Book Title: Jinabhashita 2008 08
Author(s): Ratanchand Jain
Publisher: Sarvoday Jain Vidyapith Agra
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिनभाषित वीर निर्वाण सं. 2534 m कुम्भोज-बाहुबली (कोल्हापुर, महाराष्ट्र) में विराजमान अतिप्राचीन जिनप्रतिमा श्रावण, वि.सं. 2065 अगस्त, 2008 Jain dhaation IMINARimedia Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'ही' और 'भी' आचार्य श्री विद्यासागर जी मूकमाटी महाकाव्य की निम्नलिखित काव्यपंक्तियाँ मिट्टी के घड़े पर चित्रित 'ही' और 'भी' अक्षरों के द्वारा दूसरों के धर्म, संस्कृति और विचारों का आदर करने की प्रेरणा देती हैं सम्पादक अब दर्शक को दर्शन होता है 'भी' है भारतीय संस्कृति, भाग्यविधाता। कुम्भ के मुखमण्डल पर रावण था 'ही' का उपासक 'ही' और 'भी' इन दो अक्षरों का। राम के भीतर 'भी' बैठा था। ये दोनों बीजाक्षर हैं, यही कारण कि अपने-अपने दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं। राम उपास्य हुए हैं, रहेंगे आगे भी। 'ही' एकान्तवाद का समर्थक है 'भी' के आस-पास 'भी' अनेकान्त, स्याद्वाद का प्रतीक। बढ़ती-सी भीड़ लगती अवश्य, हम ही सब कुछ हैं किन्तु भीड़ नहीं, यूँ कहता है 'ही' सदा 'भी' लोकतन्त्र की रीढ़ है। तुम तो तुच्छ, कुछ नहीं हो। लोक में लोकतन्त्र का नीड़ तब तक सुरक्षित रहेगा, 'भी' का कहना है कि जब तक 'भी' श्वास लेता रहेगा। हम भी हैं 'भी' से स्वच्छन्दता-मदान्धता मिटती है तुम भी हो स्वतन्त्रता के स्वप्न साकार होते हैं, सब कुछ! सद्विचार सदाचार के बीज 'ही' देखता है हीन दृष्टि से पर को 'भी' में हैं, 'ही' में नहीं। 'भी' देखता है समीचीन दृष्टि से सब को, प्रभु से प्रार्थना है कि 'ही' वस्तु की शक्ल को ही पकड़ता है 'ही' से हीन हो जगत् यह 'भी' वस्तु के भीतरी भाग को भी छूता है, अभी हो या कभी भी हो 'ही' पश्चिमी सभ्यता है 'भी' से भेंट सभी की हो। और For Private & Personal use only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रजि. नं. UPHIN/2006/16750 अगस्त 2008 मासिक वर्ष 7, अङ्क 8 जिनभाषित सम्पादक प्रो. रतनचन्द्र जैन अन्तस्तत्त्व पृष्ठ कार्यालय ए/2, मानसरोवर, शाहपुरा भोपाल-462 039 (म.प्र.) फोन नं. 0755-2424666 सहयोगी सम्पादक पं. मूलचन्द्र लुहाड़िया, मदनगंज किशनगढ़ पं. रतनलाल बैनाड़ा, आगरा डॉ. शीतलचन्द्र जैन, जयपुर डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत प्रो. वृषभ प्रसाद जैन, लखनऊ डॉ.सुरेन्द्र जैन 'भारती', बुरहानपुर शिरोमणि संरक्षक श्री रतनलाल कँवरलाल पाटनी (मे. आर.के.मार्बल) किशनगढ़ (राज.) श्री गणेश कुमार राणा, जयपुर . काव्य : 'ही' और 'भी' आ.पू.2 : आचार्य श्री विद्यासागर जी . मुनि श्री क्षमासागर जी की कविताएँ आ.पृ.3 • मुनि श्री योगसागर जी की कविताएँ आ.पृ. 4 . सम्पादकीय : संकल्प पुष्प और ठौना प्रवचन • सत्य की छाँव में : आचार्य श्री विद्यासागर जी . लेख शाहपुर (म.प्र.) में विद्यालय : क्षु. श्री गणेशप्रसाद जी वर्णी 11 जैन समाज का महनीय गौरवग्रन्थ कातन्त्रव्याकरण 13 ': प्रो. (डॉ०) राजराम जैन • अजैहॊतव्यम् का अर्थ क्या पशुबलि ही है? :: आलोक मोदी जैनदर्शनाचार्य 17 • श्री पाड़ासाह ': पं. कुन्दकुन्दलाल जैन 21 . संस्कृत काव्य • विद्याष्टकम् : डॉ. भागचन्द्र जैन 'भागेन्दु' 24 . जिज्ञासा-समाधान : पं. रतनलाल बैनाड़ा . ग्रन्थसमीक्षा • चिन्तामणित्रय- समीक्षा : पं. लालचन्द्र जैन 'राकेश' 29 • तीर्थक्षेत्र परिचय : • श्री दि० जैन अतिशय क्षेत्र पटनागंज (रहली) सागर म.प्र. 31 प्रकाशक सर्वोदय जैन विद्यापीठ 1/205, प्रोफेसर्स कॉलोनी, आगरा-282 002 (उ.प्र.) फोन : 0562-2851428, 2852278| 26 सदस्यता शुल्क शिरोमणि संरक्षक 5,00,000 रु. परम संरक्षक 51,000 रु. संरक्षक 5,000 रु. आजीवन 1100 रु. वार्षिक 150 रु. एक प्रति 15 रु. सदस्यता शुल्क प्रकाशक को भेजें। समाचार लेखक के विचारों से सम्पादक का सहमत होना आवश्यक नहीं है। 'जिनभाषित' से सम्बन्धित समस्त विवादों के लिये न्यायक्षेत्र भोपाल ही मान्य होगा। ' Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्पादकीय संकल्पपुष्प और ठौना "जिनभाषित' मई 2008 के सम्पादकीय में मैंने वयोवृद्ध प्रतिष्ठाचार्य पं० गुलाबचन्द्र जी 'पुष्प' का यह कथन उद्धृत किया था कि 'देवपूजा में आवाहन आदि करते समय ठौने पर जो पुष्प चढ़ाये जाते हैं, उनमें जिनेन्द्र की स्थापना नहीं की जाती, अपितु वे आवाहन, स्थापन और सन्निधीकरण के संकल्प के प्रतीक या सूचक होते हैं।' यह बात उन्होंने पं० सदासुखदास जी के निम्नलिखित वचनों के आधार पर लिखी है- "बहुरि व्यवहार में पूजन के पंच अंगनि की प्रवृत्ति देखिये हैं- १. आवाहन, २. स्थापना, ३. संनिधीकरण, ४. पूजन और ५. विसर्जन। सो भावनि के जोड़वा वास्तै आवाहनादिक में पुष्पक्षेपण करिये हैं। पुष्पनिकू प्रतिमा नहीं जाने हैं। ए तो आवाहनादिकनि का संकल्प” पुष्पांजलि क्षेपण है। पूजन में पाठ रच्या होय तो स्थापना कर ले, नाहीं होय तो नाहीं करै। अनेकांतनि के 'सर्वथा' पक्ष नाहीं। भगवान् परमात्मा तो सिद्धलोक में हैं, एक प्रदेश भी स्थान तैं चलै नाहीं, परन्तु तदाकार प्रतिबिम्ब सूं ध्यान जोड़ने के अर्थि साक्षात् अरहंत, सिद्ध आचार्य, उपाध्याय, साधु रूप का प्रतिमा में निश्चय करि प्रतिबिम्ब में ध्यान, पूजा, स्तवन करना।" (रत्नकरण्डश्रावकार / भाषावचनिका / गा.११९ / पृ.२१४)। इस कथन से जिनपूजा-सम्बन्धी यह सारभूत तथ्य हृदयंगम होता है कि जिस क्षेत्र और जिस काल में साक्षात् जिन का अभाव होता है, उस क्षेत्र और उस काल में जिनबिम्ब की ही पूजा की जाती है, जिनबिम्ब की पूजा के माध्यम से ही जिन की पूजा संभव होती है। और जिनबिम्ब जिनालय में सदा प्रतिष्ठित रहता है, जिसका तात्पर्य यह है कि उसमें स्थापना-निक्षेप से जिनदेव सदा विद्यमान रहते हैं। अतः पूजा के समय उनके आवाहन, स्थापन और सन्निधीकरण की आवश्यकता नहीं होती। हम विना आवाहनादि के ही जिनबिम्ब के दर्शन करते हैं, बिना आवाहनादि के ही जिनबिम्ब का अभिषेक करते हैं, तब पूजन के लिए आवाहनादि को आवश्यक मानना युक्तिसंगत नहीं है। इसीलिए सोमदेवसूरि (११वीं शती ई०) ने उपासकाध्ययन में आवाहन को तो पूजा का अंग ही नहीं बतलाया। उन्होंने उपासकाध्ययन में पूजा के छह अंग वर्णित किये हैं प्रस्तावना पुराकर्म, स्थापना सन्निधापनम्। पूजा पूजाफलं चेति षड्विधं देवसेवनम्॥ ४९५॥ इन छह अंगों में केवल स्थापना और सन्निधीकरण का उल्लेख है, आवाहन और विसर्जन का नाम नहीं है। और "अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः" उच्चारण करते हए ठोने पर पुष्पक्षेपण करने को स्थापना नहीं कहा, अपितु अभिषेक एवं पूजन के लिए जिनबिम्ब को मूलपीठ (वेदी) से उठाकर स्नानपीठ पर लाकर रखने को स्थापना कहा है। देखिये उपासकाध्ययन का निम्नलिखित श्लोक तीर्थोदकैर्मणिसुवर्णघटोपनीतैः पीठे पवित्रवपुषि प्रविकल्पितार्थे । लक्ष्मीश्रुतागमनबीजविदर्भगर्भे संस्थापयामि भुवनाधिपतिं जिनेन्द्रम्॥ ५०२॥ (इति स्थापना) अनुवाद- "जो पीठ मणिजटित सुवर्णघटों से लाये गये जल से शुद्ध किया गया है, तत्पश्चात् जिसे अर्घ दिया गया है तथा जिस पर 'श्री ह्री' लिखा गया है, उस पीठ पर तीनों लोकों के स्वामी जिनेन्द्रदेव (जिनबिम्ब) को मैं स्थापित करता हूँ। (यही स्थापना है)।" इसी प्रकार सोमदेवसूरि ने 'अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्' इन शब्दों का उच्चारण करते हुए ठौने पर पुष्प चढ़ाने को सन्निधीकरण नहीं कहा, बल्कि "यह (स्नानपीठ पर स्थापित) जिनबम्ब ही साक्षात् जिनेन्द्रदेव है, यह स्नानपीठ ही सुमेरुपर्वत है, घटों में भरा हुआ जल ही साक्षात् क्षीर-सागर का जल 2 अग्रस्त 2008 जिनभाषित - Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ है और आपका अभिषेक करने के कारण मैं इन्द्र हूँ, तब इस महोत्सव की शोभा पूर्ण क्यों नहीं होगी?" ऐसा विचार करने को सन्निधीकरण नाम दिया है। प्रमाण के लिए उपासकाध्ययन का निम्मलिखित पद्य द्रष्टव्य है सोऽयं जिनः सुरगिरिनु पीठमेतदेतानि दुग्धजलधेः सलिलानि साक्षात्। इन्द्रस्त्वहं तव सवप्रतिकर्मयोगात्पूर्णा ततः कथमियं न मोहत्सवश्रीः॥ ५०३॥ (इति सन्निधापनम्) सोमदेवसूरि ने पूजन के पूर्व जिनेन्द्र-प्रतिमा के अभिषेक की तैयारी करने को प्रस्तावना संज्ञा दी है और जिस पीठ पर अर्हबिम्ब को स्थापित कर अभिषेक किया जाना है, उसकी शुद्धि कर जलादि से भरे कलशों को चारों कोनों में स्थापित करना पुराकर्म बतलाया है। (उपासकाध्ययन / पद्य ४९९-५०१)। ये स्थापना और सन्निधापन तथा उसके बाद अभिषेक और पूजन, ये सभी कार्य स्नानपीठ पर सम्पन्न किये जाते हैं, अतः ठौने की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार जिनालय में जिनबिम्ब के सर्वदा विराजमान होने के कारण जब उसके आवाहन की आवश्कता ही नहीं होती, और आवाहन करने से वह स्वयं चलकर स्नानपीठ (जिसे पूजनपीठ भी कहा जा सकता है, क्योंकि अभिषेक भी पूजा है) तक आ नहीं सकता, इसलिए आवाहन अयुक्तिसंगत है, तब आवाहनादि के संकल्प हेतु पुष्पक्षेपण भी अयुक्तिसंगत सिद्ध होता है। इसलिए पं० सदासुखदास जी एवं पं० गुलाबचन्द्र जी पुष्प ने आवाहनादि करते समय ठौने पर क्षेपण किये जानेवाले पुष्पों को जो संकल्पपुष्प माना है, वह समीचीन नहीं है। इसके अतिरिक्त ईसा की ११वीं शताब्दी तक स्थापना के लिए ठौने का उपयोग नहीं होता था, यह सोमदेवसूरि द्वारा वर्णित स्थापना की उपर्युक्त विधि से सिद्ध है। उक्त प्रयोजन से ठौने का इस्तेमाल १५वीं शती ई० तक भी नहीं होता था, क्योंकि इस समय हुए श्रुतसागरसूरि ने ठौने को पूजाद्रव्य रखने का पात्र बतलाया है, पुष्पों में जिनेन्द्रदेव की स्थापना या संकल्पपुष्प-क्षेपण का पात्र नहीं। वे अष्टमंगल द्रव्यों में परिगणित ठौने (सुप्रीतिका) का लक्षण बतलाते हुए लिखते हैं- "सुप्रीतिका = विचित्र-चित्रमयी पूजा द्रव्यस्थापनार्हा स्तम्भाधारकुम्भी।" (दंसणपाहुड / टीका / गा. ३५)। अर्थात् पूजाद्रव्य (की थाली) रखने योग्य तरह-तरह के चित्रों से अंकित एवं स्तम्भों पर आधारित कुम्भी (घटिका) ठौना कहलाती है। ठौने के इस शास्त्रोक्त प्रयोजन से सिद्ध है कि ईसा की १५वीं शती तक न तो ठौने पर पुष्पादि चढ़ा कर उनमें जिनेन्द्रदेव की स्थापना की जाती थी, न संकल्पपुष्प का क्षेपण किया जाता था, अपितु जिनेन्द्रदेव की पूजा के लिए लायी गयी अष्ट द्रव्यों की थाली स्थापित की जाती थी। इससे फलित होता है कि १५वीं शती ई० तक स्थापना और सन्निधीकरण की क्रियाएँ उसी प्रकार सम्पन्न की जाती थीं, जिस प्रकार सोमदेव सूरि ने उपासकाध्ययन (यशस्तिलकचम्पू के अष्टम आश्वास) में वर्णित की हैं। सोमदेवसूरि ने पूजा के उपर्युक्त छह अंगों में आवाहन और विसर्जन को शामिल नहीं किया, क्योंकि समक्ष विराजमान जिनबिम्ब की पूजा में वे असंगत हैं। तिलोयपण्णत्ती (महाधिकार ५ / गाथा ८३-११६) में बतलाया गया है कि अष्टाह्निकापर्व में चारों निकायों के देव नन्दीश्वरद्वीप जाते हैं और वहाँ अकृत्रिम जिनप्रतिमाओं का अभिषेक और पूजन करते हैं। उनकी पूजाविधि में आवाहन, स्थापन, सन्निधीकरण और विसर्जन, इन चार अंगों का वर्णन नहीं है, क्योंकि समक्ष विराजमान अकृत्रिम प्रतिमाओं की पूजा में ये चारों अंग असंगत हैं। पं० सदासुखदास जी ने भी लिखा है-"अर प्रतिबिम्ब तदाकार होते किसी ग्रन्थ में हूँ स्थापना का वर्णन नाहीं, अर अब इस कलिकाल में प्रतिमा विराजमान होते हूँ स्थापना ही कूँ प्रधान कहैं हैं।" अर्थात् इस कलियुग में लोग प्रतिमा के विराजमान होने पर भी, स्थापना का ही आग्रह करते है, जो अनुचित है। (रत्नकरण्डश्रावकाचार / भाषा वचनिका/कारिका ११९ / पृ. २१२)। प्रतिष्ठित प्रतिमा के विराजमान होने पर आवाहन और विसर्जन तो हिन्दू-पूजाविधि में भी नहीं होते- “प्रतिष्ठितप्रतिमायामा - अगस्त 2008 जिनभाषित 3 Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4 वाहनविसर्जनयोरभावेन...।" (संस्काररत्नमाला / पृ.२७ / उपासकाध्ययन / प्रस्तावना / पृ. ५६ ) । देवपूजा के विषय में जिनागम का सार यह है कि जिस क्षेत्र और जिस काल में साक्षात् जिन उपस्थित नहीं हैं, उस क्षेत्र और उस काल में जिनबिम्ब ही पूजनीय है, क्योंकि उसकी पूजा के द्वारा ही जिन की पूजा संभव होती है। जिनबिम्ब के अतिरिक्त अन्य किसी का भी बिम्ब पूजनीय नहीं है, भले ही वह जिनशासन-देवताओं का बिम्ब हो । जिनबिम्ब के दर्शन ही सम्यक्त्वोत्पत्ति एवं संवर- निर्जरा के कारण हैं। जैसे जिनशासन- देव-देवियों के बिम्ब पूज्य नहीं है, वैसे ही जिन पाषाण, अक्षत, लवंग, पुष्प आदि में जिनबिम्ब नहीं है, वे भी पूज्य नहीं हैं। जिनबिम्ब भी वही पूजनीय है, जो दिगम्बरजैन पंचकल्याणक प्रतिष्ठा विधि द्वारा प्रतिष्ठित हो, यदि अप्रतिष्ठित है, तो जिनबिम्ब होते हुए भी अपूज्य है । श्रुतसागरसूरि ने लिखा है कि यापनीय आदि पंचजैनाभासों के द्वारा प्रतिष्ठित नग्न मूर्ति (जिनबिम्ब ) भी वंदनीय एवं पूजनीय नहीं है 'या च पञ्चजैनाभासैरञ्चलिकारहितापि नग्नमूर्तिरपि प्रतिष्ठिता सा न वन्दनीय, न चार्चनीयाः ।' (बोध- पाहुड / टीका /गा. १०) । पं० बनारसीदास जी वाणारसीविलास में लिखते हैं कि आगम में कहा गया है- 'जिनबिम्ब वही है, जो सर्वथा जिनसदृश हो । यदि उसमें रंचमात्र भी दोष हो अर्थात् जिनरूप से रंचमात्र भी भिन्नता हो, तो वह जिनबिम्ब नहीं होता, अतः वन्दनीय नहीं है ।' यथा जिनप्रतिमा जिनसारिसी, कही जिनागममाहिं । रंचमात्र दूषण लगे, वंदनीक सो नाहिं ॥ प्रतिष्ठत होने के बाद खण्डित हुआ जिनबिम्ब भी जिनसदृश न रहने के कारण पूजनीय नहीं होता । तब ठौने पर चढ़ाये गये पुष्पादि में तो जिनरूप का तिलमात्र भी सादृश्य नहीं होता, न ही उनमें पंचकल्याणक - विधि द्वारा जिनत्व की प्रतिष्ठा की गयी होती है, अतः वे जिनबिम्ब न होने के कारण कदापि वन्दनीय एवं पूजनीय नहीं हैं। जैसे जिनशासन - देव - देवियों की मूर्ति में जिनत्व की स्थापना नहीं की जा सकती, वैसे ही पाषाण, अक्षत, पुष्प, लवंग, बादाम, श्रीफल आदि में भी जिनत्व की स्थापना नहीं की जा सकती । अतः ठौने पर चढ़ाये जाने पर भी पुष्पादि अवन्द्य और अपूज्य होते हैं। शिष्टाचार आचार्य महाराज कभी किसी से आने-जाने या ठहरने के बाबत् कोई चर्चा नहीं करते। एक बार महाराज ने किसी से कहा कि महाराज आप अपने पास आने-जाने वाले व्यक्ति से बैठने के लिए भी नहीं कहते। अच्छा नहीं लगता । इतना शिष्टाचार तो साधु के द्वारा होना चाहिए । आचार्य महाराज ने सारी बात बड़े ध्यान से सुनी और मुस्कराकर बोले- 'भैया, यह स्थान मेरा तो है नहीं, जो यहाँ बैठने के लिए कहूँ। साथ ही आने-जाने की अनुमोदना भी मैं कैसे कर सकता हूँ, क्योंकि आने-जाने वाला तो वाहन का उपयोग करेगा, जिसका मैं त्याग कर चुका हूँ और मान लो, वह व्यक्ति मात्र दर्शन करके जाना चाहता हो तो मेरे कहने से उसे जबरदस्ती बैठना पड़ेगा।' आचार्यों का उपदेश तो साधु के लिए केवल इतना ही है कि वह आनेवाले व्यक्तियों को हाथ की अभय - मुद्रा के द्वारा कल्याण का संकेत दे और मुख पर प्रसाद बिखरे दे । यही शिष्टाचार पर्याप्त है । यहीं साधु की विनय है। कितना अनासक्त और सुविचारित है उनका शिष्टाचार | आत्मान्वेषी (मुनि श्री क्षमासागर जी) से साभार अग्रस्त 2008 जिनभाषित रतनचन्द्र जैन Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवचन सत्य की छाँव में आचार्य श्री विद्यासागर जी ___ यदि कोई सिद्धान्त का गलत अर्थ निकालता है, | की ओट में छुपा देता है। यही विचारने की बात है, तो उससे बिना पूछे ही उसका निराकरण करना चाहिए। आचार की बात है, कौन नहीं जानता कि चोरी करना यदि उस समय वह समन्तभद्राचार्य जैसी गर्जना नहीं | गलत है। लेकिन वह चोर भी जानता हुआ डरता है, करता है, तो उसका सम्यग्ज्ञान मिथ्याज्ञान में परिणत हो पीछे मुड़कर देखता है कि पुलिस आ रही है और मेरे जायेगा। जिस प्रकार वातावरण से प्रभावित होकर के लिए पकड़ेगी। इस प्रकार वह भयभीत होता हुआ चोरी गिरगिट अपना रंग बदलता रहता है, उसी प्रकार आजकल | को अच्छा नहीं समझता, फिर भी लत पड़ गई है, इसलिये के वक्ता भी स्वार्थसिद्धि की वजह से आगम के अर्थ | वह चोरी को छोड नहीं पा रहा है। विषयों की चपेट को बदलते रहते हैं। | में आया हुआ प्राणी, विषयों को छोड़ नहीं पाता, यह लोभ के वशीभूत हुआ प्राणी सत्य धर्म को सही- | अज्ञान है। अज्ञान का अर्थ यह नहीं कि वहाँ पर ज्ञान सही उदघाटित नहीं कर सकता। सत्य का अर्थ है अहिंसा। का अभाव है। ज्ञान तो है, लेकिन पुरा नहीं है, और असत्य का अर्थ है हिंसा, सत्य का पक्ष कभी फालतू | सही नहीं है। इसलिये येन केन प्रकारेण विषयों की नहीं जाता। पूर्ति के लिए कदम उठाता है। लौकिक क्षेत्र में यह प्रसिद्ध है कि जिस रोग पक्षपात! के आवागमन से शरीर का पक्ष विकल हो जाता है, यह एक ऐसा शरीर का एक भाग काम नहीं करता, उसे वैद्य लोग जलप्रपात है पक्षाघात कहते हैं। मैं समझता हूँ कि पक्षाघात स्वयं पक्षपात जहाँ पर से युक्त है, क्योंकि वह शरीर के मात्र आधे हिस्से को सत्य की सजीव माटी ही निष्क्रिय बनाता है। पक्षपात के आने से उसकी चाल टिक नहीं सकती में, उसकी दृष्टि में, उसकी प्रत्येक क्रिया में अन्तर बह जाती आ जाता है। जहाँ पक्षपात आ जाता है, वहाँ भीतर की पता नहीं कहाँ ? बात भीतर रह जाती है। वह जाती किसी व्यक्ति से पूछा जाये कि तुमने चोरी की असत्य के अरगढ़ है? तो उसका मन पहले कहता है कि 'हूँ', फिर बाद विशाल पाषाण खण्ड में जब उसे बाध्य किया जाता है, तो यह 'परावाक् अधगढ़े टेड़े-मेड़े पश्यन्ति' के रूप में परिवर्तित हो जाती है, उस समय अपने धुन पर अड़े भी परावाक् बिल्कुल शुद्ध रहती है, पश्यन्ति भी बिल्कुल शोभित होते। ठीक रहती है। किन्तु! मध्यमा के ऊपर ज्यों ही चढ़ना - 'डूबो मत, लगाओ डुबकी' से प्रारम्भ कर देता है, त्योंही उसके लिए एक आज्ञा आ पक्षपात एक ऐसा जलप्रपात है, जो सत्य की माटी जाती है, और जिह्वा बोलना भी चाहती है, लेकिन उसका को टिकने नहीं देता। सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरिजी में हमने देखा गला घुटकर-सा रह जाता है, वह कहती है कि जैसा था, तो वहाँ टेड़े-मेड़े विशाल पाषाण खण्ड ही मात्र हुआ वैसा नहीं, जो मैं कह रहा हूँ, वह बोलना है। मिले, माटी के दर्शन तो वहाँ पर हुए ही नहीं। असत्यक्यों तुमने चोरी की है? तो वह कहता है कि हूँ... | जीवन के पास जाते ही घबराहट होने लगती है। कहीं हूँ.... नहीं, यह निकल गया। इसका अर्थ है, हाँ फिर | ऐसा न हो कि सत्य, असत्य रूप में परिणत हो जाए उसके उपरान्त नहीं करता है। आप कितनी भी पिटाई | आज सुबह ही एक सूत्र में आया थाकीजिए, कड़ा से कड़ा दण्ड दीजिए वह सत्य को असत्य | बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च। त.सू.अ.५-सू-३७ अगस्त 2008 जिनभाषित 5 Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिणमन कराने की शक्ति असत्य के पास बहुत | जीव है, वह सच्चे देव-शास्त्र-गुरु पर श्रद्धा रखता है, है। सत्य के पैरों को भी वह हिला देता है, क्योंकि | लेकिन फिर भी उसके अन्दर कहाँ पर कमी रहती है? सत्य कथंचित आदि है और असत्य अनन्तकाल से चला | तो आचार्य कहते हैं कि भाव-भासन का अभाव है। आ रहा है। सत्य की सुरक्षा आज अनिवार्य है। | भोगों की चपेट से वह अपने को छुड़ा नहीं पा रहा सत्य की सुरक्षा वहीं पर हो सकती है, जहाँ पर | है। ज्ञान का समार्जन करनेवाला व्यक्ति, यह सोचता है पक्षपात नहीं है, जहाँ शुद्ध आचार-विचार हैं, और यदि | कि मेरे भीतर भोग की लिप्सा कितनी मात्रा में घटी यह सब नहीं है, तो वहाँ सत्य धीरे-धीरे फिसलता हुआ | है। चाहे वह स्वाध्याय करनेवाला हो या पूजन करनेवाला, असत्य के रूप में बदलता जाता है। आज मुझे सत्य | अन्दर ही अन्दर वे घड़ियाँ चलती रहती हैं। जिस प्रकार की बात कहना है असत्य की नहीं, असत्य से तो आप | ब्लड-प्रेशर नापते समय काँटा यूँ-यूँ करता है, उसी प्रकार सभी लोग परिचित हैं। मन की प्रणाली बार-बार विषयों की ओर जाती है। सुदपरिचिदाणुभूदा, सव्वस्सवि कामभोगबंधकहा।। सत्य क्या है? असत्य क्या है? वह सोचता रहता है। एयत्तस्सुवलम्भो, णवरि ण सुलहो विहत्तस्स॥ एक दोस्त था। उसके घर के लोग तन्त्र-मन्त्र को स.सा.गा. ४ | बहुत मान्यता देते थे। और वह मात्र देव-शास्त्र-गुरु को आचार्य कुन्दकुन्ददेव समयसार में कहते हैं कि | मानता था। एक दिन वह कहता है कि मुझे एक ताबीज इस आत्मा ने भोग, काम, बन्ध की कथायें खब सनी | लेना है। मैंने कहा कि कहाँ से लाओगे? सुनार के यहाँ हैं, यदि नहीं सुनी है तो, एकत्व की कथा नहीं सुनी। से लायेंगे। मैंने कहा कि चलो हम भी देखते हैं विषयों का इसे खूब अनुभव है। विषयभोग के बारे में | ताबीज बनती है। तब, वह सुनार के पास जाकर कोई भी बालक नहीं है, सभी अनन्तकाल के आसामी | है कि फलाने व्यक्ति ने इस प्रकार की ताबीज लाने हैं. और अनंत का कोई ओर-छोर नहीं होता। आत्मा | के लिये कहा था। जो कछ भी पैसा लेना है ले लो का क्या इतिहास है? पहले ही हमने बताया था. कि लेकिन ताबीज अच्छी बनाना है। ताबीज बनाते समय आज मुझे सत्य की बात कहनी है। सत्य क्या है? सत्य | ताँबे के ऊपर हथौड़े की सही चोट पड़ना चाहिए झूठी अमर है। सत्य, अनादि काल से चला आ रहा है। आज | नहीं पड़ना चाहिए। झूठ का मतलब मैं समझता रहा, तक हमने सत्य का मूल्यांकन नहीं किया, आज तक | देखता रहा। झूठ कौन सी होती है, जो कोई भी आभरण हमने सत्य का संवेदन नहीं किया, मात्र असत्य का | बनते हैं, उन पर हथौड़े की चोट करके यूँ-यूँ करते संवेदन-मनन-चिन्तन किया है, स्वप्न में भी सत्य का | हैं। उसको बोलते हैं झूठा प्रहार, उसका कोई मतलब संवेदन नहीं किया। जिसने सत्य का संवेदन किया, उसे | नहीं होता। इसका अर्थ होता है कि ताबीज झूठा प्रहार मार्ग मिला, मंजिल मिली और अनंतकाल के लिए वह | सहन नहीं कर सकता। बाँधनेवाला झूठ बोले यह बात अनंत, अव्याबाध सुख का भोक्ता बन गया। सत्य की | अलग है, लेकिन ताबीज कहता है कि मेरा निर्माण बिना महिमा कहने योग्य नहीं है। उसे हम शब्दों में नहीं | झूठ के हुआ है। हमने सोचा क्या मामला है? तो मामला बाँध सकते। वह लिखने की वस्तु नहीं है, लखने की | यह है कि सुनार की सावधानी वहाँ पर होगी। वस्तु है। 'लिखनहारे तो बहुत हैं, लेकिन लखनहारा आज तो 'धर्मयुग' है। हाँ बात तो बिल्कुल ठीक तो विरला ही पाओगे।' वस्तुतत्त्व का निरीक्षण करनेवाला | है भैय्या! आज तो धर्मयुग पत्रिका निकल रही है, और हृदय आज कहाँ है? इसलिए आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने 'युगधर्म' भी निकलता है। कभी धर्म आगे बढ़ जाता लेखनी उठाते ही कह दिया 'सुदपरिचिदाणुभूदा' सभी है, तो कभी युग आगे बढ़ जाता है। तो हम धर्मयुग कार्य संसारी प्राणी ने अनंतों बार किये हैं। की बात करें। आज युग इतने आगे बढ़ गया है, और पूर्व वक्ता ने अभी-अभी कहा था कि जिनवाणी | धर्म इतने पीछे रह गया है कि क्या बताऊँ? इसलिए को अपने जीवन में उतारना है। 'धम्मं भोगणिमित्तं।' | तो धर्मयुग कहा गया। धर्म की बातें करने से धर्म नहीं यह गाथा जब, मैं आगे जाकर उसी समयसार में देखता | आ सकता, धर्म तो तब आयेगा जब युग धर्ममय बन हूँ, तो एक विचित्र सत्य के दर्शन होते हैं। एक मिथ्यादृष्टि | जाये। पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं 6 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यह युग धर्म का नाश हो रहा हो तो? अप्रत्याशित धर्मनाशे क्रियाध्वंसे सुसिद्धान्तार्थविप्लवे। आगे बढ़ चुका है बहुत दूर.... अपृष्टैरपि वक्तव्यं तत्स्वरूपप्रकाशने। (ज्ञानार्णव) और! जब धर्म का नाश होने लगता है, धार्मिक क्रियाओं धर्म वह का विध्वंस होने लगता है और यदि कोई व्यक्ति सिद्धान्त बहुत ... दूर... का गलत अर्थ निकालता है, तो उस समय बिना पूछे पीछे रह चुका है ही उसका निराकरण करना चाहिए। उस समय वह अन्यथा समन्तभद्राचार्य जैसी गर्जना नहीं करता है, तो उसका पत्रिका का नाम सम्यग्ज्ञान मिथ्याज्ञान के रूप में परिणत हो जायेगा। क्योंकि धर्मयुग उस समय उसने सत्य ढक दिया। यह बात मुमुक्षु को क्यों पड़ा यह? हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। आज महावीर भगवान 'चेतना के गहराव में' से | के सिद्धान्त के अनुसार चलनेवाले विरले ही रह गये सत्य का अर्थ है अहिंसा और असत्य का अर्थ | हैं। मात्र साहित्य के माध्यम से ही महावीर का धर्म है हिंसा। हमारे उपास्य देवता सत्य और अहिंसा हैं। | जीवित नहीं है, बल्कि उस साहित्य के अनुरूप चर्या इन्हीं दो मंत्रों को लेकर गाँधी जी ने ब्रिटिश गवर्नमेंट | भी देखने को मिल रही है। भले ही उसका पालन करनेको प्रभावित किया था। इस शताब्दी में भी इस प्रकार | वाले अल्प संख्या में हैं। के परिवर्तन हुए हैं। सत्य-अहिंसा कोई शाब्दिक व्याख्या | साहित्य के अनुरूप आचरण करनेवालों की कमी नहीं है। यह एक प्रकार से भीतर की बात है। आज | होने के कारण बौद्धधर्म विश्व में रहते हुए भी किस सत्य के कदम कहाँ तक उठ रहे हैं, अपने जीवन | रूप में है? हम जान नहीं सकते, मात्र पेटियों में बन्द में सत्य का मूल्यांकन कहाँ तक हो रहा है? छोटी- | हो गया है, बौद्धधर्म के उपासक आज भारत में नहीं छोटी बातों को लेकर झूठ बोलते हैं, लेकिन यह विश्वास | हैं, जबकि बौद्धधर्म भारत में ही स्थापित हुआ था। के साथ सोचना चाहिए, जो काम झूठ के द्वारा हो रहा | प्रचार-प्रसार हुआ था, कि उसके उपासक यहाँ पर नहीं है, क्या वह सत्य के द्वारा नहीं होगा? उससे बढ़कर | टिक सकेंगे। फिर बाद में वह धर्म तिब्बत, लंका आदि ही होगा। लेकिन असत्य के ऊपर हमारा विश्वास जमा हुआ है। असत्य की ओर ही हमारी दृष्टि है। महावीर तक जैनधर्म अबाध गति से चला आ रहा है, __ सत्य का पक्ष वह है, जो कभी फालतू नहीं होता। इसमें कारण क्या है? असत्य का पक्ष हमेशा फालतू ही हुआ करता है। उसकी | एक विदेशी लेखक ने एक पुस्तक में लिखा है कीमत तब तक ही रहती है, जब तक हम समझते | कि बौद्धधर्म का उद्गम भारत में हुआ और भारत में नहीं हैं। हमें असत्य-हिंसा का पक्ष नहीं लेना है, सत्य- | ही उसका वर्चस्व कायम नहीं रह पाया। जैनधर्म का अहिंसा का पक्ष ही लेना है। लेकिन सत्य का पक्ष लेने- | उदगम भारत में हआ और वहीं जीवित रह गया। बौद्धधर्म वाला व्यक्ति, क्रोध, लोभ, भीरुता, हास्य का आलम्बन जीवित क्यों नहीं रह पाया? इसमें कारण यही है कि नहीं लेगा। लोभ के वशीभूत हुआ प्राणी सत्यधर्म को | उसके उपासकों की संख्या घटती गई, इसलिए बौद्धधर्म सही-सही उद्घाटित नहीं कर सकता। सत्य की सुरक्षा | यहाँ से उठ गया। उपासकों के अभाव में वह धर्म लुप्त के लिए क्रोध, लाभ, भीरुता, हास्य को छोड़ना होगा। हो गया और उपासकों के सद्भाव में जैनधर्म आज भी आचार्य शुभचन्द्र जी ने ज्ञानार्णव में एक बात कही है | जीवित है और आगे भी रहेगा। जो मुझे बहुत अच्छी लगी कि विद्वान् को अपनी गम्भीरता | यह बात अलग है कि धीरे-धीरे शिथिलता आ नहीं छोड़ना चाहिए। यद्वा-तद्वा नहीं बोलना चाहिए, अपनी | रही है। चलनेवाला शिथिल भले हो, लेकिन धर्म जीवित सीमा में रहना चाहिए, यह बिल्कुल ठीक है, बार-बार | रखने का श्रेय उपासकों को ही है। धर्मरूपी रथ के पूछने के उपरान्त भी नहीं बोलना चाहिए। लेकिन यदि | दो पहिए हैं, एक मुनि दूसरा श्रावक। यह सत्य है कि अगस्त 2008 जिनभाषित 7 Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यदि एक पहिया निकाल दिया जाये, तो रथ नहीं चल । मूल्यांकन घटता जा रहा है। सकता। एक वक्ता ने अभी कहा कि आज बड़ी-बड़ी । अक्षर के पास ज्ञान नहीं है, पर अर्थ को व्यक्त | संस्थायें हैं। संस्थाओं से शास्त्र भी प्रकाशित हुए हैं, लेकिन करने की योग्यता उसके पास है। योग्यता का अधिकरण | उनको कोई पढ़नेवाला नहीं है। ऐसा कार्य करनेवालों उसकी विवक्षा करनेवाले वक्ता के ऊपर निर्धारित है। का क्या कर्तव्य है? जरा इस पर भी ध्यान दें। देखें! सो आज उन लोगों के पास वह भी नहीं है। आज | सुबह से लेकर मध्याह्न तक रसोई मन लगाकर बनाई साहित्य क्या है? वस्तुतः जो वाच्यभूत पदार्थ है, उसको जाती है। भीतर से यह मन कहता है कि मैं किसी हम शब्दों में व्यक्त करते हैं। शब्द वस्तुतः ज्ञान नहीं | भूखे-प्यासे की क्षुधा दूर करूँ। मेरी रसोई का मूल्यांकन है, शब्द कोई वस्तु नहीं है, किन्तु वस्तु के लिए मात्र पूर्ण रूप से हो और वह सार्थक हो जाये। जिस किसी संकेत है। भाषा (लेंग्वेज) यह नॉलेज नहीं है, मात्र | व्यक्ति को आप श्रुत देकर अपने आपको कृत-कृत्य साइनबोर्ड है। नॉलेज का अर्थ है, जानने की शक्ति और | नहीं मानो। जिस प्रकार जिसको भूख है, उसी को आप लेंग्वेज को जानने के लिए भी नॉलेज चाहिए। यदि वह खाना खिलाते हैं, उसी प्रकार जिसके लिए अध्ययन विषयों में, कषायों में घुला हुआ है, तो ध्यान रखना | की रुचि है, उसे ही आप श्रुत-दान दीजिए, यदि आप उसका कोई मूल्य नहीं है। सही दाता हैं, श्रुत का सही-सही प्रचार-प्रसार करना ___आज कई विदेशी आ जाते हैं दिगम्बरत्व के दर्शन | चाहते हैं, तो बहुत सारे छात्र मेरे पास आ जाते हैं, बहुत करते हैं, श्रावकों को देखते हैं, तो ताज्जुब करते हैं कि | सारे व्यक्ति मेरे पास आ जाते हैं, और कहते हैं कि इस प्रकार धर्म रह सकता है। गाँधी जी, जब यहाँ से | महाराज मुझे कुछ दिशाबोध दीजिए, जो व्यक्ति खरीद विदेश गये थे, वहाँ पर उनके स्वागत के लिए बहुत | करके दिशाबोध देता है, उसका सामनेवाला सही-सही। भीड़ एकत्रित थी। यह कैसी खोपड़ी है? यह कैसी | मूल्यांकन नहीं करता। जिनवाणी की विनय ही हमारा - विचारधारा है? जिसके माध्यम से हमारा साम्राज्य पलट | परम धर्म है। यदि सम्यग्दर्शन के आठ अंग हैं, तो गया। उस व्यक्ति को हम देखना चाहते हैं, जब वो | सम्यग्ज्ञान के भी आठ अंग है, लेकिन सम्यग्ज्ञान के निकल गये थे, तो लोग इधर-उधर देखने लगे। कहाँ | आठ अंगों से बहुत कम लोग परिचित हैं। जिनवाणी हैं गाँधी जी? किसी ने कहा गाँधी जी यही हैं भैय्या! | का दान जिस किसी व्यक्ति को नहीं दिया जाता। जिनवाणी तो वह कहने लगे कि अरे! ये तो साधु जैसे हैं, तब | सुनने का पात्र वही है, जिसने मद्य-मांस-मधु और गाँधी जी ने कहा कि ये तो साधु की पृष्ठभूमि है, | सप्तव्यसनों का त्याग कर दिया है। मद्य-मांस-मधु का साधु तो बहुत पहुँचे हुए लोग होते हैं। तब लोगों ने | सेवन आज समाज में बहुत हो रहा है। केवल स्वाध्याय कहा कि जब आपका इतना प्रभाव है, तो उनका कितना | करने मात्र से ही सम्यग्दर्शन नहीं होनेवाला। बाह्याचरण होगा? गाँधी जी बोले-वे अपना प्रभाव दिखाते नहीं हैं, का भी अन्तरंग परिणामों पर प्रभाव पड़ता है। विषय क्योंकि वे दुनिया से ऊपर उठे हए हैं। वासनाओं में लिप्त यह आपकी प्रवृत्ति अन्दर के सम्यग्दर्शन __आचार्य उमास्वामी ने कहा है कि चोरी से, झूठ | को भी धक्का लगा सकती है। दुश्चरित्र के माध्यम से काम लेना यह असत्य है। सत्य बोलना सत्य नहीं | से सम्यग्दर्शन का टिकना भी मुश्किल हो जायेगा। है। असत्य का विमोचन करना सत्य है। अभी पूर्व वक्ता | आजकल प्रत्येक क्षेत्र में प्रवृत्तियाँ बदलती जा रही हैं। ने आपके सामने कहा कि महाराज तो विमोचन करने | पहले जैनग्रन्थों पर मूल्य नहीं डाले जाते थे, क्योंकि में माहिर हो चुके हैं। (पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य | जिनवाणी का कोई मूल्य नहीं होता, वह अमूल्य है, द्वारा लिखित सज्ज्ञानचन्द्रिका का विमोचन करते समय)। लेकिन आज ग्रन्थों पर मूल्य डाले जा रहे हैं, जो कि हाँ... परिग्रह का तो मैं विमोचन करता हूँ, पर श्रुत का | ठीक नहीं है। मोक्ष-सुख दिलानेवाली जिनवाणी माँ को विमोचन नहीं करता। श्रुत का विमोचन तब तक नहीं | आप व्यवसाय का साधन मत बनाईये। सभा में बैठे होगा, जब तक मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी। श्रुत का विमोचन | हुए विद्वानों को यह कथन रुचिकर नहीं लग रहा होगा, यह लौकिक पद्धति है, लेकिन आज स्वाध्याय का | लेकिन यह एक कटु सत्य है, चाहे कड़वा हो या मीठा, 8 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उसको उद्घाटित करना हमारा परम कर्तव्य है। एक | होते हैं, उन महान् सिद्धान्त ग्रन्थों के पन्ने भी, अस्तबात ध्यान रखना दवा कड़वी ही हुआ करती है, और व्यस्त रहते हैं। स्वाध्यायशील व्यक्ति भी उन्हें पढ़कर कड़वी दवा के माध्यम से ही रोग का निष्कासन हुआ | यथायोग्य नहीं रखते। जल्दी-जल्दी जैसे भी पढ़ लिया करता है। और अलमारी के किसी कोने में पटक दिया, यह कोई 'पुरुषार्थसिद्ध्युपाय' में, मैंने देखा, तो उसमें एक | स्वाध्याय करने का तरीका नहीं है, महिलायें भी स्वाध्याय स्थान पर आया है कि जिनवाणी सुनने का वही पात्र करने में कई कदम आगे है। शास्त्र-स्वाध्याय के साथहै, जिसने सप्त व्यसन और मद्य, मांस, मधु का त्याग | साथ उनकी पूजा भी चलती रहती है और यदि कोई कर दिया हो। आज दिनों दिन सदाचरण गिरते चले बीच में पुरुष आ गया तो, अभिषेक का अनुरोध भी जा रहे हैं। मद्य-मांस-मधु से हमारा परहेज प्रायः समाप्त | कर लेती हैं। क्या मतलब है? पढ़ भी रहे हैं, पूजा होता चला जा रहा है। केवल समयसार मात्र पढ़ने से | भी कर रहे हैं, अभिषेक भी चल रहा है। यह तो हुई हमें सम्यग्दर्शन प्राप्त होनेवाला नहीं है। आचार्य अमृतचन्द्र | पढ़ी-लिखी महिलाओं की बात, पर जो पढ़ी-लिखी नहीं जी कहते हैं, वही पात्र है, जो सदाचार का पालन करता | हैं, वे वृद्धायें किसी से भी कह देती हैं भैया! सूत्रजी है इसके उपरान्त ही सम्यग्दर्शन संभव है। इसलिए उन्होंने | सुनाओ और बीच में शांतिधारा दिखा दो, हमारा अभिषेक पहले सुनने की पात्रता बताई। हमें इसी प्रकार सीखना | देखने का नियम है, उसी समय किसी तीसरे व्यक्ति है, तो उत्तम पात्र के लिए बहुत खर्च करना पड़ता है।| से कह देती भैया! सहस्रनाम सुना दो। चौथे व्यक्ति से इसके उपरान्त आपका वित्त सार्थक होगा। पहले सुनने | कहती भैया! पद्मपुराण सुना दो। यह तो हमारी स्थिति की पात्रता बताई। पहले के लोग भी स्वाध्याय करते | है। (श्रोता समुदाय में भारी हसी) यह क्या है? यह थे, मैंने पहले सुनने की पात्रता बताई पहले के लोग | कोई स्वाध्याय करने का तरीका हुआ? यह क्या स्वाध्याय भी स्वाध्याय करते थे, मैंने पहले कुछ ग्रन्थ देखे हैं, का मूल्यांकन हुआ? जिनवाणी की तो आज यह स्थिति * जिन पर कीमत के रूप में स्वाध्याय लिखा जाता था।| हो रही है कि कहते हुए हृदय फटता है। आप यदि उन ग्रन्थों के ऊपर कीमत नहीं लिखी जाती थी, मैंने | किसी सप्त व्यसनी को समयसार पकड़ा दोगे तो वह कई बार इस बात को कहा है। मैं स्वाध्याय का निषेध | उसकी क्या विनय करेगा? उसके नहीं करता। स्वाध्याय आप खूब करिये, लेकिन विनय | अवहेलना हो होगी। के साथ करिये। पहले स्वाध्याय करने की पात्रता अपने | एक बात और मैं पुनः जोर देकर कहूँगा कि आप में लाइये, तभी आप सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान को | ग्रन्थप्रकाशन समितियों को ग्रन्थों पर मूल्य नहीं रखना प्राप्त कर सकेंगे। उसकी विनय के अभाव में वह सम्यग्ज्ञान | चाहिए। दानदाताओं से अभी यह धरती खाली नहीं हुई तीनकाल में संभव नहीं है। श्रुत का दान आप उसे है। ध्यान रखना! श्रावक धनोपार्जन करता है, तो कुछ दीजिए, जिसने उसका महत्त्व समझा है। वह पवित्र | ना कुछ दानादि कार्यों के लिए बचा कर अवश्य रखता जिनवाणी, उसी के लिए भेंट कीजिए, जो उसका सदुपयोग | है। दान दिया हुआ पैसा पुनः उपयोग में नहीं लाना कर सके। जिस किसी के लिए आप दे देते हैं, वह | चाहिए। उसको अच्छे कामों में लगाइये, सदुपयोग कीजिए। उसकी विनय नहीं रखता कहीं भी ले जाकर रख देता | मुझे 'अष्टसहस्री' पढ़नी थी। प्रति उपलब्ध नहीं है। और यदि वह शास्त्र किसी बच्चे के हाथ में पड़ | थी। मुझे बहुत चिंता थी, कहीं से भी खोजने पर एक जाए, तो वह उसे फाड़ देता है। ग्रन्थालयों में ग्रन्थ तो | प्रति आ गई। जब उसको खोलकर देखा तो उसमें कहीं मिल जाते हैं, लेकिन खोलते ही ऊपर पद्मपुराण लिखा | पर मूल्य नहीं पड़ा था। महाराजश्री (आ. गुरुवर ज्ञानसागरजी) रहता है और बीच में हरिवंश पुराण के भी पृष्ठ मिल | बोले कि भैया! पहले पुस्तक को देने के उपरान्त भी जाते हैं और अंत में उत्तरपुराण के भी दर्शन हो जाते | कोई नहीं लेता था। इसका अर्थ है कि पढ़ने की रुचि हैं। किसी भी ग्रन्थालय में ग्रन्थ व्यवस्थित नहीं रखे मिलते।| नहीं है, इसलिए प्रतियों का अकाल पड़ गया। पढ़ने सारों की बात तो अलग ही है, समयसार में गोम्मटसार | की रुचि पहले जागृत कर दी जाए, इसके उपरान्त ग्रन्थ के दर्शन होते हैं और प्रवचनसार में धवला के दर्शन | भेंट किया जाए। भोजन आप उसको दीजिए जिसे भूख - अगस्त 2008 जिनभाषित 9 Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लगी है। प्रकाशन करके यद्वा तद्वा बाँटने से उसका दुरुपयोग होता है । आजकल तो शादी-विवाह में समयसार बाँटे जाते हैं। क्या समयसार का मूल्य इतना निम्न स्तर पर पहुँच गया। जब समयसार ग्रंथ श्रीमद् रायचंद जी को मिला, तो वे इतने खुश हुए कि ग्रन्थ भेंट करनेवालों को उन्होंने थाली भरकर हीरा-मोती भेंट स्वरूप दिये थे। इतने सारे! हाँ इतने सारे ! वह अमूल्य है, उसकी कोई कीमत नहीं । ले जाओ, जितना चाहो उतना ले जाओ। आज हम समयसार की कीमत चाँदी के चंद सिक्कों में आँक रहे हैं। I जो लेखक हैं, उनके लिए क्या आवश्यक है? उनके लिए कोई कीमत मत दीजिए। महापुराण पढ़ रहा था, उसमें उन्होंने यह व्यवस्था की है। जैन ब्राह्मण भी होते हैं, जो अध्ययन कराने में अपना जीवन व्यतीत करते हैं, और उनकी आजीविका कैसे चलती है, तो आप जो खा रहे हैं, पी रहे हैं, उसी के अनुसार आप कर दीजिए । यही उनके प्रति बहुमान है। तो पंडितजी के लिए हम वेतन दें, यह अच्छा नहीं लगता । वे.... तन (आत्मा) का काम करनेवालों को आप वेतन (जड़) देते हैं। भेंट अलग वस्तु है । उसका मूल्य आंकना अलग होता है । समयग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का कोई मूल्य नहीं है। जिनसे अनंत सुख मिलता है, उन रत्नों की कीमत क्या हम जड़ पदार्थों के माध्यम से आँक सकते हैं? नहीं, तीन काल में भी यह संभव नहीं है। 1 इसी प्रकार गुरु महाराज की भी कोई कीमत नहीं होती, वे अनमोल वस्तु हैं । और भगवान् की भी कोई कीमत नहीं होती। एक बार एक बात आई थी, रजिस्ट्री कराने की। जितनी आपके पास मूर्तियाँ हैं, उन सब मूर्तियों को गवर्नमेंट को बताना होगा और उनका वेट (वजन) कितना है, यह भी बताना होगा। समस्या आ गई, जैनियों ने कह दिया हम सब कुछ बता सकते हैं, आपको खर्चा करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन हम भगवान् को तौल नहीं सकते। ये भी कितने आदर की बात है ? जिनवाणी की बात है जैसा अभी (मूलचन्द जी लुहाड़िया किशनगढ़) पूर्व वक्ता ने कहा, ज्ञान की पिटाई ऐसी हो रही है । मैं तो यह कह रहा हूँ कि जिनवाणी की पिटाई भी होती चली जा रही है। किसी ने कहा है 10 अग्रस्त 2008 जिनभाषित जिनवाणी जिनदेव से रो-रो करत पुकार । हमें छोड़ तुम शिव गए, कर कुपात्र आधार ॥ आज वह जिनवाणी रो रही है, जिसे आप माता बोलते हैं, जिसे आप अपने सिर पर धारण करते हैं, किन्तु वही जिनवाणी कहती है कि मुझे कुपात्रों के रहने के स्थान पर क्यों छोड़े जा रहे हो, हे भगवन्! आप कहाँ पर चले गये! आजकल इसमें बहुत कुछ शिथिलता आती जा रही है, मात्र स्वाध्याय करने से कोई प्रयोजन सिद्ध होनेवाला नहीं हैं। सत्य वह है, जो अर्थ को, भाव को सही-सही बतानेवाला होता है। अभी किसी वक्ता ने कहा था कि जो व्यक्ति लिख रहा है, पढ़ रहा है, उसका जहाँ कहीं से पढ़ना-लिखना प्रारम्भ हो गया । अभी वाचना चल रही थी धवला की, तो धवला की आठवीं पुस्तक में यह बात लिखी है कि 'घरत्थेसु णत्थि चारित्तं' गृहस्थाश्रम में चारित्र नहीं है। इसलिए वह रत्नत्रय का दाता नहीं हो सकता। जिसके पास जो चीज नहीं है, वह देगा क्या? एक हेतु भी है कि जिसके पास सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्वारित्र नहीं है, उसे रत्नत्रय दान करने का अधिकार नहीं है। कम से कम उसे रत्नत्रय का उपदेश तो देना ही नहीं चाहिए । उपदेश देने का उसको अधिकार भी नहीं है। फिर क्या उपदेश छोड़ दे ? नहीं... नही.... वहाँ पर भाव यह है कि चारित्र को लेकर जब हम आगे बढ़ेंगे, तब यह बात हो सकती है। बार-बार वर्णी जी की चर्चा आती है। वर्णीजी कौन थे? वर्णी जी क्या गृहस्थ थे? नहीं वर्णी का अर्थ मुनि, यति, अनगार, तपस्वी, त्यागी होता है । वे गृहस्थ नहीं ग्यारहवीं प्रतिमा - धारक क्षुल्लक जी थे । इसलिए उनका प्रभाव जनमानस के ऊपर पड़ा। आप लोगों का प्रभाव क्यों नहीं पड़ रहा? इसका अर्थ है जो व्यक्ति विषय कषायों का विमोचन नहीं करता, उस व्यक्ति को सत्य का उद्घाटन करने का अधिकार नहीं है, और वह कर भी नहीं सकता। किसी ने कहा था कि 'निर्भीक के साथ-साथ निरीह ' भी होना चाहिए। 'मोक्ष मार्ग प्रकाशक' में पं. टोडरमल जी ने लिखा है कि जिस वक्ता की आजीविका श्रोताओं पर निर्धारित है, वह वक्ता तीन काल में सत्य का उद्घाटन नहीं कर सकेगा । ( शेष अगले अंक में ) 'चरण आचरण की ओर' से साभार Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शाहपुर : (म.प्र.) में विद्यालय क्षुल्लक श्री गणेश प्रसाद जी वर्णी शाहपुर में पञ्चकल्याणक था। प्रतिष्ठाचार्य श्रीमान् । केवलकल्याणक और निर्वाणकल्याणक के उत्सव क्रम पं० मोतीलाल जी वर्णी थे। यह नगर गनेशगंज स्टेशन | से सानन्द सम्पन्न हुए। मुझे देखकर अन्तरङ्ग में महती से डेढ़ मील दूर है। यहाँ पर पचास घर जैनियों के | व्यथा हुई कि लोग बाह्य कार्यों में तो कितनी उदारता हैं, प्रायः सभी सम्पन्न, चतुर और सदाचारी हैं। इस गाँव | के साथ व्यय करते हैं, परन्तु सम्यग्ज्ञान के प्रचार में में कोई दस्सा नहीं। यहाँ पर श्री हजारीलाल सराफ व्यापार | पैसा का नाम आते ही इधर-उधर देखने लगते हैं। जिस में बहुत कुशल है। यदि यह किसी व्यापारिक क्षेत्र में | प्रकार जिनेन्द्रदेवमुद्रा की प्रतिष्ठा से धर्म होता है, उसी होता, तो अल्प ही समय में सम्पतिशाली हो जाता, परन्तु | प्रकार अज्ञानी जनता के हृदय से अज्ञान-तिमिर को दूरकर साथ ही एक ऐसी बात भी है, जिसमें समाज के साथ | उनमें सर्वज्ञ वीतरागदेव के पवित्र शासन का प्रसार करना घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं हो पाता। भी. तो धर्म हैं। पर लोगों की दष्टि इस ओर हो तब जिनके यहाँ पञ्चकल्याणक था, वह सज्जन व्यक्ति | न। मन्दिरों में टाइल और संगमर्मर जड़वाने में लोग सहस्रों थे। उनका नाम हलकूलालजी था। उनके चाचा वृद्ध थे, व्यय कर देंगे, पर सौ रुपये शास्त्र बुलाकर विराजमान जिनका स्वभाव प्राचीन पद्धति का था। विद्या की ओर | करने में हिचकते हैं। उनका बिल्कुल भी लक्ष्य नहीं था। मैंने बहुत समझाया। इस प्रान्त में यह पद्धति है कि आगत जनता ओर भी ध्यान देना चाहिये, परन्तु उन्होंने टाल | पञ्चकल्याणक करनेवाले को तिलक दान करती है, तथा दिया। यहाँ पर एक लोकमणि दाऊ थे। उनके साथ | पगड़ी बाँधती है। यदि गजरथ करनेवाला यजमान है, मेरा घनिष्ठ सम्बन्ध था। उनसे मैंने कहा कि 'ऐसा उपाय तो उसे सिंघई पदसे भषित करते हैं और सब लोग करना चाहिये कि. जिससे यहाँ पर एक पाठशाला हो | सिंघई जी कहकर उनसे जुहार करते हैं। इसी समय जावे, क्योंकि यह अवसर अनुकूल है। इस समय श्रीजिनेन्द्र | से लेकर वह तथा उसका समस्त परिवा भगवान् के पञ्चकल्याणक होने से सब जनता के परिणाम | सिंघई शब्द से प्रख्यात हो जाता है। अन्त में, जब यहाँ निर्मल हैं। निर्मलता का उपयोग अवश्य ही करना चाहिये।' | भी पञ्चकल्याणक करनेवाले को तिलकदान का अवसर दाऊ ने हमारी बात का समर्थन किया। | आया, तब मैंने श्रीयुत् लोकमणि दाऊ से कहा कि 'इन्हें देवाधिदेव श्री जिनेन्द्रदेव का पाण्डुकशिला पर | सिंघई पद दिया जावे। चूँकि सिंघई पद गजरथ चलानेवाले अभिषेक था, पाण्डुकशिला एक ऊँची पहाड़ी पर बनाई | को ही दिया जाता है, अत: उपस्थित जनता ने उसका गई थी, जिसपर कल्पित ऐरावत हाथी के साथ चढ़ते | घोर विरोध किया और कहा कि यदि यह मर्यादा तोड़ हुए हजारों नर-नारियों की भीड़ बड़ी ही भली मालूम | दी जावेगी तो सैकड़ों सिंघई हो जावेंगे। मैंने कहा-'इस होती थी। भगवान् के अभिषेक का दृश्य देखकर साक्षात् | प्रथाको नहीं मिटाना चाहिये, परन्तु जब कल्याणपुरा में सुमेरु पर्वत का आभास हो रहा था। जब अभिषेक के | पञ्चकल्याणक हुए थे, तब वहाँ श्रीमन्त सेठ मोहनलाल बाद भगवान् का यथोचित्त श्रृंङ्गारादि किया जा चुका, | जी खुरईवाले, श्रीमान् सेठ ब्रजलाल चन्द्रभानु लक्ष्मीचन्द्र तब मैंने जनता से अपील की कि 'इस समय आप | जी वमरानावाले, श्रीमान् सेठ टडैयाजी ललितपुरवाले तथा लोगों के परिणाम अत्यन्त कोमल हैं, अत: जिनका | श्री चौधरी रामचन्द्रजी टीकमगढ़वाले आदि सहस्रों पञ्च अभिषेक किया है, उनके उपदेशों का प्रचार करने के | उपस्थित थे। वहाँ यह निर्णय हुआ था कि यदि कोई लिये यहाँ एक विद्या का आयतन स्थापित होना चाहिये।' | एक मुस्त पाँच हजार विद्यादान में दे, तो उसे सिंघई सब लोगों ने 'हाँ, हाँ, ठीक है, ठीक है, जरूर होना | पद से भूषित करना चाहिये। यद्यपि वहाँ भी बहुत से चाहिये।' आदि शब्द कहकर हमारी अपील स्वीकार की, | महानुभावों ने इसका विरोध किया था, परन्तु बहु सम्मति परन्तु चन्दा लिखाने का श्रीगणेश नहीं हुआ। सब लोग | से प्रस्ताव पास हो गया था। अतः यदि हलकूलालजी यथास्थान चले गये। इसके बाद राज्यगद्दी, दीक्षाकल्याणक, | पाँच हजार रुपया विद्यादान में दें, तो उन्हें यह पद दे - अगस्त 2008 जिनभाषित 11 Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दिया जावे। हमारी बात सुनकर सब पञ्चों ने अपना | रुपये की सहायता अवश्य कर देवेंगे, अतः इन्हें सिंघई विरोध वापिस ले लिया और उक्त शर्त पर सिंघई पद देने के लिये राजी हो गये, परन्तु हलकूलाल सहमत नहीं हुए। उनका कहना था कि हम पाँच हजार रुपये नहीं दे सकते। मैंने लोकमन दाऊ से कान में धीरे से कहा कि 'देखो ऐसा अवसर फिर न मिलेगा, अतः आप इसे समझा देवें ।' अन्त में दाऊ उन्हें एकान्त में ले गये, उन्होंने जिस किसी तरह तीन हजार रुपये तक देना स्वीकार किया। मैंने उपस्थित जनता से अपील की कि आप लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि परवार सभा में पाँच हजार रुपया देने पर सिंघई पदवी का प्रस्ताव पास किया है। उन्होंने बारह हजार रुपया तो प्रतिष्ठा में व्यय किया है और तीन हजार रुपया विद्यादान में दे रहे हैं, तथा इनके तीन हजार रुपया देने से ग्रामवाले भी दो हजार पद से भूषित किया जावे। विवेक से काम लेना चाहिये । इतने बड़े ग्राम में पाठशाला न होना लज्जा की बात है। बहुत वाद-विवाद हुआ। प्राचीन पद्धतिवालों ने बहुत विरोध किया। पर अन्त में दो घंटे बाद प्रस्ताव पास हो गया। उसी समय हलकूलालजी को पञ्चों ने सिंघई पद की पगड़ी बाँधी । इस प्रकार श्री लोकमन दाऊ की चतुराई से शाहपुर में एक विद्यालय की स्थापना हो गयी । पञ्चकल्याणक का उत्सव निर्विघ्न समाप्त हो गया, पर अकस्मात् माहुट का पानी बरस जाने से जनता को कष्ट सहना पड़ा। सागर विद्यालय का भी वार्षिक अधिवेशन हुआ था । वहाँ से सागर आ गये और यथावत् धर्मसाधना करने लगे। 'मेरी जीवन गाथा' ( भाग १ ) से साभार आपके पत्र 'जिनभाषित' का अंक (जून + जुलाई 08) प्राप्त हुआ। आप इस पत्रिका को जिस ऊँचाई पर ले गये हैं, वह विज्ञों द्वारा सराहनीय और आदरणीय है । आपका श्रम और ज्ञान हर पृष्ठ पर दर्शन देता है । आचार्य विद्यासागर जी का प्रवचन 'उन्नति की खुराक' अत्यंत प्रेरक है। उनके तीन लम्बे प्रवचनों का सन् 1984 में, मुझे भी सम्पादन करने का सुयोग मिला था, वे भी अत्यंत चर्चित और प्रभावनाशील सिद्ध हुए थे । अरे जिया! जग धोखे की टाटी ॥ टेक ॥ झूठा उद्यम लोक करत है जिसमें निशदिन घाटी । जानबूझकर अन्ध बने हैं आँखन बाँधी पाटी ॥ निकल जायँगे प्राण छिनक में पड़ी रहेगी माटी । 'दौलतराम' समझ मन अपने दिल की खोल कपाटी ॥ मुनि क्षमासागर जी एवं मुनि योग सागर जी की कविताएँ बहुत अच्छी लगीं। इसी क्रम में आचार्य विद्यासागर जी की कविता 'सिंह और श्वान' एक अति विशिष्ट रचना है, जो, समाधान चाह रहे विद्वानों के लिए स्वर्णाक्षरी - उत्तर है । लेखों के क्रम में प्रो० रतनचंद्र जी जैन, पं० मिलापचंद जी कटारिया और पं० रतनलाल बैनाड़ा का 'जिज्ञासा समाधान' वह प्रसाद वितरित कर रहे हैं, जो बड़े-बड़े साधु-संत करते हैं । अन्य सभी लेखादि भी बार-बार प्रसंशनीय हैं। 12 अग्रस्त 2008 जिनभाषित भवदीय सुरेश जैन 'सरल' 405, गढ़ाफाटक, जबलपुर (म.प्र.) Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनसमाज का महनीय गौरव-ग्रन्थ कातन्त्र-व्याकरण प्रो. डॉ. राजाराम जैन जैनाचार्यों ने कठोर तपस्या एवं अखण्ड दीर्घ- | किया है। बौद्धों ने न केवल उसका अध्ययन किया, साधना के बल पर आत्मगुणों का चरम विकास तो | बल्कि उस पर दर्जनों टीकायें एवं व्याख्यायें भी लिखीं, किया ही, परहित में भी वे पीछे नहीं रहे। परहित से | वैदिक विद्वानों ने उसकी श्रेष्ठता स्वीकार कर उस पर यहाँ तात्पर्य है, लोकोपकारी अमृतवाणी की वर्षा, अथवा | दर्जनों ग्रन्थ लिखे। सामान्य जनता को जिसने भाषा विचार प्रौढ़-लेखनी के माध्यम से ऐसे सूत्रों का अंकन, जिनसे | की प्रेरणा दी, छात्रों के बौद्धिक-विकास में जिसने सामाजिक गौरव की अभिवृद्धि, सौहार्द एवं समन्वय तथा चमत्कारी सहायता की और इनसे भी आगे बढ़कर, जिसने राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की भावना बलवती हो। | सामाजिक सौहार्द एवं भारत की राष्ट्रीय एकता तथा निरतिचार अणुव्रत एवं महाव्रत उसकी पृष्ठभूमि रही | अखण्डता का युग-सन्देश दिया। वस्तुतः यह था- जैन है। साधक महापुरुषों के इन्हीं पावन-सन्देशों के संवाहक | आदर्शों, जैन संस्कृतिक-वैभव तथा उसके प्रातिम-विकास कल्याणमुनि, कोटिभट्ट श्रीपाल, भविष्यदत्त एवं जिनेन्द्रदत्त का एक अनुपम आदर्श उदाहरण, जिसका शानदार प्रतीक प्रभृति ने देश-विदेश की सोद्देश्य यात्रायें कर युगों-युगों | बना 'कातन्त्र-व्याकरण'। से वहाँ जैन-संस्कृति के प्रचार-प्रसार के जैसे सर्वोदयी आचार्य भावसेन 'विद्य' (विद्य अर्थात् आगमविद, सत्कार्य किये, उनका चिन्तन कर हमारा मस्तक गौरवोन्नत | शास्त्रविद् एवं भाषाविद्) ने 'कातन्त्र-व्याकरण' के विषय हो उठता है। इस विषय में डॉ. कामताप्रसाद, डॉ. | में लिखा है कि 'उसका प्रवचन मूलतः आद्य तीर्थंकर कालिदास नाग, मोरिस विंटरनित्स, डॉ. मोतीचन्द्र, डॉ. | ऋषभदेव ने किया था, जिसका संक्षिप्त सार परम्पराबी.एन.पाण्डे आदि प्राच्यविद्याविदों ने काफी प्रकाश डाला | प्राप्त ज्ञान के आधार पर आचार्य शर्ववर्म ने सूत्र-शैली है। कम्बोडिया के उत्खन्न में अभी हाल में एक विशाल में तैयार किया था।' प्राचीन पंचमेरु जैनमंदिर का मिलना उन्हीं उदाहरणों में कातन्त्र-व्याकरणकार शर्ववर्म का जीवनवृत्त अज्ञात से एक है। वहाँ के उत्खन्न में आज विविध जैन | है। रचनाकाल का भी पता नहीं चलता। 'कथासरित्सागर' पुरातात्त्विक सामग्री मिल रही है। डॉ. बी.एन. पाण्डे | के अनुसार वे राजा सातवाहन या शालिवाहन के समकालीन के अनुसार लगभग २००० वर्ष पूर्व इजरायल में ४००० सिद्ध होते हैं। किन्तु व्याकरण-साहित्य के कुछ जैनेतर दिगम्बर जैन साधु प्रतिष्ठित थे। प्राचीन विदेशी यात्रियों | इतिहासकारों ने विविध साक्ष्यों के आधार पर उनके ने भी इसीप्रकार के संकेत दिये है। उत्तरी और दक्षिणी | | रचनाकाल पर बहुआयामी गम्भीर विचार किया है। पं. अमेरिका, मैक्सिको, यूनान, जर्मनी, कम्बोडिया, जापान भगवद्दत्त वेदालंकार ने शर्ववर्म का रचनाकाल विक्रमएवं चीन आदि में उपलब्ध हमारी सांस्कृतिक विरासत पूर्व ५०० वर्ष स्वीकार किया है, जबकि पं. युधिष्ठिर हमारे विश्वव्यापी अतीतकालीन स्वर्णिम-वैभव की मिमांसक ने महर्षी पतंजलि से लगभग १५०० वर्ष पूर्व गौरवगाथा गाती प्रतीत हो रही है। का माना है और उसके प्रमाण में उन्होंने अपने महाभाष्य यहाँ मैं कुछेक ग्रन्थों में से एक ऐसे गौरव-ग्रन्थ | में उल्लिखित 'कालापाक' (अर्थात् कातन्त्र-व्याकरण) की चर्चा करना चाहता हूँ, जो कहने के लिये तो व्याकरण | की चर्चा की है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि शववर्म जैसे नीरस विषय से सम्बन्ध रखता है, किन्तु उसकी | महर्षि पतंजलि के भी पूर्ववर्ती थे। पतंजलि का समय प्रभावक गुणगरिमा, सरलता, सर्वगम्यता, लोकप्रचलित | ई.पू. लगभग चतुर्थ सदी माना गया है। समकालीन शब्द-संस्कृति का अन्तर्लीनीकरण तथा उन्होंने (पतंजलि ने) अपने समय में 'कालापाक' ज्ञानसंवर्धक प्रेरक शक्ति जैसी विशेषताओं के कारण वह | अर्थात् 'कातन्त्र-व्याकरण' का प्रभाव साक्षात् देखा था सभी धर्मों, सम्प्रदयों, जातियों या अन्य विविध संकीर्णताओं | और प्रभावित होकर अपने 'महाभाष्य' (सूत्र १६७१) से ऊपर है। तथा जिसने देश-विदेश के बुद्धिजीवियों | में स्पष्ट लिखा है कि 'ग्राम-ग्राम, नगर-नगर, में सभी एवं चिन्तकों की विचार-श्रृंखला को युगों-युगों से उबुद्धः। सम्प्रदायों में उसका अध्ययन कराया जाता है' - अगस्त 2008 जिनभाषित 13 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'ग्रामे-ग्रामे कालपार्क काठकं च प्रोच्यते।' । एक अन्य जैनेतर-स्रोत भी करता है। विष्णुपुराण (३/८) कातन्त्र के अन्य नाम में कहा गया है कि- 'ततो दिगम्बरो मुण्डो बर्हिपिच्छिधरो पतंजलि द्वारा प्रयुक्त 'कालापक' के अतिरिक्त | द्विजः।' (यहाँ पर मुण्डो का अर्थ केशलुंचुक तथा द्विजः 'कातन्त्र' के अन्य नामों में कलाप कौमार तथा शार्ववार्मिक | का अर्थ 'दो जन्मवाला अर्थात् दीक्षा-पूर्व एवं दीक्षा के नाम भी प्रसिद्ध रहे हैं। जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका | बादवाला अर्थ' लिया गया है। उसी 'बर्हि' अर्थात् 'मयूरहै, तीर्थंकर ऋषभदेव द्वारा प्रदत्त महिलाओं एवं पुरुषों | पंख' पिच्छीधारी दिगम्बराचार्य के द्वारा लिखित होने के के लिए क्रमशः ६४ एवं ७४ (चतुःषष्टिः कलाः स्त्रीणां कारण ही वह ग्रन्थ 'कलाप' या 'कालापक' (अथवा ताश्चतु:सप्ततिर्नृणाम्) प्रकार की कलाओं के विज्ञान का कातन्त्र) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अतः उक्त साक्ष्यों सूचक या संग्रह होने के कारण उसका नाम 'कालापाक' से यह निश्चित हो जाता है कि उक्त ग्रन्थ के लेखक और इसी का संक्षिप्त नाम 'कलाप' है। भाषाविज्ञान अथवा | शर्ववर्म दिगम्बर जैनाचार्य थे। भाषातन्त्र का कलात्मक या रोचक-शैली में संक्षिप्त सुगम शर्ववर्म कहाँ के रहनेवाले थे, इस विषय में अभी आख्यान होने के कारण उसका नाम 'कातन्त्र' भी पड़ा, | तक कोई जानकारी नहीं मिल सकी है। किन्तु 'वर्म' किन्तु यह नाम परवर्ती प्रतीत होता है। जैनेतर विद्वानों | उपाधि से प्रतीत होता है कि वे दाक्षिणात्य, विशेष रूप की सामन्यता के अनुसार 'काशकृत्स्नधातु-व्याख्यान' के | से कर्नाटक अथवा तमिनाडु के निवासी रहे होंगे, क्योंकि एक सन्दर्भ के अनुसार यह ग्रन्थ 'कौमार-व्याकरण' के | वहाँ के निवासियों के नामों के साथ वर्म, वर्मा अथवा नाम से भी प्रसिद्ध था किन्तु, जैन मान्यता के अनुसार | वर्मन् शब्द संयुक्त रूप से मिलता है। यथा-विष्णुदेववर्मन् चूँकि ऋषभदेव ने अपनी कुमारी पुत्री ब्राह्मी के लिए | कीर्तिदेववर्मन्, मदनदेववर्मन् आदि। आचार्य समन्तभद्र ६४ कलाओं, जिनमें से एक कला भाषाविज्ञान के साथ- | का भी पूर्व नाम शान्तिवर्मा था। यह जाति अथवा गोत्र साथ लिपि सम्बन्धी भी थी, उसका ज्ञानदान देने के | या विशेषण सम्भवतः उन्हें परम्परा से प्राप्त होता रहा। कारण उसी पुत्री के नाम पर उक्त तन्त्र का संक्षिप्त | इतिहास साक्षी है कि ये 'वर्मन् ' या 'वर्म' नामधारी नाम 'कौमार' तथा लिपि का नाम 'ब्राह्मी' रखा गया। | व्यक्ति इतने बुद्धिसम्पन्न एवं शक्ति-सम्पन्न थे कि दक्षिण कुछ विद्वानों को इस विषय में शंका हो सकती | पूर्व एशिया तक इनका प्रभाव विस्तृत था। बोर्नियों के है कि शर्ववर्म क्या दिगम्बर जैनाचार्य थे? गवेषकों ने | एक संस्कृतज्ञ प्रशासक का नाम 'मूलवर्म' या 'मूलवर्मन्' उसकी भी खोज की है। उन्होंने सर्वप्रथम एक साक्ष्य | था, जिसका संस्कृत-शिलालेख इतिहास-प्रसिद्ध है। के रूप में 'कातन्त्ररूपमाला' के लेखक भावसेन विद्य | इंडोनेशिया में दसवीं सदी में 'कपाल' के नाम पर नगर का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिसमें स्पष्ट कहा गया | या मंदिर बनाने की परम्परा के उल्लेख मिलते हैं। है कि-'श्रीमच्छर्ववर्मजैनाचार्याविरचितं कातन्त्रव्याकरणं।' | कातन्त्र-व्याकरण की लोकप्रियता अर्थात् कातन्त्र-व्याकरण के लेखक शर्ववर्म जैनाचार्य थे। जैसा की पूर्व में कहा जा चुका है, कोई भी उनके दिगम्बर-परम्परा के होने के समर्थ प्रमाण जैनेतर- | ग्रन्थ, पन्थ या संम्प्रदाय के नाम पर कालजयी सार्वजनीन स्रोतों से भी मिल जाते हैं। या विश्वजनीन नहीं हो सकता। वस्तुतः वह तो अपने पतंजलि ने अपने महाभाष्य में स्पष्ट लिखा है- | लोकोपकारी, सार्वजनीन निष्पक्ष वैशिष्ट्य-गुणों के कारण कि यह कातन्त्र अथवा कलाप-तन्त्र, (कलाप अर्थात्) | ही भौगोलिक सीमाओं की संकीर्णताओं की परिधि से मयूरपिच्छी धारण करनेवाले के द्वारा लिखा गया है | हटकर केवल अपने ज्ञान-भण्डार से ही सभी को (कलापिना प्रोक्तमधीयते कालापस्तेषामाम्नायः कालापकम्) | आलोकित-प्रभावित कर जन-जन का कण्ठहार बन सकता और यह सर्वविदित है कि चूँकि मयूर-पिच्छी संसार | भर की साधु-संस्थाओं में से केवल दिगम्बर-पंथी जैनाचार्यों कातन्त्र-व्याकरण एक जैनाचार्य के द्वारा लिखित के लिए ही आगम ग्रन्थों में अनिवार्य मानी गयी है और | होने पर भी उसमें साम्प्रदायिक संकीर्णता का लेशमात्र वे ही उसे अपनी संयम-चर्चा के प्रतीक के रूप में | भी न होने के कारण उसे सर्वत्र समादर मिला। ज्ञानपिपासु, अनिवार्य रूप से अपने पास रखते हैं। इसका समर्थन | मेगास्थनीज, फाहियान, ह्यूनत्सांग, इत्सिंग और अलबेरुनी 14 अग्रस्त 2008 जिनभाषित - Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भारत आये। उन्होंने यहाँ प्रमुख ग्रन्थों के साथ-साथ | विविध भाषाओं में अनुवाद तथा विविध टीकाओं, वृत्तियों लोकप्रचलित कातन्त्र का भी अध्ययन किया होगा और | व्याख्याओं, पंजिकाओं आदि को लेकर कुल मिलाकर उनमें से, जो भी ग्रन्थ उन्हें अच्छे लगे सहस्त्रो की संख्या | १६१ से भी अधिक ग्रन्थ लिखे गये और सम्भवतः सहस्रों में वे बेहिचक अपने साथ अपने-अपने देशों में लेते | की संख्या में उनकी पाण्डुलिपियाँ तैयार की गई। उनकी गये और बहुत सम्भव है कि कातन्त्र की पाण्डुलिपियाँ प्रतिलिपियाँ केवल देवनागरी लिपि में ही नहीं, बल्कि भी साथ में लेते गये हो? । बंग, उड़िया, शारदा में भी उपलब्ध हैं। इनके अतिरिक्त सन् १८८४ सर विलियम जोन्म आई.सी.एस. होकर | भी तिब्बत, नेपाल, भूटान, गन्धार (अफगानिस्तान), सिंहल भारत आये, और भारत के चीफ जस्टिस के रूप में | एवं वर्मा के पाठ्यक्रमों में वह प्राचीनकाल से ही अनिवार्य कलकत्ता में प्रतिष्ठित हुए। किन्तु संस्कृत-प्राकृत के | रूप से स्वीकृत रहा है। अत: वहाँ की स्थानीय सुविधाओं अतुलनीय साहित्य-वैभव को देखकर आश्चर्यचकित हो| को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर तिब्बती-भाषा गये और नौकरी छोडकर संस्कत परिभाषा के अध्ययन में इसकी लगभग १२ तथा पोट-भाषा में २३ टीकायें में जुट गये। 'कातन्त्र-व्याकरण' पढ़कर वे भी प्रमुदित | लिखी गई, जो वर्तमान में भी वहाँ की लिपियों में उपलब्ध हो उठे। उन्होंने देखा कि इसमें पाणिनि जैसी दुरूहत हैं। मध्यकालीन मंगोलियाई, बर्मीज, सिंघली एवं पश्तों नहीं है। संस्कृत-प्राकृत सीखने के लिए उन्होंने उसे एक | में भी उसकी टीकायें आदि सम्भावित हैं। पूर्वोक्त उपलब्ध उत्तम सरल साधन समझा। अतः उन्होंने उसका सर्वोपयोगी | पाण्डुलिपियों तथा उनका संक्षिप्त विवरण स्थानाभाव के संस्करण तैयार कराकर स्वयं द्वारा संस्थापित 'रायल | कारण यहाँ नहीं दिया जा रहा है। एशियाटिक सोसायटी (बंगाल) कलकत्ता' से सन १९१९ अपने पाठकों की जानकारी के लिए यह भी बताना में 'कातन्त्र-व्याकरण' के नाम से उसका प्रकाशन किया | चाहता हूँ कि भारतीय प्राच्यविद्या के सुप्रसिद्ध विद्वान और 'फोर्ट विलियम्स कॉलेज, कलकत्ता' में पाठयक्रम डॉ. रघुवीर ने १९५० से १९६० के दशक में तिब्बत, में भी उसे निर्धारित कराया। उसके बाद तो अविभाजित | चीन, मंगोलिया, साइबेरिया, इंडोनेशिया, लाओस, कम्बोडिया, बंगाल की समस्त शिक्षा-संस्थाओं में पठन-पाठन प्रारम्भ थाइलैंड, वर्मा आदि देशों की सारस्वत-यात्रा की थी, हो गया। तथा वहाँ उन्होंने सहस्रों की संख्या में प्राच्य भारतीय पाठकों को यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि | पाण्डुलिपियाँ देखी थीं। वे सभी भोजपत्रों, ताड़पत्रों, सन् १८१९ से १९१२ के मध्य केवल अविभाजित बंगाल | स्वर्णपत्रों एवं कर्गलपत्रों पर अंकित थी। उनमें से उनके से 'कातन्त्र-व्याकरण' तथा तत्सम्बन्धी विविध व्याख्यामूलक | अनुसार लगभग ३० सहस्र पाण्डुलिपियाँ अकेले तिब्बत सामग्री के साथ २७ से भी अधिक ग्रन्थों का संस्कृत, में ही सुरक्षित थीं। यह सर्वविदित ही है कि आचार्य बंगला एवं हिन्दी में प्रकाशन हो चुका था। जिनसेन के शिष्य तथा राष्ट्रकूटवंशी नरेश अमोघवर्ष की यह भी आश्चर्यजनक है, कि रायपुर (मध्यप्रदेश) | 'प्रश्नोत्तररत्नमालिका' की पाण्डुलिपि तिब्बत से ही के अकेले एक विद्वान् पं. हलधर शास्त्री के व्यक्तिगत | तिब्बती अनुवाद के साथ तिब्बती लिपि में प्राप्त हुई संग्रह में सन् १९२० के लगभग कातन्त्र-व्याकरण तथा थी। अपनी यात्राओं के क्रम में वे उक्त सभी देशों से उसपर लिखित विविध टीकाओं, वृत्तियों एवं व्याख्याओं | लगभग ६० हजार पाण्डुलिपियाँ अपने साथ भारत ले की लगभग १८ पाण्डुलिपियाँ सुरक्षित थीं, जिनका वहाँ | आये थे तथा जो नहीं ला सकते थे, उनकी माइक्रोफिल्मिंग अध्ययन कराया जाता था। अतः पतंजलिकालीन यह उक्ति | कराकर ले आये थे। जापान की भारतीय पाण्डुलिपियों थी की- 'ग्राम-ग्राम, नगर-नगर में 'कालापक' की शिक्षा, | की लिपि 'सिद्धम्' के नाम से प्रसिद्ध है, जो देवनागरी बिना किसी सम्प्रदाय-भेद के सभी को प्रदान की जाती | के समकक्ष होती है। डॉ. रघुवीर के अनुसार लगभग ६००० भारतीय ग्रन्थों का अनुवाद मंगोल-भाषा में किया विशेष अध्ययन से विदित होता है कि विश्व- | गया था। साहित्य में कातन्त्र-व्याकरण ही संभवतः ऐसा ग्रन्थ है, बहुत सम्भव है कि उनमें भी 'कातन्त्र-व्याकरण'जिस पर पिछले लगभग २०० वर्षों में देश-विदेश की । सम्बन्धी विविध ग्रन्थ रहे हों? जैसाकि पूर्व में कहता थी। अगस्त 2008 जिनभाषित 15 Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आया हूँ कि जो विदेशी पर्यटक भारत आये, वे अपने | में न चला जाये। साथ सहस्रों की संख्या में संस्कृत-प्राकृत की पाण्डुलिपियों | कातन्त्र व्याकरण : आचार्यश्री विद्यानंदजी का चिंतन लेते गये। उनमें से अनेक तो नष्ट हो गई होंगी, बाकी | एवं शोधकार्य जो भी बची, वे विश्व के कोने-कोने में सुरक्षित हैं। परमपूज्य आचार्यश्री विद्यानन्दजी इस दिशा में हम जिन ग्रन्थों को लुप्त या नष्ट घोषित कर चुके हैं, | अत्यधिक व्यग्र हैं। वे स्वयं ही दीर्घकाल से कातन्त्रबहुत संभव है कि वे विदेशों में अभी भी सुरक्षित हों। व्याकरण का बहुआयामी अध्ययन एवं चिन्तनपूर्ण शोधकार्य उक्त पाण्डुलिपियों में कातन्त्र-व्याकरण के भी विविध करने में अतिव्यस्त रहे हैं। जब उन्हें यह पता चला अनुवाद, टीकायें एवं वृत्तियाँ आदि सम्भावित हैं, जिसकी कि केन्द्रीय प्राच्य तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, वाराणसी खोज करने की तत्काल आवश्यकता है। के वरिष्ठ उपाचार्य डॉ. जानकीप्रसाद जी द्विवेदी तथा बीसवीं सदी के प्रारम्भ मे जब आधुनिक जैन | केन्द्रिय संस्कृत विद्यापीठ लखनऊ के डॉ. रामसागर मिश्र पण्डित-परम्परा की प्रथम पीढ़ी का उदय हुआ, तब | ने कातन्त्र-व्याकरण पर दीर्घकाल तक कठोर-साधना कर उसमें कातन्त्र-व्याकरण को पढ़ाए जाने की परम्परा थी। तद्विषयक गम्भीर शोध-कार्य किया है, तो वे अत्यधिक जैन-पाठशालाओं में उसका अध्ययन अनिवार्य रूप से | प्रमुदित हुए। उन्हें कुन्दकुन्द भारती, नई दिल्ली में आमन्त्रित कराया जाता है। जैन एवं जैनेतर परीक्षालयों ने भी उसे | किया गया, उनसे चर्चा की गई तथा उन्हें आगे भी अपने पाठ्यक्रमों में निर्धारित किया था। किन्तु पता नहीं | शोध-कार्य करते रहने की प्रेरणा दी गई है। जैन विद्याजगत् क्यों, सन् १९४५-४६ के बाद से उसके स्थान पर 'लघु | को यह जानकारी भी होगी की पिछले मार्च १९९९ को सिद्धान्त' एवं 'मध्य सिद्धान्त कौमुदी' तथा भट्टोजी | डॉ. जानकीप्रसाद द्विवेदी के लिये उनके कातन्त्र-व्याकरणदीक्षितकृत 'सिद्धान्त-कौमुदी' का अध्ययन कराया जाने | सम्बन्धी मौलिक शोध-कार्य का मूल्यांकन कर कुन्दकुन्द लगा। आज तो स्थिति यह आ गई है कि समाज या | भारती की प्रवर-समिति ने उन्हें सर्वसम्मति से पुरस्कृत , तो 'कातन्त्र-व्याकरण' का नाम ही नहीं जानती अथवा करने की अनुशंसा की थी। अतः कुन्दकुन्द भारती के जानती भी है, तो उसे जैनाचार्य लिखित एक अन्तर्राष्ट्रीय | तत्त्वावधान में पूज्य आचार्यश्री विद्यानन्द जी के सान्निध्य ख्याति के गौरव-ग्रन्थ के रूप में नहीं जानती। यह स्थिति | में दिल्ली-जनपद के विद्वानों एवं विशिष्ट नागरिकों के दुःखद ही नहीं, भयावह भी है। आवश्यकता इस बात | मध्य एक लाख रुपयों से 'आचार्य उमास्वामी पुरस्कार' की है कि जैन पाठशालाओं में तो उसका अध्ययन कराया | से उन्हें सम्मानित भी किया गया था। ही जाय, साधुओं-संघों से भी सादर विनम्र निवेदन है । जैन-समाज से मेरा विनम्र निवेदन है कि वह कि वे अपने संघस्थ साधुओं, आर्यिकाओं, साध्वियों एवं | अपने अतीतकालीन गौरव-ग्रन्थों का स्मरण करे, स्वाध्याय व्रतियों को भी उसका गहन एवं तुलनात्मक अध्ययन | करे उनके महत्त्व को समझे तथा उसके शोधार्थियों को करावें, समाज को भी उसका महत्त्व बतलावें और | प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें पुरस्कृत / सम्मानित भी विश्वविद्यालयों में कार्यरत जैन-प्रोफेसरों को भी यह प्रयत्न | करती रहे, जिससे कि अगली पीढ़ी को भी उससे प्रेरणायें करना चाहिये कि वहाँ के पाठ्यक्रमों में कातन्त्र-व्याकरण | मिलती रहें और हमारे गौरव-ग्रन्थों की सुरक्षा भी होती को भी स्वीकार किया जाय, जिससे कि हमारा उक्त | रहे। महनीय ग्रन्थ हमारी ही शिथिलता से विस्मति के गर्भ । 'नमोऽस्तु' से साभार भूल-सुधार अप्रैल 2008 के जिनभाषित में कोटा (राज.) के पं० भगतलाल जी शास्त्री के देहावसान का समाचार प्रकाशित हुआ था। वस्तुतः जिनका देहावसान हुआ है, उनका नाम पं० मगनलाल जी था। भूल के लिए खेद है। सम्पादक 16 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अजै.तव्यम् (अजैर्यष्टव्यम्) का अर्थ क्या पशुबलि ही है ? आलोक मोदी जैनदर्शनाचार्य जब हम जैन कथा ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं, किया था इसलिए तुम्हारे पिता मेरे-धर्म भाई हैं। उस तब हमें एक कथा मिलती है, जिसमें पशु बलि की | महाकाल ने क्षीर कदम्ब के पुत्र पर्वत के इष्ट अर्थ परम्परा कबसे चली है। यह कथा हमें पद्मपुराण, | का अनुसरण करनेवाली अथर्ववेद- सम्बन्धी साठ हजार हरिवंशपुराण, उत्तरपुराण ग्रन्थों में उलब्ध होती है।। ऋचाएँ पृथक्-पृथक् स्वयं बनाई। ये ऋचाएँ वेद का रहस्य उत्तरपुराण के सड़सठवें पर्व में हमें यह कथा बड़े सुन्दर | बनानेवाली थीं, उसने पवर्त को इनका अध्ययन कराया ढंग से वर्णित मिलती है। और कहा कि पूर्वोक्त मन्त्रों से वायु को द्वारा बढ़ी हुई इस कथा के अनुसार धवल देश में स्वस्तिकारती | अग्नि की ज्वाला में शान्ति, पुष्टि और अभिचारात्मक नगर में एक क्षीरकदम्ब नामका पूज्य ब्राह्मण रहता था। क्रियाएँ की जावें, तो पशुओं की हिंसा से इष्ट फलकी वह समस्त शास्त्रों का विद्वान् था और प्रसिद्ध श्रेष्ठ | प्राप्ति हो जाती है। महाकाल असुर ने अपने क्रूर असुरों अध्यापक था। उसके पास उसका लड़का पर्वत, दूसरे | को बुलाया और आदेश दिया कि तुम लोग राजा सगर देश से आया हुआ नारद और राजा विश्वावसु का पुत्र | के देश में तीव्र ज्वर आदि के द्वारा पीड़ा उत्पन्न करो। वसु ये तीन छात्र एक साथ पढ़ते थे। इन तीनों में पर्वत | असुर स्वयं पर्वत को साथ लेकर राजा सगर के नगर निर्बुद्धि था, वह मोह के उदय से सदा विपरीत अर्थ | में गया। वहाँ मन्त्र मिश्रित आशीर्वाद के द्वारा सगर के ग्रहण करता था। बाकी दो छात्र पदार्थ का स्वरूप जैसा | दर्शन कर पर्वत ने अपना प्रभाव दिखलाते हए कहा गुरु बताते थे, वैसा ही ग्रहण करते थे। एक दिन | कि तुम्हारे राज्य में जो घोर अमंगल हो रहा है, मैं उसे क्षीरकदम्बक ने उत्तम संयम धारण कर लिया और अन्त | मन्त्रसहित यज्ञ के द्वारा शीघ्र ही शान्त कर दूंगा। विधाता में संन्यासमरण कर उत्तम स्वर्ग लोक में जन्म प्राप्त किया। ने पशुओं की सृष्टि यज्ञ के लिए ही की है, अतः पर्वत ने पिता का स्थान प्राप्त किया और शास्त्रों का | उनकी हिंसा से पाप नहीं होता, किन्तु स्वर्ग के विशाल व्याख्यान किया। सुख प्रदान करनेवाला पुण्य ही होता है। राजा सगर ने किसी एक दिन साधुओं की सभा में 'अजै.तव्यम्' | यज्ञका प्रबंध किया और इधर पर्वत ने यज्ञ आरम्भ कर इस वाक्य का अर्थ निरूपण करने में बड़ा भारी विवाद प्राणियों को मन्त्रित करना शुरू किया। मन्त्रोच्चारणपूर्वक चल पड़ा। नारद कहते थे कि जिसमें अङ्कर उत्पन्न | उन्हें यज्ञ कुण्ड में डालना शुरु किया। उधर महाकाल करने की शक्ति नष्ट हो गई है, ऐसा तीन वर्ष का | ने उन प्राणियों को विमानों में बैठाकर शरीरसहित आकाश पुराना जो अज कहलाता है और उससे बनी हुई वस्तुओं | में जाते हुए दिखलाया और लोगों को विश्वास दिला द्वारा अग्नि के मुख में देवता की पूजा करना यज्ञ कहलाता | दिया कि ये सब पशु स्वर्ग गये हैं। उसी समय उसने है। नारद का यह व्याख्यान यद्यपि गुरु पद्धति के अनुसार | देश के सब अमङ्गल और उपसर्ग दूर कर दिये। यह था, परन्तु निर्बुद्धि पर्वत कहता था कि अज शब्द एक | देख बहुत से भोले प्राणी उसकी प्रतारणा-माया से मोहित विशेष का वाचक है अतः उससे बनी हुई वस्तुओं के | हो गये और स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा से यज्ञ में मरने द्वारा अग्नि में होम करना यज्ञ कहलाता है। यह सनुकर | की इच्छा करने लगे। यज्ञ के समाप्त होने पर उस दुष्ट उत्तम प्रकृतिवाले साधु पुरुषों ने पर्वत का तिरस्कार किया।| पर्वत ने विधि-पूर्वक एक उत्तम जाति का घोड़ा तथा जब पर्वत अपमानित होकर वन में चला गया, | राजा की आज्ञा से उसकी सुलसा नामकी रानी को भी तब वहाँ महाकाल नाम का अंसुर ब्राह्मण का वेष रखकर | होम दिया। भ्रमण कर रहा था। उस असुर ने पर्वत से कहा कि इस प्रकार हिंसा के ताण्डव नृत्य के बारे में जब हे पर्वत! तुम्हारे पिता ने, स्थण्डिल ने विष्णु ने, उपमन्यु | नारद और तपस्वियो ने सुना, तो वे सब इस हिंसक ने और मैंने भौम नामक उपाध्याय के पास शास्त्राभ्यास | कार्य की निंदा करने लगे। इस विषय को लेकर पर्वत अगस्त 2008 जिनभाषित 17 Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ और नारद के बीच विवाद हुआ। बाद में यह निर्णय । है, विष्णु हैं, ईशान हैं, सिद्ध हैं, बुद्ध हैं, अनामय रोग किया गया कि राजा वसु से पुछा जाय। राजा वसु सिंहासन | रहित हैं और सूर्य के समान वर्णवाले हैं, ऐसे भगवान् पर आरूढ होकर राजसभा में विराजमान हुये। इस प्रसंग | ऋषभदेव की ही पूजा करते हैं। साक्षात् पशु की बात में उत्तरपुराण में वर्णित जानकारी से भी अधिक जानकारी | तो दूर रही पशुरूप से कल्पित चूने के पिण्डसे भी हरि वंशपुराण में मिलती है, (१७वें सर्ग में) वह इस | पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अशुभ संकल्प से पाप प्रकार है- उस समय राजसभा में कितने ही ब्राह्मण मनुष्यों | होता है और शुभ संकल्प से पुण्य होता है। इत्यादि के कानों को सख देनेवाले सामवेद गा रहे थे और कितने | नारद के वचन सुनकर सब लोग हर्षित हये। जब वस ही वेदों का स्पष्ट एवं मधुर उच्चारण कर रहे थे। कितने से निर्णय करने को कहा गया, तब उसने पर्वत का ही ओंकार ध्वनि के साथ यजुर्वेद का पाठ कर रहे | पक्ष ग्रहण किया जिससे वह सातवें नरक में चला गया। थे। जो ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद को प्रारम्भ कर | इधर तिरस्कार पाकर पर्वत भी अनेक देशों में परिभ्रमण जोर-जोर से पाठ कर रहे थे, तथा जिन्होंने दिशाओं के | करता रहा अन्त में उसने द्वेष-पूर्ण दुष्ट महाकाल नामक समूह को बहिरा कर दिया था। ऐसे ब्राह्मणों से सभा | असुर को देखा। पूर्व भव में जिसका तिरस्कार हुआ का आंगन खचा-खच भर गया था, जो ढ़ाढ़ी-रूपी अंकुरो | था, ऐसे महाकाल असुर के लिए अपने परभव का समाचार से सहित थे, तथा कमण्डलुरूपी बड़े-बड़े फल धारण सुनाकर पर्वत उसके साथ मिल गया और दुर्बुद्धि के कर रखे थे, ऐसे वल्कल और जटाओं के भार से युक्त | कारण हिंसापूर्ण शास्त्र की रचना कर लोक में ठगिया अनेक तापसरूपी वृक्ष वहाँ विद्यमान थे। बन हिंसापूर्ण यज्ञ का प्रदर्शन करता हुआ प्राणी हिंसा लोगों ने राजा वसु से कहा कि हे राजन्! ये| में तत्पर मूर्खजनों को प्रसन्न करने लगा। पर्वत मरकर नारद और पर्वत विद्वान् किसी एक वस्तु में विसंवाद | नरक गया। नारद मरकर स्वर्ग गया। यह तो हुआ जैन होने से आपके पास आये हैं, क्योंकि आप न्यायमार्ग परम्परा के अनुसार पशु बलि प्रारम्भ होने का इतिहास। के हैं। यह वैदिक अर्थका विचार इस समय पृथ्वीतलपर कुछ दिनों तक हम भी सोच रहे थे, यह कथा सिर्फ आपके सिवाय अन्य लोगों का विषय नहीं है, क्योंकि जैन परम्परों में ही हैं या अन्यत्र कहीं पर इसका उल्लेख उस सबका सम्प्रदाय छिन्न-भिन्न हो चुका है। इसलिए है? जब 'की ऑफ नालेज' पढ़ रहा था, तो यह मालूम आपकी अध्यक्षता में इस सब विद्वानों के आगे ये दोनों | हुआ कि 'महाभारत में' यह कथा कुछ परिवर्तित होकर निश्चय कर न्यायपूर्ण जय और पराजय को प्राप्त करें। आई है। जब महाभारत को देखा, तब मुझे यह कथा सबसे पहले पर्वत ने अपना पक्ष रखा। बाद में नारद | इस रूप में मिली (शान्ति पर्व, 337 अध्याय)। ने पर्वत का खण्डन किया। नारद ने कहा कि एक युधिष्ठिर भीष्म पितामह से प्रश्न करते हैं किशब्द के अनेक अर्थ होते हैं, जैसे गो शब्द-पशु, किरण | उपरिचरवसु भगवान् का परमभक्त था महापुरुष था। ऐसे मृग, इन्द्रिय, दिशा, बज्र, घोड़ा, वचन, और पृथ्विी अर्थ | व्यक्ति ने किस कारण से स्वर्ग से च्युत होकर पाताल में प्रसिद्ध है...। इसलिए 'अजैर्यष्टव्यम्' इस वेद-वाक्य | में प्रवेश किया? भीष्य पितामह ने कहा कि पूर्व में में अज शब्द का अर्थ रूढ़िवत अर्थ से दूर 'न जायन्ते | हुये ऋषी और देवताओं के पुरातन इतिहास को विद्वान इति अजाः' (जो उत्पन्न न हो सकें वे अज हैं) इस | लोग बताते हैं। पूर्व में एक बार यज्ञ के समय देवलोगों व्युत्पत्ति से क्रिया सम्मत 'तीन वर्ष का धान्य' लिया | ने ब्राह्मणों से कहा की अजसे यज्ञ को करना चाहिए गया है। हिताभिलाषी मनुष्य जिन्होंने युग के आदि में | और अज मतलब छाग (बकरा) ही है और कुछ नहीं असि, मषि, कृषि, सेवा, शिल्प और वाणिज्य इन छह | ऐसा स्पष्ट किया। इसके जवाब में ऋषियों ने कहा 'यज्ञ कर्मों की प्रवृत्ति चलायी थी, जो पुराण पुरुष हैं, उत्कृष्ट | में बीजों के द्वारा ही याग करना चाहिए ऐसा वेद मन्त्र हैं, रक्षक हैं, इन्द्ररूप हैं, इन्द्र के द्वारा पूज्य हैं, वेद | कहते हैं। बीज ही 'अज' संज्ञा का प्राप्त हैं। इसलिए में स्वयम्भू नाम से प्रसिद्ध हैं, मोक्ष मार्ग के उपदेशक | 'अज' का अर्थ बकरा ऐसा करके उसका वध करना हैं, संसार-सागर के शोषक हैं, अनन्त ज्ञान-सुख आदि | ठीक नहीं है। हे देवताओं! यज्ञ में पशु को हवि के गुणों से युक्त ईश नाम से प्रसिद्ध हैं, महेश्वर हैं, ब्रह्मा | लिए वध करना सत्पुरुषों का धर्म नहीं है। यह श्रेष्ठ 18 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सत्ययुग है। इस सत्ययुग में पशुका वध करके प्राणी | गया है मूलतः यज्ञ करने की परम्परा रही है। यह बात हिंसा कैसे उचित है? उसी समय उपरिचर वसु आकाश | अलग है कि यज्ञ के स्वरूप में मतभेद जरूर है। मार्ग से अपनी सेना के साथ आ रहा था। उसे देख | भगवद्गीता के अनुसार यज्ञका स्वरूप ही अलग है, वह ऋषियों ने देवताओं से कहा कि राजा वसु तुम लोगों | अग्नि में हवन करने का समर्थक नहीं है। इसके बारे के संदेह का निवारण करेगा। सबने मिलकर वसु से | में फिर कभी विचार किया जाएगा। पूछा कि महाराज! क्या बकरे को हविषान्न करके यज्ञ अब हम एक महत्त्वपूर्ण विषय पर आते हैं, वह करना चाहिए? अथवा धान्यों को ही हविषान्न करके | यह है कि मूलतः वेद किसका उपदेश देते हैं और यज्ञ करना चाहिए। इन दोनों में से वेद में किसका उल्लेख | उन मन्त्रों के अर्थों को समझने में गलती क्यों हुई? सबसे है? तुम हम सबके लिये प्रमाणभूत हो ऐसा हम सबका | पहले यह स्मरण में रखना है कि वेदों कि भाषा एक अभिप्राय है। इसके पश्चात् वसु ने पूछा कि दोनों में | गूढ़ भाषा है, जिसको हर व्यक्ति समझ नहीं सकता। से कौन किसके पक्ष में हैं। दोनों ने अपना अपना पक्ष | इसलिए शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं दिया बताया। यद्यपि राजा वसु धान्य से यज्ञ करता था, लेकिन | गया था, जैसा कि 'वरांगचरित्र' से ज्ञात होता है। इसके देवताओं के अभिप्राय को समझकर पक्षपात से बकरे | अलावा वेद गुरुमुख से पढ़े जाते थे, ताकि उसका सही को रखकर ही यज्ञ करना चाहिए, ऐसा कह दिया। इस | अर्थ समझ में आवे। चम्पतराय जैन साहब की पुस्तक पर ऋषियों ने कहा कि तुम्हें सही अर्थ ज्ञान होने पर | असहमत संगम पृ. १२३ जिसमें उन्होंने लुई जेकोलिएट भी तुमने देवताओं का पक्ष लिया है। इसलिए तुम अभी | महोदय का उदाहरण दिया है, इसमें लिखा है "पवित्र स्वर्ग से च्युत हो जाओ। आज से तुम्हारी आकाश में पुस्तकों को साधारण पुस्तकों की भांति उनको शब्दार्थ गमन करने की शक्ति नष्ट हो जायेगी है। हमारे शाप | में नहीं पढ़ना चाहिये। यदि उनका असली भाव उनके के आघात से तुम पृथ्वी को भेदकर पाताल में प्रवेश शब्दार्थ से विदित होता तो शूद्रादि को उनके अध्ययन करो। और हुआ भी ऐसा ही। पाताल में जाने के बाद | से क्यों रोका जाता? वेद स्वयं अपना भाव प्रगट नहीं भी वह नारायण की भक्ति करता था, इससे नारायण | करते हैं और वे तब ही समझ में आ सकते हैं, जबकि ने राजा वसुको शाप से मुक्त कर दिया और वसु फिर | गुरु उस वस्त्र को जिससे वह ढके हैं, उतार देता है से उपरिचर कहलाने लगा। और उन बादलों को, जो उनके आंतरिक प्रकाश को इस संक्षेप अध्ययन से हमें यह मालूम होता है | छिपाये हुये हैं हटा देता है।" (ओकल्ट सायंस इन इण्डिया कि वैदिक संस्कृति में पशु बलि की परम्परा किस प्रकार | पृ. १०२)। से प्रचलित हुई। जैनाचार्यों ने इतिहास की उपेक्षा की जेकोलिएट साहब के वक्तव्य से हम समझ सकते है यह कहना कहाँ तक सत्य है, यह पाठक स्वयं समझ | हैं कि वेदों का असली भाव क्या है, वेद कोई घटनाओं सकते हैं। जैनाचार्यों ने प्राचीन इतिहास को बहुत अच्छे | का लेखा जोखा नहीं है, बल्कि उसमें अध्यात्म भरा से सुरक्षित रखा है यह ऊपर वर्णित कथा से स्पष्ट | हुआ है। वेदों के सही अर्थों के बारे में फिर कभी हो जाना है। इन दोनों कथाओं से कई बातों का खुलासा चर्चा करेंगे। वेदों के इन गूढ़ अर्थों को नहीं समझने हो जाता है। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है | के कारण ही पशुबलि की परम्परा चल पड़ी, जैसा कि कि बहुत समय पहले ही वेदों के अर्थों का सम्प्रदाय | पर्वत के आख्यान से स्पष्ट हो जाता है। वेदों को मात्र छिन्न-भिन्न हो चुका था अर्थात् उसको सही रूप में शब्दार्थ ग्रहण करने से बहुत सी गलतियाँ हुई हैं। यह समझनेवाले बहुत कम लोग थे। दोनों कथाओं के अनुसार | भी ध्यान रखने की बात है कि जैनपरम्परा के अनुसार राजा वसु ही एक ऐसा व्यक्ति था, जो वेदों के अर्थों | वेदों कि रचना बहुत प्राचीनकाल में हुई है, जैसा कि का निर्णय कर विवाद को समाप्त कर सकता था। साथ | हरिवंशपुराण और उत्तर पुराण से पता चलता है, में यह भी समझ में आता है कि वेद मन्त्रों में हिंसा | हरिवंशपुराण में वेदों के दो भेद किये गये है, एक आर्ष का उल्लेख नहीं है, उनमें तो अहिंसक तरीके से ही | वेद और दूसरा अनार्ष वेद। आर्ष वेद वह है जो जिनेन्द्र यज्ञ करने का उल्लेख है। वैदिक परम्परा जैसा कि समझाया ! भगवान् द्वारा कहा गया है, जिसको बारह भागों में विभाजित 'अगस्त 2008 जिनभाषित 19 Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किया गया है और अनार्ष वेद वह है जिसमें हिंसा का उपदेश है। अनार्ष वेद जो कि पर्वत के द्वारा कहा गया है। प्राचीन काल में जो वेदों के मन्त्रों का अर्थ अहिंसक तरीके से यज्ञ करने का ही किया जाता था । इस अहिंसा को उन्होंने कहाँ से लिया, यदि यह पूछा जाय तो कहना होगा कि यह अहिंसा भगवान् ऋषभदेव से लिया गया । इस बात का सर्मथन उपर लिखे एक प्रसंग से होता है, जिसमें कहा गया है कि वेदों में भगवान् ऋषभदेव को स्वयंभू आदि कहा गया है। इससे ऐसा लगता है कि वैदिक आर्यों के पूर्वज भगवान् ऋषभदेव की परम्परा थी। वर्तमान में उपलब्ध वेद में भगवान् ऋषभदेव का उल्लेख है, ऐसा विद्वानों का कहना है, जो कि हमारे विचारों का समर्थन करता है। इससे यह लगभग स्पष्ट होता जा रहा है कि जैनधर्म वैदिकधर्म से अतिप्राचीन है। इसके बारे में और स्पष्ट लिखने का प्रयास आगे फिर कभी करेंगे। इस लेखका आशय यही है कि वैद भगवान् ऋषभदेव की अहिंसा के ऋणी है और प्राचीन काल में उनका अर्थ अहिंसक रीति से ही किया जाता था। इस अहिंसा का श्रेय भगवान् ऋषभदेव को है, जो कि इस वर्तमान अवसर्पिणी काल में प्रथम तीर्थंकर थे। कर्मण्येवाधिकारस्ते श्री दि. जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर ये जमीं पै जिनका था दबदबा, कि बुलन्द अर्श पै नाम था, उन्हें यों फलक ने मिटा दिया, कि मजार तक का निशा नहीं । बहुत कुछ पाँव फैलाकर भी मगर आखिर जगह हमने, न सादगी सबसे बड़ा गहना सादगी को संसार में मनुष्य का सुंदरतम गहना माना गया है। इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री ग्लैडस्टोन बहुत सादा जीवन व्यतीत करते थे। वे अपने कपड़े तक स्वयं ही साफ करते थे और बाजार से सब्जी आदि भी स्वयं साइकिल पर लेकर आते थे । 1 एक बार रेलयात्रा के दौरान किसी समाचार पत्र के संपादक ने उनसे किसी स्टेशन पर मिलने की अनुमति माँगी। उन्होंने तुरंत हाँ कर दी। निर्धारित स्टेशन पर संपादक प्रथम श्रेणी के डिब्बे प्रधानमंत्री को ढूँढ़ने लगे, पर वे उन्हें कहीं दिखाई नहीं दिए। अचानक एक युवक ने उनसे पूछा कि क्या आप प्रधानमंत्री को ढूँढ रहे हैं? वे तो दूसरी श्रेणी के डिब्बे में सफर कर रहे हैं। संपादक महोदय जब वहाँ पहुँचे तो उन्हें प्रधानमंत्री एक सीट पर अखबार पढ़ते मिले। 20 अग्रस्त 2008 जिनभाषित चकबस्त देखा 'शाद' दुनिया में, दो गज के सिवा पायी । शाद अजीमाबादी संपादक महोदय ने आश्चर्य से पूछा, 'आप प्रधानमंत्री होकर भी दूसरे दरजे में सफर कर रहे हैं, वह तो अच्छा हुआ प्रथम श्रेणी में बैठे एक युवक ने मुझे आपका पता बता दिया, नहीं तो मैं शायद ही आपको खोज पाता ।' ग्लैडस्टोन बोले, “हाँ, वहाँ मेरा बेटा बैठा है, उसी ने आपको मेरे बारे में बताया होगा।" संपादक के आश्चर्यचकित होने पर प्रधानमंत्री का उत्तर था, 'भाई, मैं एक किसान का बेटा हूँ, पर वह तो प्रधानमंत्री का पुत्र है, उसे प्रथम श्रेणी में यात्रा करना सुविधाजनक लगता है और मुझे द्वितीय श्रेणी में । ' सादगीपूर्ण व्यक्तियों का आचरण अनुकरणीय है । 'बोध कथा' से साभार Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री पाड़ासाह बुन्देलखण्ड किसी समय में बड़ा गरिमामय प्रदेश में 'पाड़ासाह' शब्द का ही प्रयोग करेंगे। रहा है, जो जेजाक- भुक्ति नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है। यहाँ आल्हा ऊदल जैसे रणबांकुरे हुए थे, जिनकी वीरता की गाथाएँ आज भी बुन्देलखण्ड के गाँव-गाँव में गाई जाती हैं। जगनिक और ईशरी वहाँ के प्रसिद्ध लोककवि थे, जिनका लोक-संगीत गाँवों की अमराइयों और अथाइयों में आज भी सुना जाता है। बड़े-बड़े सन्त और श्रेष्ठी हुए जिन्हें लोग आज भी सम्मान और आदर से याद करते हैं। ऐसे ही भक्त श्रेष्ठियों में एक श्रेष्ठि, भक्त - शिरोमणि, जैन- जगत् का गौरव श्री पाड़ासाह भी थे। यद्यपि इनका मूल नाम कुछ और ही रहा होगा परन्तु ये पाड़ों का व्यापार किया करते थे, पाड़ों से इन्हें व्यापार में खूब लाभ हुआ था और अपार सम्पत्ति अर्जित की थी। उस धन से इन्होंने अनेक जिनालयों का निर्माण कराया तथा जिनबिम्ब प्रतिष्ठित कराये जिससे इनको बहुत कीर्ति मिली और ये 'पाड़ासाह' नाम से विख्यात हो गये । पाड़ा का पर्यायवाची भैंसा है अतः लोग इन्हें 'भैसासाह' भी संबोधित किया करते थे। ऐतिहासिक अभिलेखों में इनका 'पाड़ासाह' नाम से उल्लेख मिलता है । पं० कुन्दनलाल जैन 'पाड़ासाह' का कोई विशेष इतिहास नहीं मिलता है। वे आत्मप्रशंसा और स्वख्याति से सर्वथा दूर रहते थे। उनका मूल लक्ष्य था- नेकी कर दरिया में डाल । उन्होंने जो कुछ किया वह जन- अनुश्रुतियों और किंवदन्तियों में विख्यात है । वे गृहपति वंश में उत्पन्न हुए थे, जो अपभ्रंश में 'गहवइ' कहलाया और हिन्दी - बुन्देली में 'गहोई' हो गया । 'गहोई वैश्य जाति है जो झाँसी, दतिया, चिरगाँव, बरुआसागर, मऊरानीपुर आदि शहरों के आसपास के इलाके में आज भी पाई जाती है। पहले इस जाति में बहुत से लोग जैन धर्मावलम्बी हुए हैं, पर अब तो उस जाति का विरला ही कोई जैन हो । पाड़ासाह ने चन्देरी में फागुन सुदी ६ सं. १२३६ को तीर्थंकर शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरहनाथ की त्रिमूर्ति प्रतिष्ठित कराई थी, ऐसा उल्लेख मिलता है। ऐसी किंवदन्ती है कि पाड़ासाह तीर्थंकर शान्तिनाथ के परम भक्त थे, अतः उन्होंने जहाँ भी, जो भी मूर्ति बनवाई और प्रतिष्ठित कराई वे सब तीर्थंकर शान्तिनाथ की ही हैं। कहा जाता है कि अहारजी क्षेत्र पर जो अठारह फीट ऊँची विशालकाय कायोत्सर्ग मुद्रा में स्थित तीर्थंकर शान्तिनाथ की रम्य सुन्दर प्रतिमा आज विराजमान है, जिस पर सं. १२३७ का सात श्लोकों का विस्तृत मूर्ति - लेख है, वह इन्हीं के परिवारजनों ने इनके ही सहयोग से निर्मित और प्रतिष्ठित कराई थी। सब कुछ इन्हीं का था, पर इन्होंने उसमें अपना नामोल्लेख वगैरह का कुछ भी संकेत नहीं कराया । 'पाड़ासाह' में साह शब्द साहू के समकक्ष माना जाता है, जो प्राचीन साधु शब्द के अर्थ का द्योतक है और श्रेष्ठता, शालीनता, उच्चता, प्रतिष्ठा आदि भावों के लिए प्रयुक्त होता था, कालान्तर में साधु साहू के रूप में परिवर्तित हुआ और वह श्रेष्ठ व प्रतिष्ठित व्यापारी के लिए प्रयुक्त होने लगा। साहू से साहूकार हो गया, जो धनी का वाचक बना। यही साहू शब्द बुन्देलखण्ड में साह या साव कहलाया और उसके लिए प्रयुक्त होने लगा जो वस्तु गिरवी रखकर पैसा देता था । मध्यकाल में ऐसे ही प्रतिष्ठित और धनी लोगों के नाम के आगे साहू शब्द का प्रयोग किया जाता है, जैसा कि अनेक प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों की प्रशस्तियों में पाया जाता है । पर बुन्देलखण्ड में साहू (साह) का प्रयोग नाम के बाद लगा हुआ मिलता है इसलिए साह पाड़ा 'पाड़ासाह' हो गये और इसी नाम से विख्यात हो गये। आगे आनेवाले लोग इसे ही इनका मूल नाम समझकर इन्हें 'पाड़ासाह' लिखने लगे। अतः हम भी आगे अपने सम्पूर्ण लेख | बड़े पुत्र का नाम जाहढ़ था और छोटे का नाम उदयचन्द्र उस मूर्ति - लेख का सारांश यह है कि श्री देवपाल ने वानपुर में सहस्रकूट चैत्यालय बनवाया था। (आज भी खण्डित दशा में यह वहाँ विद्यमान है । वानपुर अहारजी के पास ही एक गाँव है । यहाँ का तालाब प्रसिद्ध है ।) देवपाल के पुत्र रत्नपाल ने बसुहाटिका नगर में एक जिनबिम्ब निर्मित कराया था। यहाँ एक प्रसिद्ध श्रेष्ठि अल्हण रहते थे। जिन्होंने नन्दपुर या आनन्दपुर में श्री शान्तिनाथ का चैत्यालय बनवाया था, तथा मदनेस सागर ( अहारजी) में भी शान्ति जिनालय बनवाया था । इन्हीं श्रेष्ठी के घर गल्हण का जन्म हुआ था । गल्हण के अगस्त 2008 जिनभाषित 21 Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ था। इन्हीं दोनों भाइयों जाहढ़ और उदयचन्द्र ने अगहन | अपार-धन सम्पत्ति हो गई, जिसे उन्होंने जिनालयों और सुदी तृतीया शुक्रवार सं. १२३७ को श्रीमान् परमर्द्धिदेव | जिनबिम्बों की प्रतिष्ठा में लगा दिया। विजय के राज्य में यह शान्ति-जिनबिम्ब प्रतिष्ठित कराया | एक और अनुश्रुति प्रसिद्ध है कि श्री पाड़ासाह था। उन प्रशस्ति स्वरूप श्लोकों के रचयिता श्री धर्माधिकारी एक बार रांगा खरीदने लासपुर गये, वहाँ से रांगे को थे, जिन्हें बाल्हण के पुत्र पापट ने उत्कीर्ण किया था | लाकर जैसे ही घर में रखने लगे तो वह सब रजत और यह जिनबिम्ब रचा था। उस प्रशस्ति में वर्णित नगर | (चांदी) हो गया। पाड़ासाह ने जब वह चाँदी देखी तो वसुहाटिका और नंद या आनन्दपुर यहीं-कहीं आस- | उन्हें भ्रम हुआ कि लासपुर के व्यापारी ने भूल से रांगे पास होंगे, जिनके नाम कालदोष से बदल गये होंगे। की जगह चाँदी दे दी है। वे तुरन्त ही वापिस गए और वानपुर और मदनेससागर तो आज भी विख्यात हैं। | उनसे कहा- भाई। हमने तो रांगा खरीदा था, आपने चाँदी मदनेससागर अहारजी कैसे हो गया इसका उल्लेख हम | दे दी! अपनी चाँदी वापिस लो और हमें रांगा दो। लासपुर आगे करेंगे। हमारे लेख के चरित्रनायक पाड़ासाह का | के व्यापारी ने जब जाँच-पड़ताल की तो बोला साहूजी! मूल नाम इन्हीं गल्हण और बाल्हण में से किसी एक | हमने तो रांगा ही दिया था। अब आपके पुण्य-प्रताप का हो सकता है, ऐसा मेरा अनुमान है। इसमें कोई | से यदि वह चाँदी हो जाय, तो वह आपकी ही है, आश्चर्य या अतिशयोक्ति भी नहीं है क्योंकि सभी कुछ | हमें इससे कोई लेना-देना नहीं। हमें तो अपनी वस्तु मिलता-जुलता है। का मूल्य मिल गया। बस यही पर्याप्त है। पाठक ध्यान पाड़ासाह ने अहारजी, खानपुर झालरापाटन, थूवौनजी, | दें क्या आज ऐसे क्रेता-विक्रेता मिलेंगे। पाड़ासाह चाँदी मियादास, वरी, आमीन, सतना, सुझेका पहाड़ पचराई, | वापिस ले गये और उसे उन्होंने धार्मिक कार्यों में लगा सेरोन आदि स्थानों पर जिनालयों का निर्माण कराया था | दिया। कहा जाता है, एक बार पाड़ासाह ने पंगत (सामूहिक और वहाँ सभी स्थानों पर शान्तिनाथ के कायोत्सर्ग मुद्रा | भोज, पंक्तिभोज) की थी, तो इतने पकवान और भोज्य में जिनबिम्ब प्रतिष्ठित कराये थे। ये सभी जिनबिम्ब | सामग्री तैयार कराई थी कि बावन मन मिर्ची का चूरा हल्के लाल या कत्थईरंगी पाषाण से निर्मित हैं और | भी कम पड़ गया था, इससे अनुमान किया जा सकता खड्गासन मुद्रा में हैं। पद्मप्रभ की माणिक्य की सत्रह | है कि उस पंगत में कितने लोग आमन्त्रित किए गए इंच की एक बहुमूल्य प्रतिमा चन्देरी के पास बीठली | होंगे। पाड़ासाह की भक्ति और सम्पत्ति अन्योन्याश्रित थी। गाँव में आपने ही स्थिापित कराई थी। पाड़ासाह ने इतना | सच्ची प्रभुभक्ति से उन्हें अपार सम्पत्ति मिली थी और विशाल सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यक्रम केवल पाड़ों | इस सम्पत्ति को वे प्रभुभक्ति के प्रतीक जिनालय और (भैंसों) द्वारा किये हुए व्यापार से अर्जित धन-राशि द्वारा | जिनबिम्बों के निर्माण और प्रतिष्ठा में सहर्ष मुक्तहस्त ही किया था। उन्हें इतनी अपार धनराशि और वैभव से व्यय किया करते थे। /सम्पत्ति कैसे प्राप्त हुई थी, इस विषय में कई अनुश्रुतियाँ मदनेससागर का नाम अहारजी क्यों पड़ा? इस संबंध एवं किंवदन्तियाँ विख्यात हैं। जैसे एक बार जब पाडासाह | में किंवदन्ति है कि पाड़ासाह अतिथि-संविभाग शिक्षाव्रत व्यापार के लिए पाड़ों का खांडू (झुण्ड) लेकर बजरंगगढ़ | का पालन दृढ़ता से किया करते थे। अतिथि को भोजन गये तो मार्ग में उनका एक पाड़ा कहीं खो गया जिसे | कराए बिना स्वयं भोजन नहीं करते थे। एक बार ऐसा ढूँढ़ने साहजी निकल पड़े। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते एक स्थान पर | कुसंयोग जुड़ा कि तीन दिन तक पाड़ासाह को कोई वह चरता हुआ मिल गया, पर साहूजी के विस्मय का | भी अतिथि न मिला, फलस्वरूप वे भी निराहार रहे। ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि पाड़े के पैर का | चौथे दिन पुनः अतिथि की प्रतीक्षा में खड़े हुए कि नाल सोने-सा चमक रहा है, उन्होंने उसे ध्यान से देखा, | सहसा एक वीतरागी निर्ग्रन्थ मुनि वहाँ आ पधारे। पाड़ासाह सचमुच ही वह स्वर्णमय था, तो उन्होंने परीक्षण हेतु | के हर्ष का पारावार न रहा। उन्होंने भक्तिभाव से पुलकित दूसरा पाड़ा भेजा, उसका भी नाल सोने का हो गया। हो मुनिश्री को आहार-दान दिया। तभी से मदनेससागर फिर तो क्या था, थोड़ा परिश्रम करके उन्हें वहाँ पारस | का नाम अहारजी पड़ गया। यह स्थान बुन्देलखण्ड पथरी मिल गई और इसी पारस पथरी से उनके यहाँ | में चमत्कृत अतिशय क्षेत्र के रूप में विख्यात है। 22 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'पाड़ासाह' बुन्देलखण्ड के प्रतिष्ठित जैन व्यापारी थे अतः व्यापार प्रणाली का संक्षिप्त सा दिग्दर्शन करा देना कोई अनुचित न होगा, क्योंकि इस प्रणाली में जैनत्व एवं जैन सांस्कृतिक तत्त्वों का समावेश था। जैनपर्वों एवं त्यौहारों का ध्यान रखा जाता था, तथा जैन आचार-विचार का यथाशक्ति पालन भी किया जाता था । उस समय आज जैसे यातायात के साधन तो सुलभ थे नहीं। न सड़कें थीं न ही वाहन। वाहन के नाम पर बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी ही होते थे, जिन्हें बहली या रथ कहा जाता था । ये प्रतिष्ठा के प्रतीक थे और केवल सवारी के लिए ही प्रयुक्त होते थे, अन्यथा व्यापारिक वस्तु लादने, लाने व ले जाने के लिए जानवरों के झुण्ड होते थे जिन्हें खाँडू कहा जाता था। ये जानवर घोड़े, बैल, खच्चर, गधे, भैंस, पाडे, ऊँट, आदि होते थे। व्यापार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना उन दिनों निरापद तो था नहीं, जगह-जगह चोरों, लुटेरों और डाकुओं का भय बना रहता था, अतः व्यापारी लोग समूह बनाकर व्यापार के लिए निकला करते थे, जब यही समूह तीर्थयात्रा जैसे धार्मिक कार्यों के लिए जाता था, तो इनका नेतृत्व करनेवाला व्यक्ति ‘संघाधिप या संघाधिपति' की उपाधि से विभूषित किया जाता था। जैन व्यापारियों के खाँडू प्राय: कार्तिकी अष्टाह्निका के बाद प्रस्थान किया करते थे और मार्ग में विभिन्न स्थानों पर लेन-देन करते हुए फाल्गुनी अष्टाह्निका से पूर्व अपने गन्तव्य पर अवश्य ही पहुँच जाते थे, जहाँ पूजन- भजन, देवदर्शन, शास्त्र - प्रवचन आदि की समुचित व्यवस्था होती थी। मार्ग में वे रात्रि विश्राम ऐसे ही स्थानों पर किया करते थे, जहाँ देवदर्शन-पूजन के लिए जिनालय या जिन चैत्यालय होते थे। लगभग चार मास के प्रवास बाद घर वापिसी का प्रस्थान फाल्गुन सुदी पूर्णिमा (अष्टाह्निका) समाप्ति के बाद होता और आषाढ़ी अष्टाह्निका से पूर्व घर पहुँच जाते, जिससे वर्षा ऋतु के कारण रास्ते दलदलमय (कीचड़मय) न हो जावें, तथा नदी-नालों में बाढ़ न आ जावे । पर्यूषण, रक्षाबन्धन आदि पर्वों और त्यौहारों का आयोजन घर पर ही करते थे। मार्ग में सुरक्षा हेतु हर खाँडू के साथ पहलवानों एवं सिपाहियों का संगठन चलता था। इन खाँडुओं के माध्यम से कथा-कहानियों एवं धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों का आदान-प्रदान एवं विकास पर्याप्त मात्रा में हुआ । इनका इतिहास बड़ा रोचक और ज्ञानवर्द्धक है। इस तरह भक्त शिरोमणि पाड़ासाह ने बुन्देलखण्ड में जैनधर्म और संस्कृति की ध्वजा फहराई । बुन्देलखण्ड के कण-कण में उनकी यशोगाथा बिखरी पड़ी है, यहाँ का हर जैन बड़े आदर और श्रद्धाभाव से उनका पुण्य स्मरण करता है । जाका गुरु है कीच कीच के कबीरवाणी गुरु मिला नहिं शिष मिला, लालच खेला दाव । दोनों बूड़े धार में, चढ़ि पाथर की नाव ॥ न तो शिष्य को सच्चा गुरु मिला, न ही गुरु को योग्य शिष्य, फिर भी लालचवश वे गुरु-शिष्य बन गये। नतीजा यह हुआ कि पत्थर की नाव पर चढ़कर दोनों मझधार में डूब गये ! गिरही चेला होय । 'जैन इतिहास के प्रेरक व्यक्तित्व' भाग १ से साभार गीरही, धोवते, दाग न छूटे कोय ॥ जिसका गुरु भी विषयों में आसक्त है और चेला भी विषयलोलुपी है, वे दोनों कीचड़ हैं। कीचड़ से कीचड़ धोने पर दाग नहीं छूट सकता । पण्डित और मसालची, दोनों सूझत चांहि । औरन को करे चाँदना, आप अँधेरे मांहि ॥ पण्डित और मशाल दिखानेवाला, इन दोनों को अपना शरीर दिखाई नहीं देता। ये औरों को प्रकाश दिखाते हैं, किन्तु स्वयं अँधेरे में रहते हैं । अगस्त 2008 जिनभाषित 23 Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विद्याष्टकम् (शिखरिणीवृत्तम्) डॉ० भागचन्द्रो जैनो 'भागेन्दुः' ___ अनुवाद- जो अहिंसा ओर सत्य की उपासना सुविद्यावारीशो गणधरसमो ज्ञानचतुरः ।। | में अहर्निश निरत हैं, तथा विकारों के शमनकर्ता और विधाता शिष्याणां शुभगुणवतां शास्त्रकुशलः। इन्द्रिय-विजेता हैं, निरन्तर ज्ञान के मार्ग पर संचरणशील पुराणानां ज्ञाता नयपथचरो नीतिनिपुणः हैं। जिनके (गृहस्थ अवस्था के पिता एवं माता होने का स कुर्यात्कल्याणं भवभयहरो मे गुरुवरः॥ गौरव) क्रमशः श्री मलप्पा जी (समाधिस्थ मुनि श्री अनुवाद- आचार्य प्रवर श्री विद्यासागर जी मुनि | मल्लिसागर जी महाराज) एवं (श्रीमती) श्रीमती जी महाराज श्रेष्ठ विद्याओं के समुद्र हैं, गणधर के समान | (समाधिस्थ आर्यिका समयमती जी माताजी) को प्राप्त ज्ञान-विज्ञान की विविध शाखाओं में दक्ष हैं, अच्छे गुणकारी | है, जो विशेषज्ञ मनीषी हैं, विख्यात हैं, बृहस्पति के समान शिष्य' समुदाय के विधाता हैं, समस्त शास्त्रों में कुशल | ज्ञानवान् है, दिगम्बर मुद्राधारी है, ससार-जन्म, वृद्धावस्था हैं, प्राच्य विद्याओं के मनीषी हैं, जैन-दर्शन के महत्त्वपूर्ण | और मृत्यु के भय को दूर करनेवाले ऐसे परमश्रेष्ठ गुरुवर सिद्धान्त 'अनेकान्तवाद' के अनयायी हैं और नीति-निपण | आचार्य विद्यासागर जी मुनि महाराज हमारा कल्याण करें। हैं, संसार, जन्म, वृद्धावस्था और मृत्यु के भय को दूर करनेवाले ऐसे परम श्रेष्ठ गुरुवर आचार्यप्रवर विद्यासागर "सदालग्गा'-ग्रामे यो जनिमवाप्नोच्छारदि-तिथौ जी मुनिराज हमारा कल्याण करें। 'धरो विद्यायाः' यो प्रथितयशसोऽभूदनुपमः। ततो लब्ध्वा ज्ञानम् 'उपनय' -विधानस्य विधिना 2 मुमुक्षुब्रह्मज्ञः सरलहृदयः शान्तकरणः स कुर्यात्कल्याणं भवभयहरो मे गुरुवरः॥ स्वशिष्याणां शास्ता शुभगुणधरः सिद्धगणकः। अनुवाद- शरद पूर्णिमा के शुभ दिन सदलगा ग्राम सुयोगी धर्मज्ञः सरलसरलः कर्मकुशलः (कर्नाटक) में जिनका जन्म हुआ, और जो (बाल्यावस्था स कुर्यात्कल्याणं भवभयहरो मे गुरुवरः॥ | में) विद्याघर के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने - अनवाद- जो परम श्रेष्ठ पद मोक्ष के अभिलाषी | विद्या-आरम्भ के प्रसिद्ध 'उपनयन संस्कार की निर्धारित हैं, आत्म-तत्त्व के मर्मज्ञ हैं, जिनका हृदय अत्यन्त सरल | प्रविधि से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की, संसार-जन्म, वृद्धाहै, जो परम संयमी (जिनकी इन्द्रियाँ शान्त) हैं, अपने | वस्था और मृत्यु के भय को दूर करनेवाले ऐसे परमश्रेष्ठ शिष्यों (संघ) के जो अनुशासक, नियंत्रक, प्राचार्य हैं, गुरुवर आचार्य विद्यासागर जी मुनि महाराज हमारा कल्याण प्रशस्त गुणों के धारक हैं, उत्कृष्ट साधक तपस्वियों में | करें। अग्रगण्य हैं, मन-वचन-काय पर समान रूप से नियंत्रक, 5 सुयोगी हैं, धर्म के मर्मज्ञ है, अतिशय सरल हैं, आचार्यपद इतो लब्ध्वाऽऽचार्य ऋषिवर-वरं 'देश'-भणितम् के दायित्वों के सम्पादन में अत्यधिक कुशल हैं, संसार व्रतं ब्रह्माख्यं योऽलभत परमं ह्यात्म-रसिकः। जन्म, वृद्धावस्था, और मृत्यु के भय को दूर करनेवाले ततोऽनुज्ञां प्राप्य गतवानसौ 'ज्ञानजलधिं' ऐसे परम श्रेष्ठ गुरुवर आचार्य विद्यासागर जी मुनि महाराज स कुर्यात्कल्याणं भवभयहरो मे गुरुवरः ।। हमारा कल्याण करें। अनुवाद- आत्म-रसिक विद्याधर जी ने आचार्य रत्न देशभूषण महाराज से ब्रह्मचर्यव्रत धारण किया और अहिंसासत्यार्थी शमदमपरो ज्ञानपथिकः उत्कट ज्ञान-पिपासा के कारण आचार्य-रत्न देश भूषण मलप्पा-श्रीमत्योरजनि जनुषा गौरवकरः। महाराज की अनुमतिपूर्वक जो आचार्य ज्ञानसागर महाराज प्रविद्यो विख्यातः सुरगुरुसमः वीत-वसनः के पास पहुँचकर प्रकृष्ट ज्ञान प्राप्त किया। संसार जन्म, स कुर्यात्कल्याणं भवभयहरो मे गुरुवरः॥ । वृद्धावस्था और मृत्यु के भय को दूर करनेवाले ऐसे 3 24 अग्रस्त 2008 जिनभाषित - Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी मुनि महाराज हमारा कल्याण करें । 6 यशस्वी तेजस्वी सरसिजसमो रागरहितः यथाभानुर्नित्यं तपति सततं ह्युष्णकिरणः । तथैवायं पूज्यस्तपति भवने शुद्धचरणः स कुर्यात्कल्याणं भवभयहरो मे गुरुवरः ॥ अनुवाद - जो यशस्वी, तेजस्वी और कमल के समान नि:स्पृह हैं। जैसे गर्म किरणोंवाला सूर्य निरन्तर तपता है, उसी प्रकार ये पूज्य आचार्य श्री अपने शुद्ध (आगम-सम्मत) आचरण से सम्पूर्ण संसार में तपस्यारत हैं। संसार-जन्म, वृद्धावस्था और मृत्यु के भय को दूर करनेवाले ऐसे आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी मुनि महाराज हमारा कल्याण करें। I 7 प्रकृत्या सौम्यो यो हिमकरसमः शान्तिचषक: सुधीर्वाग्मी शिष्टः शुभगुणधनः शुद्धकरणः । महापीठासीनो बहुगुणनिधिर्लोभरहितः स कुर्यात्कल्याणं भवभयहरो मे गुरुवरः ॥ अनुवाद- जो जन्मजात सौम्य हैं, चन्द्रमा की किरणों की भाँति शीतल हैं, शान्ति - सुधा - रस के पान करनेवाले हैं, उत्कृष्ट कोटि के विद्वान्, वक्ता, शिष्ट प्रशस्त गुणों के धारक एवं निर्दोष चर्यावाले हैं, दिगम्बर जैन - आचार्य के महनीय आसन पर विराजमान हैं, विविध प्रकार के गुणों की निधियाँ जिनके पास हैं, और किसी भी प्रकार का लोभ जिन्हें स्पर्श भी नहीं कर सका है, संसार जन्म, वृद्धावस्था और मृत्यु के भय को दूर करनेवाले ऐसे आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी मुनि महाराज हमारा कल्याण करें । 8 सुविद्यो वागीशो निजगुरुकृतिक्रान्तप्रवणः मुनीशैः संवन्द्यो विदित- महिला मङ्गलकरः । चिरञ्जीव्यादेषां भवभयभृताम् मौलिशिखरः स कुर्यात्कल्याणं भवभयहरो मे गुरुवरः ॥ अनुवाद- जो आचार्य विद्यासागर जी महाराज प्रशस्त विद्याओं में बृहस्पति हैं, जिन्होंने अपनी उत्कृष्ट साधनाचर्या और कृतित्व से अपने परम पूज्य गुरुवर आचार्य ज्ञानसागर मुनि महाराज के कृतित्व को और अधिक उजागर किया है, जो मुनिराजों के द्वारा निरन्तर वन्दनीय हैं, स्व के साथ-साथ विश्व का कल्याण करनेवाले हैं, जिनकी महिमा का गान सर्वत्र हो रहा है और संसार से भयभीत मानवों में मुकुट, शिखर की भाँति सुशोभित हैं, ऐसे आचार्य प्रवर श्री विद्यासागर जी मुनि महाराज हमारा कल्याण करें। 9 (अनुष्टुब् वृत्तम्) विद्यासागर आचार्य:, प्रथितो भुवनत्रये । ससंघाय नमस्तस्मै, नमस्तस्मै नमो नमः ॥ अनुवाद- आचार्य विद्यासागर जी महाराज महान प्रसिद्ध मुनि हैं। उन्हें उनके सम्पूर्ण संघ के साथ सादर नमन है, त्रि-बार नमोऽस्तु । 2. विद्यासिन्ध्वष्टकमिदं भक्त्या भागेन्दुना कृतम् । महापुण्यप्रदं लौकैः प्रपठन् याति सदा सुखम् ॥ अनुवाद - यह 'विद्यासागराष्टक' शीर्षक स्तवन अतिशय भक्तिपूर्वक डॉ० 'भागेन्दु' जैन के द्वारा रचा गया है। यह भव्य स्तवन महान् पुण्यप्रदाता है, इसके पठन-पाठन से धर्म और सुख सुलभ होते हैं। व्याख्या 1. शासितुं योग्यः शिष्यः जो अनुशासन के योग्य पात्र हैं, उन्हें 'शिष्य' कहते हैं । उपनयन संस्कार - विद्या प्राप्ति के लिए विद्यार्थी को आचार्य के पास ले जाना, और आचार्य द्वारा विद्या प्रदान करने के लिए उसे स्वीकार किये जाने की प्रक्रिया को 'उपनयन संस्कार' कहते हैं । आचार्य श्री विद्यासागर जी का चातुर्मास सन्तशिरोमणि परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का ससंघ चातुर्मास इस वर्ष श्री शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर रामटेक (नागपुर महाराष्ट्र) में भव्य समारोह के साथ सम्पन्न हो रहा है। 28, सरोजसदन, सरस्वती कॉलोनी दमोह 470661 (म. प्र. ) अगस्त 2008 जिनभाषित 25 Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा-समाधान पं. रतनलाल बैनाड़ा प्रश्नकर्ता- पं. देवेन्द्रकुमार जी जैन जबलपुर।। एक सैंकड के हजारवें भाग से भी कम कहा है। तथा जिज्ञासा- सप्तम गुणस्थान में आहार-विहार होता | छठे गुणस्थान का काल इससे दुगना कहा है। अब यदि है या नहीं? कोई मुनिराज आहार या विहार कर रहे हों, और उनको समाधान- इस संबंध में पू. आचार्य विद्यासागर | उसमें मुहूर्त से अधिक या कर्ह घंटे का समय लगे, जी महाराज ने अपने प्रवचनों में बहुत बार कहा है कि | तो छठे गुणस्थान के काल के बाद सप्तम गुणस्थान मानना आहार करते समय, जब मुनिराज अंजुलि फैलाते हैं, पड़ेगा, अन्यथा उनके नीचे का कोई गुणस्थान हो जायेगा, तब उनका छठा गुणस्थान होता है और जब अंजुलि | जो आगम तथा युक्ति से सिद्ध नहीं हो सकेगा। में प्राप्त आहार का शोधन करते है, तब सप्तम गुणस्थान | छठे तथा सातवें गुणस्थान की परिभाषा पर दृष्टि होता है। इसी तरह जब आहार को मुख में लेते हैं, | देने से ज्ञात होता है कि इन दोनों गुणस्थानों में मुख्य तब छठा गुणस्थान होता है और जब स्वाद न लेते हुये | अंतर मात्र इतना ही है कि छठे गुणस्थान में संज्वलन चर्वण करते हैं, तब सप्तम गुणस्थान होता है। ऐसा क्यों? | का तीव्र उदय रहता है और सातवें गुणस्थान में मंद क्योंकि उस समय न तो एषणासमिति के लिये कोई | उदय है। इसी कारण विश्राम करते हुये मुनिराज के कार्य हो रहा है और न आहारसंज्ञा ही है, क्योंकि इनका | घड़ी के पैण्डुलम की तरह छठा व सातवाँ गुणस्थान, कार्य तो पहले समाप्त हो चुका है। मुख में रखे हुये | संज्वलन के तीव्र व मंद उदय के अनुसार क्रमशः होते ग्रास को चबाते समय आहार ग्रहण की क्रिया न होने | रहते हैं। कुछ महानुभाव ऐसा मानते हैं कि सप्तम गुणस्थान से आहारसंज्ञा की आवश्यकता भी नहीं है। इसी प्रकार | में मात्र ध्यानावस्था ही होती है, उनका मानना, उपर्युक्त विहार करते समय चार हाथ प्रमाण पृथ्वी देखकर गमन आगम संदर्भो के अनुसार उचित नहीं है। अत: आहार, करते हुये साधु के, पृथ्वी देखते समय तो छठा गुणस्थान । विहार या निद्रा के समय भी मुनिराज के छठा तथा तु अपना पैर आगे रखते समय सप्तम गुणस्थान | सातवाँ गुणस्थान मानना उचित है। होने में कोई बाधा नहीं है, क्योंकि उस समय ईर्यासमिति जिज्ञासा- सातिशय अप्रमत्तगुणस्थान में देवायु का के लिये कोई कार्य नहीं है। बंध होता है या नहीं? धवला पु.१ पृष्ठ ३७५ सूत्र १२६ में इस प्रकार समाधान- उपर्युक्त जिज्ञासा के समाधान से पूर्व कहा है- "परिहारशुद्धिसंयत प्रमत्त और अप्रमत्त इन दो | इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि सप्तम गुणस्थान में गुणस्थानों में होता है।" इसकी टीका में श्री वीरसेन | देवायु का बंध होता है या नहीं? इस प्रकरण पर कर्मस्वामी ने कहा है- "गमनागमन आदि क्रियाओं में प्रवृत्ति | काण्ड गाथा ९८ में इस प्रकार कहा हैकरनेवाला ही परिहार कर सकता है, प्रवृत्ति नहीं करनेवाला छटे अथिरं असुहं असादमनसं च अरदिसोगं च नहीं। इसलिये ऊपर के आठवें आदि गुणस्थानों में। अपमत्ते देवाऊ णिवणं चेव अस्थित्ति॥ ९८॥ परिहारशुद्धिसंयम नहीं बन सकता। यद्यपि आठवें आदि अर्थ- छठे गुणस्थान में अस्थिर, अशुभ, परिहार ऋद्धि पाई जाती है, परन्तु वहाँ पर | असातावेदनीय, अयशस्कीर्ति, अरति और शोक इन छह परिहार करने रूप उसका कार्य नहीं पाया जाता है, अतः | प्रकृतियों की बंधव्युच्छित्ति होती है। तथा अप्रमत्त गुणस्थान आठवें आदि गुणस्थानों में परिहारशुद्धिसंयम का अभाव | में एक देवायु के बंधनिष्ठापन की व्युच्छित्ति होती है। कहा गया है" इस प्रसंग से स्पष्ट है कि सप्तम गुणस्थान तात्पर्य है कि यदि कोई मुनिराज छठे गुणस्थान में विहार होने से ही परिहारशुद्धिसंयम कहा गया है। में देवायु का बंध प्रारंभ कर चुके हों, तो वे सप्तम छठे तथा सातवें गुणस्थान का काल निकालते हुये | गुणस्थान में भी देवायु का बंध कर सकते हैं, परंतु पं. रतनचन्द्र जी मुख्तार ने सप्तमगुण स्थान का काल | सप्तम गुणस्थान में देवायु के बंध का प्रारंभ नहीं कर (धवला पु.६, पृष्ठ ३३५ से ३४२ तक के आधार से) | सकते। इसी दृष्टि से सप्तम गुणस्थान में देवायु के निष्ठापन 26 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ की व्युच्छित्ति कही गई है। सप्तम से आगे के गुणस्थानों । शुद्धिव्रत पालन के लिये १२३४ उपवास किये जाते हैं। में आयुबंध कोई भी नहीं होता । इसी उद्देश्य से चारित्रशुद्धि विधान में १४ व्रतों का पूजन तथा १२३४ अर्घ होते हैं। वे १२३४ दोष इस प्रकार हैं अब प्रश्न है कि सातिशय अप्रमत्त में देवायु का बंध होता है या नहीं ? इस संबंध में कोई आगमप्रमाण मेरी दृष्टि में नहीं आया। इतना अवश्य है कि इसी गाथा का भावार्थ लिखते हुये पं. मनोहर लाल जी सिद्धांत शास्त्री ने लिखा है कि सातिशय अप्रमत्त में देवायु का बंध नहीं होता है। यदि किन्हीं पाठक महानुभाव को कोई आगम प्रमाण ज्ञात हो, तो कृपया अवश्य मुझे लिखने का कष्ट करें। प्रश्नकर्त्ता - सौ. कमलाबाई ललितपुर जिज्ञासा- क्या चा.च. आ. शांतिसागर जी महाराज स्त्री- अभिषेक के समर्थक थे? समाधान- चा.च. आ. शांतिसागर जी महाराज के दर्जनों जीवनचरित्र अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। उनमें अति प्राचीन जीवनचरित्र 'आचार्य श्री शांतिसागर महामुनि का चरित्र' मुझे प्राप्त हुआ है। यह जीवनचरित्र सखाराम नेमचंद जैन ग्रंथमाला, जिसके ट्रस्टी श्री पार्श्वनाथ दि. जैनमंदिर ट्रस्ट, २०४ - २०५ कालवादेवी, मुंबई थे, उनके द्वारा सन् १९३२ में प्रकाशित किया गया था। इसके लेखक भी सुप्रसिद्ध विद्वान् स्व. श्री पं. वंशीधर शास्त्री सोलापुर थे । इस चारित्र के पृष्ठ १३६ पर इस प्रकार लिखा है" संघ शाहपुर चैत्र शु. १ बुधवार संवत् १९८६ के दिन आया। यह सागर जिले का गाँव है। जैन-जैनेतर = ९० | सभी की तरफ से स्वागत हुआ। प्रश्नोत्तरों में एक प्रश्न आचार्य महाराज के सामने यह आया कि स्त्री जिनमूर्ति का अभिषेक करे या नहीं? आचार्य महाराज ने उसका निषेध किया ।" कृपया उपर्युक्त प्रकरण पढ़कर निर्णय करें। यदि आप पत्र लिखेंगी, तो आपको फोटो कापी भेज दी जायेगी। प्रश्नकर्त्ता - श्रीमती पदमकुमार जी सौगानी आगरा । जिज्ञासा- चारित्रशुद्धि के १२३४ व्रत करने का क्या तात्पर्य है? समाधान- मुनिराज पाँच महाव्रत, पाँच समिति तथा तीन गुप्ति रूप तेरह प्रकार के चारित्र के धारी होते हैं। इस तेरह प्रकार के चारित्र में प्रमादवश दोष लगा करते हैं। जब तक उन दोषों का निवारण न किया जाय, तब तक चारित्र शुद्ध नहीं होता। वे दोष १२३४ होते हैं। इन दोषों को निवारण करने की भावना से चारित्र १. अहिंसामहाव्रत - चौदह जीवसमास की दया में, मन, वचन, काय तथा कृत- कारित अनुमोदना, इन नव कोटि से दोष लगना = १४९ =१२६ २. सत्यमहाव्रत - सत्य के आठ दोष (भिक्षा, स्वपक्षग्रहण, परपक्षनिवारण, चुगली, क्रोध, लोभ, आत्मप्रशंसा, परनिंदा) = ८ × ९ नवकोटि ७२ । ३. अयौर्यमहाव्रत - ग्राम, जंगल, खलिहान, एकांत, गुफा, कोटर आदि परिग्रह, विना आज्ञा वस्तुग्रहण, बलप्रयोग द्वारा वस्तुग्रहण = ८x९ ७२ । ४. ब्रह्मचर्यमहाव्रत- देवी, मनुष्यनी, तिर्यंचनी, पुतली =४ x पांच इन्द्रियाँ x नवकोटि १८० । ५. परिग्रहत्याग - महाव्रत- अंतरंगपरिग्रह १४ + बाह्यपरिग्रह १० २४ नवकोटि २१६ । ६. रात्रिभोजनत्यागव्रत- नवकोटि से अनिच्छापूर्वक + = = =१० । २७ । ७. तीन गुप्ति- ३ गुप्ति x नवकोटि ८. समिति में- ईर्या, आदान-निक्षेपण, प्रतिष्ठापना ३×९ (नवकोटि) =२७। ९. भाषासमिति - सत्य के १० भेद x नव कोटि = = १०. एषणा समिति - ४६ दोष x नवकोटि = ४१४ । कुलयोग ( समस्त दोष) १२३४ । जिज्ञासा - निद्रा के समय सातावेदनीय का उदय रहता है या असाता का ? = समाधान- उपर्युक्त जिज्ञासा के समाधान में राजवार्तिक अ. ८/ ७ के नौवें वार्तिक में अकलंक स्वामी ने इस प्रकार कहा है " निद्राकर्म और सातावेदनीय कर्म के उदय से निद्रापरिणाम की सिद्धि होती है। अर्थात् निद्रादर्शनावरण और सातावेदनीय इन दोनों कर्मों के उदय से निद्रा आती है । निद्रा के समय शोक, थकावट, श्रम आदि का नाश देखा जाता है, अतः साताकर्म का उदय तो स्पष्ट ही है और असाता वेदनीय का भी उस समय मंद उदय रहता है ऐसा जानना चाहिये । " प्रश्नकर्त्ता - श्री एस. बी. काले औरंगाबाद अगस्त 2008 जिनभाषित 27 Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा- तैजस शरीर की उत्कृष्ट स्थिति ६६ | तैजस वर्गणाओं को ग्रहण करता है, उनमें से कोई वर्गणायें सागर से क्या तात्पर्य है? तो अगले समय में ही खिर सकती हैं और कोई वर्गणा समाधान- श्री धवला पु. १४ पृष्ठ २४६-२४८ | यदि उत्कृष्ट काल तक रहे, तो ६६ सागर तक शरीरपर पाँचों शरीरों से बद्ध निषेकों का उत्कृष्ट व जघन्य | बद्ध होकर रहती है। ६६ सागर से अधिक काल में, सत्ताकाल दिया गया है। वहाँ कहा गया है कि तैजस- | कोई भी वर्गणा शरीर वद्ध होकर नहीं रह सकती है। शरीर-बद्धवर्गणाओं का उत्कृष्ट काल ६६ सागर तथा | इस प्रकार तैजस शरीर की उत्कृष्ट स्थिति ६६ सागर जघन्य काल-१ समय है। बनती है। इसका तात्पर्य है कि एक समय में जीव जितनी १/२०५, प्रोफेसर्स कॉलोनी, आगरा (उ.प्र.) वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र ग्रहण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करता है। श्रीमद्भगवद्गीता क्षमा क्षमा के विषय में कहा गया है-'सत्यपि प्रतिकारसामर्थ्येऽपकारसहनं क्षमा' प्रतिकार करने की सामर्थ्य होते हुए भी दूसरों के अपकार को सहन करना वास्तविक क्षमा है। उदारदृष्टि और सकारात्मक सोचवाले व्यक्ति ही इसे धारण कर सकते हैं। सत्ता, शक्ति और प्रभुता से सम्पन्न होने के बाद भी अपने अपकारी के प्रति क्षमाभाव बनाये रखना महात्मा का लक्षण है। छोटी-छोटी बातों में उद्विग्न और विचलित होना उथली मानसिकता की पहिचान है। सच्चे साधक विषमतम परिस्थितियों में भी उद्विग्न नहीं होते। उनकी समता खण्डित नहीं होती वे हर परिस्थिति में समता और क्षमा की प्रतिमूर्ति बने रहते हैं। एक साधु नाव पर यात्रा कर रहे थे। नाव पर कुछ युवक भी सवार थे। युवकों को मजाक सूझा। उन्होंने साधु महाराज की हँसी उड़ाना शुरू कर दी। साधु सच्चे साधु थे। उन्होंने अपनी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं की। युवकों ने साधु की समता को उनकी कमजोरी समझा, वे एकदम उद्दण्डता पर उतर आये। पर साधु महाराज पूर्णतः अविचलित रहे। सन्त कहते हैं- साधुओं का स्वभाव चन्दन की भाँति होता है, जो जलाये जाने पर भी सुगन्ध प्रदान करता है। एक युवक ने साधु महाराज को नदी में ढकेलना चाहा कि तभी जल देवता प्रकट हो गये। जल देवता ने साधु महाराज से निवेदन करते हुए कहा- 'महाराज! इन दुष्टों ने आपके साथ दुर्व्यवहार किया है, मैं अभी नाव पलट कर सभी को सबक सिखाता हूँ। सन्त ने देवता को रोकते हुए कहा'नहीं नहीं, ऐसा मत करो, नाव पलटने से क्या होगा? पलटना ही है तो इनकी बुद्धि पलट दो।' सन्त की वाणी सुनकर सारे युवक पानी-पानी हो गये। सभी उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगे। यह है आदर्श क्षमा। कुरल काव्य में ठीक ही कहा है- 'घमण्ड में चूर होकर जिन्होंने तुम्हें हानि पहुँचायी है, तुम उन्हें क्षमा व्यवहार से जीत लो।' 'धर्म जीवन का आधार' (मुनि श्री प्रमाणसागर जी) से साभार 28 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्रन्थ-समीक्षा चिन्तामणि - त्रय - समीक्षा समीक्ष्य कृति का नाम पं० लालचन्द्र जैन 'राकेश' 'चिन्तामणि' त्रय समीक्षा, लेखक - डॉ. अनिलकुमार जैन, निर्देशन एवं सम्पादक- प्रोफेसर डॉ. भागचन्द्र जैन 'भागेन्दु', प्रकाशक - डॉ. शीतलचन्द्र जैन, मानद मंत्री, वीर सेवा मंदिर ट्रस्ट, 81/ 94, नीलगिरी मार्ग, मानसरोवर, जयपुर (राजस्थान), मूल्य- 125/-, समीक्षकधर्मदिवाकर पं. लालचन्द्र जैन 'राकेश' अध्यात्म और दर्शन के रचयिता के मूल भावों को अपनी सहज-सरल भाषा से सर्वग्राह्य बना दिया है। चतुर्थ अध्याय में चिन्तामणि त्रयों का साहित्यिक अनुशीलन प्रस्तुत किया है। जिसमें ग्रन्थ का उद्देश्य नामकरण, भावपक्ष ( रस, रीति, गुण) एवं कलापक्ष ( अलंकार, छन्द, भाषा) पर प्रकाश डाला गया है। चतुर्थ अध्याय में चिन्तामणि -त्रयों का पृथक्-पृथक् दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत किया है। सम्यक्त्व - चिन्तामणि के दार्शनिक अनुशीलन के अन्तर्गत सम्यग्दर्शन का लक्षण, सम्यग्दर्शन की सम्प्राप्ति, सम्यग्दर्शन के अंग, सम्यग्दर्शन के भेद, सम्यग्दर्शन का महत्त्व, इसके अतिरिक्त सात तत्त्व, नौ पदार्थ, षड्द्रव्य गुणस्थान, पर्याय, प्राण, संज्ञा, मार्गणा, गति, कषाय, लेश्या, समुद्घात, गुण, पदार्थ, मिध्यात्व, कर्म, युक्ति तथा परीषहों का विवेचन किया है। शोधकर्त्ता का वेशिष्ठ्य यह है कि उसने पण्डित जी द्वारा प्रणीत ग्रन्थ का आश्रय तो लिया ही है साथ ही रत्नकरण्ड श्रावकाचार, गोम्मटसार (जीवकाण्ड) आदि प्राचीन एवं अतिप्रसिद्ध ग्रन्थों का भी आश्रय लेकर रचना को अधिक उपयोगी बना दिया है । सम्यग्ज्ञान चिन्तामणि की विषयवस्तु की विवचेना के अन्तर्गत शोधार्थी ने सम्यग्ज्ञान, सम्यग्ज्ञान भेद, नवध्यान तथा, द्वादशांग का वर्णन किया है। विषय को सर्वोपयोगी एवं सर्वग्राह्य बनाने के लिए प्राचीन ग्रन्थों का सहारा लेकर प्रतिपाद्य विषय का समीक्षात्मक एवं तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। फलतः इस अध्याय में प्राचीन भाषा शास्त्र, दर्शन, साहित्य, इतिहास और संस्कृति के विविध पक्ष उजागर हुए हैं। अनथक शोधकर्ता श्री अनिलकुमार जैन ने पण्डित जी के सम्पूर्ण साहित्य का आलोढ़न कर इस शोधग्रन्थ का प्रणयन किया है। शोधकर्ता ने समीक्ष्य कृतियों के विषय को ६ अध्यायों में विभाजित कर विवेचना की है। प्रथम एवं द्वितीय अध्याय में पण्डित जी के व्यक्तित्व, कृतित्व, वैदुष्य एवं जीवनवृत्त का चित्रण है, जो उनकी गुण- गरिमा के अनुकूल बन पड़ा है। शोधकर्ता सम्यक्चारित्र-चिन्तामणि के विवेचन के अन्तर्गत सम्यक्चारित्र का स्वरूप, सम्यक्चारित्र की सम्प्राप्ति, सम्यक् चारित्र के भेद, पंचमहाव्रत, पंचसमिति, षट् आवश्यक, ने तृतीय अध्याय में चिन्तामणि त्रयों के प्रतिपाद्य विषय । इन्द्रियजय, सप्तअन्यगुण, द्वादश अनुप्रेक्षा, अणुव्रत, गुणव्रत, अगस्त 2008 जिनभाषित 29 समीक्ष्य कृति 'चिन्तामणि' - त्रय समीक्षा श्रद्धेय साहित्याचार्य डॉ. पन्नालाल जी जैन सागर द्वारा विरचित 'सम्यक्त्व चिन्तामणि', 'सम्यग्ज्ञान- चिन्तामणि' एवं ' सम्यक्त्व चारित्र'-चिन्तामणि इन कालजयी त्रय कृतियों का समीक्षात्मक अध्ययन है। इसके प्रणेता है डॉ. श्री अनिलकुमार जैन। यह एक शोध-प्रबन्ध है जो स्नातकोत्तर शासकीय महाविद्यालय, दमोह के ( तत्कालीन) विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. भागचन्द्र जैन ' भागेन्दु' के समर्थ निर्देशन में डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने हेतु तैयार किया गया था । इस शोध प्रबन्ध को डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर ने उत्कृष्ट, मौलिक शोधकार्य स्वीकार कर श्री अनिलकुमार जैन को पी-एच.डी. की उपाधि से अलंकृत किया । डॉ. पं. पन्नालाल जी 'बसंत' सागर नव-नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा से सम्पन्न बहुश्रुत - व्रती विद्वान् थे । आपने संस्कृत - प्राकृत जैन ग्रन्थों के सम्पादन, अनुवादन, टीका एवं स्वतन्त्र लेखन में अग्रगामी रहकर ऐतिहासिक कार्य किया है। सम्यक्त्व-चिन्तामणि, सम्यक्त्व चिन्तामणि, सम्यक्त्व चारित्र चिन्तामणि (चिन्तामणि -त्रय) उन्हीं विद्वत्रन की रचनाएँ हैं। जिनमें कुल मिलाकर ७७२ पृष्ठ व ३६८५ पद्य हैं, एवं लगभग ३० प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया गया है। Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शिक्षाव्रत, सल्लेखना एवं ग्यारह प्रतिमाओं का सांगोपांग। मुझे विश्वास हे कि शोधकर्ता के इस अध्यावसाय विवेचन किया गया है। शोधार्थी ने सर्वत्र अभिव्यक्ति से समाज एवं राष्ट्र को अपनी साहित्यिक, सांस्कृतिक को प्राथम्य देकर ग्रन्थ को सर्वोपयोगी बनाने में कोई | एवं चारित्रिक गरिमा का बोध हो सकेगा तथा श्रद्धेय कोर-कसर नहीं छोड़ी है। डॉ. पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य जी के चिन्तन को षष्ठ अध्याय में चिन्तमणि त्रय का वैशिष्ठ्य प्रदेय भारतीय काव्य परम्परा में अग्रगण्य स्थान प्राप्त होगा। एवं मूल्यांकन कर कृतियों की उपादेयता पर कलशारोहण मैं अन्त में डॉ. श्री अनिलकुमार जी को साधुवाद कर दिया है। देता हूँ कि जिन्होंने मोक्षमार्ग में कल्याणकारी रत्नत्रय इस शोध प्रबन्ध का आद्योपान्त अनुशीलनकर यह | पर प्रणीत ग्रन्थों पर शोधकार्य कर उन्हें सरल शब्दों पाया कि इसमें अधुनातन शोध-प्रविधि एवं समीक्षा- में परिभाषित कर सर्वकल्याणकारी बना दिया है। निश्चत सिद्धान्तों के मानकों को आधार बनाया गया है, तथा ही डॉ. श्री भागचन्द्र जी 'भागेन्दु' के कुशल निर्देशन विषय के समीचीन प्रतिपादन एवं समीक्षात्मक अध्ययन- | ने इस शोध प्रबन्ध में चार चाँद लगा दिये हैं। मैं उन्हें अनुशीलन हेतु अधिकाधिक साहित्यिक, ऐतिहासिक, | भी हार्दिक धन्यवाद देता हूँ। सांस्कृतिक दार्शनिक, धार्मिक तथा खोजपूर्ण ग्रन्थों का शोध प्रबन्ध के अन्त में पारिभाषिक शब्दकोष भरपूर उपयोग किया गया है। डॉ. पं. पन्नालाल जी | देकर कृति को समझने एवं जैन सिद्धान्तों के द्वार तक आधुनिक संस्कृत के कवियों, साहित्यकारों तथा टीकाकारों | पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करना प्रशंसनीय है। में महत्त्वपूर्ण एवं शीर्षस्थान रखते हैं, यह तथ्य शोध | से. नि. प्राचार्य, नेहा चौक, गली नं. 4, प्रबन्ध से सुस्पष्ट हो जाता है। गंजबासौदा (विदिशा) म.प्र. क्या भूलें क्या याद रखें ? मीनाक्षी जैन छोटे भाई की कन्या का विवाह था। बड़े भाई वर्षों पहले छोटे भाई द्वारा कहे गए कुछ अपमानजनक शब्दों को लेकर उस विवाह में शामिल नहीं हो रहे थे। छोटा भाई अनुनय विनय करते हुए हार गया। क्या करें, क्या न करें की स्थिति आ गई। ऐसे में किसी मित्र ने सुझाया कि बड़े भाई जैनसंत के पास नित्य सत्संग को जाया करते थे, उनसे मिलें। संत ने छोटे भाई के पश्चात्ताप व क्षमायाचना की पूर्ण बात सुनी। दूसरे दिन उन्होंने बड़े को छोटे की कन्या के विवाह में शामिल होने की बात कही। बड़े भाई ने तुरंत छोटे भाई के पूर्वाचरण की बात बताते हुए मना कर दिया। इस पर संत ने पूछा- 'बताओ गत रविवार को मैंने क्या उपदेश दिया था?' 'याद नहीं आ रहा, महाराज।' 'प्रयास करो।' बहुत प्रयास करने पर भी उनको ठीक से याद नहीं आया। इस पर संत ने कहा- 'जब गत रविवार के वचन तुम्हें याद नहीं, तो वर्षों पूर्व कहे कटुवचन तुम्हारे हृदय को कैसे वेध रहे हैं? अच्छी बातें याद नहीं रख सकते, तो बुरी को तो बिसार दो।' संत की बात सुनकर बड़े भाई को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने विवाह का प्रबंध अपने जिम्मे लिया। आइए हम भी कटु वचनों को भूल जाने की दुआ करें और सुखद यादों को याद करें। मधुरिमा, 'दैनिक भास्कर' 2 जुलाई 2008, से साभार 30 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र पटनागंज ( रहली), सागर म.प्र. बुन्देलखण्ड (मध्यप्रदेश) के सागर जिलान्तर्गत | अतिशयों से युक्त इस प्राचीन क्षेत्र पर विराजित भगवान् रहली तहसील मुख्यालय में 1000 वर्ष से भी अधिक | पार्श्वनाथ जी की एक हजार आठ सर्पफणों से युक्त प्राचीन 'श्री दिगम्बर जैन अतिशयकारी तीर्थक्षेत्र पटनागंज' | संसार की सबसे विशाल सहस्रफणी प्रतिमाएँ सैकड़ों में विशाल क्षेत्र स्थित है। स्वर्णभद्र नदी के सुरम्य तट | सालों से, क्षेत्र को सुशोभित कर रही हैं। इन प्रतिमाओं पर एक ही परकोटे में अतिप्राचीन और अतिशयकारी | के फणों की अद्भुत कलात्मक संरचना को देखकर 30 गगनचुम्बी जिनालयों की लम्बी श्रृंखला है। इतने | दर्शनार्थी मुक्तहृदय से सराहना किये बिना नहीं रहते। प्राचीन इस क्षेत्र और क्षेत्र पर विराजमान प्रतिमाओं का बड़े बाबा : भगवान् महावीर स्वामी- अतिशय क्षेत्र अतिशय आज भी विद्यमान है। पटनागंज के बड़े बाबा के रूप में विख्यात भगवान् महावीर मुगल शासक औरंगजेब के समय किये गये बर्बर | स्वामी की पद्मासन मुद्रा में, भारत की सबसे विशाल अत्याचार के बाद भी सुरक्षित रहे। मधुमक्खियों के हमलों अतिशयकारी अतिप्राचीन प्रतिमा विराजमान है। से मुगलसेना परास्त हुई थी। खास बात यह है कि प्रतिष्ठित स्थल पर ही महान् संत न्यायाचार्य परम श्रद्धेय क्षुल्लक श्री गणेश | विशाल चट्टान में आसन सहित विशालकाय प्रतिमा प्रसाद जी वर्णी सन् 1944 में जब रहली क्षेत्र पधारे, | उत्र्कीण होने पर, जब इसे अन्यत्र ले जाना संभव नहीं तो अतिशय क्षेत्र पटनागंज के हालात पर हतप्रभ रह | | हो सका, तो इसी स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण गये। उन्होंने पटनागंज के जीर्णोद्धार का ऐसा दृढ़ निश्चय | किया गया, जो कि सदियों से अपनी अतिशययुक्त किया कि उन्होंने अन्न जल का पूर्णतः त्याग कर दिया | विशेषताओं के कारण आस्था का केन्द्रबिन्दु है। और तीसरे दिवस जीर्णोद्धार कार्य प्रारंभ हुआ। । भारत की सबसे विशाल भगवान् महावीर स्वामी इस तरह अपने समय में चरमोत्कर्ष और उत्कृष्ट | जी की 13 फुट उत्तुंग पद्मासन प्राचीन प्रतिमा के दर्शन भगवान् महावीर स्वामी की विशाल प्रतिमा और सहस्रफणी | कर धर्मावलम्बी श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कर, पार्श्वनाथ जी की अनूठी प्रतिमा जी सहित संपूर्ण क्षेत्र | सदियों से अपने जीवन को धन्य करते आ रहे हैं। का अतिशयपूर्ण दर्शन एक बार फिर वर्णी जी के निमित्त भगवान् मुनिसुव्रतनाथ जी- एक ही परकोटे में एक से सुरम्य और सुलभ बन सका। साथ 30 भव्य जिन मंदिरों में प्रतिष्ठित, अतिशयकारी क्षेत्र के प्रमुख आकर्षण प्रतिमाओं के समूह में एक और अद्वितीय प्रतिमा सहस्रकूट चैत्यालय- बेमिसाल और अनूठी रचनाओं | उल्लेखनीय है। में दुनिया का सबसे बड़ा सहस्रकूट चैत्यालय भी कलाकृति __ भगवान् मुनिसुव्रतनाथ जी की अत्यंत मनोज्ञ का अद्भुत नमूना है। इस 9 फुट ऊँचे अति प्राचीन पद्मासन प्रतिमा, जो कि कत्थई वर्ण में है, अपने आप सहस्रकूट चैत्यालय में 32 फुट की गोलाई में खड्गासन | में अनूठी प्रतिमा है। और पद्मासन मुद्रा में उत्कीर्ण एक हजार आठ अरहंत इसी मंदिर में 3/2 फुट उत्तुंग मूंगावर्ण की भगवान् प्रतिमाओं के एक साथ दर्शन भी दर्शनार्थियों को क्षेत्र | शांतिनाथ जी की अलौकिक, मनोहारी, प्राचीन प्रतिमा पर बार-बार आने को प्रेरित करते हैं। विराजित है। साथ ही भगवान् आदिनाथ जी की दसवीं त्रिमूर्ति जिनालय- असि, मसि, कृषि, शिल्प, कला | शताब्दी की दो प्रतिमाएँ इसी मंदिर में एवं एक प्रतिमा और वाणिज्य के प्रणेता प्रथम तीर्थंकर भगवान् आदिनाथ | अन्य वेदी पर विराजमान है। जी, कीचड़ में कमल की तरह संसार में रहते हुये भी, नंदीश्वरद्वीप, पंचमेरु एवं समवशण- महान् जैन निर्लिप्त साधक भगवान् भरत जी, एक हजार वर्षों तक | संस्कृति के गौरवशाली अतीत के साक्षी अतिप्राचीन अविचल तपस्या कर प्रथम तीर्थंकर से भी पहले मोक्ष | नंदीश्वर द्वीप, पंचमेरु जिनालय के साथ ही समवशरण पधारे, भगवान् बाहुबली जी की अतिमनोज्ञ प्रतिमाएँ त्रिमूर्ति | की रचना भी भारत की पुरातन कला से परिचित कराती जिनालय में विराजमान हैं। सहस्रफणी पार्श्वनाथ जी- चंदनवृष्टि आदि अनेक 'क्षेत्र द्वारा प्रकाशित परिचय' से साभार - अगस्त 2008 जिनभाषित 31 Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ समाचार पर्युषण पर्व हेतु आमंत्रण शीघ्र भेजें । के पावन पुनीत अवसर पर प्रवचन हेतु गुरुकुल के श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, जैन नसियाँ | विद्वान् विभिन्न क्षेत्रों में धर्म की महती प्रभावना के उद्देश्य रोड, वीरोदय नगर, सांगानेर, जयपुर से श्रमण संस्कृति | से समाज के मध्य भेजे जा रहे हैं, जो कि न सिर्फ के पोषक, कुशल वक्ता, आर्षमार्गीय विद्वान् विगत बारह | अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज में जागृति फैलाते वर्षों से जैनधर्म की प्रभावना करने लिए देश-विदेश के | हैं, बल्कि जैनधर्म के सिद्धान्तों एवं सामाजिक मूल्यों विभिन्न स्थानों में आमंत्रण पर जाते हैं। इस वर्ष यह | को भी अपनी अद्भुत प्रतिभा के माध्यम से घर-घर पर्व दिनांक 4.9.2008 से 14.9.2008 तक समस्त जैन | तक पहुँचाते हैं। अतः आप भी अपने समाज में फैल धर्मानुयायी बन्धुओं द्वारा हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जायेगा। रही कुरुतियों को दूर करने तथा संस्कृति, सभ्यता, संस्कार इस अवसर पर विधि-विधान एवं प्रवचनार्थ विद्वान को फैलाने हेतु शीघ्रतिशीघ्र इन मनीषी विद्वानों को आमंत्रण हेतु अपना आमंत्रण पत्र यथाशीघ्र संस्थान कार्यालय | पर्युषणपर्व में प्रवचनार्थ आमंत्रित करें। में अवश्य प्रेषित करें, जिससे समय रहते समुचित व्यवस्था सम्पर्क सूत्र- श्री शैलेन्द्र जैन शास्त्री' 09441858600, की जा सके। श्री संजय जैन 'शास्त्री' 09948693150 सम्पर्क सूत्र- पं० सौरभ जैन, व्याख्याता, पं० वीरेन्द्र श्री पारसनाथ दिगम्बर जैन गुरुकुल, 15-2-262, जैन, परीक्षा प्रभारी, श्री खं. दिग. जैन भवन, महाराजगंज, हैदराबाद-12 श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, जैन नसियाँ ___(आ.प्र.) फोन : 040-24651825, 65586295 रोड, वीरोदय नगर, सांगानेर, जयपुर (राज.) पर्दूषण आदि पावन अवसरों पर विद्वान हेतु . फोन : 0141-3241222, 2730552 सम्पर्क करें मो. 9887116697, 9414765331, 9785344265 जैसा कि आप सभी को विदित है कि श्री १००८ डॉ. शीतलचन्द्र जैन जम्बूस्वामी दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र चौरासी, मथुरा में ११ जैनदर्शन के अध्ययन-अनुसंधान हेतु आर्थिक | जुलाई २००१ में स्थापित श्रमण ज्ञान भारती संस्थान जैन सहयोग धर्म की शिक्षा देकर विद्वानों को तैयार कर रहा है। जो भी सज्जन (छात्र-छात्रा/व्रती-संयमी/साधु-साध्वी) | इस संस्थान द्वारा प्रशिक्षित एवं सुयोग्य विद्वान आपके किसी भी विश्वविद्यालय में, किन्तु जैनदर्शन विषय से | नगर एवं गाँव में पर्युषण पर्व एवं अष्टान्हिका पर्व आदि शास्त्री, आचार्य, पी.एच.डी. के लिए अध्ययन-अनुसंधान | पावन अवसरों पर प्रवचन एवं विधि-विधान हेतु उपलब्ध करना चाहते हैं, किन्तु उसके लिए धन का अभाव अनुभव | हैं। विद्वान् आमंत्रित करने हेतु निम्न पते पर सम्पर्क करें। करते हैं, वे अब निम्नलिखित पते पर सम्पर्क कर आर्थिक सम्पर्क सूत्र सहयोग प्राप्त कर सकते हैं। प्रार्थना-पत्र के साथ उन्हें निरंजनलाल बैनाडा जिनेन्द्र शास्त्री अपना सम्पूर्ण व्यय विवरण भी विस्तृतरूप से भेजना | 'अधिष्ठाता' 'अधीक्षक' होगा। १/२०५, प्रोफेसर कॉलोनी श्रमण ज्ञान भारती अध्यक्ष | आगरा (उत्तरप्रदेश) जैन चौरासी सिद्धक्षेत्र श्रीमती कमला जैन चैरिटेबल ट्रस्ट | मो. ०९९२७०९१९७० कृष्णानगर, मथुरा बी-38, ग्रीनपार्क मेन, नई दिल्ली-16 मो. ०९४१२६२६५२४, पर्युषण महापर्व के लिए विद्वान् उपलबध ९४११९६६७३५ विदित हो कि श्री पारसनाथ दिगम्बर जैन गुरुकुल, ९४५६४४९१८४, ०५६५-२४२०३२३ हैदराबाद से प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी पर्युषण महापर्व 32 अग्रस्त 2008 जिनभाषित Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मुनि श्री क्षमासागर जी की कविताएँ विश्वास मैंने पूछा चिड़िया से कि आकाश असीम है क्या तुम्हे अपने खो जाने का भय नहीं लगता? चिड़िया कहती है कि वह अपने घर लौटना जानती है। बारिश चिड़िया भीग जाती है जब बारिश आती है नदी भर जाती है जब बारिश आती है धरती गीली हो जाती है जब बारिश आती है पर बहुत मुश्किल है इस तरह आदमी का भीगना और भर पाना आदमी के पास बचने के उपाय हैं न! रीतापन चिड़िया आयी उसके करीब एक चिड़िया और आयी चहचहायी सारा आकाश भर गया चिड़िया की चहचहाहट से जीवन का रीतापन भर नहीं पाया आदमी परस्पर मधुर संवाद से। अकिंचन देने के लिए मेरे पास क्या है सिवाय इस अहसास के सिवाय इस अहसास के कि कोई खाली हाथ लौट न जाए। कर्मो का भंजन करते हैं। प र Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ UPHIN/2006/16750 मुनि श्रीयोगसागरजी की कविताएँ 0 रोष दोषों का कोष दोषों का कोष है, रोष जिसके जोश में होश खो जाता है जिसके मद होश में खरगोश सा दौड़ने लगता है पर जहाँ सन्तोष है वहाँ रोष का शोषन होता है रोष भी रोशन बन जीवन का एक आभूषण बनता है अन्त में देशभूषण बनता है कपट की लपट दिल है जिसका साफ वहाँ छलकता है इन्साफ पर जहाँ कपट की लपट से संतप्त है जिसका दिल वहाँ तो उगलता है दिनरात अभिशाप भगवच्चरण में नमन जिन्हें भगवत् चरण के नमन में न मन है क्या उनके जीवन के चमन में सुमन खिल सकते हैं? क्या उनके मन का दमन कर्मों का वमन और कषायों का उपशमन संभव है? तथा क्या वे अपने स्वरूप में रमन-मगन और निमग्न हो सकते हैं? कर्मों का भंजन भो राजन् ये स्वजन, पुरुजन और विविध भोजन व्यंजनों में रंजन होना ही कर्मों का सृजन है वे सज्जन/महाजन हैं अंजन का मंजन नित विजन में निरंजन के भजन में गुंजन के साथ कर्मो का भंजन करते हैं। स्वामी, प्रकाशक एवं मुद्रक : रतनलाल बैनाड़ा द्वारा एकलव्य ऑफसेट सहकारी मुद्रणालय संस्था मर्यादित, 210, जोन-1, एम.पी. नगर, भोपाल (म.प्र.) से मुद्रित एवं 1/205 प्रोफेसर कॉलोनी, आगरा-282002 (उ.प्र.) से प्रकाशित। संपादक : रतनचन्द्र जैन।