य जुए छे. केमके धर्म भावनाओ अने धर्म क्रियाओनी आशा प्रशंसनीय छे. कारण के आ आशा मानवीने तेना लक्ष्य सुधी लई जाय छे. आ आशा-इच्छानो संबंध मोक्ष सुधी रहे छे. परमात्मा साथे जोडायेल आशा खराब नथी होती. मोक्षनी आशा उपर कोई दूषण लागी शकतुं नथी. मोक्षनी आशा ए संजीवनी छे.
केटलाक साधकोनो मत छे के अंतमां मोक्षनी इच्छा पण छोडवी पड़े छे. वास्तविक रीते जोईए तो मोक्षनी इच्छा छोडवी पडती नथी परंतु कोईक चरमसीमा सुधी पहोंचीने पोतानी मेळे छूटी जाय छे. मोक्षनी आशानो त्याग करनार दानपुण्यनी आशानो त्याग पण करी शके छे. अंते आ ज भावना होवी जोईए के आवी आशाओ उच्च कक्षाए पहोंचता आपोआप पोतानी मेळे छूटी जाय छे. जेमके साधु बन्या पछी द्रव्यपूजा वगैरेनी इच्छा छूटी जाय छे.
केटलाक लोको एवा छे के जेमने कांई न जोईए. पछी ते सोनामहोर होय के विश्वनुं साम्राज्य पण होय, एमने ए तृणवत् भासे छे. आगामी जीवन माटे विचार्यु होत तो कंइ सारं थात! आ जन्ममां कंइ न कर्यु, कंइ मेळव्यु नहि तेथी भावि जन्ममा कंइ मळवानी तक नथी.
आशाना त्यागनो अर्थ एवो कदापि थतो नथी के निराश थइ जq. निराशा आशानी दास करतां वधारे भयंकर होय छे. तमे जीवनमां गमे तेटला निष्फळ थइ जाओ परंतु निराश थशो नहि. प्रतिक्षण आशाना किरणो तमारी साथे रहेवां जोइए. परंतु उत्तम कार्योनी आशा करजो. खराब कार्योनी आशा राखनार एक दिवस पोते ज खाली थइ जाय छे. जाते ज कंइ करी छूटवानी, कंइक थवानी अने आत्मोन्नतिनी आशा राखवी जोईए. जो मानवी विश्वना कल्याणनी कामना करे,
कपिलनी आशाए तेने सम्राटना साम्राज्य सुधी पहोंचाडी दीधो. ज्यारे त्यां पण तेने तृप्ति थइ नहि त्यारे ते आकांक्षा रहित थइ आत्मतृप्ति थइ केवळज्ञानी बनी गया. आ प्रमाणे जीवन मांगल्यनी साधना माटे शुभ भावनाओ-आशाओगें अस्तित्व विकासन ज कारण छे, विनाशनं नहि.
इच्छाओनी अनंतता ए दुःखनु मुळभूत कारण छे, इच्छाओनो निरोध सुख छे. सुखनी इच्छा दुन्यवी दृष्टिए पुष्कळ धन कमाईने एशआरामनुं जीवन जीवq एटले के दुनियानी दृष्टि धन उपर छे. ज्ञानीओनी दृष्टि धर्म उपर छे. दुनियानी दृष्टि वैभव पर छे ज्यारे ज्ञानीओनी दृष्टि विरति उपर छे. धन होय ते महान नहि परंतु
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श्रुतसागर - ४० धर्म करी शके ते महान. वैभवी जीवन सारं नहि परंतु विरती प्राप्त करवी ते सारं जीवन छे. ज्ञानीओनी दृष्टि क्षुल्लक पदार्थों पर नहि परंतु शाश्वत पदार्थो पर छे.
देवो सुखने पराधीन छ माटे ते धर्म करी शके नहि तमने इच्छा थाय तो तमे नवकारशी करी शको, सामयिक करी शको, अरे तमने भाव जागे तो दीक्षाय लई शको, देवो आ बधुं करी शके? देवो सुखने पराधीन छे, नारकीयो दुःखने पराधीन छे, तिर्यंचो परिस्थितिने पराधीन छ ज्यारे मानव सर्व रीते स्वाधीन छे. माटे मानव जे धर्म करी शके एवो धर्म करवानी ताकात कोइनामांय नथी. तेथी ज श्री सिद्धर्षिगणिए उपमिति भव प्रपंचा कथामा मानवभवनी दश दृष्टांते दुर्लभता दर्शावी छे. आवो मानवभव आशा-इच्छा-तृष्णाना चकरावामां वेडफी देवाय?
'आ जगतमां सुखो सारा नहि, पण आत्माना गुणो सारा छे. सुखना साधनो सारा नहि, पण गुणना कारणो सारां छे. सुख आपे ते सारा नहि, गुण आपे ते सारा छे. आटली वात जडबेसलाक मनमा ठसावी देवानी जरूर छे. भौतिक पदार्थो उपरथी उंचकाईने दृष्टि ज्यां सुधी आत्माना गुणो उपर स्थापित नहि कराय त्यां सुधी प्रशंसवा जेवू शुं छे? के शुं नथी?'
संदर्भ साहित्य १. आ. विजय नयवर्धनसूरि, प्रवचनकार
उपमितिनो रसास्वाद-१, भारतवर्षीय जिनशासन सेवा समिति, वि. सं. २०६० २. लादीवाला, जमनादास के. (अनु.)
इच्छापूर्ति (मंत्र अने तंत्र), लोनावाला, माइन्ड रीसर्च सोसायटी, सने १९६४ अन्तरराष्ट्रीय म्यूजियम दिवस के अवसर पर समारोह का आयोजन
धर्म श्रुतज्ञान एवं कला का त्रिवेणी संगमरूप श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र, कोबा द्वारा संचालित सम्राट संप्रति संग्रहालय के तत्त्वावधान में अन्तरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस (International Museum Day) के अवसर पर दिनांक १८ मई, २०१४ रविवार को एक परिसंवाद का आयोजन किया गया है. परिसंवाद का विषय है '२१वीं सदी में म्युजीयम की आवश्यकता एवं उसकी विशेषताएँ .
परम पूज्य राष्ट्रसन्त श्रुत-तीर्थोद्धारक आचार्यदेव श्रीमत् पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से आयोजित इस परिसंवाद में कला एवं स्थापत्य के मर्मज्ञ डॉ. श्रीधर अंधारेजी एवं श्री नंदन शास्त्रीजी ने मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित होने की स्वीकृति प्रदान की है. गुजरात के विभिन्न भागों से कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में कार्यरत लगभग ३० से ४० प्रतिभागी इस परिसंवाद में उपस्थित होकर अपने अपने विचार प्रस्तुत करेंगे.
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श्री हस्तिनापुर तीर्थ : परिचय
बीनाबेन शाह मूळनायक - श्री शांतिनाथ भगवान, पद्मासनस्थ, गुलाबीवर्ण, ऊँचाइ लगभग ९० से. मी.
तीर्थस्थळ - हस्तिनापुर गाममां आवेल छे. ऐतिहासिकता :
आ तीर्थ हालना नूतन अने प्राचीन तीर्थोमां नु मुख्य महातीर्थ छे. आ तीर्थनो प्राचीन इतिहास श्री आदेश्वर भ. ना समयनो छे. आ तीर्थनुं प्राचीन नाम 'गजपुर' 'नागपुर' 'कुंजरपुर' 'शांतिनगर' 'ब्रह्मस्थळ' 'आसन्दीवत' वि. नो उल्लेख छे. सोमयशना नानाभाई श्री श्रेयांसकुमारे भगवान श्री आदिनाथने अहीं इक्षुरसथी पारणा कराव्या हता. तेनी यादगीरीमां श्री श्रेयांसकुमारे एक स्तूपर्नु निर्माण करी श्री आदिनाथ प्रभुनी चरणपादुका स्थापित कर्यानो उल्लेख छे.
श्री आदेश्वर भगवान पछी श्री शांतिनाथ, श्री कुंथुनाथ अने श्री अरनाथ भगवानना चारे कल्याणक अहीं थयेल छे. जेनी स्मृतिमा स्तूपो निर्माण थयाना उल्लेख छे. आ अनेक जिनालयो अने स्तूपो हालमां नथी. पण भूगर्भमांथी अनेक प्राचीन अवशेषो प्राप्त थाय छे जे प्राचीनतानी याद अपावे छे. हालना आ श्वेतांबर जिनालयनो छेल्लो जीर्णोद्धार वि. सं. २०२१मां मागसर सुद दशमना दिवसे थई फरी प्रतिष्ठित थयेल छे. श्री मल्लिनाथ भ. ना समवसरणनी रचना पण आ तीर्थमां थयेली छे. महाभारतना काळमां कौरवो अने पांडवोनी राजधानी, आ शहेर हतुं.
श्री भरतचक्रवर्तीथी कुल बार चक्रवर्ती राजा थयेल छे. जेमांना छ चक्रवर्तीओनी आ जन्मभूमि छे रामायण काळना श्री परशुरामनी पण आ जन्मभूमि छे. आवा महान आत्माओना जन्म कल्याणक, अने पदार्पणथी पवित्र बनेली आ भूमिनी महानता वर्णन माटे शब्दो ओछा पडे छे.
दिगंबर जैन संप्रदाय अनुसार रक्षाबंधन अथवा श्रावणी पूनमनी महान घटना आ हस्तिनापुर स्थळथी शरु थयेल छे. आम जैन परंपरा अनुसार तथा इतिहास प्रमाणे अनेक तीर्थंकरो चक्रवर्ती राजाओ, महामुनिओ, केवलज्ञानीओ, तपस्वीओ, श्रावक-श्राविकाओ धर्मवीरो, कर्मवीरो वि. नो आ प्राचीन भूमि साथे संबंध रहेलो छे. तदुपरांत जैन आगमो चारित्रग्रंथो कथावार्ता, सूत्रग्रंथो तथा अन्य धार्मिक
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श्रुतसागर ४०
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रचनाओमा अगणित संदर्भ, सूचना अने संकेतथी आ हस्तिनापुरनो संबंध जोडायेलो
छे.
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दर वरसे कारतक सुद पूनम अने वैशाख सुद त्रीजना दिवसे अहींआ भव्य मेळानुं आयोजन थाय छे. वरसीतपना पारणानुं अहीं खास महत्त्व छे. लोको दूर दूरथी वरसीतपना पारणा अर्थे अहीं आवी इक्षुरसथी पारणा करे छे.
-
अन्य मंदिर आ जिनालय सिवाय एक दिगंबर जिनालय तदउपरांत त्रणे तीर्थकरोना कल्याणकना स्थळे समवसरण स्थळ, प्रभुना चरणपादुकानी देरीओ, अने श्री आदिनाथ प्रभुना चरण स्थापित छे. ते देरी जेने भगवाननुं पारणा स्थळ मानवामां आवे छे वैशाख सुद त्रीजना दिवसे वरघोडो अहीं आवे छे. आ उपरांत शांतिनाथ भगवाननुं भव्य चौमुखजी जिनालय छे.
·
कलाकृति अने स्थापत्य आ स्थान प्राचीन होवाथी अहींनी घणी प्राचीन प्रतिमाओ, सिक्का, शिलालेखो, खंडेरो तथा अन्य अवशेषो भूगर्भमांथी प्राप्त थयेल छे. आ जिनालयोमा जे प्राचीन प्रतिमाजीओ छे ते खरेखर दर्शनीय छे.
आ प्राचीन स्थळ पुरातत्त्व विभाग माटे एक आकर्षण स्थळ छे. महाभारतना युद्धना समयथी आ स्थळ विवादास्पद तथा अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहेलुं छे. हालमा भारत सरकार अने पुरातत्त्व विभाग संशोधन करी रह्युं छे. अने नवीन हस्तिनापुर नगर निर्माण योजना ने लीधे आ स्थान आकर्षणनुं केन्द्र बनेलुं छे.
गाईडन्स - अहींथी नजीकना रेल्वे स्टेशन मेरठथी आशरे ३७ कि. मी. अने दिल्हीथी आशरे १२० कि. मी. दूर आ तीर्थ आवेलुं छे. बस तथा खानगी वाहन व्यवहार उपलब्ध छे. रहेवा माटे सगवडतावाळी विशाळ धर्मशाळाओ अने भोजनशाळानी सुविधाओ उपलब्ध छे. ए सिवाय बालाश्रम, बोर्डींग, पाठशाळा, ज्ञानभंडार, उपाश्रय, आयंबिलशाळा तेमज दादावाडी पण अहीं छे.
पेढी - श्री हस्तिनापुर जैन श्वेतांबर तीर्थ समिति हस्तिनापुर (मेरठ) - २५०४०४
राज्य - उत्तरप्रदेश
भारत
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पुस्तक समीक्षा
डॉ. हेमन्त कुमार • पुस्तक नाम : द्रव्य गुण पर्यायनो रास * कर्ता :
महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराज * संपादक व विवेचक : पंन्यास श्री यशोविजयजी महाराज * भाषा:
संस्कृत, मारुगुर्जर एवं गुजराती * प्रकाशक :
श्री श्रेयस्कर अंधेरी गुजराती जैन संघ, मुंबई * प्रकाशन वर्ष : वि. सं. २०६९, आवृत्ति : प्रथम, भाग : ७ • कुल पृष्ठ : ४१४+४६२+४६१+९०५+३३०+४२६+ ५०८=३५०६ * मूल्य:
५०००/- (सेट की कीमत) महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराज द्वारा रचित द्रव्य गुण पर्याय रास का विद्वद्वर्य पंन्यास श्री यशोविजयजी ने संस्कृत भाषाबद्ध पद्यानुवाद एवं गद्य में बृहत् विवेचन लिखकर जहाँ एक ओर प्रबुद्धजनों को द्रव्यानुयोग को समझने में मार्ग प्रशस्त किया है, वहीं दूसरी ओर गुजराती भाषा में विस्तृत विवेचन लिखकर सामान्य जनों को भी संतोष प्रदान करने का भरपूर प्रयास किया है.
मूल कृति एवं टबार्थ के पाठ को शुद्ध संपादित करने हेतु विद्वान संपादक पूज्यश्रीने ३६ हस्तप्रतों एवं अनेक प्रकाशित ग्रंथों का आधार लिया है. किसी कृति के पाठ का संशोधन इतने हस्तप्रतों और प्रकाशित पुस्तकों के आधार पर करना अपने आप में एक बहुत ही श्रम, समय एवं धैर्य का कार्य है फिर भी पंन्यासश्री ने इस कार्य को बहुत ही सुन्दर रूप से प्रस्तुत किया है. पाठान्तरों को पादटिप्पण में देकर संशोधकों का मार्ग प्रशस्त किया है. अनेक प्रकार के परिशिष्टों के साथ अन्य कई महत्त्वपूर्ण सूचनाओं का संकलन कर प्रकाशन को बहुत ही उपयोगी बना दिया है.
३८४ गाथा एवं १७ ढाल युक्त यह कृति ७ भागों में प्रकाशित की गई है, यही द्योतक है कि इसकी विवेचना कितनी विस्तृत एवं ज्ञानोपयोगी है. द्रव्य, गुण और प्रर्याय इन तीनों की सूक्ष्मरुप से विवेचना जैन दर्शन में ही मिलती है. जैनेतर भारतीय दर्शनों में पर्याय जैसे किसी शब्द का प्रयोग नहीं मिलता है. वहाँ केवल द्रव्य, गुण एव क्रिया इन्हीं शब्दों की व्याख्या मिलती है. तत्त्वार्थसूत्र में उमास्वातिजी
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श्रुतसागर ४०
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महाराज ने गुणपर्यायवद् द्रव्यम् लक्षण बताया है. द्रव्य गुण और पर्याय युक्त है, इसका विवेचन जैनदर्शन में विस्तारपूर्वक मिलता है. सामान्य जनों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पूज्यश्री ने मात्र गुजराती विवेचन को २ भागों में प्रकाशित कराकर बड़ा ही उपकार किया है.
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गुजराती रासों में और विशेषरूप से जैन विद्वानों द्वारा रचित रासों में द्रव्यगुणपर्याय रास का स्थान सर्वोपरि है. इस रास में वर्णित विषयों को समझना सर्वसामान्य के लिए दुर्गम कार्य जैसा रहा है. सर्व सामान्य के लिए यह रास सुलभ हो सके, इस हेतु से जैन तत्त्वज्ञान के मर्मज्ञ विद्वान पूज्य पंन्यास श्री यशोविजयजी ने संस्कृत एवं गुजराती में विवेचना लिखी है. विवेचनकार ने बड़ी ही सूक्ष्मतापूर्वक इस विषय को निरूपित किया है कि सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के पश्चात् परद्रव्य गुण पर्याय का कर्तृत्व भोक्तृत्व भाव समाप्त होता है और शुद्ध स्वात्मद्रव्य गुण पर्याय का कर्तृत्व भोक्तृत्व परिणाम प्रतिष्ठित होता है. पूज्य महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराज की मूल भावना को संरक्षित करते हुए पूज्य पंन्यासश्रीजी ने इस कृति की सविस्तार विवेचना करके विद्वानों एवं जन सामान्य के लिए सुलभ कर दिया है.
प्रस्तुत प्रकाशन अब तक के सारे प्रकाशनों से काफी ज्यादा विस्तृत आकृति वाले इस प्रकाशन में मूल संदर्भों की गहराई तक जाकर विश्लेषण किया गया है. आत्मार्थियों हेतु प्रत्येक गाथा का अलग से आध्यात्मिक उपनय प्रस्तुत किया गया है, जिसे अलग से दो भागों में प्रकाशित किया गया है. सामान्यतः संस्कृत, प्राकृत की मूल कृतियों का गुजराती, हिन्दी आदि देशी भाषाओं में अनुवाद, विवेचन किया जाता है, किन्तु प्रस्तुत विवेचन एक दुर्लभतम घटना के रूप में परिलक्षित होता है. मारुगुर्जर मूल व टबार्थ का संस्कृत पद्यानुवाद और संस्कृत टीकानुवाद द्वारा विवेचन की दुनिया में एक नया प्रयोग स्थापित किया गया है.
द्रव्यानुयोग सबसे जटिल विषय माना जाता है. विश्व के गहनतम रहस्यों को इस माध्यम से ही जाना जा सकता है. इस विषय को समझने के लिए अनेक दर्शनों में विस्तृत विवेचन उपलब्ध हैं. उन्हीं जटिलतम विषयों को समझाने हेतु द्रव्यगुणपर्याय रास की रचना की गई. इस कृति का भी कुछ अंश इतना जटिल था कि प्रायः इसके पूर्व कोई उस अंश के रहस्य को योग्यरूप से समझा नहीं पाया था, उन अंशों को भी पूज्य पंन्यासश्रीजी ने विस्तृत रूप से समझाया है. पुस्तक की छपाई बहुत सुंदर ढंग से की गई है, आवरण भी कृति के
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३०
मई • २०१४ अनुरूप बहुत ही आकर्षक बनाया गया है, विस्तृत विषयानुक्रमणिका, पदार्थों की सूचि आदि भी बहुपयोगी सिद्ध हो रही है. भूमिका (हृदयोर्मि) में विद्वान लेखक ने अन्य कृतियों से संबंधित विषयों के उद्धरण, पूर्व प्रकाशित प्रकाशनों, संबंधित हस्तप्रतों का परिचय आदि प्रस्तुत कर इस प्रकाशन को और अधिक उपयोगी बना दिया है. परिशिष्ट के अन्तर्गत बहुपयोगी विषयों को सम्मिलित किया गया है. सामान्यतः प्रकाशनों में गाथा/श्लोकानुक्रमणिका तो होती ही है, परन्तु प्रस्तुत प्रकाशन के अंतर्गत टबार्थ में प्रयुक्त संदर्भग्रंथों एवं साक्षीपाठों की अनुक्रमणिका भी दी गई है, जो स्वयं में एक उदारहणरूप है. इसके साथ-साथ कुल १७ परिशिष्टों में परामर्शकर्णिका में प्रयुक्त संदर्भग्रंथ, ग्रंथकार, न्याय, विशिष्ट व्यक्तियों के नाम, नगर-तीर्थ के नाम, साक्षीपाठ, विषय, दृष्टांत, कोष्ठक आदि की अति विशिष्ट एवं विस्तृत अनुक्रमणिका दी गई है. परिशिष्ट देखने से यह स्वतः स्पष्ट होता है कि आधुनिक तकनीक (कम्प्युटर) का उपयोग किसी वैसे व्यक्ति के निर्देशन में किया गया है जो कम्प्युटर की सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयों का विशिष्ट ज्ञान रखता हो. सभी विषय एवं विषय से संबंधित बातों का संकलन खूब सूक्ष्मतापूर्वक किया गया है.
प्रस्तुत प्रकाशन के संपादन हेतु जिन ३६ हस्तप्रतों का आधार लिया गया है, उनमें से १८ हस्तप्रतें एवं अनेक प्रकाशित पुस्तकें आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर कोबा से ही उन्हें मिली है, ज्ञानमंदिर का अहोभाग्य है कि इस प्रकाशन के संपादन हेतु हस्तप्रतें, पुस्तकें एवं कुछ परिशिष्टों के सर्जन में सहयोगी बन सका है. यह किसी भी ज्ञानभंडार के लिए सौभाग्य की बात है. प्रस्तुत प्रकाशन में सहयोग हेतु ज्ञानमंदिर गौरव का अनुभव कर रहा है.
मूल व टबार्थ महामहोपाध्याय श्री यशोविजयजी का है तो उसकी विवेचना वर्तमान समाननामधारी पंन्यासप्रवर श्री यशोविजयजी की है. द्वात्रिंशत् द्वात्रिंशिका की महान प्रस्तुति के पश्चात् यह एक और सीमाचिह्न रूप में पूज्यश्री की प्रस्तुति है. श्रीसंघ, विद्वद्वर्ग, जिज्ञासु इसी प्रकार के और भी उत्तम प्रकाशनों की प्रतीक्षा में हैं. सर्जनयात्रा जारी रहे ऐसी शुभेच्छा है.
अन्ततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रस्तुत प्रकाशन जैन साहित्य गगन में देदीप्यमान नक्षत्र की भाँति जिज्ञासुओं को प्रतिबोधित करता रहेगा. पूज्य पंन्यासश्रीजी को इस कार्य की सादर अनुमोदना के साथ कोटिशः वंदन.
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राष्ट्रसंत परम श्रद्धेय आचार्य प्रवरश्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. आदि श्रमण
भगवंतों का संभावित पदयात्रा
प्रवास कार्यक्रम
स्थान
कि.मी.
बोरीज तीर्थ (गांधीनगर ) १३
पुनितधाम
१८
बदपुरा
८
महुडी
पामोल
वीसनगर
उमता
पीलुचा
मगरवाडा
पालनपुर
चित्रासणी
इकबालगढ
भटाणा
दंताणी
अणादरा
सिरोडी
पावापुरी
मीरपुर
सिरोही
विजयपताका
कोबा तीर्थ से नाकोडा तीर्थ
तारीख
१६-५-१४
१७-५-१४
१७५-१४
(शाम)
१४
१८
१७
८
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१६ २१-५-१४
१४
२२-५-१४
१४ २३-५-१४
१७
१०
१७ २४-५-१४
१५
२५-५-१४
१९ २६-५-१४
९ २६-५-१४
(शाम)
१८-५-१४
१९-५-१४
२०-५-१४
२०-५-१४
(शाम)
१४
५
पालडी
१२
पोसलिया ( विहारधाम ) १२
सुमेरपुर
१३
चांकली
१४
तखतगढ़
१२ २८-५-१४
८
२८-५-१४
(शाम)
२७-५-१४
२७-५-१४
(शाम)
२९-५-१४
२९-५-१४
(शाम)
३०-५-१४
३१-५-१४
१-६-१४
२-६-१४ ११३१०-६-१४
स्थान
उमेदपुर
आहोर
जालोर
भागली प्याउ
बाकरा रोड
रेवतडा
मांडवला
रमणीया
मोकलसर
सिवाणा
आसोतरा
बालोतरा
नाकोडा
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कि.मी. तारीख
१०
११-६-१४
१५ १२-६-१४
१८
१३-६-१४
१५ १४-६-१४
१५
१५-६-१४
१४१६१८-६-१४
२०२०२१६-१४
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१५
२२-६-१४
१५
२३-६-१४
१५ २४स २५६-१४
१५
२६-६-१४
२०
२७-६-१४
१० २८-६-१४
विहार में पूज्यश्री से संपर्क हेतु
मो. ०९७२६६१७५७०
आगामी सन् २०१४ पत्र भव्य चातुर्मास श्री नाकोडाजी महातीर्थ (राजस्थान ) मे संपन्न होगा
पत्राचार के लिए
श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा - ३८२००७, ता. जि. गांधीनगर फोन नं. (०७९) २३२७६२०४, २०५ Email :
[email protected] web site : www.kobatirth.org
चातुर्मास स्थल
श्री जैन श्वेताम्बर नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ, मु. पो. मेवानगर, बालोतरा-३४४०२५, जिला- बाडमेर (राजस्थान) फोन (०२९८८) २४०००५, २४००९६
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गणिपद प्रदान एवं अधिष्ठायक देव-देवीयों की प्रतिष्ठा का पावन पर्वोत्सव सम्पन्न
परम पूज्य राष्ट्रसन्त श्रुत-तीर्थोद्धारक आचार्यदेव श्रीमत् पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब की पावन निश्रा में ११ मई २०१४ को श्री शांतिधाम जैन तीर्थ, श्री जैन आश्रम, वटवा, अहमदाबाद में गणिपद प्रतिष्ठा एवं तपागच्छ संरक्षक सम्यग्दृष्टि अधिष्ठायक देव-देवीयों की मंगलकारी प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हर्षोल्लासपूर्वक सम्पन्न हुआ.
योगनिष्ठ आचार्यदेव श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजी महाराजा की गौरवमय परम्परा में परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य भगवन्त श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब के शिष्य ज्योतिर्विद प. पू. आचार्यदेव श्री अरुणोदयसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब के शिष्य पंचांगगणितज्ञ प. पू. पंन्यास प्रवर श्री अरविंदसागरजी महाराज साहब के आगमोपक्रम के उत्तराधिकारी, संयमैकलक्षी पूज्य मुनिवर श्री अमरपद्मसागरजी महाराज को चतुर्विध श्रीसंघ की गरिमामयी उपस्थिति में परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य भगवन्त के वरदहस्तों द्वारा पूज्य श्री अमरपद्मसागरजी महाराज को गणिपद पर प्रतिष्ठित किया गया. समारोह का संचालन श्री मनोज जैन, चेन्नई ने किया तथा संगीतकार श्री त्रिलोक मोदीने अपने सुमधुर संगीत द्वारा उपस्थित श्रोताओं को भक्तिरस में डुबो दिया.
परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य भगवन्त की निश्रा में दिनांक ०९ मई से ११ मई, २०१४ तक आयोजित त्रिदिवसीय प्रतिष्ठा महोत्सव में विभिन्न मांगलिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. इस पावन अवसर पर श्री शांतिधाम जैन तीर्थ, श्री जैन आश्रम. वटवा, अहमदाबाद में समयग्दृष्टि श्री घंटाकर्ण महावीर देव, तपगच्छ संरक्षक श्री माणिभद्रवीर देव, प्रगट प्रभावी नाकोडा भैरव देव, शासन रक्षक श्री भोमियाजी देव, तीर्थ रक्षक श्री क्षेत्रपालजी देव, मनवांछितपूरणी श्री पद्मावती देवी, ज्ञानदायिनी श्री सरस्वती देवी, सूरिमंत्र अधिष्ठात्री श्री महालक्ष्मी देवी, शासनरक्षिका श्री अंबिका देवी, शासनदीपिका श्री चक्रेश्वरी देवी की प्रतिष्ठा परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य देव श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज की निश्रा में सम्पन्न हुई.
इस प्रसंग पर योगनिष्ठ आचार्य श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजी म. सा. रचित स्तवन चोवीशी भाग-१ 'यंदु जिन चोवीश' सीडी का लोकार्पण हुआ. श्री नारणपुरा जैनसंघ में पू. आचार्य श्री अरुणोदयसागरसूरीश्वरजी म. सा. एवं श्री मीरांबीका जैन संघ में पंन्यास प्रवरश्री अरविंदसागरजी म. सा. के चातुर्मास की जय बुलवाई गई.
इस मंगलमय अवसर पर परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्यदेव श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज के विशाल शिष्य परिवार में से जाप-ध्याननिष्ठ आचार्यदेव श्रीमद् अमृतसागरसूरिजी म. सा., ज्योतिर्विद आचार्यदेव श्रीमद् अरुणोदयसागरसूरिजी म. सा., पंन्यासप्रवर श्री हेमचंद्र सागरजी म. सा. पंचांगगणितज्ञ पंन्यासप्रवर श्री अरविंदसागरजी म. सा., गणिवर्य श्री प्रशांतसागरजी म. सा. आदि श्रमण - श्रमणी भगवन्त उपस्थित रहे. इस मांगलिक प्रतिष्ठा महोत्सव में भाग लेने हेतु देश के विभिन्न भागों से अनेक गुरुभक्तों ने पधारकर पुण्यार्जन किया.
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