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।। कोबातीर्थमंडन श्री महावीरस्वामिने नमः ।।
।। अनंतलब्धिनिधान श्री गौतमस्वामिने नमः ।। ।। योगनिष्ठ आचार्य श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरेभ्यो नमः ।।
।। गणधर भगवंत श्री सुधर्मास्वामिने नमः ।। ॥चारित्रचूडामणि आचार्य श्रीमद् कैलाससागरसूरीश्वरेभ्यो नमः ।।
आचार्य श्री कैलाससागरसूरिज्ञानमंदिर
पुनितप्रेरणा व आशीर्वाद राष्ट्रसंत श्रुतोद्धारक आचार्यदेव श्रीमत् पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा.
जैन मुद्रित ग्रंथ स्केनिंग प्रकल्प
ग्रंथांक:१
आराधना
वीर जैन
श्री महावी
कोबा.
अमृतं
अमृत
तु विद्या
तु
श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र
शहर शाखा
आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर कोबा, गांधीनगर-श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर कोबा, गांधीनगर-३८२००७ (गुजरात) (079) 23276252, 23276204 फेक्स : 23276249 Websiet : www.kobatirth.org Email :
[email protected]
आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर शहर शाखा आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर त्रण बंगला, टोलकनगर परिवार डाइनिंग हॉल की गली में पालडी, अहमदाबाद - ३८०००७ (079)26582355
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प्रास्ताविकश्लोक संग्रह
संग्राहक,
मुनि प्रियंकरविजय,
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बाई समु दलीचंद्र जैन ग्रंथमाला नं. ५
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प्रास्ताविकश्लोक संग्रह।
किंमत ६ आना
संग्राहकः। मुनि प्रियंकरविजय
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प्रकाशकः ।
एम. एन. दलाल । सेक्रेटरी : वाई ससु दलोचंद जैन ग्रन्थमाला
लांघणन ( उ. गुजरात)
मुद्रक :शेठ गुलाबचंद देवचंद आनंद ग्रिन्टिा प्रेस-भावनगर.
प्रथमावृत्त
१९४५
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दो शब्द।
प्रस्तुत पुस्तिका का नाम भिन्न २ स्थलं से श्लोक संग्रह किया गया है इस से " प्रास्ताविक श्लोक संग्रह" रखा गया है । जिसमें भिन्न २ प्रकार की नीति के श्लोक है । व्याख्यानकारों में इस से महद् लाभ होने की संभावना है। विद्वद्वर्ग की पीछे बाल जीवों को भी कुच्छ लाभ हो उसी उद्देश से हिन्दी पदों का भी संग्रह इस लघु पुस्तिका में किया गया है। इस से उम्मेद है कि दोनू वर्ग महद् लाभ उठायेगा । यदि दोनू वर्ग में इनका सत्कार होगा तो इसी तरह और भी संग्रह जनता की सेवा में अर्पित किया जायगा ।
-प्रियंकरविजय
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Aca
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वचनामृत
दुनिया लकीरों का बाज़ार है।
प्रलोभन और पॉलीसी स्वार्थी संसार को हस्त करने का अज़ब जादू है।
मानव जीवन यहीं मनुष्य जीवन की शाळा है । अज्ञानता मानव जीवन की घातक है । संकट से मनुष्य जीवन के चक्षु खुल जाते है । जमाना बुद्धिवाद का है और आप उनके प्रचारक है।
वीर पुरुष प्राण के भयसे दीनता को कभी धारण नहीं करते।
अध्यात्मवाद ही निश्चित सुख की कुश्ची है। शरीर मन और वाणी को स्वतंत्र बनाओ।
-प्रियंकरविजय
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प्रास्ताविक श्लोक संग्रह
कोटं च बूटं च पतलून दिव्यं,
चूर्टा मुखे चंचल मन द्वितीयं । लेडी गुलामं शुभर्कमहीनं,
तं जेन्टनमेनं मुनयो गदन्ति ॥१॥ अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं,
जातं दशन विहीनं तुण्डम् । वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं,
तदपि न मुश्चत्याशापिण्डम् ॥२॥ श्रतिविभिन्ना स्मृतयश्च भिन्ना,
नैको मुनिर्यस्य वचोऽप्रमाणम् । धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां,
महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥३॥
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अर्थातुराणां न पिता न बंधुः,
कामातुराणां न भयं न लजा। क्षुधातुराणां न बलं न तेजा,
चिन्तातुराणां न सुखं न निद्रा ॥४॥
चतुरः सखि मे भर्ता,
यल्लिखति स तत् परो न वाचयति । तस्मातयाधिकोमे,
स्वयमपि लिखित स्वयं न वाचयति ॥५॥
पिति नया स्वयमेव नाभ्या,
खादन्ति तं न स्वादुफलानि वृक्षाः । पयोमुखः किं विलसंति सस्य,
परोपकारः सतां विभूतयः ॥६॥
चिन्तितं तदिह दूरतरं प्रयाति,
यचेतसा न गणितं तदिहाऽभ्युपैति । प्रातर्भवामि वसुधाऽधिप चक्रवर्ती,
सोऽहं व्रजामि विपिने जटिल: तपस्वी ॥७॥
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धूतं च मांसं च सुरा च वेश्या,
पापद्धिं चौर्ये परदारसेवा । एतानि सप्त व्यसनानि लोके
घोरातिघारं नरकं नमन्ति
॥८
॥
त्यजन्ति मित्राणि धनविहीन,
पुत्राश्च दाराश्च सहोदराश्च । नमर्थवन्तं पुनराश्रयन्ति
अर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः
॥९॥
मार्गे मार्ग निर्मलं ब्रह्मवृन्द,
वृन्दे वृन्दे तचचिन्तानुवादः । वादे वादे जायते तत्त्वबोधो,
चौधे बोधे भासते चन्द्रचूडा
॥१०॥
पुष्पेषु चम्पा नगरीषु लङ्का,
नदीषु गङ्गा च नृपेषु रामः । योषित्सु रंभा पुरुषेषु विष्णुः,
काव्येषु माघः कविकालिदासः ॥११॥
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प्रावासिको व्याधियुतः सरोषो,
विद्यार्थचिः परदाररक्तः । यस्यास्ति वैरी हि वियोगितोऽपि,
ह्यष्टौ लभते मनुजा न निद्राम् ॥१२ ।।
बालः पश्यति लिंग,
मध्यमबुद्धिर्विचारयति वृत्तम् । आगमतत्वं तु बुधः
परीक्षते सर्वयत्नेन
॥ १३ ॥
दानेन पाणिन्तु कंकणेन, ___ मानेन तृप्तिन तु भोजनेन । धनेन कान्तिर्न तु चन्दनेन,
ध्यानेन मुक्तिर्न तु दर्शनेन
॥१४॥
बुद्धः फलं तत्त्वविचारणं च,
देहस्य सारं व्रतधारणं च । अर्थस्य सारं किल पात्रदानं,
वाचा फलं प्रीतिकरं नराणाम्
॥१५॥
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किं मोतिहारं न च मर्कटस्य, मिष्टान्नपानं न च गर्दभस्य ।
अन्धस्य दीपं बधिरस्य गीतं, मूर्खस्य किं धर्मकथाप्रसंग : १
अकर्णस्य कर्ण कथं गीतगानं,
विना नाशिकायां कथं धूपगंधः ।
अकंठस्य कंठे कथं पुष्पमाला,
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कार्येषु मंत्री कर्णेषु दासी,
अपादस्य पादे कथं मे प्रणामः ॥ १७ ॥
भोज्येषु माता शयनेषु रंभा ।
मनोनुकूला क्षमया धरित्री, षड्गुणभार्या कुलमुद्धरति
पुत्र सूर्यो विधवा कन्या, शठं च मित्रं चपलं कलत्रम् |
।
विलासकालेsपि दरिद्रता च,
॥ १६ ॥
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॥ १८ ॥
विनाऽग्निना पञ्च दद्दन्ति देहम् ॥ १९ ॥
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ग्रामो नास्ति कुतः सीमा, धर्मो नास्ति कुतः सुखम् ।
दानं नास्ति कुतः कीर्तिभार्या नास्ति कुतः सुतः
क्वचिद् भूमौ शय्या क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनम्, कचिच्छाखाहारी क्वचिदपि शाल्योदनरुचिः । क्वचित् कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो, मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम् ॥ २१ ॥
द्वौ हस्तौ द्वौ च पादौ च दृश्यते मनुजाकृतिः, अहो ! कपन्द्र ! राजेन्द्र ! गृहं किन्न करिष्यति । सुचि मुखे दुराचारे रण्डे पंडित मानिनि, असमर्थो गृहकारणे समर्थो गृहभञ्जने
॥ २० ॥
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।। २२ ।।
वृक्षं क्षणिं फलं त्यजन्ति विहगाः शुष्कं सरः सारसाः, निद्रव्यं पुरुषं त्यजन्ति गणिका भ्रष्टं नृपं सेवकाः । निर्गन्धं कुसुमं त्यजन्ति मधुपा दग्धं वनान्तं मृगाः; सर्वे स्वार्थवशाज्जनोऽभिरमतं नो कस्यचिद् ( को ) वल्लभः ||२३||
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काकः पद्मवने रतिं न कुरुते हंसो न कूपोदके, मूर्खः पण्डितसङ्गमे न रमते दासो न सिंहासने । कुस्त्री सजनसङ्गमे न रमते नीचं जन सेवते, या यस्य प्रकृत्तिः स्वभावनिता केनापि न त्यज्यते ॥२४॥
धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिचिरं गेहिनी, सत्यं सुनूग्यं दया च भगिनी भ्राता मनः संयमः । शय्या भूमितलौ दिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजनम् , एते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे ! कस्माद् भयं योगिनः॥२५॥
हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटं सारश्रुतं द्रोहिणौ, नेत्रे साधु विलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थं गतौ । अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुङ्गं शिरो; रे ! रे ! जम्बुक मुश्च मुञ्च सहसा नीचस्य निधं वपुः ॥२६॥
साधुभ्यः साधूदानं रिपुजनसुहृदां चोपकारं कुरु त्वं, सौजन्यंबधुवर्गो निहितमुचितं स्वामि कार्य यथार्थ । श्रोतेते तथ्यमेतद् कथयति सतता लेखिनी भाग्यशालिन; नोचन्नष्टेऽधिकारे मम मुख दृशं तावास्यं भवेद्भिः ॥२७॥
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धर्मः पर्वगतस्तपः कपटतः सत्यं च दूरे गतं, पृथ्वी मंदफला नृपाश्च कुटिलाः शस्त्रायुधा ब्राह्मणाः । लोकः स्त्रीषु रतः स्त्रियोऽति चपला लौल्ये स्थिता मानवाः; साधः सीदति दुर्जनः प्रभवति प्रायः प्रविष्टः कलिः ॥ २८ ॥
दु
निर्वीर्या पृथिवी निरौषधिरसा नीचा महत्त्वं गता, भूपाला निजधर्मकर्मरहिता विप्राः कुमार्गे रताः। भार्या भर्तृतियोगिनी पररता पुत्राः पितुद्वीपणा; हा! कष्टं खलु दुर्लभाः कलियुगे धन्या नराः सज्जनाः ॥२९।।
विद्यानाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं, विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणा गुरुः । विद्या बधुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता, विद्या राजसु पूजिता न तु धनं विद्याविहीनः पशुः ॥ ३० ॥
-
भोगे रोगभयं सुखे क्षयभयं वित्तेऽग्निभूभृद्भयम्, माने म्लानिभयं जये रिपुभयं वंशे कुयोषिद्भयम् । दास्ये स्वामिभयं गुणे खलभयं काये कृतांताद्भयम् , सर्वनामभयं भयेदिह नृणां वैराग्यमेवाभयम्, ॥३१ ।।
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विद्वत्ता वसुधातले विगलिता पाण्डित्यधर्मो गतः, श्रोतृणां हृदयेष्यबुद्धिरधिका ज्ञानं गतं चारणे । गाथागीतविनोदवाक्यरचना युक्त्या जगंद्रजितं, ज्योतिवैद्यकशास्त्रसारमखिलं शूद्रेषु जातं कलौ ॥ ३२ ॥
नाहं स्वर्गफलोपभोगरसिको नाभ्यर्चितस्त्वं मया, संतुष्टस्तृणभक्षेणन सततं साधो न युक्तं तव । स्वर्ग यांति यदि त्वया विनिहता यज्ञ ध्रुवं प्राणिनो, यज्ञ किं न करोषि मातृपितृभिः पुत्रैस्तथा बांधवैः ॥३३॥
मौने मौनी गुणिनि गुणवान पण्डिते पण्डितोऽसौ. दीने दीनः सुखिनि सुखवान् भोगिनि प्राप्तभोगः । मूर्खे मूखों युवतिषु युवा वाग्मिषु पौढवाग्मि, धन्यः कोऽपि त्रिभुवनजयी योऽवधूनेऽवधूतः ॥३४ ।।
काया हंस विना नदी जल विना दातुर्विना याचकाः, भ्राता स्नेह विना कुलं सुत विना धेनुश्च दूग्धं विना । भार्या भक्ति विना पुरं नृप विना वृक्षं च पत्रं विना, दीपः स्नेह विना शशी निशि विना धर्म विना मानवाः॥३५॥
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उयति यदि भानुः पश्चिमायां दिशायां, विकसति यदि पद्म पर्वताग्रे शिलायाम् । प्रचलति यदि मेरुः शीततां याति वह्निस्तदपि न चलतीयं भाविनी कमरेखा
भिक्षो कन्था श्लथाते नहि सफरवधे जालमनासि मत्स्यान् , ते वै मद्योपदंशाः पिबसि मधुसमं वेश्यया यासि वेश्याम् । दत्वानि मीणां तब किम रिपवो भित्ति भत्तास्मि येषाम चोरोऽसि चूतहतोस्त्वयि सकलमिदं नास्ति नष्टे विचारः।।३७॥
दुःखं स्त्रांकुक्षिमध्ये प्रथमिह भवदर्भवासे नराणां, बालत्वे चापि दुःखं मललुलितवपुः स्त्रीपयःपानमिश्रम् । तारुण्ये चापि दुःखं भवति विरहवं वृद्धभावोऽप्यसार, संसार रे मनुष्या वदत यदि सुखं स्वल्पमप्यस्ति किंचित् ॥३८॥
नास्तिक्यं वेदधर्मे जिनवरसुमते सर्वमिथ्यात्वभावः, कासग्यं चोद्धवीये भुवनसुविदिते वैष्णवेऽन्याश्रयत्वम् । सामाज्येऽनार्यता यत् प्रचलति परमं म्लेच्छ के काफरत्वं, सर्वाधः पातकारी प्रसरति भयदो भारते भेदभावः ।। ३९ ।
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पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम् , नोलूकोप्यवलोक्ते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम् ? धारा नैत्र पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणं ? यत्पूर्व विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः ॥४०॥
कथमुत्पद्यते धर्म:, कथं धर्मो विवद्धते । कथं संस्थाप्यते धर्मः; कथं धर्मो विनश्यति
॥४१॥
सत्येनोत्पद्यते धर्मो, दया दानेन वद्धते । मायाः स्थाप्यते धर्मः, क्रोधलाभाद्विनश्यति
॥४२॥
अहिंसा लक्षणो धर्मः, अधर्मः प्राणिनां वधः । तस्माद्धर्मार्थिभिर्लोकः, कर्तव्या प्राणिनां दया
॥४३॥
जीवानां रक्षणं श्रेष्ठं, जीवाजीवितकांक्षिणः । तस्मात् समस्तदानेभ्यो-ऽभयदानं प्रशस्यते
॥४४॥
न मांसभक्षणे दोषो, न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां, निवृत्तिस्तु महाफलाः
॥४५ }
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राजा राजानमालोक्य, वैद्यो वैद्यं नटो नटम् । भिक्षुको भिक्षुकं दृष्ट्वा, श्वानवत् घुघुरायते
॥४६ ॥
कर्मणो हि प्रधानत्वं, किं कुर्वन्ति शुभाग्रहाः । वशिष्ठदत्तलग्नोऽपि, राम प्रवर्जितो बने
दर्शने हरतं चित्तं, स्पर्शने हरते बलम् । संगमे हरते वीर्य, नारी प्रत्यक्ष राक्षमी
॥४८॥
आपदामाकरो नारी, नारी नरकवर्तिनी । विनाशकारणं नारी, नारी प्रत्यक्षराक्षसी
पुरुषो विपदां खानिः, पुमान् नरकपद्धतिः । पुरुषः पाप्मनां मूलं, पुमान् प्रत्यक्षराक्षसः
अष्टादशपुराणेषु, व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्
शर्ट प्रति शाढ्यं कुर्यात् , आदरं प्रति चादरं । त्वया समुच्यते पक्षः, मया च नाम्यते शिरः
॥५२॥
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किं गीतं कष्ठहीनस्य, किं रूपंगुणहीनस्य । किं धनं दानहीनस्य, मानहीनस्य भोजनम् ॥ ५३ ।।
नराणां नापितो धूर्तः, पक्षिणां चैव वायसः । पशूणां शृगालो धूर्तः, नारीणां चैव मालिका ।। ५४ ॥
ब्राह्मणानां धनं विद्या, क्षत्रियाणां धनं धनुः । ऋषीणां च धनं सत्यं, योषिता यौवनं धनम् ॥ ५५ ॥
तुष्यन्ति भोजनैर्विश्रा, मयूरा धनगर्जितैः । साधवः परकल्याणैः, खला परविपत्तिभिः ॥ ५६ ॥
वैद्यराज ! नमस्तुभ्यं, यमराज सहोदर ! । यमस्तु हरते प्राणान् , त्वं च प्राणान् धनानि च ॥५७॥
उद्यमेन विना राजन् , सिद्धन्ति न मनोरथाः। कातरा इति जल्पन्ति, यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥ ५८ ॥
कामलुब्धे कुतो लज्जा, धर्महीने कुतः क्रिया। मद्यपाने कुतः शौचं, मांसाहारे कुतो दया ॥५९ ॥
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अनित्यानि शरीराणि, विभवो नैव शाश्वतः । नित्यं सन्निहितो मृत्युः, कर्तव्यो धर्मसङ्गहः ॥६० ॥
व्याजे स्याद् द्विगुणं वित्तं, व्यवसाय चतुर्गुणम् । क्षेत्रे शतगुण प्रोक्तं, पात्रेऽनन्तगुणं तथा ॥६१ ॥
मेघ पिपीलिका हन्ति, यूका कुर्याज्जलोदरम् । कुरुते मक्षिका वान्ति, कुष्टरोगं च कोलिका ।। ६२ ।।
पुष्पं दृष्ट्वा फलं दृष्ट्वा, दृष्ट्वा नारी सुशोभितम् । एतानि त्रीणि वने दृष्टा, कस्य न चलते मनः ॥६३ ॥
अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम् । अधनस्य कुतो मित्र, ममित्रस्य कुतो बलम् । ॥ ६४ ॥
कीटिकासंचितं धान्यं, मक्षिकासंचितं मधु । कृपणे संचितं वित्तं, तदन्यैरेव भुज्यते
॥६५॥
पञ्चैतानि पवित्राणि, सर्वेषां धर्म चारिणाम् । अहिंसा सत्यमस्तेयं त्यागो मैथुनवर्जनम्
॥६६ ।।
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दानं सिद्धिनिदानं हि, देयमत्र महाधिया। न तरन्ति बिना दानं, प्राणिनो भवसागरम् ॥१७॥
घटं भित्त्वा पटं छित्वा, कृत्वा रासभोहणं । येन केन प्रकारेण, प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्
॥ ६८ ॥
उद्यमः साहसं धैर्य, बलबुद्धिपराक्रमः। षडेते यस्य विद्यन्ते, तस्य देवोऽपि शंकते
॥१९॥
दानेन प्राप्यते लक्ष्मी, शीलेन सुखसंपदा । तपसा क्षीयते कर्म, भावना भवनाशिनी
॥७
॥
उत्तमाः स्वगुणैः ख्याता, मध्यमास्तु पितुर्गुणैः । अधमा मातुलैः रूपाता, श्वशुरैरधमाधमा ॥७
॥
चिन्तया नश्यते बुद्धिः, चिन्तया नश्यते बलम् । चिन्तया नश्यते ज्ञानं, व्याधिर्भवति चिन्तया ॥ ७२ ॥
उपदेशो हि मूखोणां, प्रकोपाय न शान्तये । पयःपानं भुजङ्गानां, केवलं विषार्धनम्
॥७३ ।।
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१६
उष्ट्राणां च गृहे लग्नं, गर्दभाः शान्तिपाठकाः । परस्परं प्रशंसन्ति, अहो रूपम् अहो ध्वनिः ॥ ७४ ॥
मुखं पद्म दलाकारं, वाणी चंदन शीतला । हृदय कर्तरी तुल्यं, त्रिविधं धूर्तलक्षणम्
पिंडे पिंडे मतिर्भिन्ना, कुंडे कुंडे नवं पयः । जातौ जातौ नवाचारा, नवा वाणी मुखे मुखे ॥ ७६ ॥
11 154 11
शतं विहाय भोक्तव्यं, सहस्रं स्नानमाचरेत् । लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत् ॥ ७७ ॥
पुण्यस्य फलमिच्छन्ति, पुण्यं नेच्छन्ति मानवः । न पापफलमिच्छन्ति, पापं कुर्वन्ति यत्नतः
गुणो भूषयते रूपं, शीलं भूषयते कुलम् । शान्तिर्भूषयते विद्यां दानं भूपयते धनम्
विद्यामित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च । व्याधि तस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥ ७९ ॥
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1102 11
॥ ८० ॥
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शोमते विद्यया विप्रः, क्षत्रियो विजयेन वै । अर्थः पात्रे प्रदानेन, लज्जया च कुलाङ्गना
॥८१॥
कवयः किं न पश्यन्ति, किं न खादन्ति वायसाः। मद्यपा किं न जल्पन्ति, किं न कुर्वन्ति दुर्जनाः ॥८२॥
पादपानां भयं वातात् , पनानां शिशिराद् भयम् । पर्वतानां भयं वज्रात् , साधूनां दूर्जनाद् भयम् ॥ ८३॥
सत्येन धार्यसे पृथ्वी, सत्येन तपते रविः । सत्येन वायवो वान्ति, सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ८४ ॥
आत्मनो मुखदोषेण, बध्यन्ते सुकसारिकाः । बकास्तु नैव बध्यन्ते, मौनं सर्वार्थसाधनम् ॥ ८५ ॥
अहो दुर्जनसंसर्गा-न्मानहानिः पदे पदे । पावको लोहसङ्गेन; मुद्गरैरभिहन्यते
॥८६॥
अन्नदानं महादानं, विद्यादानं महत्तरम् । अनेन क्षणिका तृप्ति-विज्जीवं तु विद्यया ॥८७ ॥
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उद्यमेन हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथैः । नहि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ ८८ ॥
सर्पदुर्जनयोर्मध्ये, वरं सर्पो न दुर्जनः । सो दशति कालेन, दुर्जनस्तु पदे पदे
॥ ८९॥
साधूनां दर्शनं पुण्यं, तीर्थभूता हि साधवः । तीर्थ फलति कालेन, सद्यः साधुममागमः
॥९० ॥
गीतशास्त्रविनोदेन, कालो गच्छति धीमताम् । व्यसनेन तु मूर्खाणां, निद्रया कलहेन वा ॥९१ ॥
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते, पितृवंशो निरर्थकः । वासुदेवं नमस्यन्ति, वसुदेवं न मानवाः
॥९२ ॥
काचः काञ्चनसंसर्गाद, धत्ते मारकती घतिम । तथा सङ्गेन विदुषां, मूों याति प्रवीणताम् ॥ ९३ ॥
आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन् , को न जीवति मानवः । परं परोपकारार्थ, यो जीवति स जीवति ॥९४ ॥
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परोपकारशूनस्य, धिङ् मनुष्यस्य जीवितम् । जीवन्तु पशवो येषां, चर्माऽप्युपकरिष्यति
॥९५ ॥
यथा परोपकारेषु, नित्यं जागर्ति सज्जनः। तथा पराऽपकारेषु, नित्यं जागर्ति दुर्जनः
॥९६ ॥
संधयेत सरला सूची, वक्रा छेदाय कर्तरी । अतो विमुच्य वक्रत्वं, गुणानेव समाश्रय
॥९७ ॥
दिवा पश्यति नो घूरू, काको नक्तं न पश्यति । अपूर्वः कोऽपि कामान्धो, दिवा नक्तं न पश्यति ॥९८॥
मूर्खा मूखैः समं संगं, गावो गोभिर्मगा मृगैः । सुधीभिः सुधयो यांति, समशीले ही मित्रता । ९९।।
शतेषु जायते शूरः, सहस्रेषु च पण्डितः । वक्ता शतसहस्रेषु, दाता भवति वा न वा ॥१०॥
रे रे ! मण्डक ! मारोदीर्यदहं खण्डितोऽनया। . राम-रावण-मुञ्जाद्या, स्त्रीभिः के के न खण्डिताः ॥१०॥
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रे रे ! यन्त्रक ! मा रोदीः, कं कं न भ्रमयन्त्यमुः। कटाक्षाक्षेपमात्रेण, करा कुष्टस्य का कथा ? ॥ १०२ ॥
वैरिणोऽपि हि मुच्यन्ते, प्राणान्ते तृणभक्षणात् । तृणाहारः सदैवैते, हन्यन्ते पशवः कथम् ॥ १०३ ।।
महाव्रति सहस्रेषु, वरमेको हि ताचिकः । तात्त्विकेन समं पात्रं, न भूतं न भविष्यति ॥१०४ ॥
बाला पश्यति लिंगं, मध्यमबुद्धिर्विचारयति वृत्तम् । आगम तत्त्वं तु बुधः, परीक्षते सर्वयत्नेन ॥१०५ ॥
उत्तमैः सह संगत्यं, पंडितैः सह सं कथाम् । अलुब्धैः सह मित्रत्वं, कुर्वाणो नैव सीदति ॥ १०६॥
अस्थिन वसति रूद्रश्च, मांसे चास्ति जनार्दनः । शुक्रे वसति ब्रह्मा च, तस्मान्मांसं न भक्षयेत् ॥ १०७॥
प्रमाणं यो न जानाति, भोजने वचनेषु च । अतिमोक्ता चातिवक्ता, प्राणी स प्राणघातकः ॥१८॥
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निद्रा मूलमनाना, निद्रा श्रेयो विघातिनी । निद्रा प्रमादजननी, निद्रा संसारवर्द्धिनी ॥ १०९ ॥
संपदि यस्य न हों, विपदि विषादो रणे च धीरत्वम् । तं भुवनत्रयतिलकं, जनयति जननी सुत विरलम् ॥११॥
कृतकम क्षयो नास्ति, कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं, कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ १११ ॥
दानं पूजा तपश्चैव, तीर्थसेवा श्रुतं तथा । सर्वमेव वृथा तस्य, यस्य शुद्धं न मानसम् ॥ ११२ ।।
दानेन प्राप्यते लक्ष्मीः , शीलेन सुखसंपदा । तपसा क्षीयते कर्म, भावना भव नाशिनी ॥ ११३ ॥
यावज्जीवं तु यो मांस, विषवत् परिवर्जयेत् । वसिष्ठो भगवानाह, स्वर्गलोक स गच्छति ॥ ११४ ॥
यूपं छित्वा पशून् हत्वा, कृत्वा रुधिरकर्दमान । यथैवं गम्यते स्वर्ग, नरके केन गम्यते ? ॥११५॥
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अश्वं नैव गजं नैव, व्याघ्र नैव च नैव च । अजा पुत्रं बलिं दद्याद, देवो दुर्बलघातकः ॥११६ ॥
ब्राह्मणोऽपि क्रियाहीनः, शूद्रात् प्रत्यवरो भवेत् । शूद्रोऽपि शील सम्पन्नो, गुणवान् ब्राह्मणो भवेत् ॥११७॥
क्षमा दानं दमो ध्यानं, सत्यं शौचं धृतिघृणा । ज्ञान-विज्ञानमास्तिक्यमेतद्, ब्राह्मणस्य लक्षणम्।।११८॥
देवपूजा दयादानं, दाक्षिण्यं दम दक्षते । यस्यैते षड दकाराः स्युः; स देवांशी नरः स्मृतः ११९
नास्ति ज्ञानसमो दीपः, सर्वान्धकारो नाशते । स्वर्गे भूमौ च पाताले, स्थाने स्थाने च दृश्यते ॥१२०॥
भिक्षुका नैव याचन्ते, बोधयति दिने दिने । दीयतां दीयतां किञ्चिद्दातुः, फलमीदृशम् ॥ १२१।।
हस्तादपि न दातव्यं, गृहादपि न दीयते । परापकरणार्थाय, वचने किं दरिद्रता ?
॥ १२२ ।
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यावज्जीवं सुखं जीवेद् , ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य, पुनरागमनं कुतः ? ॥ १२३ ॥
अनभ्यासे विषं शास्त्रं, अजीर्ण भोजनं विषम् । दरिद्रस्य विष गोष्ठी, वृद्धस्य तरुणी विषम् ॥ १२४ ॥
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं । लोचनाभ्यां विहीनस्य, दर्पणः किं करिष्यति ? ॥१२५॥
न कार्या सर्व हिंसा, नरकस्येव दृतिका । परपीडा कृतः पुंसः, प्रत्यासमो न धर्मराट् ॥ १२६ ॥
कीटिका संचितं धान्यं, मक्षिका संचितं मधु । कृपणे संचितं वित्तं, तदन्यैरेव भुज्यते ॥ १२७॥
अनृतं साहसं माया, मूर्खत्व मतिलोभता । अशौचं निर्दयत्वं च, स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥१२८॥
आशाया ये दासाः, ये दासा सर्वलोकस्य । आशा येषां दासी, तेषाम् दासायते लोकः ।। १२९॥
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एक तडागे यद्यपि, पिबति भुजङ्गो जलं तथा गौश्च । परिणमति विषं सर्प, तदेव गवि जायते क्षीरम् ॥१३०॥
यो दद्यात्कांचनं मेरु, कृत्स्नां हिंसां परित्यजेत् । एकस्य जीवितं दद्या-न च तुल्यं युधिष्ठिर !॥ १३१ ।।
षट्पदः पुष्पमध्यस्थो, यथा सारं समुद्धरेत् । तथा सर्वेषु कार्येषु, सारं गृह्णाति बुद्धिमान् ॥ १३२ ॥
नष्टं नैव मृतं चैव, नानुशोचन्ति पण्डिताः । पण्डितानां जडानां च, विशेषोऽयमतः स्मृतः ॥ १३३ ॥
एकेन शुष्कवृक्षेण, दह्यमानेन वहिना । दाते काननं सर्व, दुष्पुत्रेण कुलं तथा । ॥ १३४ ॥
वाणी रसवती, यस्य भार्या प्रेमवती सती। लक्ष्मी दानवती, यस्य सफलं तस्य जीवितम् ॥ १३५ ।।
किं कुलेन विशालेन, विद्याहीनस्य देहिनः । अकुलीनोऽपि विद्यावान् , विबुधरपि पूज्यते ॥ १३६ ॥
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प्रशांत दर्शनं यस्य, सर्वभूताभयप्रदम् । मांगल्यं च प्रशस्तं च, शिवस्तेन विभाव्यते ॥ १३७ ॥
महत्वादीश्वरत्वाच्च, यो महेश्वरतां गतः। रागद्वेषविनिर्मुक्तं, वंदेऽहं तं महेश्वरम् ॥ १३८ ॥
महाज्ञानं भवेद्यस्य, लोकालोकप्रकाशकम् । महादया दमो ध्यानं, महादेवः स उच्यते ॥ १३९ ॥
दर्शनज्ञानयोगेन, परमात्मायमव्ययः। परा क्षान्तिरहिंसा च, परमात्मा स उच्यते ॥ १४०॥
असारे खलु संसारे, सारं श्वशुर मंदिरम् । हरो हिमालये शेते, हरिः शेते महोदधौ ॥ १४१ ॥
नाहं जानामि केयरे, नाहं जानामि कुण्डले । नूपुरे त्वभिजानामि, नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥१४२ ॥
प्रदोषे दीपकश्चन्द्रः, प्रभाते दीपको रविः। त्रैलोक्ये दीपको धमः, सुपुत्र कुल दीपकः ॥१४३॥
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२६
नहि सत्यात्परो धर्मो, नानृतात्पातकं परम् । नहि सत्यात्परं ज्ञानं, तस्मात् सत्यं समाचेरत् ॥ १४४ ॥
कु पुत्रेण कुलं नष्टं, जन्म नष्ट कु भार्यया । कु भोजनेन दिनं नष्ट, पुष्यं नष्टं कु कर्मतः
॥१४५ ॥
खलः करोति दुर्वृत्त, नूनं फलति साधुषु । दशाननोऽहरत सीता, बन्धं प्राप्तो महोदधिः
॥ १४६ ॥
ऋणकर्ता पिता शत्रुः, माता च व्यभिचारिणि । भार्या रुपवती शत्रुः पुत्रः शत्रु रपण्डितः ॥ १४७ ॥
यौवनं सफलं भोगैः भोगाः, स्युः सफला धन्नैः । तद्विना मानुपं जन्म, जायत वन पुष्पवत् ॥१४८॥
आधयो व्याधयो विघ्ना, दुःस्वप्नाः कु ग्रहा प्रहाः । दुर्जना दुष्ट शकुना, बाधते नैव धर्मिणाम् ॥१४९ ॥
एकोऽपि गुणवान् पुत्रो, निर्गुणैः किं शतैरपि । एकश्चन्द्रो जगन्नेत्रं, नक्षत्रैः किं प्रयोजनम् ॥ १५० ॥
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૨૭
यचिन्त्यमानं न ददाति युक्ति प्रत्यक्ष तो नाप्यनुमान तश्च । तद् बुद्धिमान् कोनु भजेत लोके गोश्रृंङ्गत क्षीर समुद्भवो न १५१
नैक पुष्पंद्विधा कुर्या-छिन्द्यात् कलिकामपि । पंपकोत्पल भेदेन, भवेदोषो विशेषतः
॥ १५२॥
क्षणेरुष्टः क्षणे तुष्टो, रुष्ट तुष्ट क्षण क्षणे । अव्यवस्थित चित्तस्य, प्रसादोऽपि भयंङ्करः ॥१५३ ॥
टका धर्म ष्टका कर्म, टकाहि परमं पदम् । यस्य गृहे टका नास्ति, हा ! टका टक टकायते ॥ १५४ ॥
देव पूजा गुरुपास्ति, स्वाध्याय संयम स्तपः । दानं चेति गृहस्थानां, षट् कर्माणि दिने दिने ॥ १५५ ।।
चरेत् माधुकरी वृत्तिमपि, म्लेच्छ कुलादपि । एकानं नैव भूञ्चत, बृहस्पति समादपि
॥१५६ ।।
येलुब्ध चित्ता विषयादिभोगे, बहि विरागा हदिवद्धरागाः । तेदाम्भिका वेष भृतश्चधूर्णा, मनांसि लोकस्य तु रज्चयन्ति १५७
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૨૮
लेखनी पुस्तकिदारा, पर हस्ते गता गता। आगता यदि भाग्येन, हष्टा नष्टा च मर्दिता
॥१५८॥
दुर्जनः परिलतव्यो, विद्यया भूषितोऽपि सन् । मणिनालंकृतः सर्पः किमसौ न भयंकरः
॥१५९ ॥
आलस्य हि मनुष्याणां, शरीरस्थो माहात्रिषुः । नास्त्युद्यम समो बन्धुः कृत्वायं तापसीदति ॥१६० ।
को न याति वशं लोके मुख पिण्डेन पूरितः । मृदङ्गो मुख लेपेन करोति मधुर ध्वनिम्
॥१६१ ॥
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता स्तयो न तप्तं वयमेव तप्ताः । काला न यातो वयमेव याता स्तृष्ण न जीणों बयमेव जीर्णाः १६२
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवित यौवने । चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः
॥१६३ ॥
कनक कान्ता सूत्रेण वेष्टितं सकलं जगत् । तासुतेषु बिरक्तो यो भुजो परमेश्वरः
॥ १६४॥
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पुरुषस्य जरा पंथा, अश्वानां भैथुनं जरा । अमथुनं जरा स्त्रीणां, वस्त्राणां वमलं जरा
॥१६५ ॥
वोह कौनसा उकदा है, जो वा हो नहीं सकता ? | हिम्मत करे इन्सान, तो क्या हो नहीं सकता ? ॥ १६६ ॥
तुझे देखकर ओंरोंको, किन आंखों से हम देखें ? वे आंखें फूट जायें, औरोंको जिन आँखों से हम देखें १६७
जमाना है नाम मेरा, सभी को बतादूंगा। न माने बात जो मेरी, उसी को चखादूगा ॥१६८॥
बहता पानी निर्मला, खड़ा सो गंदा होय । साधू तो रमता भळा, दाग न. लागे कोय
॥ १६९ ॥
रक्त लगे कपडे, जामा होवे पलीत । जे रक्त पीवें मानुषा, तिन क्यों निर्मल चित्त ॥१७० ॥
फूट नाशका मूल है, फूट मत करो कोय । फूट पडी नृप हिंद में, दीयो देश को खोय
॥१७१ ॥
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वशीफरण यह मंत्र है, तज दे वचन कठोर तुलसी मीठे बोलसे, सुख उपजे चउ ओर
॥ १७२ ॥
जबराइका पेंडा न्यारा, कोई मत मानो रीस । सब देवता शीष पूजावे, लिंग पूजावे ईश ॥१७३ ।।
भंग वेचीथी जा दीना, भूरखा वेचाथा ता दीना । खबर पड़ेगी ता दीना, रंगरोट कटेगो जा दिना ॥ १७४।।
घर नहि तो मठ बनाया, धंधा नहि तो फेरी । बेटा नहि तो चेला मुंडा, ऐसी माया घरी ॥१७५॥
जब तक तेरे पुन्यका, ओर पता नहि करार । तब लग गुना माफ है, अवगुण करो हजार
॥१७६ ॥
पापी दृष्टि जीवने, धर्म वचन न सुहाय । के ऊंधे के लडपडे, के उठके घर जाय
॥ १७७ ॥
नारी कपटकी कोथली. नारी कपटकी खान । जे नारी के वश पड्या, ते न तर्या संसार
॥ १७८ ॥
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धर्म करत संसार सुख, धर्म करत नवनिध । धर्म पंथ साधन विना, नर तिथंच समान
॥१७९ ॥
जे माणस जेणीपरे, समजे धर्मनो सार । पंडित जन तेनी परे, समजावे निरधार
॥१८० ॥
सबसे हीलना सबसे मीलना, सबका लेना नाम । सबसे हाजी हाजी करना, बसना अपना गांव ।। १८१ ॥
हमारें जो भक्त है, तुम्हारे है वो ठक्त । तुम्हारे जो भक्त है, हमारे है वो ठक्त ॥१८२ ॥
धर्म घटे धन घटे, घटत घटत घट जाय । धर्म बढे धन बढे, बढत बढत बढ जाय
॥१८३ ।।
शरते करडे कुतरो, वे शरते मारे वाघ । विश्वासे मारे वाणियो, चगदायो करडे नाम
॥१८४ ॥
टकाही धर्म है टकाही कर्म है, टका स्वर्गका दाताजी । टकाही मनोरथ पूर्ण करेगा, टका चढायो माताजी ॥१८५॥
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भय त्यां कहीं न मानवो, ज्यां न होय ज्ञातिजन पास । कुहाडी काष्ठ विना, कदि न करे तरुवर नाश ॥१८६ ॥
निज धर्म जातिका, जिसको नहि अभिमान है। वह नर नहि वीन पुंछक, और मृतक समान है ॥ १८७॥
कोटडीए नाणां कदि भले बेसे, पण धर्म विनाधन शोभे नहि। सोले श्रृंगार सजे भले सुंदरी, पण नाक विना नारी शोमे नहि
कितनेक मुफलिस हो गये, कितनेक तवंगर हो गये। खाख में जब मील गये, तब दोनू बराबर हो गये ॥१८९।।
पैसो मारो परमेश्वर, कायडी मारो गुरु । छोकरां मारां संत साधू, सेवा किसकी करु
॥१९॥
शठने तो शिक्षा विना. कदि न आवे सान । कहींए खरने करगरी, तो न तजे तोफान ॥ १९१ ॥
लांचे लोको लूटवा, तजी खावं हराम । लायक जन लायक नर्हि, कोली भीलका काम ॥१९२॥
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ब्राह्मन भये तो क्या भये, गले में डाला सूत । आत्मज्ञान की खबर नहीं, भये श्मशान का भूत ॥१९३॥
गुरु गोविंद दोनूं खडे, किसकुं लागू पाय । बलिहारी गुरु देवकी, जीने गोविंद दियो वताय ॥ १९४ ॥
काम क्रोध मद लोभकी, जब लग मनमें खान । तब लग पंडित मूर्ख हि, सब हि एक समान ॥ १९५ ॥
सासरा सुख वासरा, दो दिनका आसरा । तीसरे दिन रहेवेगा, तो खावे खासरा
॥१९६॥
चलनो भलो न कोस को, हिता भली एक नार । मंगना नहीं सगा बापसे, जो रखावे प्रभू टेक ॥१९७ ॥
कबीर कहे कमालकुं, दो बातें शीख ले । कर साहेब की बंदगी, भूख्या को अन्न दे
॥१९८ ॥
जीव जीवके आशरे. जीव करत है राज । तुलसी रघुवीर आशरे क्यु बगडेगो काज
॥१९९ ॥
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माता पासे बेटा मागे, कर बकरे का साटा। अपना पुत खीलावन चाहे, पुत्त दूजेका काटा ॥२०॥
तुलसी इण संसार में, भात भातके लोक । सबसे हीलमील चालीए, नदी नाव सयाग
॥२०१॥
पंडित भये मसालची, बातां करे वनाय । औरन को उजला करे, आप अंधेरे जाय
॥२०२ ॥
मीठा बोला मानवी, केम पतीज्यां जाय । मोर कंठ मधुरो लवे, साप समुलो खाय
॥२०३॥
सास तीरथ ससरा तीरथ. आधा तीरथ साली। मा बापको लातज मारु, सब तीरथ घरवाली
॥२.४॥
भली करत लगत विलंब, विलंब न दूरे विचार । भवन बनावत दिन लगत, ढहत न लागत वार ॥ २०५ ॥
कार्तिक मासके कुतरे, तजे अन्न अरु प्यास । तुलसी वाकी क्या गति, जिनके बारे मास
॥२०६॥
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परधन पत्थर जाणीये, परस्त्री मात समान । इतने किये हरि न मीले, तो तुलसीदास जमान ॥ २०७।।
पठन गुनन कवि चातुरी है, सब बात सहल्ल । मदन दहन मन वशीकरन, गगन चलन मुसकिल ॥२०८॥
बात बात सब एक है, बतलावन में फेर । एक पवन बादल मीले, एक ही देत विखेर
॥२०९ ॥
जीभ्यामें अमृत बसे, विष भी उनके पास । एक बोल से लाख ल्ये, एक लाख विनाश
॥२१
॥
कविजन किमही न छडीए, जो होय हयडे सान । मेरु टाळी कर्कर करे, कर्कर मेरु समान ॥२११॥
जिनमूर्ति मानी नही, पूजत आण्यो द्वेष । ते नर मर गंडक हूवा, रोवे झालर देख
॥२१२ ।।
जाति न पुछो साधुकी, जो पुछो तो ज्ञान । मोल करो तरवार का, परा रहन दो म्यान
॥२१३॥
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दुःखमें सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमरिन करे, तो दुःख काहे को होय || २१४ ॥
संपत गई ते सांपडे, गया वलत है व्हाण | गत अवसर आवे नहिं, गया न आवे प्राण
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब । अवसर बित्यो जात है, फिर करेगो कब्
जाकी जैसी बुद्धि है, वैसा कहे बनाय । वाको बुरो न मानीए, लेने कहां से जाय
गेहु गोरस गोरडी, गज गुणियल ने गान । छ गग्गा जो इहां मीले, तो सग्गह शुं शुं काम ॥ २१७ ॥
छोटे नर के पेट में, रहे न मोटी बात । पाशेरी के पात्र में, कहां से शेर समात
मरन मरन सबको कहे, बहुरी मरन न कोय । कबीर मरन ऐसा करो, बहुरी मरन न होय
॥ २१५ ॥
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॥ २१८ ॥
॥ २१९ ॥
॥ २२० ॥
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अति मला नहिं बोलना, अति भला न चूप । अति भला नहि वरसना, अति भला नहि घुष ॥२२१ ।।
अंधाने अंधो कहे, वसमुं लागे घेण । धीरे धीरे पुछीए, शाथी खोया नेण
॥ २२२॥
मुरख जाणे मुज विना, चाले नहि व्यवहार । गया युधिष्ठर राम नल, पण चाळे संसार
॥२२३ ।।
राजा कोनो गोठीओ, जोगी कोनो मित्त । वेइया कोनी नार है, त्रण मित्त कुमित्त
अन्यनी निंदा जे करे, तम आगळ जे आज । क्लते करशे ते नकी, तम निंदानु काज
॥ २२५।।
बड़ा बडाई ना करे, बड़ा न बोले बोल । हीरा मुखसे ना कहे, लाख हमारा मोल
॥२२६॥
अंक विना अगणित मीडां, मिथ्या जेम मनाय । विवेक सद्गुण विण त्यम-विद्या व्यर्थ गणाय ॥ २२७॥
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संगत विचारी शुं करे, जेनु हृदय कठोर। नव नेजा पानी चडे, पत्थर न भीजे कोर
॥२२८ ॥
तुलसी हाय गरीब की, कबू न खाली जाय । मुवे ढोर के चामसे, लुहा भस्म हो जाय
॥२२९ ॥
सदैव जे साथ रहे, तेमां खटपट थाय । दांत तळे कोइक दिने, जीभ जरुर कचराय
॥२३० ॥
निंदक हमेरा मत मरो, मरो हमेरा पूत । वो नरके ले जायेगा, वो सरजेगा भृत
॥२३१ ॥
जब तुं आयो जगतमें, जगत हंसे तुं रोय । अब तो एसा कर चलो, तुं हंसे जग रोय
॥२३२ ॥
कबीरा सोही पीर है, जो जाणे पर पीर ।। पर पीर जीन्हे जानी नहीं, सो काफर ने पीर ॥२३३ ।।
नावमें नदीयां डुब गई, कुवेमें छग गई आग । कीचड पानी जल गया, मछली रह गई साफ ॥२३४ ।।
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गुल गये गुलशन गये, जगमें धतूरे रह गये । चाहनेवाले ना रहे, उल्लु के पठे रह गये ॥९३५ ॥
आदमको खूदा मत कहो, खूदा आदम नहि । लेकिन खुदा के नूर से, आदम जूदा नहि
॥२३६ ॥
जो कोई तुजको शूल वावे, बो तु उसीको फूल । तुजको फूल का फूल मीलगा, उसे बबूल के बबूल ॥२३७॥
कबीर कहे वनमें जाउ पता न तोडु, न कोई जीव सताउ । पतों पतों में साहिब मोरा, सब को शीष नमाऊ । २३८॥
मुजे सताले निवल जानके कभी समय वह आयगा। अपनी करनी का मुजसे ही, नीच शीघ्र फल पायगा २३९
बच्चू याद करो उस दीनको, अब समय हमारा आया है। देखो हमारी सबल मुंढको, इतना क्यों घबराया है ॥२४॥
तुलसी हाय गरीबकी, कबू न खाली जाय । मुवे ढोरके चाम से, लूहा भस्म हो जाय
॥२४१॥
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૪૦
-बहुत वणिज बहुत बेटियां, दो नारी भरतार | उसको क्या है मारना, मार रहा किरतार
पोथी पढ पढ जग मुआ, जोगी भया न कोय । ढाइ अखर प्रेमके पढै, सो जोगी होय
।। २४२ ।।
अन्नन्न देश जाया, अन्नन्नाहार वद्धिय शरीरा । जिण सासणे पवन्ना, सन्धे ते बन्धवा भणिया ॥ २४४ ॥
बहुआ नर दीसंति, नारी नई बुडवि गया । विरला केई तरंति, तारुण्णय तारु हुआ
आरंभे नत्थि दया, महिला संगेण नास ए बम्भं । संकाए समत्तं पव्वज्जा दव्व गहणेणं
॥ २४३ ॥
जहा लाहो तद्दा लोहो, लाहा लोहो पवडूइ । दो मास कणय कजं, कोडिए विन नियं
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॥ २४५ ॥
महिला कूड चरित, गंभ पुण पार न जाणई । दिनि डरपई दोरडई, रयणि विसहर फण मोडई ॥ २४७ ॥
॥ २४६ ॥
।। २४८ ॥
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४१
कम्मुणा बंभणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तिऊ । कम्मुणा वइसा होइ, सुद्दो होइ कम्मुणा
॥२४९ ।।
जहां पोपं जले जायं, नो वि लिप्पइ वारिणा । एवं अलित्त कामेहि, तं वयं बंभमाहणं
॥ २५० ॥
नवि मुंडिएण समणो, न ओंकारेण बंभयो । न मुणि रण वासेण, कुसीचीरेण न तावसो
॥२५१ ॥
जीव वधंता नरग गई, अवधता गई साग । हुँ पाणुं दो वाटडी, जिण भावे तिण लग्ग
॥२५२ ॥
नवि मारीयई नवि चोरीयई, परदारा गमण निवारीयई। थोअं थोअंदायियई, "तो" स्वर्गे जटा जट जायियई ॥२५३।।
સમાસ
रत
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ર
त्रिमूर्ति कैसे? एकमूर्तिस्त्रयो भागा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः। परस्परं विभिन्ना नामेकमूर्तिः कथं भवेत् ?
॥१॥
कार्य विष्णुः क्रिया ब्रह्मा, कारणं तु महेश्वरः । कार्यकारणसंपन्ना, एकमूर्तिः कथं भवेत् १ ॥२।
प्रजापतिसुतो ब्रह्मा, माता पनावती स्मृता । अभिजिञ्जन्मनक्षत्रमेकमूर्तिः कथं भवेत् ?
॥३॥
वसुदेवसुतो विष्णुर्माता च देवकी स्मृता ।। रोहिणी जन्म नक्षत्रमेकमूर्तिः कथं भवेत् ?
॥४॥
पेढालस्य सुतो रुद्रो, माता च सत्यकी स्मृता । मूलं च जन्म नक्षत्रमेकमूर्तिः कथं भवेत् ? ॥५॥
रक्तवर्णो भवेद् ब्रह्मा, श्वेतवर्णो महेश्वरः । कृष्णवर्णो भवेद् विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् ?
॥६॥
अक्षसूत्री भवेद् ब्रह्मा, द्वितीयः शलधारकः । तृतीय शंखचक्रांक, एकमतिः कथं भवेत् ?
॥७॥
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४३
चतुर्मुखो भवेद् ब्रह्मा, त्रिनेत्रोऽयं महेश्वरः । चतुर्भुजो भवेद्विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् १
॥८॥
मथुराया जातो ब्रह्म, राजगृहे महेश्वरः । द्वारावत्यामभाद्विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवत् !
॥९॥
हंसयानो भवेद् ब्रह्मा, वृषयानो महेश्वरः ॥ गरुडयानो भवेद्विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् ॥ १० ॥
पद्महस्तो भवेद् ब्रह्मा, शूलपाणिमहेश्वर ॥ चक्रपाणिभवेद्विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् १ ॥ ११ ॥
कृते जातो भवेद् ब्रह्मा, त्रेतायां च महेश्वरः । द्वापरे जनितो विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् १ ॥ १२ ॥
ज्ञानं विष्णुस्सदा प्रोक्तं, चारित्रं ब्रह्म उच्यते ॥ सम्यक्तं तु शिवं प्रोक्तमहन्मूर्तिस्त्रयात्मिका ॥ १३ ॥
मुक्तो न करोति जगेन कर्मणा बध्यते वितरागः। रागादियुतः सतनुर्निबध्यते कर्मणा वश्यम् ॥ १४ ॥
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शुद्धिपत्रक
पेन
पंक्ति
अशुद्ध
अर्ड
अङ्गं
१०
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प्रमाणम्
प्य
यिन्तितं
ययिन्तितं
१५
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चिः
चित्तः
माया:
क्षमाया: कण्ठ
२
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