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जिनभाषित
वीर निर्वाण सं. 2528
श्री दिगम्बर जैन रेवातट सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर (म.प्र.) में निर्माणाधीन पंच बालयति एवं त्रिकाल चौबीसी जिनालय का प्रतिरूप
भाद्रपद, वि. सं. 2057
सितम्बर 2002
Jain Edulation International
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गुरुदेव विद्यासागर
डॉ. वन्दना जैन
विद्या का ही सागर है
कैलाश मड़वैया
गगन का हर सितारा अब तुम्हारे गीत गायेगा। प्रभंजन देखकर साहस तुम्हारा, ठहर जायेगा।
सरोवर की इसी माटी में, तुमने जन्म पाया है। नये अंकुर सरीखा पथ, तुम्हें बचपन से भाया है। तुम्हारे मान और सम्मान पर जग झूम जायेगा। गगन का हर सितारा अब तुम्हारे गीत गायेगा।
विद्या का ही सागर है या सागर की ही विद्या ये, हाड़ मांस देह बीच ज्ञान-गीत-गागर है। सम्यक् ज्ञान, सम्यक दृष्टि, सम्यक् चारित्र युक्त, बीसवीं सदी का आश्चर्य ये उजागर है। ज्ञान औ चरित्र जैसे पा गये शरीर एक और इस शरीर में समाया धर्म आगर है। सूरज की धूप और चन्द्रमा का रूप लिये, तीर्थंकर सा धरती पै आज विद्यासागर है।
लिया संकल्प मुक्ति मार्ग पर चलने की बेला में। पवन भी हो गया गतिहीन, उस अचरज की बेला में। विजय का पथ ये साहस की निशानी देख पायेगा। गगन का हर सितारा अब तुम्हारे गीत गायेगा।
तुम्हारा देखकर तप त्याग, पूर्वज मुस्कराते हैं। गगन से कुंदकुंदाचार्य जी कुंदन लुटाते हैं। उन्हीं सा यश तुम्हारा, इस धरा पर फैल जायेगा। गगन का हर सितारा अब तुम्हारे गीत गायेगा।
ज्ञान की पिपासा जिसे देख और और बढ़े, ज्ञान मुक्ताओं में ये हीरा है-जवाहर है। जिज्ञासा की हरी भरी भूमि पै वितान दिव्य, सौम्य, सरल, श्वेत-शांत, ज्ञान-दीप्त-चादर है। सिन्धु में तो सरितायें डूबतीं हैं आ-आकर, किन्तु इस सागर से निकलती ज्ञान-धारायें। लक्षण-विलक्षण-दशलक्षण का भव्य रूप, आज 'जिनता' का पर्याय विद्यासागर है।
है तुममें ओज शांति सा, दमक है वीर सागर सी। शिव सागर सा जीवन दर्श तेरा है ओ तेजस्वी। ज्ञान सागर का पाकर अंश जग ये जगमगायेगा। गगन का हर सितारा अब तुम्हारे गीत गायेगा।
'नर्मदा का नरम कंकर' हो गया है 'मूक माटी',
और उस माटी में समाया 'समय सार ' है। दक्षिण से उत्तर का पानी, पानीदार हुआ नर्मदा औ बेतवा में 'विद्या' वाली धार है। 'वर्णी' के बाद किसी सन्त ने जगाया ऐसा, ऐसे लगा जैसे यह वही अवतार है। 'श्रवणबेलगोला' जैसे आ गये हों मध्य-देश, उत्तर से दक्षिण का सेतु 'विद्यासागर' है।
नहीं संदेह अब हमको कभी दिग्भ्रांत होने का। यही विश्वास है पक्का यहाँ प्रत्येक मानव का। डगर का शूल बनकर फूल, फिर स्वागत में आयेगा। गगन का हर सितारा अब तुम्हारे गीत गायेगा।
भाग्यादेय तीर्थ प्राकृतिक चिकित्सालय सागर (म.प्र.)
75, चित्रगुप्त नगर, कोटरा भोपाल (म.प्र.)-462003
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रजि. नं. UP/HIN/29933/24/1/2001-TC
डाक पंजीयन क्र.-म.प्र./भोपाल/588/2002
सितम्बर 2002
जिनभाषित
मासिक
वर्ष 1,
अङ्क 8
सम्पादक प्रो. रतनचन्द्र जैन
अन्तस्तत्त्व
कार्यालय 137, आराधना नगर, भोपाल-462003 (म.प्र.) फोन नं. 0755-776666
आपके पत्र : धन्यवाद
सम्पादकीय : उच्चतम न्यायालय का सराहनीय निर्णय • लेख • महाश्रमण दिगम्बराचार्य श्री शान्तिसागर : मुनिश्री निर्वेगसागर जी 5
जी महाराज
सहयोगी सम्पादक पं. मूलचन्द्र लुहाड़िया पं. रतनलाल बैनाडा डॉ. शीतलचन्द्र जैन डॉ. श्रेयांस कुमार जैन प्रो. वृषभ प्रसाद जैन डॉ. सुरेन्द्र जैन 'भारती'
उत्तम मार्दव
: आचार्य श्री विद्यासागर जी7
पर्वराज पर्युषण
: मुनिश्री समतासागर जी 11
.
न अहं, न शर्म.....
:
डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन
13
शिरोमणि संरक्षक श्री रतनलाल कँवरीलाल पाटनी (मे. आर.के.मार्बल्स लि.)
किशनगढ़ (राज.) श्री गणेश राणा, जयपुर
•
और मौत हार गई
: पं. मूलचन्द लुहाड़िया 15
• समाज के उत्थान में युवाओं की भूमिका : कु. समता जैन
18
.जिज्ञासा-समाधान
द्रव्य-औदार्य श्री गणेशप्रसाद राणा
जयपुर
: पं. रतनलाल बैनाड़ा 20 : महावीर प्रसाद पहाड़िया 23
||
परिचय : दि. जैन श्रमण संस्कृति
संस्थान सांगानेर
समाचार
12, 25, 31
प्रकाशक सर्वोदय जैन विद्यापीठ 1/205, प्रोफेसर्स कॉलोनी,
आगरा-282002 (उ.प्र.) फोन : 0562-351428,352278
.वर्षा योग : चातुर्मास 2002
.
सदस्यता शुल्क शिरोमणि संरक्षक 5,00,000 रु. परम संरक्षक 51,000 रु. संरक्षक
5,000 रु. आजीवन
500रु. वार्षिक
100 रु. एक प्रति
10 रु. सदस्यता शुल्क प्रकाशक को भेजें।
जरूरत है शाकाहार के पहचान-चिह्न के नियम के पालन की 31-32 -कविताएँ: • गुरुदेव विद्यासागर
: डॉ. वन्दना जैन आवरण पृष्ठ 2 •विद्या का ही सागर है
: कैलाश मड़वैया आवरण पृष्ठ 2 • वाह रे ! दूध के धुले
: मुनि श्री उत्तमसागर जी 19 .आत्मकथाः एक बूढी गाया की आत्मकथा : श्रीमती रंजना पटोरिया 6
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आपके पत्र, धन्यवाद : सुझाव शिरोधार्य
जिनभाषित में आपके सम्पादकीय सभी स्पष्टोक्ति सहित | जिनभाषित के जून-जुलाई के अंक मिले। जून अंक आचार्य एवं समाज के लिए आगमिक विवादों को सुलझाने में काफी | श्री ज्ञानसागर जी मुनिराज के प्ररेक कर्तत्व एवं व्यक्तित्व को उपयोगी एवं प्रशंसनीय हैं । बधाई स्वीकार करें।
समर्पित है। विपरीत परिस्थितियों में विद्याध्ययन पश्चात संस्कृतपं. शिवचरणलाल जैन, शास्त्री
हिन्दी में जयोदय, वीरोदय, दयोदय, भाग्योदय आदि विपुल साहित्य सीताराम मार्केट, मैनपुरी (उ.प्र)
की रचना अद्भुत एवं प्ररेक प्रसंग है, 'वीतरागता की पराकाष्ठा' जून 2002 की जिनभाषित पत्रिका प्राप्त हुई। इसमें
उद्वेलित करता है। उनका संदेश 'मोक्षमार्ग पर चलने के लिए सम्पादकीय लेख महाकवि आचार्य श्री ज्ञानसागर जी का 30वाँ
समर्पित भाव से समीप आये उसे शरण देना और स्वयं अनासक्त समाधि दिवस एवं अन्य सभी लेख पठनीय, मननीय एवं अत्यंत
रहकर अपने आचरण में तत्पर रहना' आत्मार्थी के कल्याण हेतु ज्ञानवर्द्धक हैं। पत्रिका का इतने सुंदर रूप में नियमित प्रकाशन ही
राजमार्ग है। 'श्रुतपंचमी हमारा कर्तव्य' आलेख मार्गदर्शक है। महान उपलब्धि है, जिसके लिए आपको हार्दिक बधाई व कोटिशः
आज के समय जबकि यत्र-तत्र जिनवाणी का बहिष्कार अपने धन्यवाद।
द्वारा ही की जा रही हो, श्रुतपंचमी का संदेश दिशाबोधक सिद्ध पत्रिका निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर रहकर उच्चतम
होता है। ज्ञातव्य है कि 19.1.1935 में ग्वालियर स्टेट मे महगाँव ऊँचाइयों को प्राप्त करे ऐसी मेरी शुभभावना है। मैं इसमें बराबर
में जैनधर्म के द्रोहियों द्वारा जैन मंदिर अपवित्र कर जैनशास्त्र जला सहयोग प्रदान करूँगा। मेरे पास 100जैन पत्र आते हैं, उनमें
दिये थे। तब परिषद के प्रस्ताव पर सर सेठ हुकमचन्द्र जी के आपकी पत्रिका सर्वश्रेष्ठ है।
नेतृत्व में 10 महानुभाव राजमाता ग्वालियर से न्याय प्रदान हेतु डा. ताराचन्द्र जैन बख्शी 'वीर' सम्पादक : 'अहिंसा वाणी'
मिले। और 19.1.1936 को (महगाँव अत्याचार काण्ड) की वर्षी जिनभाषित के अंक अत्यन्त पठनीय तथा अनुकरणीय |
पर उपवास जल्से एवं तार आदि से आन्दोलन किया। ऐसी सामग्री से साथ बराबर मिल रहे हैं। मई अंक में दोनों पूजा
जागरूकता अब समाज में दिखाई नहीं देती। चिंता का विषय है। पद्धतियाँ आगमसम्मत लेख पढ़ा। बीसपंथ और तेरापंथ,पद्धतियाँ
विश्वास है कि जिनदेवता-वाणी, गुरु आदि की रक्षा का भाव देश के कोने-कोने में (ये दोनों पद्धतियाँ) प्रचलित हैं। उत्तर
जागृत होगा। भारत में तेरापंथ की बहुलता, परन्तु दक्षिण में बीस पंथ प्रचलन में
| जुलाई अंक के देवदर्शन हिन्दुत्व और जैन समाज, अहिंसा हैं। अत: सामाजिक सामंजस्य के लिए जन भावनाओं का सम्मान
पर हमला, सम्पादकीय एवं अन्य आलेख वस्तु स्वरूप का चित्रण होना चाहिए। एक तीर्थस्थल पर वर्षों से सार्वजनिक मस्ताकाभिषेक | करते हैं। समाज के कर्णधार, अपने आपसी मतभेद भुला कर में पंचामृत अभिषेक नहीं होता था, परन्तु एक व्यक्ति के महामन्त्री
महावीर की वीतरागता/अहिंसा को केन्द्र बिन्दु बनाकर अपने बनने पर वहाँ यह पद्धति अपनायी गई। ऐसी स्थिति में तेरापंथी
अस्तित्व की रक्षा में संगठित हो तभी हमारी आत्मियता अक्षुण्ण लोगों में रोष देखा गया। इतना ही नहीं जब अभिषेक करने वालों | बनी रहेगी। एकांकी अपनी-अपनी प्रशंसा, घटकों में विभाजन ने जल से अभिषेक की माँग की, तब वह अनसुनी कर दी गई। आदि स लाभ का अपक्षा हान हा आधक है। अत: नय-नय ऐसे लोगों के लिए इस लेख से शिक्षा लेनी चाहिए। जनभावना को |
विवाद बिन्दु उत्पन्न कर समाज में विग्रह/विभ्रम के बीज बोये जा सर्वोपरि मानकर किसी को भी दूग्रही नहीं बनना चाहिए।
रहे हैं। सम्पादक जी, आप अपने दीर्घ अनुभव एवं जैन समाज की जुलाई माह में देवदर्शन पर पूज्य आचार्य विद्यासागर जी
व्यक्तिवादी छीन्न-भिन्न स्थिति को दृष्टिपात कर पत्रिका के माध्यम महाराज का प्रवचनामृत, श्री अजित प्रसाद जैन का "हिन्दुत्व और | से एकता के सूत्र संजोने की कृपा करें, इसी से जिन शासन, वीर जैन समाज" तथा जे.एल. संघवी का "अहिंसा पर हमला" लेख | शासन जयवन्त रहेगा। व्यक्ति नहीं शासन महान है। पढ़कर यदि समाज जागरूक बन सके तो अच्छा है । मूकमाटी पर
डॉ. राजेन्द्र कुमार बंसल, अमलाई सम्पादकीय सम्पादक की विद्वत्ता का दिग्दर्शन कराता है। जिनभाषित जुलाई 2002 का अंक प्राप्त हुआ। हम हमेशा आत्मान्वेषी आचार्य श्री विद्यासागर जी, रत्नत्रय का प्रकाशपुंज, जिनभाषित के नये अंक की प्रतीक्षा करते रहते हैं। अन्य अजैन के साथ जिज्ञासा-समाधान भी पूर्ण लेख है। सामग्री का चयन मित्रों को भी इसके अंक दिखाते समय गौरव का अनुभव होता है। उत्कृष्ट गैट, अप सुन्दर है। इसके लिए बधाई।
इस अंक का आलेख 'हिन्दुत्व और जैन समाज'- श्री अजित डॉ. नरेन्द्र जैन"भारती" वरिष्ठ सम्पादक पार्श्व ज्योति |
प्रसाद जी का काफी महत्त्वपूर्ण व प्रासंगिक है। फिलहाल जैन अ.दि.जैन उ.मा. विद्यालय सनावद (म.प्र.) | समाज का प्रधान लक्ष्य अल्पसंख्यक' वाला मुद्दा ही होना चाहिए। 2 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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आज के इस युग में बिना अधिकार के कोई भी कार्य मुश्किल है। | श्री चरणों में झुक गया। "बारह भावना" जहाँ मन को भायी तो और अधिकार प्राप्त करने के लिए लड़ना पड़ता है।
वहीं दमा का उपचार वाला प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित प्रत्येक अंक का सम्पादकीय तो शोधपूर्ण होता ही है, | आलेख भी अच्छा लगा। शंका-समाधान भी काफी जानकारियाँ देता है। यह पत्रिका जैन | पत्रिका इसी तरह प्रकाशित होती रहे एवं प्रगति करती समाज में घर-घर में पहुँचानी चाहिए।
रहे, इसी भावना के साथ। डॉ. अनेकान्त जैन
प्रकाश जैन रोशन व्याख्याता
जतारा, टीकमगढ़, म.प्र. लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली जिनभाषित का प्रत्येक अंक यथा समय प्राप्त हो रहा है। जिनभाषित जून 2002 का अंक मिला जिसमें आपने
आचार्यश्री के मुनि दीक्षा दिवस पर समर्पित जुलाई 2002 का आचार्य श्री ज्ञानसागर जी के बारे में काफी विस्तार से बतलाया।
अंक सारगर्भित एवं सच्चा दिग्दर्शन कराने वाला है। विशेषतः यह संपूर्णतः अच्छी और स्मरणीय पत्रिका साबित हुई है। मैं
आपका सम्पादकीय, 'मूकमाटी: एक उत्कृष्ट महाकाव्य' ने श्रावकों पत्रिका में निरन्तर निखार देख रहा हूँ।
की जिज्ञासा को एक नया आयाम दिया है। अपने आप में अद्वितीय इंजी. आलोक लहरी,
इस उत्कृष्ट महाकाव्य को हृदयंगम करने में हम अल्पज्ञ अपने को HD-22, डायमंड सीमेंट,नरसिंहगढ़, दमोह (म.प्र.) पत्रिका जिनभाषित बेहद उपयोगी पत्रिका होती जा रही है
असहाय पाते हैं, लेकिन आपकी टिप्पणी एवं व्याख्याओं के द्वारा जुलाई अंक के मुखपृष्ठ पर आचार्यश्री विद्यासागर महाराज जी का
इसे समझना सरल हो जाता है। चित्र बहुत आर्कषक लगा। साथ ही अंदर के पृष्ठों पर मुनि श्री
आचार्य श्री के साहित्य पर हो रहे शोध कार्य की विस्तृत क्षमासागर जी द्वारा आचार्यश्री के जीवन परिचय का प्रस्तुतीकरण
जानकारी प्राप्त हुई। यदि इस संबंध में भोपाल में विद्वद्वर्ग का एक
सेमीनार आयोजित किया जावे तो समाज के सभी वर्गों को तथ्यपरक बहुत भाया। इस अनुपम प्रस्तुति पर साधुवाद। श्रीपाल जैन, नेहरु वार्ड, गोटेगाँव (म.प्र.)
जानकारी एवं धर्म लाभ प्राप्त होगा। इस संबंध में आपके द्वारा जून, 2002 की जिनभाषित पत्रिका प्राप्त हुई। इतने कम
किये गए प्रयास से सभी लाभान्वित होंगे। दामों में इतनी सुन्दरता के साथ पाठकों के लिये प्रतिमाह बेहद पुनः जिनभाषित के उत्तरोत्तर विकास के लिए हमारी ज्ञानवर्धक पठनीय सामग्री देते रहना सचमुच सराहनीय कार्य है। | शुभकामनाएँ। इसके लिये पत्रिका के सम्पादक मण्डल के सदस्य, प्रकाशक व
अरविन्द फुसकेले
उपाध्यक्ष-पारस जन कल्याण संस्थान सम्मानीय संरक्षक सदस्य बधाई के पात्र हैं। एक सुझाव है कि
ई.डब्ल्यू.एस.-541, कोटरा, भोपाल यदि यह पत्रिका माह के प्रथम सप्ताह में ही प्राप्त हो जाये तो इससे _ 'जिनभाषित' मई 2002 का सम्पादकीय "दोनों पूजा पाठकों को ज्यादा सांत्वना मिलेगी।
पद्धतियाँ आगमसम्मत' वस्तुतः सम्यक विश्लेषण है। आपने इस महाकवि आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के 30वें
तरह समन्वय का जो प्रयास किया है वह तभी असरकारी होगा समाधि दिवस पर प्रकाशित आलेख सम्पादकीय के रूप में रुचिकर जब कि लोग पूजा के यथार्थ को समझेंगे। लगा। (आचार्य विद्यासागर महाराज) के गुरुवर के अन्य ज्ञानवर्धक
दामोदर जैन, आलेख पढ़ते ही मन प्रफुल्लित हो उठा और परम पूज्य गुरुवर के ।
S-334, नेहरु नगर, भोपाल
सुभाषित
अपना उद्देश्य सिद्धि का नहीं, सिद्ध बनने का होना चाहिए। संयम और साधना आत्मदर्शन के लिए हो, प्रदर्शन के लिए नहीं। प्रदर्शन करने से दर्शन का मूल्य कम हो जाता है, यदि उसके साथ दिग्दर्शन और जुड़ जाये तो उसका मूल्य और भी कम हो जाता है। . साधन वही है जो साध्य को दिला दे। कारण वही है जो कार्य को सम्पादित करे। औषधि वही है जो रोग को दूर करे। तप वही है जो नर से नाराण बना दे।
आचार्यश्री विद्यासागर 'सागर बूंद समाय' से
-सितम्बर 2002 जिनभाषित
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सम्पादकीय
उच्चतम न्यायालय का सराहनीय निर्णय
बर को | झडापोर्ट ने अपने
क
रता और स्कूल
भारत के उच्चतम न्यायायल ने दिनांक 12 सितम्बर को। झंडी दे दी। माध्यमिक कक्षाओं के नवनिर्मित राष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्रारूप 2002 कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान धार्मिक शिक्षा को संविधान के अनुरूप घोषित करने का जो निर्णय दिया है, वह | | का अध्ययन प्रतिबंधित नहीं करता और स्कूलों में इससे संबंधित अत्यन्त सराहनीय है। दूध का दूध पानी का पानी कर देने वाले इस पाठ्यक्रम लागू करने को सरकार का गैरधर्मनिरपेक्ष कार्य नही निर्णय ने भारतीय अस्मिता की रक्षा की है और देश के विभिन्न कहा जा सकता। न्यायमूर्ति एमबी शाह, डीएम धर्माधिकारी और धर्मावलम्बियों के मन में जो क्षोभ व्याप्त था उसका शमन किया है। एचके सेम की तीन सदस्यी खंडपीठ ने दो-एक के बहुमत से
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान परिषद् (एन.सी.ई.आर.टी.) | अरुणा राय और अन्य की जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया के पूर्ववर्ती पाठ्यक्रम का निर्माण करनेवाले तथाकथित विशेषज्ञों | याचिका में केंद्र पर आरोप लगाया गया था कि सरकार समीक्षा के ने हिन्दी, इतिहास और समाजविज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में भारत के नाम पर पाठ्यक्रम में अपनी राजनीतिक और धार्मिक विचारधार विभिन्न धर्मों एवं जातियों के विषय में ऐसी अनर्गल, अशोभनीय, | को शामिल करना चाहती है। अप्रामाणिक बातें ठूस दी थीं, जिनसे उन धर्मों एवं जातियों के प्रति खंडपीठ ने कहा कि महात्मा गाँधी खुद धर्म की शिक्ष घृणा और अनास्था का भाव उत्पन्न होता था। इसने उन धर्मों के | देने के पक्षधर थे। शिक्षा को मूल्य आधारित बनाने की दृष्टि से अनुयायियों के स्वाभिमान को गहरी चोट पहुँचाई थी, जिससे | धार्मिक शिक्षा देने में कुछ भी गलत नहीं है। न्यायमूर्ति शाह ने उनका हृदय क्षोभ से आन्दोलित था। 11वीं कक्षा के इतिहास की | कहा कि जिस पाठ्यक्रम को चुनौती दी गई है उसमें ऐसी कोई पुस्तक में जैनधर्म के विषय में यह लिखा गया था कि जैनों के धार्मिक शिक्षा शामिल नहीं है, जिससे अपनी इच्छा का धार्मिक चौबीस तीर्थंकरों में से केवल भगवान् महावीर ही ऐतिहासिक अध्ययन चुनने के छात्रों के मौलिक अधिकार का संरक्षण करने पुरुष हैं, शेष तेईस तीर्थंकर काल्पनिक हैं और भगवान् महावीर वाले संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है। न्यायाधीशों ने की साधना का जो रूप वर्णित किया गया था, वह जैनधर्म में मान्य | इस संबंध में तीन अलग-अलग निर्णय दिए। साधना से बिलकुल विपरीत और अशोभनीय था। जैनधर्मालम्बियों न्यायमूर्ति धर्माधिकारी ने अपने अलग फैसले में न्यायमूर्ति ने केन्द्रीय शासन से इसका घोर विरोध किया था। अन्य शाह से सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि धार्मिक शिक्षा तो धर्मावलम्बियों की तरफ से भी विरोध प्रकट किया गया था। इसके सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित फलस्वरूप मानव संसाधन मंत्रालय ने नया पाठ्यक्रम निर्मित कराया शिक्षा संस्थाओं में भी लागू की जा सकती है। न्यायमूर्ति सेम ने जिसमें से उक्त आपत्तिजनक अंशों को निकाल दिया गया। साथ | हालाँकि न्यायमूर्ति शाह के फैसले से आम तौर पर सहमति व्यक्त ही पाठ्यक्रम में सभी धर्मों के मूल सिद्धान्तों की शिक्षा देने का | की, लेकिन उन्होंने केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड से विचारप्रावधान किया गया, जिससे विद्यार्थियों को सभी धर्मों के बारे में | विमर्श न करने को लेकर सरकार की आलोचना की । खंडपीठ ने सही जानकारी मिल सके और उनके प्रति समभाव उत्पन्न हो।। इतिहास और हिंदी सहित सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रमों को वस्तुतः सर्वधर्मसमभाव अर्थात् किसी भी धर्म के प्रति घृणा न | लागू करने पर लगी अंतरिम रोक हटा ली। इससे लाखों छात्रों ने होना ही राष्ट्रीय दृष्टि से धर्मनिरपेक्षता है।
राहत की साँस ली है, जो अभी तक इन पुस्तकों के बिना काम किन्तु उक्त पाठ्यक्रम के विचारधारा-विशेष से प्रतिबद्ध चला रहे थे। कोर्ट ने कहा कि एनसीईआरटी द्वारा तैयार स्कूली निर्माताओं एवं राजनीतिक दलों ने सरकार के उक्त कदम का घोर पाठ्यक्रमों को सिर्फ इस आधार पर कि केंद्रीय परामर्शदात्री बोर्ड विरोध किया, उस पर शिक्षा के भगवाकरण और तालिबानीकरण | से सलाह मशविरा नहीं किया गया, निरस्त करना असंवैधानिक के आरोप लगाये तथा नवीन पाठ्यक्रम को लागू होने से रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका प्रस्तुत कर दी। उच्चतम । बोर्ड कोई वैधानिक निकाय नहीं है। खंडपीठ ने सरकार न्यायालय ने उस समय पाठ्यक्रम को लागू करने पर रोक लगा दी को भविष्य की शिक्षा नीति के लिए बोर्ड के पुर्नगठन का निर्देश थी किन्तु अब विषय पर विधिवत् सुनवाई कर तथा गंभीरतापूर्वक दिया। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट का मार्च 2002 का अंतरिम विचार विमर्श कर यह निर्णय दिया है कि नवीन संशोधित पाठ्यक्रम आदेश रद्द हो गया, जिसमें नए पाठ्यक्रम को देश भर में लागू न तो असंवैधानिक है, न ही धर्मनिरपेक्षता की भावना के विरुद्ध, किये जाने पर रोक थी। कोर्ट ने कहा कि पाठ्यक्रम तैयार करने अत: उसे लागू किया जा सकता है। निर्णय का विवरण, प्रतिष्ठित | वाली एनसीईआरटी एक वैधानिक संस्था है। एनसीईआरटी दैनिक समाचार पत्र दैनिक भास्कर', भोपाल (दिनांक 13, सितम्बर, शिक्षा में मूल्यों के महत्त्व और सभी धर्मों के प्रेम संबंधी सार को 2002) में इस प्रकार दिया गया है
अच्छी तरह समझती है।" "नई दिल्ली, 12 सितंबर (एजेंसियाँ)। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्रीय मानव संसाधन विभाग के उपर्युक्त प्रयास एवं आज भगवाकरण के आरोपों को खारिज करते हुए माध्यमिक | माननीय उच्चतम न्यायालय के सटीक निर्णय से भारतीय संस्कृति स्कूलों के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्रारूप-2002 को लागू करने और | एवं धर्मनिरपेक्षता के वास्तविक स्वरूप की रक्षा हुई है। एतदर्थ संशोधित पाठ्यक्रम वाली इतिहास एवं हिंदी सहित सामाजिक | हम दोनों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। विज्ञान की पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए केंद्र सरकार को हरी ।
रतनचन्द्र जैन 4 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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महाश्रमण दिगम्बराचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज
48वीं पुण्य तिथि के अवसर पर
अहिंसा और सत्य की खाद से संपुष्ट भारतीय संस्कृति के । पौध का संरक्षण और संवर्धन करने में श्रमण परम्परा, संत धारा का अपना एक महत्वपूर्ण योगदान है, जिसे भूलाना नहीं अपितु बुलाना, स्मृति में बनाये रखना ही सत्पुरुषों के प्रति आस्था और समर्पण का प्रतीक है "सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय" के सर्वोदयी उद्देश्य के साथ ही निज कल्याण के हेतु अनेकों आत्माओं ने इस भूमि पर साधना की, और साधना के बल पर तड़पती मानवता को समय-समय पर आध्यात्म और प्रेम वात्सल्य के शीतल जल से स्नपित कराते हुए सुख और शांति प्रदान की।
ऐसी ही श्रमण परम्परा के उज्जवल नक्षत्र " चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज" हुए। जिन्होंने लगभग 82 वर्ष पूर्व भौतिक सुख-सुविधाओं, इंद्रियजन्य विषय कषायों से मुख मोड़, सन् 1919 में समस्त आरम्भ और परिग्रह को त्याग कर प्रकृति पुरुस्कृत दिगम्बरत्व को अंगीकार किया तथा "परोपकाय सतविभूतय:" इस सूक्ति के अनुसार इस नश्वर देह को परोपकार जैसे सत्कार्यों में वीतमोह होकर समर्पित कर दिया।
सन् 1872 दक्षिण प्रांत के येलगुल ग्राम में माँ सत्यवती की कोख से द्वितीय किन्तु अद्वितीय बालक का जन्म, नामकरण हुआ 'सातगौडा', ज्योतिषाचार्यों की घोषणा बालक एक महान संत बनेगा प्राणि मात्र का अभय प्रदाता। हुआ यूं ही "पूत के गुण पालने में" वाली कहावत चरितार्थ होती चली, बालक करुणा प्रेम, समवृत्ति, गंभीरता आदि गुणों के साथ-साथ दूज के चाँद की तरह यौवन की दहलीज पर पहुँच गया। शौच को जाते हुए सातगौड़ा ने देखा कि एक सर्प मेढ़क को खाने दौड़ रहा है तुरंत पत्थर पर लोटा दे मारा सर्प विपरीत दिशा में भाग गया, घर लौटने पर फूटा लोटा देख माँ ने पूछा, समाधान मिलने पर माँ की आँखों से अश्रुधारा बह पड़ी और गौरवान्वित हुई वह माँ कह पड़ी धन्य है बूटा तूने कोख सफल कर दी। करुणा हृदयी पुरुष पक्षियों को भी कभी खेतों से नहीं उड़ाता पास ही छना हुआ शुद्ध जल भी रख देता पीने के लिये परिणाम स्वरूप फसल कम नहीं ज्यादा ही पैदा होती थी "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना जो मन में थी।
आध्यात्मिक विकास के लिये आवश्यक होती है देह के प्रति निस्पृहता, निरीहता की, जिसका विकास होता है दृढ़ संकल्प से, सादा जीवन उच्च विचार से 18 वर्ष की उम्र से ही आराम दायक गादी का त्याग कर माँ के द्वारा काते खादी के वस्त्र पहनते हुए 25 वर्ष की उम्र में पादत्राण का भी त्याग कर दिया सहिष्णुता की वृद्धि के लिये। अभी त्याग का क्रम टूटा नहीं 32 वर्ष की उम्र
मुनि श्री निर्वेगसागर जी
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में ही घी व तेल का आजीवन त्याग कर दिन में मात्र एक बार ही शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करने की दृढ़ प्रतिज्ञा/ आखिर, अंततोगत्वा यह माटी का पुतला माटी में ही मिलना है क्यों न इसके द्वारा कुछ चेतन की शाश्वत सत्ता का विकास किया जाए। और वैराग्य भीतर ही भीतर बढ़ता ही चला गया कि सन् 1914 में गुरु देवेन्द्रकीर्ति से निवेदन किया गया कि मुझे श्रमण दीक्षा प्रदान की जाए, पर " बेटा तलवार की धार पर चलने के समान यह व्रत है। धीरे-धीरे कदम बढ़ाने पर पतन का भय नहीं रहता, इसलिये पहले उत्कृष्ट श्रावक के व्रत अंगीकार करो।" गुरु के इस उपदेश को आदेश मान शुल्लक दीक्षा स्वीकार की। भगवान नेमिनाथ की निर्वाण भूमि गिरनार जी सिद्ध क्षेत्र में ऊपरी वस्त्र का त्याग कर मात्र एक लंगोटीधारी का पद स्वीकार किया तथा आजीवन सवारी का भी त्याग कर दिया।
अतः
तात्कालिक क्षेत्रीय तथा सामयिक प्रतिकूलताओं के बावजूद भी आगमिक चर्या का निर्दोष पालन करते हुए, अपने गुरु को ही पुनः दीक्षित कर "गुरुणां गुरुं " का दायित्व स्वीकार किया । कठोर तपश्चर्या मुनि जीवन में धारणा पारणा अर्थात् एक उपवास एक आहार निरन्तर, कभी लगातार 2, 3, 4,5 से लेकर लगातार 16 दिन तक निराहार निर्जल रहकर देह को तपाग्नि में तपाकर आत्मा को कुन्दन की तरह निर्मल और प्रकाशमान बनाने की साधना स्वरूप 35 वर्ष के मुनि जीवन में लगभग 10,000 (दस हजार ) उपवास किये।
.........
उपसर्ग और परीषहों को अपवर्ग की प्राप्ति का साधन मान सहर्ष स्वीकारते हुए समता का नित्य प्रति विकास करते रहे। बस्ती से सुदूर एकांत गुफा में ध्यान मग्न वे साधक भिखारी के द्वारा रोटी माँगते हुए रोटी न मिलने पर कील लगी लकड़ी से मारते हुए लहूलुहान होने पर भी विदेही की तरह शान्त और निराकुल, निष्प्रतिकारक भावों से सहन करते हुए, "शांति सागर " इस नाम को सार्थक कर रहे थे। चीटियों, दंस मशक, क्षुद्र कीट, मकोड़े तथा बिच्छू आदि की प्रदत्त पीड़ा तो मानो आपकी साधना विकास / कर्म निर्जरा में सहयोगी ही बना रही हो तथा नग्न देह पर घंटों सर्प का लिपटना, सिंह का सामने बैठे रहना, मानो आपके प्रेम और अहिंसक भावों से वे मित्रता को प्राप्त हो रहे हो, और राजाखेड़ा की वह शत्रु द्वारा प्रहार की घटना के बावजूद भी शत्रु के प्रति भी वही अनुकम्पा का भाव आपकी हृदय की विशालता, "पापी से नहीं पाप से घृणा करो" कहावत को प्रतिबिम्बत करता है।
रमता जोगी बहता पानी, परोपकार के सत् उद्देश्य से निरन्तर -सितम्बर 2002 जिनभाषित
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गतिशील बड़े-बड़े पहाड़, उत्थान पतन के समक्ष भी हिम्मत न | की निर्वाण स्थली कुंथलगिरी सिद्ध क्षेत्र पर महाव्रतों की निर्दोषता हारती हुई सरिता के सदृश्य दक्षिण भारत से प्रारम्भ की पदयात्रा, | हेतु सल्लेखना व्रत को अंगीकार किया। 17 अगस्त सन् 1955 को अरुक-अथक । अहिंसा सत्य अपरिग्रहवाद का दिव्य संदेश जन- यम सल्लेखना रूप प्रतिज्ञा ग्रहण की, तथा सभी खाद्य पदार्थों का जन तक पहुँचाते हुए कटनी, ललितपुर, मथुरा, दिल्ली, जयपुर, | त्याग कर मात्र जल शेष रख"मृत्यु महोत्सव" की उत्साह पूर्वक आदि नगरों, महानगरों में चातुर्मास कर अनेक धार्मिक व सामाजिक | तैयारी प्रारम्भ की। देह क्षीण होती चली गयी और आत्मा पुष्ट उत्थान के कार्य आपकी महती अनुकम्पा से ही सम्भव हुए हैं। | होती चली गई, समता तो मानो आसमान को ही छू रही हो, आगम ग्रंथों की सुरक्षा हेतु ताम्रपत्र में उत्कीर्णन, बालविवाह पर निराकुल, परमशांत, आत्म परिणामों के साथ भादों सुदी दूज को प्रतिबंध, शूद्रों के उद्धार हेतु कल्याणकारी उपदेश तथा दिगम्बर | प्रातः 6 बजे आत्मा ने "महाप्रयाण" कर दिया, नश्वर देह यहीं साधुओं के विहार पर लगा प्रतिबंध सदा के लिये हटा । अनेकों | पड़ी रही और आत्मा स्वर्ग लोक पधार गई। व्यक्तियों ने आपकी वीतराग मुद्रा, सदुपदेश से प्रभावित सदा- | सत्य ही है जिन्होंने अपने जीवन को संयम सदाचरण सदा के लिये व्यसनों, पापों, कुरीतियों के अनुकरण से तिलांजलि | रूपी पुष्पों से श्रृंगारित किया, वे ही जीवन के अन्तिम क्षणों का दे दी।
सहर्ष स्वागत करते हैं, और इस जीवन रूपी मंदिर पर कलशारोहण "जातस्य ही ध्रुवो मृत्युः" जिसका जन्म हुआ उसकी | करते हैं। आज महायोगी हमारे बीच नहीं है फिर क्या उनके मृत्यु निश्चित ही होगी चाहे वो महावीर, राम, कृष्ण, बुद्ध अथवा | आदर्श उनकी चर्या हमारी आत्मा को आज भी आंदोलित नहीं कोई भी महापुरूष क्यों न हो, लेकिन प्रण/व्रत को छोड़ प्राणों की | करती, सत्पथ पर चलने की प्रेरणा नहीं देती ? अवश्य देती है ! रक्षा करना दृढ़ संकल्पित महामानव को मंजूर नहीं, और जब | ऐसे महाश्रमण, बालब्रम्हचारी, महातपस्वी, उपसर्ग विजयी, दिगम्बर
आंखों की ज्योति मंद पड़ने लगी, जीव जन्तुओं का समीचीन | जैनाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के चरणों में सम्पूर्ण विश्व रक्षण असंभव सा प्रतीत होने लगा तब देशभूषण कुलभूषण मुनियों | का बारम्बार कोटिशः नमन नमन नमन -------
एक बूढ़ी गाय की आत्मकथा
श्रीमती रंजना पटोरिया
तुम क्यों इतना हठ कर रही हो मुझसे? मेरे जीवन में | बछड़े बैल के रूप में किसान की सेवा कर रहे हैं । जब मैं बूढ़ी ऐसी क्या दिलचस्प बात है, जो मैं तुम्हें सुनाऊँ? पर तुम नहीं | हो गई तब एक दिन किसान ने मुझे दूसरों के हाथ बेच दिया। मानती तो मुझे अपनी जीवन कथा कहनी ही होगी, सुनो।
वे लोग मुझे कसाईखाने ले आए। वहाँ बहुत सी दूसरी मेरा जन्म आज से कई वर्ष पहले एक किसान के घर | गाएँ व भेड बकरियाँ थीं। सबके चेहरे पर मौत की छाया थी। हुआ था। मैं सुबह शाम अपनी माँ का ताजा दूध पी लिया करती | परंतु कुछ भले लोग आए और मुझे व मेरे साथ वाली गायों को
और उसी के साथ जंगल चरने जाया करती थी। माँ का प्यार खरीदकर ले चले। ये लोग "गौहत्या विरोधी समिति" के पाकर मैं मतवाली बन जाती और सारे जंगल को अपनी उछलकूद सदस्य थे। तभी से मैं गौशाला में रहती हूँ। मुझे यह भी पता तथा शरारतों से भर देती। मेरे बालसाथी दूसरे बछड़े थे। इस चला है कि मेरी जाति की रक्षा के लिए बड़े-बड़े आंदोलन प्रकार कुछ वर्षों से मैं सयानी हो गई और तब मेरा जीवन भी किए जा रहे हैं। लेकिन दुःख की बात यह है कि जो लोग थोड़ा बदला मेरी माँ अब बूढ़ी हो चुकी थी। अचानक एक दिन सड़कों पर जितने उत्साह से नारे लगाते हैं वे उतने उत्साह से वह मर गई। मरते समय माँ ने मुझे किसान की सेवा करने का | मेरे सामने चारा नहीं डालते। आदेश दिया। कुछ ही समय बाद मैंने एक सुंदर बछड़े को जन्म
इस तरह मेरा जीवन सुखदु:ख की धूप-छाँव से गुजरा दिया। मालिक और मालकिन दोनों ही मुझे चाहते थे, मैं बहुत
है। यह कितने दुःख की बात है। जिस भारत में गायों को माता दूध जो देती थी। मेरा बछड़ा उनके पुत्र के समान था। मेरे दूध से
का स्थान दिया जाता है। उसी भारत में उसका कत्ल किया मालिक के यहाँ दही, मक्खन, घी की कमी नहीं रहती थी। मुझे
जाता है। इस गौशाला से मैं सुखी हूँ और जीवन के आखिरी दुःख सिर्फ इस बात का था कि किसान बछड़े को पर्याप्त दूध
दिन बिता रही हूँ। तुम्हारी हमदर्दी के लिए धन्यवाद । पीने नहीं देता था।
कलेक्टर बँगला के सामने धीरे-धीरे मेरे दिन कटते गए। मेरी दो संतानें हैं। दोनों
सिविल लाइन, कटनी (म.प्र.)
6 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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उत्तम मार्दव
आचार्य श्री विद्यासागर जी
आज पर्व का दूसरा दिन है। कल उत्तम क्षमा के बारे में | पर कहा जाए कि आरोग्य लाओ, तो आरोग्य तो रोग के अभाव में आपने सुना, सोचा, समझा और क्षमा भाव धारण किया है। वैसे | ही आयेगा। रोग के अभाव का नाम ही आरोग्य है। इसी प्रकार देखा जाए तो ये सब दस-धर्म एक में ही गर्भित हो जाते हैं। एक | मुदुता को पाना हो तो यह जो कठोरता आकर छिपकर बैठी है के आने से सभी आ जाते हैं। आचार्यों ने सभी को अलग-अलग उसे हटाना होगा। जानना होगा कि इसके आने का मार्ग कौन सा व्याख्यायित करके हमें किसी न किसी रूप में धर्म धारण करने | है, उसे बुलाने वाला और इसकी व्यवस्था करने वाला कौन है? की प्रेरणा दी है। जैसे रोगी के रोग को दूर करने के लिये विभिन्न तो आचार्य कहते हैं कि हम ही सब कुछ कर रहे हैं। जैसे अग्नि प्रकार से चिकित्सा की जाती है। दवा अलग-अलग अनुपात के | राख से दबी हो तो अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती, ऐसे ही मार्दव साथ सेवन करायी जाती है। कभी दवा पिलाते हैं, कभी खिलाते | धर्म की मालिक यह आत्मा कर्मों से दबी हुई है और अपने हैं और कभी इंजेक्शन के माध्यम से देते हैं। बाह्य उपचार भी | स्वभाव को भूलकर कठोरता को अपनाती जा रही है। करते हैं। वर्तमान में तो सुना है कि रंगों के माध्यम से भी चिकित्सा | | विचार करें, कि कठोरता को लाने वाला प्रमुख कौन है? पद्धति का विकास किया जा रहा है। कुछ दवाएं सुंघाकर भी अभी आप सबकी अपेक्षा ले लें। तो संज्ञी पञ्चेन्द्रिय के पाँचों इलाज करते हैं। इतना ही नहीं, जब लाभ होता नहीं दिखता तो | इन्द्रियों में से कौन सी इन्द्रिय कठोरता लाने का काम करती है? रोगी के मन को सान्त्वना देने के लिए समझाते हैं कि तुम जल्दी | क्या स्पर्शन इन्द्रिय से कठोरता आती है, या रसना इन्द्रिय से आती ठीक हो जाओगे। तुम रोगी नहीं हो। तुम तो हमेशा से स्वस्थ हो | है, या घ्राण या चक्षु या श्रोत, किस इन्द्रिय से कठोरता आती है? अजर-अमर हो। रोग आ ही गया है तो चला जायेगा, घबराने की | तो काई भी कह देगा कि इन्द्रियों से कठोरता नहीं आती। यह कोई बात नहीं है। ऐसे ही आचार्यों ने अनुग्रह करके विभिन्न धर्मों | कठोरता मन की उपज है। एक इन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय के माध्यम से आत्म-कल्याण की बात समझायी है।
तक कोई भी जीव ऐसे अभिमानी नहीं मिलेंगे जैसे कि मन वाले प्रत्येक धर्म के साथ उत्तम विशेषण भी लगाया है। सामान्य | और विशेषकर मनुष्य होते हैं। थोड़ा सा भी वित्त-वैभव बढ़ जाए क्षमा या मार्दव धर्म की बात नहीं है, जो लौकिक रूप से सभी | तो चाल में अन्तर आने लगती है। मनमाना तो यह मन ही है। मन धारण कर सकते हैं। बल्कि विशिष्ट क्षमा भाव जो संवर और के भीतर से ही माँग पैदा होती है। वैसे मन बहुत कमजोर है, वह निर्जरा के लिए कारण है, उसकी बात कही गयी है। जिसमें | इस अपेक्षा से कि उसका कोई अङ्ग नहीं है लेकिन वह अङ्गदिखावा नहीं है, जिसमें किसी सांसारिक ख्याति, पूजा, लाभ की अङ्ग को हिला देता है। विचलित कर देता है। जीवन का ढाँचा आकांक्षा नहीं है। यही उत्तम विशेषण का महत्त्व है।
परिवर्तित कर देता है और सभी इन्द्रियाँ भी मन की पूर्ति में लगी दूसरी बात यह है कि क्षमा, मार्दव आदि तो हमारा निजी | रहती हैं। स्वभाव है, इसलिए भी उत्तम धर्म है। इसके प्रकट हुए बिना हमें मन सबका नियन्ता बनकर बैठ जाता है। आत्मा भी इसकी मुक्ति नहीं मिल सकती। आज विचार इस बात पर भी करना हे | चपेट में आ जाती है और अपने स्वभाव को भूल जाती है। तब कि जब मार्दव हमारा स्वभाव है तो वह हमारे जीवन में प्रकट मुदृता के स्थान पर मान और मद आ जाता है। इन्द्रियों को खुराक क्यों नहीं है? तो विचार करने पर ज्ञात होगा कि जब तक मार्दव | मिले या न मिले चल जाता है लेकिन मन को खुराक मिलनी धर्म का विपरीत मान विद्यमान है तब तक वह मार्दव धर्म को | चाहिये। ऐसा यह मन है। और इसे खुराक मिल जाये, इसके प्रकट नहीं होने देगा। केवल मृदुता लाओ, ऐसा कहने से काम | अनुकूल काम हो जाए तो यह फूला नहीं समाता और नित नयी नहीं चलेगा किन्तु इसके विपरीत जो मान कषाय है उसे भी हटाना | माँगें पूरी करवाने में चेतना को लगाये रखता है। जैसे आज कल पड़ेगा। जैसे हाथी के ऊपर बंदी का बैठना शोभा नहीं देता, ऐसे | कोई विद्यार्थी कॉलेज जाता है। प्रथम वर्ष का ही अभी विद्यार्थी है ही हमारी आत्मा पर मान का होना शोभा नहीं देता। यह मान कहाँ अभी-अभी कॉलेज का मुख देखा है। वह कहता है-पिताजी! से आया? यह भी जानना आवश्यक है। जब ऐसा विचार करेंगे तो हम कल से कॉलेज नहीं जायेंगे। तो पिताजी क्या कहें? सोचने मालूम पड़ेगा कि अनन्त काल यह जीव के साथ है और इस तरह | लगते हैं कि अभी एक दिन तो हुआ है और नहीं जाने की बात से जीव का धर्म जैसा बन बैठा है। इससे छुटकारा पाने के दो ही | कहाँ से आ गयी? क्या हो गया? तो विद्यार्थी कहता है कि पिताजी उपाय है या कहो अपने वास्तविक स्वरूप को पाने के दो ही | आप नहीं समझेंगे नयी पढ़ाई है। कॉलेज जाने के योग्य सब उपाय हैं। एक विधि रूप है तो दूसरा निषेध रूप है। जैसे रोग होने | सामग्री चाहिए। कपड़े अच्छे चाहिए। पॉकेट में पैसे भी चाहिए
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और यूनिवर्सिटी बहुत दूर है, रास्ता बड़ा चढ़ाव वाला है इसलिए | हानि होना आवश्यक है। यदि मान की हानि हो जाती है तो मार्दव स्कूटर भी चाहिए। उस पर बैठकर जायेंगे इसके बिना पढ़ाई | धर्म प्रकट होने में देर नहीं लगती। सम्भव नहीं है।
आप शान्तिनाथ भगवान के चरणों में श्रीफल चढ़ाते हैं तो यह कौन करवा रहा है? यह सब मन की ही करामात है। भगवान श्रीफल के रूप में आपसे कोई सम्मान नहीं चाहते न ही यदि इसके अनुरूप मिल जाए तो ठीक अन्यथा गड़बड़ हो जायेगी। हर्षित होते हैं, बल्कि वे तो अपनी वीतराग मुद्रा से उपदेश देते हैं जैसे सारा जीवन ही व्यर्थ हो गया, ऐसा लगने लगता है। कपड़े | कि जो भी मान कषाय है वह सब यहाँ विसर्जित कर दो। यह जो चाहिए ऐसे कि बिल्कुल टिनोपाल में तले हुए हों हाँ जैसे पूरियाँ | मन, मान कषाय का स्टोर बना हुआ है, उसे खाली कर दो। तलती है। यह सब मन के भीतर से आया हुआ मान-कषाय का | जिसका मन, मान कषाय से खाली है वही वास्तविक ज्ञानी है। भाव है। सब लोग क्या कहेंगे कि कॉलेज का छात्र होकर ठीक | उसी के लिये केवलज्ञान रूप प्रमाण-ज्ञान की प्राप्ति हुआ करती कपड़े पहनकर नहीं आता। एक छात्र ने हमसे पूछा था कि सचमुच | है। वही तीनों लोकों में सम्मान पाता है। ऐसी स्थिति आ जाती है तब हमें क्या करना चाहिए? तो हमने हम पूछते हैं कि आपको केवलज्ञान चाहिये या मात्र मानकहा कि ऐसा करो टोपी पहन लेना और धोती पहनकर जाना, वह कषाय चाहिये? तो कोई भी कह देगा कि केवलज्ञान चाहिए। हँसने लगा। बोला यह तो बड़ा कठिन है। टोपी पहनना तो फिर लेकिन केवलज्ञान की प्राप्ति तो अपने स्वरूप की ओर, अपने भी सम्भव है लेकिन धोती वगैरह पहनूँगा तो सब गड़बड़ जो | मार्द्रव धर्म की ओर प्रयाण करने से होगी। अभी तो हम स्वरूप से जायेगी। सब से अलग हो जाऊँगा। लोग क्या कहेंगे? हमने कहा | विपरीत की प्राप्ति होने में ही अभिमान कर रहे हैं। वास्तव में देखा कि ऐसा मन में विचार ही क्यों लाते हो कि क्या कहेंगे? अपने को | जाए तो इन्द्रिय ज्ञान, ज्ञान नहीं है । इन्द्रिय ज्ञान तो पराश्रित ज्ञान है। प्रतिभा सम्पन्न होकर पढ़ना है। विद्यार्थी को तो विद्या से ही स्वाश्रित ज्ञान तो आत्म-ज्ञान या केवलज्ञान है। जो इन्द्रिय ज्ञान प्रयोजन होना चाहिये।
और इन्द्रिय के विषयों में आसक्त नहीं होता, वह नियम से अतीन्द्रिय आज यही हो रहा है कि व्यक्ति बाहरी चमक-दमक में | ज्ञान को प्राप्त कर लेता है; सर्वज्ञ दशा को प्राप्त कर लेता है। ऐसा झूम जाता है कि सारी की सारी शक्ति उसी में व्यर्थ ही व्यय 'मनोरपत्यं पुमान्निति मानवः' कहा गया है कि मनु की होती चली जाती है और वह लक्ष्य से चूक जाता है। यह सब मन संतान मानव है। मनु को अपने यहाँ कुलकर माना गया है। जो का खेल है। मान कषाय है। मान-सम्मान की आकांक्षा काठिन्य | मानवों को एक कुल की भाँति एक साथ इकट्ठे रहने का उपदेश लाती है और सबसे पहले मन में कठोरता आती है, फिर बाद में | देता है, वही कुलकर है। सभी समान भाव से रहें। छोटे-बड़े का वचनों में तदुपरान्त शरीर में भी कठोरता आने लगती है। इस भेदभाव न आवे तभी मानव होने की सार्थकता है। अपने मन को कठोरता का विस्तार अनादिकाल से इसी तरह हो रहा है और वश में करने वाले ही महात्मा माने गये हैं। मन को वश में करने आत्मा अपने मार्दव-धर्म को खोता जा रहा है। इस कठोरता का, | का अर्थ मन को दबाना नहीं है, बल्कि मन को समझाना है। मन मान कषाय का परित्याग करना ही मार्दव धर्म के प्रकटीकरण के | को दबाने और समझाने में बड़ा अन्तर है। दबाने से तो मन और लिए अनिवार्य है।
अधिक तनाव-ग्रस्त हो जाता है, विक्षिप्त हो जाता है। किन्तु मन आठ मदों में एक मद ज्ञान का भी है। आचार्यों ने इसी। को यदि समझाया जाये तो वह शान्त होने लगता है। मन को कारण लिख दिया है कि-ज्ञानस्य फलं किं? उपेक्षा, अज्ञाननाशो समझाना, उसे प्रशिक्षित करना, तत्त्व के वास्तविक स्वरूप की वा' उपेक्षा भाव आना और अज्ञान का नाश होना ही ज्ञान का फल ओर ले जाना ही वास्तव में, मन को अपने वश में करना है। है। उपेक्षा का अर्थ है रागद्वेष की हानि होना और गुणों का आदान जिसका मन संवेग और वैराग्य से भरा है। वही इस संसार से पार (ग्रहण) होना। यदि ऐसा नहीं होता तो वह ज्ञान कार्यकारी नहीं हो जाता है। जैसे घोड़े पर लगाम हो तो वह सीधा अपने गन्तव्य है। 'ले दिपक कुएँ पड़े' वाली कहावत आती है कि उस दीपक | पर पहुँच जाता है। ऐसे ही मन पर यदि वैराग्य की लगाम हो तो के प्रकाश की क्या उपयोगिता जिसे हाथ में लेकर भी यदि कोई | वह सीधा अपने गन्तव्य मोक्ष तक ले जाने में सहायक होता है। कूप में गिर जाता है। स्व-पर का विवेक होना ही ज्ञान की सभी दश धर्म आपस में इतने जुड़े हुए हैं कि अलगसार्थकता है। पर को हेय जानकर भी यदि पर के विमोचन का अलग होकर भी सम्बन्धित हैं । मार्दव धर्म के अभाव में क्षमा धर्म भाव जागृत नहीं होता और ज्ञान का मद आ जाता है कि मैं तो रह पाना संभव नहीं है, और क्षमा धर्म के अभाव में मार्दव धर्म ज्ञानी हूँ तो हमारा यह ज्ञान हमारा एकमात्र बौद्धिक व्यायाम ही टिकता नहीं है। मान-सम्मान की आकांक्षा पूरी नहीं होने पर ही कहलायेगा।
तो क्रोध उत्पन्न हो जाता है। मुदृता के अभाव में छोटी सी बात से ज्ञान का अभिमान व्यर्थ है। ज्ञान का प्रयोजन तो मान की | मन को ठेस पहुँच जाती है और मान जागृत हो जाता है। जब मान हानि करना है, पर अब तो मान की हानि होने पर मानहानि का | जागृत हो जाता है तो क्रोध की अग्नि भड़कने में देर नहीं लगती। कोर्ट में दावा होता है। मार्दव धर्म तो ऐसा है कि जिसमें मानकी । द्वीपायान मुनि रत्नत्रय को धारण किये हुए थे। वर्षों की 8 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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दिन नहीं
है।
तपस्या साथ थी। उस तपस्या का फल, चाहते तो मीठा भी हो । प्राप्त कर सकता है। मान को जी सकता है। इतना संयम तो कषायों सकता था किन्तु वे द्वारिका को जलाने में निमित्त बन गये। दिव्यध्वनि की जीतने के लिए आवश्यक ही है। सम्यग्दर्शन तो जीव जन्म से के माध्यम से जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मेरे निमित्त से बारह वर्ष के ही लेकर आ सकता है लेकिन मुक्ति पाने के लिये सम्यग्दर्शन के बाद द्वारिका जलेगी तो यह सोचकर वे द्वारिका से दूर चले गये कि | साथ जो विशुद्धि चाहिये वह चारित्र के द्वारा ही आयेगी। वह कम से कम बारह वर्ष तक अपने को द्वारिका की ओर जाना ही | अपने आप आयेगी, ऐसा भी नहीं समझना चाहिये। आचार्यों ने नहीं है। समय बीतता गया और बारह वर्ष बीत गये होंगे-ऐसा कहा है कि आठ साल की उम्र होने के उपरान्त कोई चाहे तो सोचकर वे विहार करते हुए द्वारिका के समीप एक बगीचे में सम्यग्दर्शन के साथ चारित्र को अङ्गीकार कर सकता है। लेकिन आकर ध्यानमग्न हो गये। वहीं यादव लोग आये और द्वारिका के | चारित्र अङ्गीकार करना होगा, तभी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा बाहर फेंकी गई शराब को पानी समझकर पीने लगे। मदिरापान | और मुक्ति मिलेगी। कषायों पर विजय पाने योग्य समता परिणाम का परिणाम यह हुआ कि यादव लोग नशे में पागल होकर द्वीपायन चारित्र को अङ्गीकार किये बिना आना/होना संभव नहीं है। आत्म मुनि को देखकर गालियाँ देने लगे, पत्थर फेंकने लगे। जब बहुत की अनन्त शक्ति भी सम्यक्चारित्र धारण करने पर ही प्रकट होती देर तक यह प्रक्रिया चलती रही और द्वीपायन मुनि को सहन नहीं हुआ तो तैजस ऋद्धि के प्रभाव से द्वारिका जलकर राख हो गयी। एक बात और कहूँ कि सभी कषायें परस्पर एक दूसरे के तन तो सहन कर सकता था लेकिन मन सहन नहीं कर सका और | लिए कारण भी बन सकती हैं। जैसे मान को ठेस पहुँचती है तो क्रोध जागृत हो गया।
क्रोध आ जाता है। मायाचारी आ जाती है। अपने मान की सुरक्षा महाराज श्री (आचार्य श्री ज्ञानसागर जी) ने एक बार | का लोभ भी आ जाता है। एक समय की बात है कि एक व्यक्ति उदाहरण दिया था। वही आपको सुनाता हूँ। एक गाँव का मुखिया | एक सन्त के पास पहुँचा। उसने सुन रक्खा था कि सन्त बहुत था। सरपंच था। उसी का यह प्रपञ्च है। आप हँसिये मत । उसका | पहुँचे हुए हैं। उसने पहुँचते ही पहले उन्हें प्रणाम किया और प्रपञ्च सबको दिशाबोध देने वाला है। हुआ यह कि एक बार | विनयपूर्वक बैठ गया। चर्चा वार्तालाप के बाद उसने कहा कि उससे कोई गलती हो गयी और उसे दंड सुनाया गया। समाज | आप हमारे यहाँ कल आतिथ्य स्वीकार करिये। अपने यहाँ हम गलती सहन नहीं कर सकती ऐसा कह दिया गया और लोगों ने आपको कल के भोजन के लिय निमन्त्रित करते हैं। सन्त जी इकट्ठे होकर उसे घर जाकर सारी बात कह दी। घर के भीतर | निमन्त्रण पाने वाले रहे होंगे, इसलिए निमन्त्रण मान लिया। देखा उसने भी स्वीकार कर लिया कि गल्ती हो गयी, मजबूरी थी। पर | निमन्त्रण 'मान' लिया, इसमें भी 'मान' लगा है। इतने से काम नहीं चलेगा। लोगों ने कहा कि यही बात मञ्च पर दूसरे दिन ठीक समय पर वह व्यक्ति आदर के साथ उन्हें आकर सभी के सामने कहना होगी कि मेरी गलती हो गयी और | घर ले गया, अच्छा आतिथ्य हुआ। मान-सम्मान भी दिया। अन्त मैं इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। फिर दण्ड के रूप में एक रुपया में जब सन्त जी लौटने लगे तो उस व्यक्ति ने पूछ लिया कि देना होगा। एक रुपया कोई मायने नहीं रखता। वह व्यक्ति करोड़ आपका शुभ नाम मालूम नहीं पड़ सका। आपका शुभ नाम मालूम रुपया देने के लिए तैयार हो गया लेकिन कहने लगा कि मञ्च पर | पड़ जाता तो बड़ी कृपा होती। सन्त जी ने बड़े उत्साह से बताया आकर क्षमा मांगने तो सम्भव नहीं हो सकेगा। मान खण्डित हो कि हमारा नाम शान्तिप्रसाद है। वह व्यक्ति बोला बहुत अच्छा जायेगा। प्रतिष्ठा में बट्टा लग जाएगा। आज तक जो सम्मान मिलता नाम है। मैं तो सुनकर धन्य हो गया, आज मानों शान्ति मिल गयी। आया है वह चला जायेगा।
वह उनको भेजने कुछ दूर दस बीस कदम साथ गया उसने फिर सभी संसारी जीवों की यही स्थिति है। पाप हो जाने पर, | से पूछा लिया कि क्षमा कीजिये, मेरी स्मरण शक्ति कमजारे है। मैं गलती हो जाने पर कोई अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है। भूल गया कि आपने क्या नाम बताया था? सन्त जी ने उसकी ओर असल में भीतर मान कषाय बैठा है वह झुकने नहीं देता। पर हम | गौर से देखा और कहा कि शान्तिप्रसाद, अभी तो मैंने बताया था। चाहें तो उसकी शक्ति को कम कर सकते हैं, और चाहें तो अपने | वह व्यक्ति बोला हाँ ठीक-ठीक ध्यान आ गया आपका नाम परिणामों से उसे संक्रमित (ट्रांसफर्ड) भी कर सकते हैं। उसे | शान्तिप्रसाद है। अभी जरा दूर और पहुँचे थे कि पुन: व्यक्ति बोला अगर पूरी तरह हटाना चाहें तो आचार्य कहते हैं कि एक ही मार्ग | कि क्या करूँ? कैसे मेरा कर्म का तीव्र उदय है कि मैं भूल-भूल हैं -समता भाव का आश्रय लेना होगा। अपने शान्त और मुदृ | जाता हूँ। आपने क्या नाम बताया था? अब की बार सन्त जी ने स्वभाव का चिन्तन करना होगा। यही पुरुषार्थ मान-कषाय पर | घूरकर उसे देखा और बोले शान्तिप्रसाद, शान्तिप्रसाद-मैंने कहा विजय पाने के लिए अनिवार्य है।
ना। वह व्यक्ति चुप हो गया और आश्रय पहुँचते-पहुँचते जब आत्मा की शक्ति और कर्म की शक्ति इन दोनों के बीच | उसने तीसरी बार कहा कि एक बार और बता दीजिये आपका देखा जाये तो आत्मा अपने पुरुषार्थ के बल से आत्म-स्वरूप के | शुभ नाम। उसे तो जितनी बार सुना जाय उतना ही अच्छा है। चिन्तन में मान कषाय के उदय में होने वाले परिणामों पर विजय | अब सन्त जी की स्थिति बिगड़ गयी, गुस्से में आ गये। बोले क्या
नाम 100 जिनभाषित 9
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। । कहता है तू कितनी बार तुझे बताया कि शान्तिप्रसाद, शान्तिप्रसाद
वह व्यक्ति मन ही मन मुस्कराया और बोला, मालूम पड़ गया है कि नाम आपका शान्तिप्रसाद है पर आप तो ज्वालाप्रसाद हैं । अपने मान को अभी जीत नहीं पाया, क्योंकि मान को जरा सी ठेस लगी और क्रोध की ज्वाला भड़क उठी।
बंधुओं ! ध्यान रखो जो मान को जीतने का पुरुषार्थ करता है वही मार्दव धर्म को अपने भीतर प्रकट करने में समर्थ होता है । पुरुषार्थ यही है कि ऐसी परिस्थिति आने पर हम यह सोचकर चुप रह जायें कि यह अज्ञानी है। मुझसे हँसी कर रहा है से या फिर सम्भव है कि मेरी सहनशीलता की परीक्षा कर रहा है। उसके साथ तो हमारा व्यवहार, माध्यस्थ भाव धारण करने का होना चाहिये। कोई वचन व्यवहार अनिवार्य नहीं है। जो विनयवान हो, ग्रहण करने की योग्यता रखता हो, हमारी बात समझने की पात्रता
जिसमें हो, उससे ही वचन व्यवहार करना चाहिये। ऐसा आचार्यों ने कहा है । अन्यथा 'मौनं सर्वत्र साधनम्' मौन सर्वत्र / सदैव अच्छा साधन है।
द्वीपायन मुनि के साथ यही हुआ कि वे मौन नहीं रह पाये, और यादव लोग भी शराब के नशे में आकर मौन धारण नहीं कर सके।' मदिरापानादिभिः मनसः पराभवो दृश्यते' मंदिरापान से मन का पराभव होते देखा जाता है। पराभव से तात्पर्य है पतन की ओर चले जाना। अपने सही स्वभाव को भूलकर गलत रास्ते पर मुड़ जाना । गाली के शब्द तो किसी के कानों में पड़ सकते हैं लेकिन ठेस सभी को नहीं पहुँचती ठेस तो उसी के मन को पहुँचती है जिसे लक्ष्य करके गाली दी जा रही है। या जो ऐसा समझ लेता है कि गाली मुझे दी जा रही है। मेरा अपमान किया जा रहा है।
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पान मुनि को भीतर तो यही श्रद्धान था कि मैं मुनि हूँ। मेरा वैभव समयसार है। समता परिणाम ही मेरी निधि है। मार्दव मेरा धर्म है। मैं मानी नहीं हूँ, लोभी नहीं हूँ। मेरा यह स्वभाव नहीं है । रत्नत्रय धर्म उनके पास था, उसी के फलस्वरूप तो उन्हें ऋद्धि प्राप्त हुई थी। लेकिन मन में पर्याय बुद्धि जागृत हो गयी कि गाली मुझे दी जा रही है। आचार्य कहते हैं कि 'पज्जयमूढ़ा हि परसमया' जो पर्याय में मुग्ध है, मूढ़ है वह पर समय है। पर्याय का ज्ञान होना बाधक नहीं है परन्तु पर्याय में मूढ़ता आ जाना बाधक है। पर्याय बुद्धि ही मान को पैदा करने वाली है। पर्याय बुद्धि के कारण उनके मन में आ गया कि ये मेरे ऊपर पत्थर बरसा रहें हैं,
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10 सितम्बर 2002 जिनभाषित
मुझे गाली दी जा रही है और उपयोग की धारा बदल गयी। उपयोग में उपयोग को स्थिर करना था, पर स्थिर नहीं रख पाये । उपयोग आत्म-स्वभाव के चिन्तन से हटकर बाहर पर्याय में लग गया और मान जागृत हो गया।
जो अपने आप में स्थित है, स्वस्थ है उसे मान-अपमान सब बराबर हैं । उसे कोई गाली भी दे तो वह सोचता है कि अच्छा हुआ अपनी परख करने का अवसर मिल गया। मालूम पड़ जायेगा कि कितना मान कषाय अभी भीतर शेष है। यदि ठेस नहीं पहुँचती तो समझना कि उपयोग, उपयोग में है। ज्ञानी की यही पहचान है कि वह अपने स्वभाव में अविचल रहता है। यह विचार करता है कि दूसरे के निमित्त से मैं अपने परिणाम क्यों बिगाडूं? अगर अपने परिणाम बिगाडूंगा तो मेरा ही अहित होगा। कषाय दुःख की कारण है। पाप-भाव दुःख ही है। आचार्य उमास्वामी ने कहा है 'दुःखमेव वा' आनन्द तो तब है कि जब दुःख भी मेवा हो जाये । सुख और दुःख दोनों में साम्य भाव आ जाये ।
मान कषाय का विमोचन करके ही हम अपने सही स्वास्थ्य का अनुभव कर सकते हैं, साम्य भाव ला सकते हैं । जैसे दूध उबल रहा है अब उसको अधिक नहीं तपाना है तब या तो उसे सिगड़ी से नीचे उतार कर रख दिया जाता है या फिर अग्नि को कम कर देते हैं। तब अपने आप वह धीरे-धीरे अपने स्वभाव में आ जाता है, स्वस्थ हो जाता है अर्थात् शान्त हो जाता है और पीने योग्य हो जाता है। ऐसे ही मान कषाय के उबाल से अपने को बचाकर हम अपने स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकते हैं। मान का उबाल शान्त होने पर ही मार्दव धर्म प्राप्त होता है। मान को अपने से अलग कर दें या कि अपने को ही मान कषाय से अलग कर लें, तभी मार्दव धर्म प्रकट होगा।
अन्त में इतना ही ध्यान रखिये कि अपने को शान्तिप्रसाद जैसा नहीं करना है। हाँ, यदि कोई गाली दे, कोई प्रतिकूल वातावरण उपस्थित करे तो अपने को शान्तिनाथ भगवान को नहीं भूलना है। अपने परिणामों को संभालना अपने आत्म परिणामों की सँभाल करना ही धर्म है। यही करने योग्य कार्य है जिन्होंने इस योग्य कार्य को सम्पन्न कर लिया वे ही कृतकृत्य कहलाते हैं । वही सिद्ध परमेष्ठी कहलाते हैं, जिनकी मुदृता को अब कोई खण्डित नहीं कर सकता। हम भी मुदृता के पिण्ड बनें और जीवन को सार्थक करें।
सुभाषित
जीवन निश्चित ही संघर्षमय है, लेकिन साधक उसे हर्षमय होकर अपनाता है । साहस, धैर्य, सहिष्णुता नहीं होने के कारण ही चित्त विक्षिप्त सा होता है और चित्त का चंचल होना साधक की सबसे बड़ी कमजोरी है ।
आचार्य श्री विद्यासागर 'सागर बूँद समाय' से
'समग्र' से साभार
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पर्वराज पर्युषणः विचार के वातायन से
मुनि श्री समता सागर जी पर्वराज पर्युषण का पुन: आगमन हो रहा है। यह पर्व ही। है कि क्षमा का भाव ही संपूर्ण धर्म-साधना की मनोभूमि प्रदान नहीं पर्वराज माना गया है। पर्युषण का अर्थ है सब ओर से इन्द्रिय | करता है। इसके आने पर ही मृदुता आदि शेष धर्मों की बात
और मन की असंयत प्रवृत्ति को रोककर आत्मा के बारे में चिन्तन | आती है। क्षमा से प्रारंभ हुई यह धर्म-यात्रा आत्मरमण रूप ब्रह्मचर्य मनन करना। इस पर्युषण का ही दूसरा नाम दशलक्षण पर्व है। में परिणत हो जाती है। तथा अन्त में सामूहिक क्षमावाणी का लक्षण से किसी वस्तु को जाना पहचाना जाता है। जिन बातों से | आयोजन कर पर्व का समापन कर दिया जाता है। किसी को माफ हम अपनी आत्मा को जान पहचान सकते हैं, अनुभव कर सकते | कर देना या किसी से माफी माँग लेने मात्र का नाम क्षमा नहीं है हैं वह है दशलक्षण। इन दशलक्षणों से आत्मा के विशुद्ध धर्ममय । क्योंकि यह कार्य तो बहुत ऊपरी औपचारिक भी हो सकता है पर होने की जानकारी मिलती है। यहाँ इस बात को भी समझना इस धर्म का अर्थ तो सहनशीलता सहिष्णुता से है। प्रतिकूल जरूरी है कि यह दशलक्षण विभिन्न धर्म नहीं है बल्कि धर्म के दश परिस्थितियों के उपस्थित होने पर भी क्षमा, समता का भाव धारण अंग ही हैं। अर्थात् पृथक्-पृथक् सत्ता में नहीं किन्तु इनका सम्मिलित | करना क्षमा धर्म है। मार्दव धर्म मृदुता का प्रतीक है। धन, पद, आचार-बोध ही धर्म है। इसे इस तरह से समझना चाहिये कि धर्म | ज्ञान, बल, वैभव आदि को पाकर भी अहंकार नहीं करना तथा एक सुवासित पुष्प है और दशलक्षण उसकी पांखुरी है। धर्म एक | विनम्रता का व्यवहार करना मार्दव धर्म है। जो मन में है वही हार है और दशलक्षण उसकी मणियाँ, या धर्म एक सागर है और वाणी और कर्म में निष्कपट भाव से आचरित हो, इसी भीतर दशलक्षण उसकी लहरें। अत: कुछ भिन्न दिखाई देते हुए भी यह | बाहर की एक जैसी परिणति को आर्जव धर्म कहा है। शौच सब मूलत: अभिन्न ही है। यदि सोंचें कि धर्म के दश ही लक्षण | पवित्रता का प्रतीक है, जिसमें शारीरिक शुद्धि के साथ-साथ क्यों हैं? तो इसका अभिप्राय में इतना ही समझता हूँ कि सुना गया | संतोष रूप जल से लोभ कषाय की निवृत्ति कर आत्मशुद्धि की है कि रावण दशमुखी था, (यथार्थ में वह एकमुखी ही था, उसके | जाती है। पाँचवा धर्म सत्य का है, जिसमें परम सत्य को पाने के हार में दशमुख दिखाई देते थे) तो लगा कि जब रावण अर्थात् | लिये हित मित प्रिय वचनों का व्यवहार किया जाता है। संयम के अनीति और अधर्म के दशमुख हो सकते हैं तो नीति और धर्मरूप | धर्म में मन और इन्द्रियों के विषयों से विरत आत्म-नियंत्रण की राम के दशमुख क्यों नहीं हो सकते। पर्युषण के यह दशमुख | शिक्षा ली जाती है। प्राणि रक्षा वाली परम अहिंसक चर्या इस धर्म न्याय, नीति और धर्मरूप आतमराम के ही दशलक्षण हैं। में अपनाना पड़ती है। तप का धर्म आत्मशोधन के लिये परम
पर्युषण के इन दिनों को पर्व कहा गया है। पर्व का अर्थ | रसायन है। तपकर जैसे स्वर्ण शुद्ध हो जाता है वैसे ही कर्म अवसर, सन्धि, पोर या किसी से जोड़ने वाला बिन्दु, यह सब पर्व | कालिमा हटने से आत्मा निर्मल हो जाती है। अंतरंग और बहिरंग के ही पर्यायवाची माने गये हैं। जिन क्षणों में जीवन जीने के लिये | के भेद से 12 प्रकार के तप मुक्ति के साधन माने गये हैं। त्याग नया प्रकाश मिलता है, परमात्मा के प्रति प्रेम प्रीति का भाव प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक प्रक्रिया है। वृक्ष में पत्ते आते हैं, फल लगते जन्मता है। नया आनन्द उल्लास उमंग का वातावरण बनता है। हैं और झर जाते हैं। प्राणी जो श्वांस लेता है उसे छोड़ना ही पड़ता पुरानी दिनचर्या बदलती है। खानपान और विचारों में परिवर्तन का | है। राग के वशीभूत किये गये संचित द्रव्य का चतुर्विध दान में क्रम शुरु हो जाता है और मन सद्विचारों से भरकर तन का साथ देने | लगाना त्याग धर्म है। इसके बाद आने वाला आकिञ्चन्य धर्म हमें लगता है, बैर विरोध विसम्बाद से हटकर वात्सल्य मैत्री और | एकदम निर्विकल्प रखना चाहता है। मैं, मेरा और तु, तेरा की सौहार्द की अभिवृद्धि होती है वह है दशलक्षण पर्व। सच बात तो | सूक्ष्म विकल्पधारा से भी इसमें मुक्त होना पड़ता है क्योंकि त्याग यह है कि पर्व हमारी उदास टूटी हुई जिंदगी को उत्सव से जोड़कर | के बाद भी मन की यह विकल्पधारा आत्मशीलन में बाधक बनती चला जाता है। यह दशलक्षण पर्व प्रतिवर्ष माघ, चैत्र और भाद्रमास | है। इस धर्म के आते ही परमब्रह्म में रमण की स्थिति आती है। के शुक्लपक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक तीन बार आता है किन्तु | देह के अशुचि स्वभाव को समझते हुये विषय वासना विरक्त भाद्रमास की विशेषता ही कुछ अलग है। सुहावना मौसम, वर्षा आत्मरमणता का नाम ही ब्रह्मचर्य है। ऋतु का आगमन, समशीतोष्ण प्रकृति, तथा व्यवसाय की मंदता । प्रकृति भी हमें दशलक्षण वाले नैसर्गिक जीवन को अपनाने आदि कारणों से सारे देश में भाद्रमास का ही यह पर्व विशेष | का संदेश देती है। बीज से वृक्ष तक की यात्रा में यह धर्म का उत्सव के रूप में मनाया जाता है। क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, | जीवन अवतरित होते दिखता है। क्षमाशीला मूक सहिष्णु माँ सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिञ्चन्य और ब्रह्मचर्य रूप इन | धरती की गोद में जब विनम्रता का बीज गिरता है, अपने कठोर दशलक्षणों में क्षमा को प्रथम स्थान दिया गया है। जिसका कारण | कवच को गला कर खुद को मिटाकर माटी में मिलता है तब
-सितम्बर 2002 जिनभाषित 11
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फूटने वाले सीधे सरल अंकुर स्वच्छता के गीत गाते आगे बढ़ते हैं । सत्य के असीम आकाश का अनुभव पाने वाले उन पौधों को जीवन रक्षा हेतु संयम का बंधन डालना ही पड़ता है। सूरज के प्रखर तप में तपे परिपक्व फलों का जब दान होता है तब त्याग की मूर्ति बना वह वृक्ष आकिञ्चन्य अकेला खड़ा हुआ उस योगी सा प्रतीत होता है जो स्थित प्रज्ञ परमब्रह्म में तल्लीन हो गया है। बीज से वृक्ष तक की इस जीवन यात्रा में हमें जो बोध मिला है मैं समझता हूँ कि वह अपने आत्मधर्म का समूचा सार संदेश है। क्षमा से ब्रम्होपलब्धि तक का यह ऊर्ध्वारोही उपक्रम हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा का पूर्ण प्रगटीकरण है। ऐसे इस पर्वराज पर्युषण
फिरोजाबाद में अभूतपूर्व धर्म प्रभावना
अन्यान्य विद्वानों ने भी श्रावण प्रतिपदा वीर देशना के महत्व पर प्रकाश डाला। छदामी लाल जैन, श्री महावीर जिनालय में मुनि संघ विराजमान है, प्रतिदिन प्रातः 7.45 से 9 बजे तक मुनिश्री के प्रवचन होते हैं, जिसमें जैन-जैनेतरों की अपार भीड़ रहती है। रविवार को विशेष प्रवचन विभिन्न स्थानों पर बदल-बदल कर दोपहर 3 बजे से 5 बजे तक होते हैं, जिसमें क्रमशः तीनों महाराज बड़ा ही प्रभावोत्पादक प्रवचन देते हैं। मुनि श्री समतासागर तथा मुनि श्री प्रमाणसागर व ऐलक श्री बड़े ही श्रुत मर्मज्ञ विद्वान हैं । आगम के संदर्भ में आधुनिक विज्ञान तथा व्यावहारिक पक्ष को जोड़कर इस प्रकार ढाल देते हैं कि अबालवृद्ध तथा विद्वान, सभी श्रोताओं के हृदय में बिठा देते हैं । प्रतिदिन 3 से 4 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि तथा 4 से 5 बजे तक रत्नकरण्ड श्रावकाचार का अध्यापन भी चल रहा है (रविवार को छोड़कर) फिरोजाबाद का समाज बड़ा ही भाग्यशाली है। यहाँ आचार्य श्री महावीर कीर्ति मुनि श्री विद्यानंद, आचार्य श्री विद्यासागर जी, आचार्य श्री विमलसागर ससंघ, आचार्य श्री सन्मतिसागर ( अंकलीकर) ससंघ, मुनि श्री अमितसागर जी ससंघ मुनि श्री निर्णयसागर जी आदि महान संतों का चातुर्मास हुआ है। आचार्य श्री विद्यासागर जी का 1975 में इसी महावीर जिनालय में चातुर्मास हुआ था। आज उन्हीं के परम शिष्यों ने धूम मचा रखी है।
डॉ. विमला जैन फिरोजाबाद
फिरोजाबाद में परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर
जी महाराज के परम शिष्य मुनि श्री समतासागर जी तथा मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज एवं ऐलक श्री निश्चयसागर जी का पावन वर्षायोग स्थानीय महावीर बाहुबली जिनालय प्रांगण में अभूतपूर्व धर्म प्रभावना के साथ हो रहा है। महाराज श्री का ससंघ मंगल प्रवेश 13 जुलाई को प्रातः काल हुआ। 14 जुलाई को आचार्य श्री विद्यासागर जी का 34वाँ दीक्षा दिवस बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया, जिसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों से अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने आकर भाग लिया, शोभायात्रा तथा विनयांजलि एवं संस्मरण सुनाने की श्रृंखला प्रातः तथा मध्याह्न दोनों बार काफी देर तक चली। मुनिद्वय तथा ऐलक जी ने अपने गुरु के प्रति आभार भक्ति प्रदर्शित करते हुये रोचक संस्मरण सुनाये। प्राचार्य नरेन्द्र प्रकाश जी, श्री अनूपचंद एडवोकेट, डॉ. विमला जैन तथा बैनाड़ा बन्धु (आगरा), सेठ समाई लाल कन्नौज तथा टीकमगढ़, मैनपुरी आदि के अनेक विद्वान तथा गणमान्य श्रेष्ठी पधारे थे ।
24 जुलाई को मध्याह्न काल में साधु संघ का वर्षायोग स्थापना कार्यक्रम बड़े ही हर्षोल्लास तथा धूमधाम से हुआ। बाहर से काफी गणमान्य श्रेष्ठी तथा विद्वान अनुमोदना हेतु पधारे। 25 जुलाई को वीरशासन जयंती का कार्यक्रम भी बड़ी धूमधाम से हुआ। मुनिश्री ने सारगर्भित प्रवचन दिये।
12 सितम्बर 2002 जिनभाषित
को सिर्फ पारम्परिक पर्व ही नहीं मानना चाहिए। इसे एक आध्यात्मिक प्रयोगशाला भी कहा जा सकता है जिसमें हम स्वयं पर रिसर्च करते हैं, स्वयं का अन्वेषण, स्वयं की खोज करते हैं। यही एक ऐसा अवसर है जिसमें हम दशधर्म के रसायन से आत्मतत्त्व का शोधन करते हैं इसलिये इन पर्वों से हम औपचारिक नहीं किन्तु वास्तविकता से जुड़े। पर्व से जुड़े हुये आयोजनों के प्रयोजन को भी यदि हम आत्मसात करें तो अंदर कुछ नुतन, कुछ नया अतिशय आनन्द घटित हो सकता है ।
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उत्तमक्षमा धर्म
न अहं, न शर्म; न शर्म; भूल से परे क्षमा धर्म
"क्षमा वीरस्य भूषणम्" अर्थात् क्षमा वीरों का आभूषण है इसे कहना सरल है, किन्तु जीवन में उतारना बहुत कठिन है। मनुष्य भूल करे और उसका परिमार्जन करले, भूल बड़ी है तो प्रायश्चित करले और अपने मूल स्वभाव में वापिस आ जाये तो उसे खीर कहलाने से कोई कैसे रोक सकता है। यह वीरता माँगने से नहीं आती, छीनने से नहीं मिलती, खरीदने पर प्राप्त नहीं होती बल्कि इसे गुणग्रहण के भावपूर्वक हृदय में धारण करना पड़ता है । सामान्यतया कहा जाता है कि क्रोधकषाय के अभाव का नाम क्षमा है, किन्तु यह निषेधात्मक होने से उत्तम क्षमा की कोटि में नहीं आती। जब क्षमा हृदय में स्थापित हो और क्रोधोत्पत्ति के अनेकानेक प्रसंग उपस्थित हो जायें फिर भी व्यक्ति क्षमाशील बना रहे तो क्षमा धर्म प्रभावी होता है। जैनाचार्य कहते हैं कि
कोहणे जो ण तपादि, सुरणार- तिरिएहि किरमाणे वि । उपसग्गे वि रवद्दे तस्य खमाणिम्मला होदि ॥ अर्थात् देव, मनुष्य और तिर्यज्यों (पशुओं) के द्वारा घोर व भयानक उपसर्ग पहुँचाने पर भी जो क्रोध से संतप्त नहीं होता, उसके निर्मल (पवित्र) क्षमा धर्म होता है। क्षमाभाव से चित्तवृति हिंसा से दूर होती है, वैरभाव से दूर होती है, प्राणीमात्र के प्रति मित्रता एवं दया के भाव जन्म लेते हैं, करुणा की अविरल धारा दीन दुःखी जनों पर अमृत वर्षा का सिंचन कर पुष्ट बनाती है, बैर के स्थान पर निर्वैर और निर्वेद का स्वर चहुँओर गुंजायमान होने लगता है। अपमान के प्रसंग किसके जीवन में नहीं आते और मान किसका खण्डित नहीं होता? क्रोध को शान्त किये बिना कौन सुखी हो पाता है ? हिंसा की संस्कृति से कौन सा परिवार, समाज और राष्ट्र प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है? जीवन की बगिया में फूल महकते हैं तो मुरझाते भी हैं। जो मुरझाते हैं उनका दुःख न मनाकर नये फूल उगाने की चेष्टा ही सार्थक होती है। मानवीय भूलों की सहजता पर नेपाली भाषा के प्रमुख कवि श्री विक्रमवीर थापा ने लिखा है कि -
बिना वेदना की भी क्या जिन्दगी कहें जहाँ तीक्ष्ण शूल न हो । उस आदमी को भी क्या आदमी कहें जिसकी जिन्दगी में भूल न हो ॥
क्षमा मानव का स्वभाव है, यह क्रोध कषाय के अभाव में होती है। उत्तम शब्द जोड़ने से तात्पर्यं सम्यग्दर्शन सहित जानना चाहिये, क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना धर्म नहीं होता है। किसी भी प्रकार के कटुक वचन कहे जाने पर, अनादरित होने पर, शरीर का घात किए जाने पर भी भावों में मलिनता न आना ही उत्तम क्षमा
डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन 'भारती' है। क्षमावान् व्यक्ति के मन में हमेशा यही भावना रहनी चाहिए कि
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खम्मामि सव्व जीवाणं सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ती मे सव्व भूएस वैरं मज्झं ण केण वि ॥ अर्थात् मैं सब जीवों पर क्षमा करता है, सब जीव मुझे क्षमा करें। मेरी सभी से मित्रता है, मेरी किसी से भी शत्रुता नहीं है । दशलक्षण धर्म पूजन में कविवर द्यानतराय जी ने कहा है कि'उत्तम क्षमा जहाँ मन होई, अन्तर बाहिर शत्रु न कोई।" शत्रुता से रहित सुखी जीवन की लालसा किसे नहीं है, किन्तु सब क्रोध को क्रोध से जीतना चाहते हैं, हिंसा को हिंसा से पाटना चाहते हैं, वैर को वैर से काटना चाहते है; जो त्रिकाल में संभव नहीं है। क्षमा एक अनोखा धर्म है जो मर्म पर पहुँचकर संसार एवं संसार से पार शान्ति का पथ प्रशस्त करता है। क्षमा की महत्ता अप्रतिम है। नीतिकार कहते हैं कि
पुष्प कोटि समं स्तोत्रं, स्तोत्र कोटि समं जपः । जयकोटि समं ध्यानं, ध्यान कोटि समं क्षमा । अर्थात् करोड़ों पुष्पों की कोमलता के समान स्तोत्र होता है। भगवान के करोड़ों स्तोत्रों के समान जप है। करोड़ों जप के समान ध्यान है और करोड़ों ध्यान के समान क्षमा है। तात्पर्य है कि एक क्षमा के होने पर करोड़ों स्तोत्र, जप एवं ध्यान करने की आवश्यकता नहीं; किंतु एक क्षमा के नहीं होने पर करोड़ों जप, तप, ध्यान निरर्थक हैं। संसार के सभी महापुरुषों ने वैभाविक परिणति कराने वाले क्रोध को छोड़कर शीतलता दायक क्षमा को अंगीकार किया तभी वे महापुरुष बन सके। गजकुमार मुनि को ससुर के द्वारा सिर पर गीली मिट्टी की बाड़ लगाकर जलते अंगारे भरकर जला दिया गया किन्तु वे समता भाव में स्थित रहे। उनके लिए आत्म वैभव ही सबकुछ था, वे शरीर के प्रति निष्ठुर एवं निर्ममत्व बने रहे। पाँचों पाण्डव तप्त लौह आभूषणों को पहनाये जाने पर शरीर को जलता हुआ देखते रहे, किन्तु परम शक्तिमान होने पर भी बदला लेने का विचार नहीं किया और सद्गति पायी। राम सीता का हरण करने पर भी रावण के प्रति निर्वैर बने रहे तथा मर्यादित जीवन जीते रहे। ये प्रसंग जीवन के ऐसे सुखद प्रसंग हैं जो परम सुख का पथ प्रशस्त करते हैं।
क्षमा की साकार मूर्ति दिगम्बर संत होते हैं जो न राग करने वाले पर राग करते हैं और न द्वेष करने वाले पर द्वेष । वे तो बीतरागता के पथिक एवं वीतरागता के उपासक होते हैं। जिसने संसार को क्षमा कर क्षमा का संसार रच लिया है, संसार के बैरी क्रोध को जीत लिया है, जिसने सभी जीवों को अपना मित्र बना -सितम्बर 2002 जिनभाषित 13
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लिया है, जिसका मन परोपकार में लगा हुआ है, जिसे सताना नहीं । राजकुमार मुनि पर पांशुल श्रेष्ठी का उपसर्ग, चाणक्य आदि आता, जिसे स्वभाव में रमने की कला आ गयी है, ऐसा साधक | पाँच सौ मुनियों पर मंत्री द्वारा किया गया उपसर्ग, सुकुमालमुनि क्षमाशील होता है और परम अहिंसा धर्म का पालन करता है। । को स्यालिनी द्वारा खाया जाना, सुकौशल मुनि का व्याघ्र द्वारा
घृणा का कोई संसार नहीं होता, बल्कि संसार से घृणा खाया जाना, पणिक मुनि का जल का उपसर्ग सहकर मोक्ष जाना, मिटे; यह महापुरुष की भावना होती है। क्रोध एक नशे की तरह श्रेणिक द्वारा यशोधर मुनि के गले में मृत सर्प डालना और मुनि को है जो विवेक को मारता है,संयम के बाँध को तोड़ता है, कुकर्म से चींटियों द्वारा काटे जाने पर भी उफ तक न करना क्षमा शीलता के जोडता है, शरीर को तप्त करता है, प्रकृति से दूर ले जाता है, नरक | ऐसे विलक्षण उदाहरण हैं जिन्हें जानने-सुनने पर अपने क्रोधियों गति में ले जाता है, अतः क्रोध त्याज्य ही है।
पर ही क्रोध आने लगता है। स्वयं के अपकृत्यों पर घृणा होने शान्त व्यक्ति ही साधना का अधिकारी होता है। कर्मरूपी | लगती है और स्वयं से प्यार होने लगता है। ऐसी क्षमा हमारे हृदय मैल का क्षय किये बिना आत्मिक गुणों की आराधाना संभव नहीं | में आ जाये; यह प्रयत्न हम सब करें। है। जिनाज्ञा है कि
कुछ लोग क्षमा को आदान-प्रदान का भाव मानते हैं जो उवसमइ तस्स अस्थि आराहणा।
जबकि इसका विनिमय संभव नहीं है। इसे तो धारण किया जा जो न उवसमइ तस्स णस्थि आराहणा॥
सकता है, किया जाता है। कुछ लोग क्षमा माँगने के लिए दबाव अर्थात् जो उपशान्त होता है उसकी आराधना सफल होती | डालते हैं, शक्ति का भय दिखाते हैं, लोक-लाज के नाम पर है, जो उपशान्त नहीं होता है उसकी आराधना ठीक नहीं है। याचना भी करते हैं। यह सब निरर्थक परिश्रम है क्योंकि जब तक उपशान्त का तात्पर्य उप = समीप, शान्त = शान्ति। अतः जो
क्षमा का विचार स्वयं ही उत्तरदायी व्यक्ति के मन में जन्म नहीं शान्ति के समीप है वह उपशान्त है । शान्ति का आधार आत्मा है लेता तब तक क्षमा याचना या क्षमा करने का भाव ही उत्पन्न नहीं शरीर नहीं अत: आत्मा की निकटता आवश्यक है। जो आत्मा के होता। नीति कहती है किनिकट है, क्षमा उसका निजभाव है, अतः क्षमा के बिना शान्ति की "क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात।" "क्षमा कल्पना या शान्ति की कामना ही निरर्थक है। यह क्षमा कर्मक्षय | वीरस्य भूषणम्" भी इसलिए कहा है। छोटे आदमी की क्षमा से आती है।
क्षमा कम याचना अधिक है। भय या प्रीति क्षमा के कारक नहीं भर्तृहरि कहते हैं कि "भज क्षमा" अर्थात् क्षमा की भक्ति | हैं। शक्तिमान की क्षमा या उच्च पदासीन व्यक्ति की क्षमा सामाजिक करो। बिना क्षमा की भक्ति के आत्मविरोधी क्रोध- रिपु पर विजय | मूल्यों एवं सौहार्द की सृष्टि करती है, अतः क्षमा याचना के द्वारा प्राप्त नहीं हो सकती अत: हमारे जीवन में क्षमा आये तथा हम भी की जाय वह श्लाघनीय (प्रशंसनीय) एवं आदरणीय ही है। पृथ्वी सदृश क्षमा को धारण कर सकें तभी हम वीर हैं, तभी हम क्षमा के लिए समय एवं अवसर की प्रतीक्षा जरूरी नहीं है । मानव महावीर हैं।
समाज दण्डनीय कृत्य के लिए दण्ड की वकालत करता है, उसे धर्मात्मा होने का सबसे बड़ा प्रमाण क्षमाशील होना है। | उचित मानता है, प्रताड़ित करता है वह पापास्रव कर रहा है अत: श्रीराम ने रावण से कहा कि "तुम मेरी सीता मुझे वापिस कर दो।। वह दया का पात्र तो है ही। क्षमा माँग लेना भूल का अन्त करना मेरा तुमसे कोई बैर नहीं है।" श्री दत्त मुनि व्यन्तरदेव कृत उपसर्ग है, भविष्य के लिए प्रायश्चित है। क्षमायाचना के साथ ही अन्त: को जीतकर केवल ज्ञानी हुए। चिलाती पुत्र मुनि व्यन्तरदेव कृत | करण की शुद्धि हो जाती है। इतने पर भी यदि कोई क्षमायाचना उपसर्ग जीतकर सर्वार्थसिद्धि को प्राप्त हुए। कार्तिकेय मुनि क्रोंच | को ठुकराता है तो उसे पापात्मा समझकर क्षमा कर देना चाहिए। राजा के प्रकोप को सहकर देव हुए। गुरुदत्त मुनि ने कपिल क्षमायाचना स्व के प्रयोजन की सिद्धि (स्वार्थपूर्ति) के लिए है; ब्राह्मण के उपसर्ग को क्षमा से जीता और मोक्ष प्राप्त किया। श्री लेकिन यह स्वार्थ आध्यात्मिक अर्थों वाला है। इससे जीवन में धन्यमुनि चक्रराजकृत उपसर्ग से विचलित नहीं हुए और केवलज्ञान नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मकता, निष्क्रियता के स्थान प्राप्त किया। पाँचों पाण्डवों ने अग्नि में तप्त आभूषण पहनाये जाने
पर सक्रियता और क्षोभ के स्थान पर क्षेम की सृष्टि होती है। क्षमा पर भी उफ तक नहीं की। पाँच सौ मुनि दण्डक राजा के उपसर्ग
देने वाले से भी अधिक निर्मल भावों के लिए अन्तर्द्वन्द्व क्षमायाचक से व्यथित नहीं हुए और सिद्ध हुए। भगवान पार्श्वनाथ पर कमठ
के मन में चलता है। पश्चाताप की भावना, उदारता, करुणाशीलता, ने घोर उपसर्ग किया और पत्थरों की वर्षा की, पानी बरसाया
अहिंसा आदि निज परिस्थितियाँ, सामाजिक-नैतिक-धार्मिक दबाव भगवान ने अन्त तक क्षमा को धारण किया। कमठ का क्रोध पार्श्व
आदि बाह्य परिस्थितियाँ क्षमा याचना की भावना को आसान बना की क्षमा के आगे नतमस्तक हो गया। कहा भी है
देते हैं। इसके लिए अहं और शर्म की भावना से छुटकारा पाना समता सुधा का पान करके जो सदा निःशंक हैं,
आवश्यक है। क्षमायाचना, क्षमादान और क्षमाशीलता तीनों सुखद शोकार्त्त न करता उन्हें प्रतिकूल कोई प्रसंग है।
भविष्य का निर्माण करते हैं अतः हर दृष्टि से, हर स्थिति में कमठ ने उपसर्ग ढाया था सताने के लिए,
उपादेय एवं अनुकरणीय है। पार्श्व को कारण बना वह मुक्ति पाने के लिए।
पता- एल-65, न्यू इंदिरा नगर, पार्ट ए, बुरहानपुर (म.प्र.) 14 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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... और मौत हार गई
पं. मूलचन्द्र लुहाड़िया
इस भोग प्रधान युग में जब कि चारों ओर उपभोक्तावादी प्रथम बार मौत का आक्रमण आचार्यश्री के बुंदेलखंड की आंतरिक रूचि और प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने वाले सबल निमित्त | भूमि पर प्रथम प्रवेश के समय सतना में हुआ। मोह को तब यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, आधुनिक शिक्षा प्राप्त युवक-युवतियों | अवश्य आभास हुआ होगा कि इस संत को बुंदेलखंड में प्रवेश का बड़ी संख्या में संयम के दुरूह मार्ग पर कदम बढ़ाने के लिए और बुंदेलखंड में प्रवास उसके लिए विशेष संकट का कारण आकृष्ट होना एक अतीव आश्चर्यकारी घटना के रूप में इतिहास | बनेगा। सतना में तीव्र ज्वर का प्रकोप हुआ। साधारणतया यह में स्थान पायेगी। इस घटना के मुख्य सूत्रधार हैं युग प्रवर्तक बात सहज समझ में नहीं आती थी कि ज्वर की इतनी तीव्रता में भी आचार्य विद्यासागर जिनकी मोहक प्रशांत वीतराग मुद्रा के दर्शन | आचार्य श्री अपने परिणामों में समता कैसे बनाए रखते थे। अस्वस्थ मात्र से व्यक्ति के हृदय में वैराग्य भावना अंकुरित हो आंदोलित अवस्था में ही वे सतना से कटनी आ गए। शहरों के सभी प्रकार होने लगती है। बिना कुछ कहे भी उनकी चमत्कारी मुद्रा वह सब के प्रदूषण युक्त वातावरण को अपनी आध्यात्मिक साधना के कुछ कह देती है जो उपदेशों के द्वारा नहीं कहा जा सकता। क्या अनुकूल नहीं जानकर आचार्यश्री ने कुंडलपुर वर्षायोग स्थापित इसमें अधिक आश्चर्य की बात और कोई हो सकती है कि जिन | करने का मन पहले से ही बना लिया लगता था। कटनी में एक कॉलेज शिक्षा प्राप्त युवक-युवतियों के माता-पिता एवं गुरुजनों | और संकट आ गया। आचार्यश्री के प्रथम शिष्य और गृहस्थ के प्रेम, रोष, झिड़की, धमकी भरे उपदेश आदेश भी जिनकी | जीवन के लघु भ्राता क्षुल्लक समयसागर जी उनसे भी अधिक उच्छृखल भोगवादी जीवन प्रणाली में तनिक भी सुधार नहीं ला | अस्वस्थ हो गए। अत: कटनी से विहार करने की परिस्थितियाँ पाते हैं, वहाँ उन युवक-युवतियों को इस युगांतरकारी संत की पूर्णतः प्रतिकूल थीं, किंतु इस दृढ़ संकल्पी पुरुषार्थी महात्मा को, प्रथम झलक मात्र अंतचिंतन के लिए विवश कर देती है और वे | परिस्थितियों की प्रतिकूलता अपनी लक्ष्य पूर्ति से कब रोक सकी संत के चरण कमलों के समीप भौरों की तरह मंडराने लगते हैं। | है। और तीव्र ज्वर की अवस्था में ही वन के अनुरूप तीर्थ कुंडलपुर जहाँ युवक-युवतियों को सदाचार के साधारण नियमों को स्वीकार | की ओर विहार कर गए। अपनी अस्वस्थता को कदाचित् न सही करने के लिए अनेक आग्रहपूर्ण उपदेश भी विशेष अनुकूल परिणाम किंतु अपने प्रथम शिष्य और लघु भ्राता की अस्वस्थता भी उनको प्राप्त नहीं करा पाते, वहीं पू. आचार्यश्री की वैराग्य की सविशेष कटनी में बांध नहीं सकी। जिस दिन आचार्यश्री कुंडलपुर पहुंचे मौन उपदेश देने वाली वीतराग मुद्रा का ऐसा जादुई प्रभाव उन | | उसके दूसरे दिन मैं भी किशनगढ़ से कुंडलपुर पहुँचा। कटनी के युवक-युवतियों के हृदयों पर पड़ता है कि वे आजीवन ब्रह्मचर्य सिंघई परिवार की सेठानी जी के आंसुओं से भीगे वे शब्द आज जैसे असिधारा व्रत प्रदान करने के लिए आचार्यश्री से आग्रह भी मेरे मन में गूंजने लगते है "भैय्या जी कैसे भी करके आचार्यश्री करने लगते हैं। साधना के अभ्यास के बिना प्रारंभ में ही आजीवन | को वापिस कटनी ले चलो। यहाँ कुंडलपुर में सब कुछ प्रतिकूल व्रत देने के लिए आचार्यश्री के राजी नहीं होने पर वे दुखी होते हैं, | है और कुछ भी अनुकूल नहीं है। यहाँ मच्छर है, जलवायु आर्द्र किंतु अंत में गुरु आज्ञानुसार सावधि व्रत की साधना के अभ्यास | है, यहाँ दूध नहीं है, सब्जी नहीं है, वैद्य नहीं है, औषधि नहीं है। के पश्चात् आजीवन व्रत ग्रहणकर संयम की शीतल छाया तले | यहाँ चातुर्मास किसी भी तरह उपयुक्त नहीं रहेगा। किंतु इस आत्म शांति को विकसित करते हुए जीवन सफल बना रहे हैं। । अलौकिक महात्मा को प्रतिकूलताओं की कब चिंता रही। प्रत्युत
इस अलौकिक संत आचार्य विद्यासागर का व्यक्तित्व ऐसी उन्होंने तो प्रतिकूलताओं को ही अनुकूलता समझा है।" जीविताशा ही अनेक मुद्रा, वाणी और लेखनी की लोकोत्तर विशेषताओं का धनाशा च येषां तेषां विथि विधिः। किं करोषि विधिस्तेषां येषां पुंज रहा है। संभवतः युगजयी शैतान (मोह) को यह महान आशा निराशता॥ और ऐसे दृढ़ संकल्प शक्ति के कारण प्रतिकूलताएं साधक अपनी सत्ता साम्राज्य की एकछत्रता में बाधक प्रतीत हुआ स्वतः अनुकूलताओं में बदल गईं... और मौत हार गई।
और उसने इस बाधा को दूर करने के लिए मौत से सहायता द्वितीय बार नैनागिरि सिद्धक्षेत्र पर भाद्रपद मास में आचार्यश्री मांगी। लगता है मौत को मोह पर दया आई और उसने मोह की | पर रोग ने भीषण आक्रमण किया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि सहायता के लिए अपनी पूरी शक्ति के साथ आचार्यश्री पर आक्रमण हम लोग बुरी तरह घबरा गए। सब उपचार विफल हो रहे थे। दो किया। भीषण आक्रमण के बाद प्राप्त हुई असफलता से मौत | तीन दिन पहले ही पं. जगन्मोहन लाल जी शास्त्री पर्युषण पर्व में निराश हुई और एक दो बार नहीं लगातार 5 बार आक्रमण करती प्रवचन करने इन्दौर गए थे। आचार्यश्री ने कहा -"मेरी समाधि रही, किंतु हर बार असफल रही और ऐसे मौत हार गई। | का समय आ गया है तुरंत पंडित जी को बुलाओ।" उसी समय
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इन्दौर आदमी भेजकर पंडित जी को बुलवाया गया। पंडित जी । सानिध्य के अभाव में लगभग चार वर्षों से टाला जाता रहा यह इन्दौर में पर्युषण में एक भी दिन प्रवचन नहीं कर पाए और उन्हें | पंच कल्याणक उत्सव पुनः अनिश्चय के घेरे में आ गया। ज्योंलौटना पड़ा। पंडित जी के आने पर आचार्यश्री ने उन्हें कहा | ज्यों पंच कल्याणक की तिथियाँ निकट आ रही थीं हमारे श्वांस "पंडित जी मेरा समाधि का समय आ गया है। मैं समाधि लेना | ऊपर नीचे हो रहे थे। जयपुर के कुशल वैद्य सुशील कुमार जी चाहता हूँ, आप सहयोग करें।" पंडितजी स्थिति की विषमता को | का उपचार चल रहा था। एक-डेढ माह की लम्बी टाइफाइड की देखकर भी घबराए नहीं और द्रढ़ शब्दों में बोले "आचार्यश्री | बीमारी ने आचार्यश्री की देह को इतना कृष बना दिया था कि आपके शरीर पर केवल आपका ही अधिकार नहीं है। यह समाज उठना बैठना भी दूभर था। पंच कल्याणक उत्सव में केवल 10की सम्पत्ति है। आपको इस प्रकार गहन विचार किए बिना | 12 दिन का समय शेष रह गया था। पू. आचार्यश्री हमारी चिंता समाधि लेने की बात नहीं सोचनी चाहिए, अभी आपके द्वारा इस | को जान रहे थे और समय पर किसी भी तरह किशनगढ़ पहुँचने कलि काल में महती धर्म प्रभावना होना है। जल्दी ही आपका रोग | के लिए चिन्तित थे। दूसरे दिन प्रातः काल आचार्यश्री ने, जिस दूर हो जाएगा।" पंडितजी के आगे आचार्यश्री निरुत्तर हो गये। | मंदिर में ठहरे हुए थे उसकी वेदी की तीन प्रदक्षिणा लगाई। हमने धीरे-धीरे रोग शमन होने लगा और कुछ ही दिनों में पूज्यश्री इस को साधारण रूप में लिया, किंतु संभवतः आचार्यश्री तो स्वस्थ हो गए। जिस चमत्कारी ढंग से ऐसा भीषण रोग हुआ उसी अपनी देह की शक्ति को तोल रहे थे। शाम को लगभग 5 बजे मैं चमत्कारी ढंग से वह दूर भी हो गया और ऐसे मौत हार कर भाग | किसी सज्जन के निमंत्रण पर भोजन करने गया ही था कि पीछे से गई।
मंदिर के माली ने आकर समाचार दिया कि महाराज पीछी कमंडलु तृतीय बार थुबौन क्षेत्र के द्वितीय चातुर्मास में आचार्यश्री | उठाकर मंदिर के बाहर आ गए हैं और चांदपोल की ओर जाने की पर अत्यंत भीषण रोग का आक्रमण हुआ। संभवत: इस बार तैयारी में है। मैं उलटे पांव लौटा और पू. आचार्यश्री का कमंडलु पहले दो बार की अपेक्षा रोग की भीषणता अधिक थी। रोग के | पकड़ चलने लगा। रास्ते में आए दो-तीन मंदिरों में आचार्य श्री से कारण शरीर केवल हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया था। उस समय | रूकने की प्रार्थना की, किंतु वे तो आगे बढ़ते गए। मेरा विचार था का आचार्यश्री का फोटो देखकर उन्हें पहिचान पाना कठिन है। कि उन्हें आधा किलोमीटर से अधिक चलना नहीं चाहिए। किंतु तीन-चार मुनिराज कठिनता से उन्हें खड़ाकर आहार के लिए | वे तो चलते रहे और चांदपोल दरवाजे के बाहर खजांची जी की उठाते थे। कई दिन तक केवल आधा पौन कटोरी काढा मात्र | नसियाँ में आकर रूके। अब हमें यह विश्वास हो गया कि अब आहार में दिया जाता रहा। उस औषधि के आहार के समय आचार्यश्री किशनगढ़ की ओर विहार करेंगे। सांयकाल वैद्य जी सैकड़ों ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणी बहिनें एवं श्रावक, श्राविकाएँ आए। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री को एक-डेढ़ किलोमीटर से धर्मशाला के बगल की चट्टानों पर औषधि के निरंतराय आहार के अधिक नहीं चलाना है, नहीं तो टायफाइड का पुन: आक्रमण हो लिए णमोकार मंत्र का जाप देते रहते थे। अंत में 15-20 दिन के जायेगा। किशनगढ़ से और भी लोग आ गए। उस रात हम सो बाद धीरे-धीरे आचार्य श्री स्वस्थ होने लगे और पर्युषण के चतुर्दशी | नहीं सके । योजनाएँ बनाने में ही रात निकल गई। रात को नौ बजे के दिन सब भक्त जनों की प्रार्थना पर 10 मिनिट उपदेश दिया। किशनपोल बाजार से एक दुकान से लकड़ी का पटिया व प्लास्टिक सब श्रोता धन्य हो गए। आगामी 8-10 दिनों में आचार्यश्री उठने- की रस्सी खरीदकर डोली बनवाई जिसमें आचार्यश्री को बैठाकर बैठने, चलने लगे और धीरे-धीरे स्वस्थ हुए। ऐसे पुनः मौत हार | ले जाया जा सके। किशनगढ़ से एक जीप में चौके का पूरा सामान गई।
आ गया। पुरुष महिलाएँ भी आ गए। रात को ग्यारह बजे अजमेर चौथी बार पू. आचार्यश्री ने मौत का सामना किया कुंडलपुर | केसरगंज के श्री श्रीपत जी को फोन किया और उनसे जैसवाल से किशनगढ़ की यात्रा के बीच जयपुर में। कुंडलपुर से जयपुर | नव युवक मंडल के आठ मजबूत युवकों को डोली उठाने के लिए तक की लगभग 700 किलोमीटर की लगातार लम्बी यात्रा भीषण | भेजने के लिए कहा। उन्होंने तुरंत जीप से आठ युवकों को भेजा गर्मी के दिनों में पूरी की। यह यात्रा वास्तव में कठिन रही। मार्ग | जो प्रात: पाँच बजे तक जयपुर पहुँच गए। हम सबने मिलकर में एक बार तो लालसोट के आस-पास आहार की व्यवस्था भी मीटिंग की और आचार्यश्री को डोली से ले जाने की योजना नहीं बन पाई। गर्मी में लम्बा चलने के कारण जयपुर आते-आते | बनाई। हमने सोचा कि एक-डेढ़ किलोमीटर तक चलने के बाद आचार्यश्री को तीव्र ज्वर ने आ घेरा, जो धीरे-धीरे टाइफाइड में | सड़क के किनारे किसी वृक्ष के नीचे थोड़ी देर तक विश्राम करने बदल गया। निरंतर 106 डिग्री के आस-पास ज्वर रहने लगा। की आचार्य श्री से प्रार्थना करेंगे और जब वे बैठ जायेंगे तो उठने से आचार्यश्री के सानिध्य के बिना पंच कल्याणक उत्सव नहीं कराने पहले ही उन्हें चार युवक पकड़कर डोली में बैठा देंगे और का संकल्प लिए मदनगंज-किशनगढ़ की समाज उनके जयपुर | एकदम तेजी से चल पड़ेंगे। युवक इतने उत्साही थे कि वे कहने तक आने से अत्यंत हर्षित थी, किंतु आचार्यश्री की यह असाधारण | लगे कि चार-चार युवक बारी-बारी से डोली उठायेंगे और एक अस्वस्थता समाज की चिंता का कारण बन गई। पू. आचार्यश्री के | दिन में बीस पच्चीस किलोमीटर आसानी से पार कर लेंगे। चौका 16 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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बनाने के लिए रास्ते में आने वाले उपयुक्त स्थानों की सूची बनाई । ऐसे ही योजना बनाते प्रातः काल हो गया। आचार्यश्री सामायिक के बाद विहार के लिए तैयार हुए। जयपुर समाज के भाई-बहिन एवं वैद्य सुशील कुमार जी आए। वैद्य जी ने हमसे पुन: कहा कि उनकी कल कही हुई बात का पूरा ध्यान रखा जाये। आचार्यश्री ने जयपुर की जनता द्वारा किए जा रहे घोषों के बीच विहार प्रारंभ किया । इस को हम चमत्कार नहीं तो क्या कहें कि आकाश में कहीं बादल दिखाई नहीं देते हुए भी एकाएक आचार्यश्री के विहार के समय बादल छा गए और रिमझिम बरसात प्रारंभ हो गई। लगता था जैसे जयपुर से किशनगढ़ के पूरे विहारकाल में इन्द्र ने आगे-आगे वर्षा की व्यवस्था की हो। एक-दो किलोमीटर तक भीड़ कम हो गई। हम तथा अजमेर के युवक योजना की क्रियान्विति के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। मैंने आचार्य श्री से प्रार्थना की कि वे वैद्य जी की राय के अनुसार एक साथ अधिक दूर नहीं चलें और अभी 5-7 मिनिट विश्राम कर लेवें। हमने सड़क के किनारे पाटा लगा दिया था। डोली के सामान की जीप साथ चल रही थी। आचार्य श्री ने विश्राम स्वीकार नहीं किया। कहने लगे श्रमण श्रम करते हैं, विश्राम नहीं । आचार्यश्री आगे बढ़ते रहे और हम सब लोग असहाय से बगलें झाँकने लगे। पुनः चार-पाँच किलोमीटर चलने तक तनिक विश्राम की प्रार्थना की, वह भी नहीं सुनी गई। हम सब बहुत घबरा गए। वैद्य जी की चेतावनी बार-बार याद आ रही थी। थोड़ी दूर चलने पर मैंने आचार्यश्री से पुनः वैद्य जी द्वारा एक-दो किलोमीटर से अधिक नहीं चलने की बात कही और पुनः विश्राम की प्रार्थना की। आचार्यश्री ने कहा वैद्य जी को अपनी बात कहने दो और मुझे अपना काम करने दो। आचार्य श्री के चरण बिना रूके बढ़ते रहे। आचार्यश्री ने हमको डोली तैयार करने का एवं उन्हें डोली पर बैठाने का बिल्कुल अवसर ही नहीं दिया और गंतव्य की ओर उनके चरण बढ़ते रहे। हम किंकर्तव्यविमूढ़ से एक दूसरे की ओर देखते रहे और चलते रहे। डोली में जबर्दस्ती पकड़कर बैठा देने की बात तो बहुत दूर रही परंतु डोली में बैठने की प्रार्थना करने का भी साहस हम में से कोई नहीं जुटा सका। आचार्यश्री के आत्मबल और आत्म-तेज के आगे सभी भीगी बिल्ली बने चुपचाप साथ-साथ चलते रहे। पाठक गण अनुमान नहीं लगा पायेंगे कि उस सुबह डेढ़ माह की देह तोड़ भीषण टायफाइड से पीड़ित आचार्यश्री पहली बार कितना चल लिए होंगे। आप अधिक से अधिक 5-7-8-10 किलोमीटर का अनुमान लगा रहे होंगे। किंतु सच मानिए उस सुबह आचार्य श्री जयपुर से 18 किलोमीटर चलकर भांकरोटा आए। हम लोग बहुत चिंतित थे। हमने वैद्यजी से कहा "वैद्यजी हम क्या कोई भी, संकल्प के पक्के आचार्यश्री के आगे कुछ नहीं कर सकता था।" वैद्य जी कहने लगे “ऐसे संतों का जीवन तो असाधारण है जिस पर साधारण जीवन पर लागू होने वाले आयुर्वेद के सिद्धांत पूर्णतः लागू नहीं होते।" बैद्य जी ने यह
भी कहा कि मेरे ज्ञान के अनुसार रोगियों के इतिहास की पहली घटना है कि जब डेढ़ माह से तीव्र टायफाइड से पीड़ित रोगी, पहली बार अठारह किलोमीटर तो बहुत होता है एक किलोमीटर भी पैदल चल सका हो। यह तो लोकोत्तर महात्मा के जीवन की, लोकोत्तर घटना है। अंत में गर्भ कल्याणक के दिन सांयकाल किशनगढ़ के निकट आचार्य श्री पहुँच ही गए। वह किशनगढ़ का पंच कल्याणक महोत्सव आचार्य श्री का सान्निध्य पा ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बन गया। ऐसे फिर मौत हार गई और आचार्य श्री जीत गए ।
पाँचवी बार अमरकंटक के पास पेंड्रा रोड़ में आचार्य श्री पर जानलेवा हरपीज रोग का आक्रमण हुआ। रोग ने पूरी तीव्रता ग्रहण की। उठना बैठना भी कठिन । आहार औषधि लेना भी कठिन । प्रारंभ में रोग का निदान नहीं हो सका। बाद में जब निदान हुआ तो रोग अपने चरम उत्कर्ष पर था। आठ-दस दिन अत्यंत कठिनाई के रहे। धीरे-धीरे रोग शमन हुआ। परंतु फिर भी आगामी कुछ समय तक रोग का प्रभाव रहता है और पूर्ण स्वस्थता में कुछ माह लग जाते हैं। सभी लोग यह समझते थे कि अभी आचार्य श्री पैदल नहीं चल पायेंगे और उन्हें पैंड्रा रोड ही ठहरना पड़ेगा। किंतु लोकोत्तर संत की लोकोत्तर वृत्ति किसको आश्चर्य में नहीं डाल देगी कि आचार्यश्री अपूर्ण स्वस्थ दशा में ही बिहार कर 45 किलोमीटर का लम्बा कठिन पहाड़ी मार्ग चलकर अमरकंटक पहुँच गए। और ऐसे फिर मौत हार गई।
पू. आचार्य श्री के जीवन की अनेक घटनाएँ और उनकी चर्या उनकी लोकोत्तरता को सिद्ध करती है भयंकर रोगों के उक्त पाँच जान लेवा अवसरों पर जिस प्रकार मौत के मुँह तक पहुंचकर पुन: स्वस्थ हुए, इससे सिद्ध होता है कि आचार्य श्री का जीवन में संघ का विस्तार एवं गण पोषण का महान कार्य करना शेष था इसीलिए मौत हर बार हार गई। जन्म के साथ मृत्यु तो निश्चित है किंतु इस महान संत की आज्ञा लेकर समाधि साधना के साथ ही मौत आयेगी नही तो अपना नियोजित प्रभावना कार्य पूर्ण होने तक असामयिक अनचाही आई मौत पहले भी हारी है और आगे भी हारेगी।
लुहाड़िया सदन, जयपुर रोड़ मदनगंज किशनगढ़- 305801 जिला - अजमेर (राज.)
मुक्तक
योगेन्द्र दिवाकर
कोशिश से धूल में भी फूल मिल जाता है, कोशिश से अवसर भी अनुकूल मिल जाता है। सागर की लहरों से हार नहीं माने तो, तैरने से उसका भी कूल मिल जाता है।
-सितम्बर 2002 जिनभाषित 17
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समाज के उत्थान में युवाओं की भूमिका
कु. समता जैन युवा पीढ़ी परिवार, समाज एवं राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण सम्पत्ति । की सरिता सूखने नहीं देना चाहिये। उन्हें हमेशा प्रेरित करते रहना है। वर्तमान के संघर्षों और चुनौतियों का सामना करने पर ही वह | चाहिये। जब कोई कार्य युवाओं द्वारा गलत किया जाता है, तो भविष्य बनाती है। अर्थात् पुरानी पीढ़ी का अनुभव एवं नई पीढ़ी | समस्त अनैतिकता एवं बिगड़ते दूषित वातावरण का आरोप भी का संघर्ष अवश्य ही कार्यशील होकर नया निर्माण एवं फलीभूत | प्रायः युवकों पर ही लगा दिया जाता है, लेकिन हम यह भूल जाते हो सकता है। युवा पीढ़ी एवं पुरानी पीढ़ी के मध्य एक लंबा | हैं, कि युवा शक्ति को अधर्म, विध्वंश एवं अनैतिकता की ओर अंतराल होता है। समाज का उत्थान युवा ही कर सकते हैं, | उन्मुख करने में उस समाज का भी योगदान है, जो स्वयं शोषण, क्योंकि बचपन विवेक हीन होता है, जो खेल कूद में बीत जाता | अनाचार और अत्याचार की नींव पर खड़ा है। आज की स्थिति है। तथा बुढ़ापा सामर्थ्यहीन होता है जो रोगों के घिरने के कारण | इतनी विषम है, कि हम अपने को छोड़ सभी को भ्रष्टाचारी एवं निकल जाता है। युवाओं में विवेक तथा सामर्थ्य दोनों ही रहते हैं। पतित सिद्ध करने का दावा करते हैं। हम लोगों में से किसी के बुजुर्ग पुरानी बातें एवं बीते जमाने के गीतों को दोहराते रहते हैं, | पास भी इतना समय नहीं है कि वह आत्मावलोकन करके इस और उसे अच्छा बताते हैं। कभी-कभी ऐसे क्षण भी आते हैं जब | समस्या का सही निदान खोज सके। असंतोष और विद्रोह का विष नई पीढ़ी, पुरानी मान्यताओं, परम्पराओं एवं धारणाओं को ठुकराने | वृक्ष निरंतर ही बढ़ता चला जा रहा है। समाज ऐसा होना चाहिये, की कोशिश करती है, जो उचित नहीं है। इसे नये और पुरानों के | जहाँ युवकों के अंतर्गत भातृत्व, प्रेम, स्नेह, सद्भाव, दया, करुणा, बीच संघर्ष कह सकते हैं। काल चक्र तो गतिमान है; जो बदलते सेवा, परोपकार एवं धर्म के सप्तरंगी मधुर मंजुल इंद्र धनुष लहरायें। परिवेश, परिस्थितियों के अनुसार 'स्व' को ढाल लेते हैं, वे पुराने | युवा वर्ग समाज की पहचान और देश की शान होता है। आज वह होकर भी नये कहे जावेंगें।
अपने जीवन के चौराहे पर खड़ा होकर कर्तव्य विमुख हो रहा है। विश्व में किसी भी राष्ट्र, समाज ने उन्नति की है, तो उस युवा समाज भोगवाद के जुनून में अपनी बुद्धि वासना से जोड़ उन्नति की नींव युवाओं के कंधों पर ही मिलेगी। सरदार भगतसिंह, | चुका हो, वहाँ ऐसी परिस्थिति में युवा वर्ग की जीवन दिशा खोज महारानी लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, 1 पाना असंभव तो नहीं, लेकिन कठिन अवश्य है। आज युवा सुभाषचंद्र बोस जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी कुर्बानी देकर भौतिकता की चकाचौंध में गुम हो गये हैं, ये टेलीविजन संस्कृति फिरंगी सरकार को खदेड़कर भारत देश को आजादी का मंगल | के बढ़ते प्रभाव में भ्रमित सी नकारात्मक दिशा की ओर बढ़ रहे प्रभात दिखाने की भरपूर कोशिश की थी। युवा शक्ति का मूल्यांकन | हैं। युवाओं में दुर्व्यसन भी तेजी से गति पकड़ रहे हैं। जैसे जुआ
और सदुपयोग जिस राष्ट्र के नेता ने कर लिया हो, वह राष्ट्र किसी खेलना, शराब पीना, तंबाकू, पान, गुटखा आम बात हो गई है। न किसी दिन विश्व का अजेय शत्रु और स्वर्ग का कोना, अवश्य इसकी गिनती फैशन में होने लगी है। इस प्रकार दुर्व्यसन में करीब बनेगा।
75% युवा पीढ़ी उलझी हुई है, दुर्व्यसन तभी छूट सकते हैं, जब नई पीढ़ी बुद्धिमान, उत्साही एवं सुसंस्कारी भी है। शिक्षा, | वह धर्म के मर्म को समझे। धर्म ही इस भ्रमात्मक स्थिति से व्यवसाय आदि क्षेत्रों में हमारी युवा पीढ़ी धीरे-धीरे ही सही किंतु निकाल सकता है। लेकिन आज भी नई पीढ़ी का धर्म के प्रति प्रतिष्ठित होती जा रही है। यह जैन समाज के लिए खुशी की बात उदासीन होना स्वाभाविक है। आज की पीढ़ी किसी बात को तर्क है आज हमारे समाज के युवा हजारों की संख्या में डाक्टर, इंजीनियर, | की कसौटी पर कसे बिना मानने को तैयार नहीं है। क्योंकि आज सी.ए., केन्द्र एवं राज्य सरकारों में उच्च पदों पर हैं। पत्रकार, कवि | का युग वैज्ञानिक युग है। पर जैन धर्म की आधार शिला भी तो आदि क्षेत्रों में भी नये चेहरे उभर रहे हैं। श्रम, सेवा एवं संस्कारों वैज्ञानिक है। आवश्यकता है, उन्हें सही तरीके से समझाने की। के बल पर ही व्यक्ति आगे बढ़ता है। जिसने संस्कारों को गौण | आज सारे देश में विद्यार्थियों में अनुशासन हीनता बढ़ती जा रही मान लिया, वह उन्नति कर ही नहीं सकता है। और ये संस्कार हमें है। उसका कारण धार्मिक शिक्षा का अभाव है। यदि हम नई पीढ़ी अपने माता-पिता से मिलते हैं। माता-पिता का व्यवहार बिना | को अपनी संस्कृति का ज्ञान नहीं करायेंगे तो वह भटक जायेगी। सिखाये ही बच्चों के अंत:करण में उदारता, सद्भावना, मैत्री, | धार्मिक शिक्षा से नई पीढ़ी को सुसंस्कृत, सभ्य, अहिंसा प्रिय सहयोग और समानता जैसे गुणों का सफल एवं स्थाई प्रत्यारोपण बनाया जा सकता है। और उनका नैतिक स्तर पतन की ओर जाने कर देता है।
से रोका जा सकता है। युवा ही समाज के कर्णधार, भूत और भविष्य के सेतु तथा | धर्म के विकास के लिये युवा पीढ़ी में हमें कथनी और वर्तमान के सशक्त आधार होते हैं। उनके अंतरंग से हमें सौहार्द | करनी के अंतर को समाप्त करना होगा। अर्थात् हमें कर्म और 18 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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वचन में एकरूपता लानी होगी तभी हम युवा पीढ़ी को धर्म की । संगत की त्रिवेणी है। किंतु प्रस्तुतीकरण, भाषा-शैली पुरानी है, भावना में निहित वास्तविक कल्याण की ओर कर पायेंगे। जो नई पीढ़ी को कम आकर्षित कर रही है। इसे नया रूप देना
युवा शक्ति एक ऐसी शक्ति है, जिससे बड़े से बड़े काम | जरूरी हो गया है। एक ओर तो हम पश्चिमी संस्कृति को बढ़ावा दे आसानी से हो जाते हैं। क्योंकि युवाओं में जोश होता है, कुछ कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर पश्चिमी संस्कृति वाले शाकाहार, रहनगुजरने की क्षमता होती है और जो करना चाहते हैं,उसे जल्द ही सहन एवं फैशन में भारतीयता की नकल कर रहे हैं। सभाकरके सबके सामने प्रस्तुत करते हैं । युवाओं की तार्किक शक्ति, संस्थाओं के कार्यक्रमों में अथवा प्रवचनों में हम देखते हैं कि सोचने, विचारने की शक्ति बच्चों और वृद्धों की अपेक्षा अधिक | बुजुर्ग एवं बच्चे युवक-युवतियाँ सभी होते हैं कितु मेरा अनुभव है होती है। वे जो सोच लेते हैं, करके दिखलाते हैं। धर्म के प्रचार- | कि काफी संख्या में युवा पीढ़ी ध्यान से प्रवचन/व्याख्यान/भाषणों प्रसार के लिये आवश्यक है, कि नव युवकों को इस ओर प्रेरित | को सुनते हैं तथा यदि कहीं उन्हें शंका होती हैं, तो पास बैठे लोग किया जाये। इसी बात को लक्ष्य करके जगह-जगह मंडल, युवा | तुरंत समाधान भी करते हैं। क्या उसे इनकी धर्म प्रभावना नहीं संगठन, युवा फेडरेशन आदि संस्थायें स्थापित हैं।
| मान सकते हैं? अवश्य मानते हैं। विज्ञान के नवीनतम आरामदेह संसाधन और भोग सामग्रियाँ
हमारा प्रत्येक जैन-परिवार से आग्रह है कि साधु-साध्वियों इतने समय के पश्चात भी मानव जगत में शांति का सौहार्दपूर्ण
के सान्निध्य में होने वाले प्रवचनों, सभाओं में अवश्य ही युवा वातावरण निर्मित करने में समर्थ नहीं हो सकी हैं, और नहीं
पीढ़ी को भेजने एवं साथ ले जाने का लक्ष्य रखें। युवक-युवतियों भविष्य में कर पाना ही संभव है। आज युवा को भौतिक पर्यावरण की चकाचौंध से हटाकर धर्म की आरे प्रेरित करना है, क्योंकि
से भी कहना है कि घर में कभी अश्लील साहित्य न पढ़ें, बल्कि विश्व में शान्ति लाना है। शांति लाने का एक मात्र उपाय धार्मिक
जैन साहित्य अवश्य पढ़ें। जिससे कि अपने संस्कारों को पूर्ववत् भावनायें जागृत करना है।।
संजाये रखें और गर्व का अनुभव करें। तथा समस्त युवा वर्ग से आज अंग्रेजी शिक्षा युवाओं पर अधिक हावी है। बदलते
आग्रह है कि हमेशा अहिंसामयी जैन-धर्म का प्रचार-प्रसार करें। परिवेश में तो अंग्रेजी शिक्षा गलत नहीं है। किंतु अपने धर्म एवं
तब हम कह सकते हैं कि समाज में युवाओं की अहं भूमिका है। संस्कारों के साहित्य को भी इसमें जोड़ना जरूरी है। युवा वर्ग
समाज का उत्थान युवाओं के द्वारा ही हुआ है, और होता रहेगा। आदि कोई बात स्वीकारना भी चाहता है, तो उसके लिए वैज्ञानिक
सुपुत्री - श्री सुरेश जैन 'मारौरा' आधार होना जरूरी है। हमारा धर्म बौद्धिक, वैज्ञानिक एवं तर्क
जीवन सदन, सर्किट हाउस के पास शिवपुरी (म.प्र.)
वाह रे! दूध के धुले
सब जन अपने आप को, समझत हैं निर्दोष। किन्तु उन्हें यह होश ना, यह भी है इक दोष ॥ मात्र दोष ही देख मत, कुछ तो गुण भी देख। दोष देखना आपका, बडा दोष है एक ॥ कठिन काम समझो वही, जो खुद को उपदेश। सरल काम समझो वही, जो पर को उपदेश ॥ सज्जन पूजन भजन में, अपना समय बिताय। दुर्जन भोजन कलह में, जीवन व्यर्थ गमाय ॥ दुर्गुण रूपी खून से, भरे हो खुद हि आप। फिर भी दूध के ही धूले, क्यों समझत हो आप॥ पाप करे दिन रात तो, पुण्य कहाँ से आय। बोये बीज बबूल तो, आम कहाँ से आय ॥
मुनि श्री उत्तमसागर जी केवल दुर्गुण देखना, दुर्जन का है काम। ज्यों सूअर मल शोधता, पाकर भी फल-धाम ॥ साथी का साथी बनो, चलो साथ ही साथ। यह न बने तो मत करो, साथी का ही घात ।।
आँखें सब को देखती, खुद को देखत नाहि । दुर्जन भी पर दोष ही,-देखे खुद को नाहि ।। सज्जन का धन गुण रहा, दुर्जन का धन दोष। दोनों उद्यम नित करें, भरने निज-निज कोष । बोली गोली से बड़ी, कर देती है घाव। याते ऐसा बोल मत, बिगड़े सब के भाव ।। दुर्जन की अरु आग की समझो एक ही जात । दूसरों को तो शुद्ध करे, स्वयं राख हो जात।
(संघस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज)।
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जिज्ञासा-समाधान
पं. रतनलाल बैनाड़ा जिज्ञासा - त्रस नाड़ी की लम्बाई कितनी है? क्या त्रस | अर्थ - वृक्ष में (स्थित) सार की तरह, लोक के बहुमध्य नाड़ी और लोक नाड़ी एक ही बात है?
भाग में एक राजू लम्बी चौड़ी और कुछ कम तेरह राजू ऊँची समाधान - लोकनाड़ी और त्रस नाड़ी को लगभग सभी त्रस-नाली है। त्रसनाली की कमी का प्रमाण तीन करोड़, इक्कीस लेखकों ने पर्यायवाची माना है। यद्यपि लोकनाड़ी शब्द 'सिद्धान्तसार लाख, बासठ हजार दो सौ इकतालीस धनुष एवं एक धनुष के दीपक' आदि ग्रन्थों में पढ़ने को तो मिलता है पर लोकनाड़ी और तीन भागों में से दो (2/3) भाग है। त्रसनाड़ी के स्वरूप में भेद नहीं करके दोनों का एक ही स्वरूप भावार्थ - त्रस नाड़ी की ऊँचाई 14 राजू है। इसमें सातवें लिखा है। परन्तु जब गौर से देखें तो लोक के मध्य भाग में एक | नरक के नीचे एक राजू प्रमाण कलकल नामक स्थावर लोक है। राजू चौड़ी और एक राजू मोटी तथा चौदह राजू लम्बी लोकनाड़ी | इसमें त्रस जीव नहीं रहते। शेष तेरह राजू में से भी ऊपर और नीचे तथा एक राजू मोटी, चौड़ी एवं तेरह राजू के कुछ कम लम्बी त्रस | का कुछ स्थान घटाने से कुछ कम तेरह राजू प्रमाण त्रस नाड़ी नाड़ी उचित प्रतीत होती है।
सिद्ध होती है जो इस प्रकार हैलोक का जितना भाग त्रस जीवों का निवास क्षेत्र है उसे | 1. महातम प्रभा नामक सप्तम भूमि जो आठ हजार योजन त्रस नाड़ी या त्रस नाली कहते हैं । यद्यपि पूरी चौदह राजू लम्बी मोटी है, के मध्य भाग में ही नारकियों का निवास है अर्थात् नीचे लोक नाड़ी के, निचले एक राजू से कुछ अधिक भाग में त्रस | के 3999-1/3 योजन में (3199466-2/3 धनुष) त्रस जीव नहीं जीवों का निवास नहीं है, फिर भी आचार्यों ने त्रस नाड़ी को चौदह | हैं। अतः यह संख्या 13 राजू में से घटानी चाहिए। राजू लम्बा भी माना है। जैसा कि 'सिद्धांतसार दीपक' के प्रथम 2. उर्ध्वलोक में सर्वार्थसिद्धि विमान के ध्वजदण्ड से अधिकार श्लोक नं. 72 में कहा है -
ईष्त्प्राग्भार नामक आठवीं पृथ्वी 12 योजन दूर है ईष्प्राग्भार लोकस्य मध्यभागेऽस्ति त्रसनाड़ी त्रसान्विता। पृथ्वी की मोटाई 8 योजन है इसके ऊपर दो कोश मोटा घतोदधि
चतुर्दशमहारज्जूत्सेधा रज्जवेक विस्तृता ॥ 92।। वलय,एक कोश मोटा घनवातवलय तथा 1575 धनुष मोटा
अर्थ - लोक के मध्य भाग में त्रस जीवों से समन्वित, | तनुवातवलय है। उर्ध्वलोक के इन 96000 + 64000 + 4000 + चौदह राजू ऊँची और एक राजू चौड़ी त्रसनाड़ी (नाली) है। 2000 + 1575 धनुष = 167575 धनुष हुए। श्री त्रिलोकसार गाथा 143 में इस प्रकार कहा है
इस प्रकार अधोलोक और उर्ध्वलोक दोनों त्रसजीव रहित लोयबहुमज्झदेसे रुक्खे सारत्व रज्जुपदटजुदा । । स्थान का जोड़ (32162241-2/3 धनुष) कम बैठता है। चोद्दसरज्जुत्तुंगा तसणाली होदि गुणणामा ॥43॥
उपर्युक्त प्रमाणों के अनुसार लोकनाड़ी का विस्तार 14 अर्थ- लोकाकाश के मध्य प्रदेशों में (बीच में) वृक्ष के राजू और त्रस नाड़ी का विस्तार 13 राजू में से 32162241-2/3 मध्य में रहने वाले सार भाग के सदृश, तथा एक राजू प्रतर सहित | धनुष कम मानना चाहिए। चौदह राजू ऊँची और सार्थक नाम वाली त्रस नाली है।
जिज्ञासा- क्या संसारी अवस्था में जीव को मूर्तिक कहा तिल्लोयण्णत्तिकार आ.यतिवृषभ ने तो एक विवक्षा से | जा सकता है? अधिकार 2 गाथा 8 के द्वारा सम्पूर्ण लोक को भी नाड़ी कहा है: समाधान - "जीव अमूर्तिक ही है" ऐसा एकान्त नहीं
उववाद-मारणंतिय-परिणद-तस-लोय-पूरणेण गदो। है। जैसा सर्वार्थ सिद्धि अध्याय-2, सूत्र-7 की टीका में कहा है
केवलिणो अवलंबिय सव्व-जगो होदितस-णाली॥8॥ हिन्दी अर्थ -आत्मा के अमूर्तत्व के विषय में अनेकान्त
अर्थ - अथवा उपपाद और मारणांतिक समुद्घात में | है। यह कोई एकान्त नहीं कि आत्मा अमूर्तिक ही है। कर्मबन्ध परिणत त्रस तथा लोकपूरण समुद्घात को प्राप्त केवली का आश्रय | रूप पर्याय की अपेक्षा उसका आवेश होने के कारण कथंचित् मूर्त करके सारा लोक त्रस-नाली है। ॥8॥ त्रस नाड़ी का स्वरूप | है और शुद्ध स्वरूप की अपेक्षा कथंचित् अमूर्त है। तिल्लोयपण्णत्तिकार ने अधिकार-2, गाथा-6 में इस प्रकार कहा
बंधं पडि एयत्तं लक्खणदो हवइ तस्स णाणत्तं।
तम्हा अमुत्ति भावो णेयंतो होई जीवस्स। लोय-बहु मज्झ देसे तरुम्मि सारं व रज्जु-पदर-जुदा। अर्थ - यद्यपि आत्मा बन्ध की अपेक्षा एक है, तथापि तेरस रज्जुच्छेहा किचूंणा होदि तस-णाली ॥6॥ | लक्षण की अपेक्षा वह भिन्न है। अत: जीव का अमूर्तिक भाव ऊण-पमाणं दंडा कोडि-तियं एक्कवीस-लक्खाणं। अनेकान्त रूप है। वह एक अपेक्षा से तो है और एक अपेक्षा से
वास४ि च सहस्सा दुसया इगिदाल दुतिभाया ॥7॥ | नहीं है। 20 सितम्बर 2002 जिनभाषित
है:
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सर्वार्थसिद्धि अध्याय -1 के 27 वें सूत्र की टीका में इस | गाथार्थ - जो रत्नत्रय सहित, निरंतर धर्म का उपदेश देने प्रकार कहा है:-"रुपिषु इत्यनेन पुद्गला: पुद्गल द्रव्यसंबन्धाश्च | में तत्पर है, वह आत्मा उपाध्याय है, मुनिवरों में प्रधान है, उसे जीवा: परिगृह्यन्ते" सूत्र में कहे गये "रुपिषु" इस पद से पुद्गलों | नमस्कार हो। का और पुद्गलों से बद्ध जीवों का ग्रहण होता है।
श्री राजवार्तिक अ.9 सूत्र 24 की टीका में इस प्रकार कहा वृहदद्रव्यसंग्रह गाथा-7 की टीका में ब्रह्मदेव सूरी ने इस | है -“विनयेनोपेत्य यस्माद् व्रतशीलभावनाधिष्ठानादागमं प्रकार कहा है:- हिन्दी अर्थ - "ववहारा मुत्ति' क्योंकि जीव श्रुताख्यमधीयते इत्युपाध्यायः" जिस व्रत शील भावनाशाली अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नय से मूर्तिक है, अत: कर्म बन्ध महानुभाव के पास जाकर भव्यजन विनयपूर्वक श्रुत का अध्ययन होता है। जीव मूर्तिक किस कारण से है? "बंधादो" अनन्त | करते हैं वे उपाध्याय हैं। ज्ञानादि की उपलब्धि जिसका लक्षण है ऐसे मोक्ष से विलक्षण सर्वार्थसिद्धि 309, सूत्र 24 की टीका में इस प्रकार कहा अनादि कर्म बन्धन के कारण जीव मूर्त है।
है-"मोक्षार्थ शास्त्रमुपेत्य यस्मादधीयत इत्युपाध्याय:" अर्थ-मोक्ष तत्त्वार्थसार 5/16-19 में आ. अमृतचन्द्र स्वामी ने इस | के लिए पास जाकर जिससे शास्त्र पढ़ते हैं वह उपाध्याय कहलाता प्रकार कहा है-"अमूर्तिक आत्मा का मूर्तिक कर्मों के साथ बन्ध असिद्ध नहीं है, क्योंकि अनेकान्त से आत्मा में मूर्तिकपना सिद्ध आ. कुन्दकुन्द ने भी नियमसार गाथा-74 में इस प्रकार है। कर्मों के साथ अनादिकालीन नित्य संबंध होने से आत्मा और | कहा है- रयणत्तयसंजुत्ता जिणकहियपयत्थदेसया सूरा। कर्मों में एकत्व हो रहा है। इसी एकत्व के कारण अमूर्त आत्मा में | णिक्कंखभावसहिया उवज्झायाएरिसा होति । अर्थ-रत्नत्रय से संयुक्त भी मूर्तत्व माना जाता है। जिस प्रकार एक साथ पिघलाए हुए | जिनकथित पदार्थों में शूरवीर उपदेशक और नि:कांक्ष भाव सहित, स्वर्ण तथा चांदी का एक पिण्ड बनाए जाने पर परस्पर प्रदेशों के | ऐसे उपाध्याय होते हैं। मिलने से दोनों के एकरूपता मालूम होती है। आत्मा के मूर्तिक उपर्युक्त प्रमाणों के अनुसार उपाध्याय परमेष्ठी के विशेष मानने में एक युक्ति यह भी है कि उस पर मदिरा (मूर्त पदार्थ) का | 25 गुणों से रहित, अध्ययन करने-कराने में तत्पर तथा आचार्य प्रभाव देखा जाता है इसलिए आत्मा मूर्तिक है। क्योंकि मदिरा | द्वारा उपाध्याय पद पर दीक्षित मुनिराज को भी उपाध्याय परमेष्ठी अमूर्तिक आकाश में मद को उत्पन्न नहीं कर सकती। | मानना आगम सम्मत है। वर्तमान में ऐसे उपाध्याय परमेष्ठी का
श्री वीरसेन स्वामी ने धवल पु. 13/11, 333 तथा धवल अभाव नहीं मानना चाहिए। पु. 15/33-34 में इस प्रकार कहा है-संसार अवस्था में जीवों में जिज्ञासा- क्या शास्त्रों में ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि दंतमंजन अमूर्तपना नहीं पाया जाता। इसीलिए "जीव द्रव्य अमूर्त है तथा | करके ही मंदिर जाना चाहिए? पुद्गल द्रव्य मूर्त फिर इनका बंध कैसे हो सकता है" यह प्रश्न ही समाधान -श्री भव्यमार्गोपदेश उपासकाध्ययन में भट्टारक नहीं उठता। प्रश्न-यदि संसार अवस्था में जीव मूर्त है तो मुक्त होने | जिनचंद्रसूरी ने इस प्रकार कहा है : पर वह अमूर्तपने को कैसे प्राप्त हो सकता है? उत्तर-यह कोई दोष
दन्तकाष्ठं तदा कार्य गण्डूषैः शोधयेन्मुखम्। नहीं है क्योंकि जीव में मूर्तपने का कारण कर्म है, कर्म का अभाव
तदा मौनं प्रतिग्राह्यं यावदेव विसर्जनम्॥347 ।। होने पर तद्जनित मूर्तत्व का भी अभाव हो जाता है और इसलिए
क्षेत्र प्रवेशनाद्यैश्च मन्त्रैः क्षेत्रप्रवेशनम्। सिद्ध जीवों के अमूर्तपने की सिद्धि हो जाती है। इस प्रकार संसारी
ततः ईर्यापथं शोध्यं पश्चात् पूजां समारभेत् ॥348 ।। जीव व्यवहारनय से मूर्त है और निश्चयनय से अमूर्त है यह सिद्ध अर्थ- देव पूजा से पूर्व काष्ठ की दातुन करनी चाहिए और होता है।
जल के कुल्लों द्वारा मुख की शुद्धि करनी चाहिए। तत्पश्चात् देव जिज्ञासा- जैन आगम में उपाध्याय परमेष्ठी के 25 मूलगुण | विसर्जन करने तक मौन ग्रहण करना चाहिए ॥347 ॥ जिनमंदिर में होते हैं। वर्तमान में उन 25 मूलगुणों वाला या उनमें से एक प्रवेश करने आदि के मंत्रों का उच्चारण करते हुए धर्म क्षेत्र में मूलगुण वाला भी कोई मुनि दुष्टिगोचर नहीं होता? तो क्या प्रवेश करना चाहिए। पश्चात् ईर्यापथ की शुद्धि करके पूजा को वर्तमान में उपाध्याय परमेष्ठी का अभाव मानना चाहिए। प्रारंभ करें ।।348॥
समाधान - जैन आगम में उपाध्याय परमेष्ठी की परिभाषा । श्री धर्मसंग्रह श्रावकाचार (पं. मेघावी) में इस प्रकार करते हुए आचार्यों ने 25 मूलगुणधारी के अलावा जो पठन-पाठन | कहा हैएवं संघ को उपदेश आदि देने का कार्य करते हैं और आचार्यों
मत्वेति चिकुरान्मृष्टवा दन्तामपि गृहव्रती। द्वारा उपाध्याय पद पर नियुक्त किये जाते हैं उनको भी उपाध्याय
देशे निर्जन्तुके शुद्धे प्रमृष्टे प्रागुदङ्मुखः ।।50॥ परमेष्ठी कहा है। द्रव्यसंग्रह गाथा-53 में इस प्रकार कहा है
गालितैर्निमलैीरेः सन्मन्त्रेण पवित्रितैः। जो रयणत्तयजुत्तो णिच्चं धम्मोवदेसणे णिरदो।
प्रत्यहं जिनपूजार्थं स्नानं कुर्याद्यथाविधि ॥51 ।। सो उवज्झाओ अप्पा जदिवरवसहो णमो तस्स ॥3॥ | अर्थ- जिनपूजादि में स्नान करने को निर्बाध समझकर
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गृहस्थों को चाहिए कि अपने केश तथा दाँतों को धोकर पूर्व दिशा सभी शास्त्र सौधर्म, सानत्कुमार, ब्रह्म, लान्तव,आनत तथा अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जीवरहित, पवित्र तथा | आरण स्वर्ग के इन्द्रों को दक्षिणेन्द्र मानने में एक मत हैं, परन्तु मार्जन (झाड़े) किये हुए किसी स्थान में छाने हुए तथा शास्त्रोक्त | पाँचवें एवं छठे युगल के किस स्वर्ग में इन्द्र रहता है इस संबंध में मन्त्रों से पवित्र किए हुए निर्मल जल से प्रतिदिन जिनपूजा के लिए | शास्त्रों में विभिन्न मत पाये जाते हैं। स्नान करें 150-51 ।।
(अ) निम्नलिखित शास्त्रों में पाँचवें युगल के महाशुक्र श्री यशस्तिलकचम्पू उपासकाध्ययन (रचियता-सोमदेव) | स्वर्ग में छठे युगल के सहस्त्रार स्वर्ग में इन्द्र माने गये हैं-श्री श्लोक नं. 439 में कहा है :
तिलोयपण्णत्ति अधिकार-8, गाथा नं. 131 से 135 एवं 341 से दन्तधावनशुद्धास्यो मुखवासोवृताननः । 352, सिद्धांतसार दीपक अधिकार-15, श्लोक 6-7, श्री त्रिलोकसार
असंजातान्यसंसर्गः सुधीर्देवानुपाचरेत्।।439॥ गाथा 4541
अर्थ- दातोन से मुख शुद्ध करे और मुख पर वस्त्र लगाकर (आ) निम्नलिखित शास्त्रों में पाँचवें युगल के शुक्र स्वर्ग दूसरों से किसी तरह का सम्पर्क न रखकर जिनेन्द्र देव की पूजा | में और छठे युगल के सतार स्वर्ग में इन्द्र माने गये हैं-सर्वार्थसिद्धि, करें 1439॥
राजवार्तिक, तत्त्वार्थवृत्ति, श्लोकवार्तिक इन सभी में तत्त्वार्थसूत्र सागारधर्मामृत अध्याय 6 के श्लोक नं. 3 की स्वोपज्ञ अध्याय-4, के 19वें सूत्र की टीका में तथा वृहदद्रव्यसंग्रह की टीका करते हुए पं. आशाधर जी ने शुचिः शब्द के अर्थ में "विधिवत् गाथा 35 की टीका में। शौच, दंतधाव न आदि करके" पूजन करे ऐसा कहा है।
(इ) हरिवंशपुराण सर्ग6 श्लोक नं. 101-102 के अनुसार इस प्रकार उपर्युक्त श्रावकाचारों के अनुसार दन्तधावन | | ब्रह्म और शुक्र स्वर्ग में इन्द्र माने गये हैं तथा लान्तव-कापिष्ठ (मंजन) करके ही मंदिर प्रवेश या पूजन करने का विधान पाया | युगल स्वर्ग में और सतार-सहस्त्रार स्वर्ग में इन्द्र माने गये हैं। जाता है।
उपर्युक्त तीनों मतों को ध्यान में रखने से यह निश्चित होता प्रश्नकर्ता - एच.डी. बोपलकर, उस्मानाबाद
जिज्ञासा-स्वर्ग के इन्द्रों में से कौन-कौन से इन्द्र दक्षिणेन्द्र 1. उपर्युक्त "अ" मान्यता वाले शास्त्रों के अनुसार पहले, हैं और कौन से उत्तरेन्द्र ?
तीसरे, पाँचवें, सातवें और तेरहवें, पन्द्रहवें स्वर्ग के 6 इन्द्र दक्षिणेन्द्र समाधान - तत्त्वार्थसूत्र के अनुसार 16 स्वर्गों में 12 इन्द्र |
इन्द्र हैं और शेष 6 इन्द्र, उत्तरेन्द्र हैं। हैं अर्थात् सौधर्म ऐशान, सानत्कुमार व माहेन्द्र में एक-एक इन्द्र
2. उपर्युक्त "आ" मान्यता के अनुसार पहले, तीसरे, है। ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ठ, शुक्र-महाशुक्र, सतार-सहस्त्रार
पाँचवे, सातवें, नोंवें, ग्यारहवें, तेरहवें, पन्द्रहवें स्वर्ग के आठ इन्द्र इन चार युगलों में एक-एक इन्द्र हैं तथा आनत, प्राणत, आरण, अच्युत इन चार स्वर्गों में एक-एक इन्द्र है। यहाँ यह भी समझ
दक्षिणेन्द्र हैं शेष चार इन्द्र उत्तरेन्द्र हैं। लेना चाहिए कि स्वर्ग नं. 1-3-5-7-9-11-13-15 तो दक्षिण 3. श्री हरिवंशपुराण के अनुसार पहले, तीसरे, पाँचवे, के हैं, यदि इनमें इन्द्र रहता है तो दक्षिणेन्द्र है और शेष बचे हुए | नौंवें, तेरहवें और पन्द्रहवें स्वर्ग के 6 इन्द्र दक्षिणेन्द्र और शेष 6 2-4-6-8-10-12-14-16 ये उत्तर के स्वर्ग हैं, यदि इनमें इन्द्र | इन्द्र उत्तरेन्द्र हैं। रहता है तो उत्तरेन्द्र होता है।
___1/205, प्रोफेसर्स कालोनी, आगरा- 282002 (उ.प्र.)
है कि
('जिनभाषित' के सम्बन्ध में तथ्यविषयक घोषणा प्रकाशन स्थान
1/205, प्रोफेसर्स कालोनी, आगरा-282002 (उ.प्र.) प्रकाशन अवधि
मासिक मुद्रक-प्रकाशक
रतनलाल बैनाड़ा राष्ट्रीयता
भारतीय पता
1/205, प्रोफेसर्स कालोनी, आगरा-282002 (उ.प्र.) सम्पादक
प्रो. रतनचन्द्र जैन पता
137, आराधना नगर, भोपाल-462003 (म.प्र.) स्वामित्व
सर्वोदय जैन विद्यापीठ 1/205, प्रोफेसर्स कालोनी, आगरा- 282002 (उ.प्र.) ___मैं, रतनलाल बैनाड़ा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार उपर्युक्त विवरण सत्य है।
रतनलाल बैनाड़ा, प्रकाशक
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श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, छात्रावास,सांगानेर एक आदर्श संस्था
महावीर प्रसाद पहाड़िया
विश्व विख्यात गुलाबी नगर जयपुर से 10 किलोमीटर | श्री शीतलचन्द्र जी जैन भी समर्पित एवं वात्सल्य भाव से स्वयं दक्षिण में स्थित सांगानेर की ऐतिहासिक पुण्य धरा पर परम पूज्य | छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। समय-समय पर बाहर से संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद | विद्वानों को बुलाकर भी छात्रों को प्रशिक्षित कराया जाता है। एवं उनके सुयोग्य शिष्य मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज छात्रावास के सभी छात्र लौकिक एवं नियमित शिक्षा प्राप्त करने की मंगल प्रेरणा से 1 सितम्बर 1996 को श्री दिगम्बर जैन श्रमण | हेतु श्री दिगम्बर जैन संस्कृत महाविद्यालय जयपुर में प्रतिदिन जाते संस्कृति संस्थान अन्तर्गत आचार्य ज्ञानसागर छात्रावास का | बीजारोपण हुआ, भवन का शिलान्यास हुआ और मात्र 8-9 माह छात्रावास में 10वीं कक्षा उत्तीर्ण छात्रों को विधिवत् के अल्प समय में ही छात्रावास भवन की प्रथम मंजिल के 35 साक्षात्कार लेकर प्रवेश दिया जाता है। ये छात्र 5 वर्ष छात्रावास में कमरे व भूतल का विशाल ध्यान कक्ष निर्मित होकर उसमें छात्रावास रहकर राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री (बी.ए.) की का शुभारम्भ, 20 जुलाई 1997 को वीर शासन जयंती एवं गुरु | उपाधि प्राप्त करने के साथ-साथ छात्रावास में प्रात: सांय धर्मग्रन्थों पूर्णिमा के पावन अवसर पर, कर दिया गया। 10वीं कक्षा उत्तीर्ण की शिक्षा प्राप्त कर योग्य विद्वान बनकर समाज को समर्पित होते छात्रों को शास्त्री कक्षा (बी.ए.) तक के 5 वर्षीय अध्ययन हेतु | हैं। छात्रों को प्रात: सायं एवं रात्रि को छात्रावास में प्रार्थना, ध्यान, प्रवेश दे दिया गया।
पूजन, जैनदर्शन का अध्ययन उपर्युक्त वर्णित विद्वानों एवं योग्य वर्तमान में छात्रावास भवन की तीनों मंजिलें व सम्पूर्ण ब्रह्मचारीयों द्वारा कराया जाता है। ब्रह्मचारी भाईयों में श्री संजीव परिसर का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। भवन में छात्रों हेतु 100 | भैया, श्री महेश भैया, श्री भरत भैया आदि उच्च कोटि के समर्पित कमरे, 6 शिक्षण कक्ष, वाचनालय कक्ष, अतिथि कक्ष, ध्यान | विद्वान हैं। संस्थान और यहाँ के छात्र आपकी सेवाओं का भरपूर कक्ष, समस्त छात्रों के एक साथ भोजन करने की क्षमतावाला | लाभ ले रहे हैं, तथा इन्हें पाकर धन्य हैं। व्यवस्थापक एवं अधीक्षक विशाल हॉल एवं सुसज्जित भोजनशाला पूर्ण रूप से तैयार है तथा | के रूप में श्री सुकान्त जी व संस्कृत शिक्षक के रूप में श्री राकेश इनका उपयोग वर्तमान में रह रहे 135 छात्रों द्वारा हो रहा है। जी की सेवायें भी उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त दो मंजिला आधुनिक सुविधाओं से युक्त अधिष्ठाता समय की माँग को देखते हुए छात्रों को कम्प्यूटर का निवास भी गत वर्ष बनकर तैयार हो चुका था। जिसमें छात्रावास | प्रशिक्षण भी दिया जाता है। संस्कृत एवं अंग्रेजी की अतिरिक्त के अधिष्ठाता एवं छात्रों को आगमानुकूल धार्मिक शिक्षा देकर | कक्षायें लगाकर छात्रों को ये दोनों विषय सुदृढ़ कराये जाते हैं। मार्ग प्रशस्त करने वाले ख्यातिप्राप्त विद्वान श्री रतनलाल जी बैनाड़ा, | छात्रों को खेल के शानदार मैदान के साथ-साथ खेल की आवश्यक अन्य ब्रह्मचारी शिक्षक गण एवं जाने-माने जन कवि तथा छात्रावास | सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है। वाचनालय एवं पुस्तकालय के उपअधिष्ठाता श्री राजमल जी बेगस्या निवास करते हैं। ऐसे | की भी सुविधा उपलब्ध है। यहाँ छात्रों को भोजन-वस्त्र, निवास, शानदार और दर्शनीय भवन को इतने कम समय में पूरा करने का | बिजली-पानी, फीस, कॉलेज आने-जाने हेतु वाहन सुविधा आदि श्रेय श्री गणेश जी राणा की अध्यक्षता में गठित सुयोग्य प्रबन्धसमिति | सब निःशुल्क उपलब्ध है। एवं उसके दो सदस्य श्री माणकचन्द्र जी मुशर्रफ एवं श्री रतनलाल हम गर्व से कह सकते हैं कि यह छात्रावास आज देश में जी नृपत्या को जाता है।
दिगम्बर जैन जगत की शान है और यहाँ के अध्ययन कर निकलने संस्थान का मूल उद्देश्य आचार्य कुन्दकुन्द देव की परंपरा वाले छात्र निर्विवाद रूप से भारतीय संस्कृति और सभ्यता में ढले में आगमानुसार छात्रों को तथा अन्य श्रावकों को उसके कर्तव्यों हुये आदर्श तथा संस्कारित व्यक्ति के रूप में ही देश व धर्म की एवं संस्कारों से अलंकृत करते हुए श्रमण संस्कृति की रक्षा हेतु | सेवार्थ निकलते हैं। उपासक विद्वानों को तैयार करना है, जिसके लिए संस्थान में अल्प समय में छात्रावास की शानदार प्रगति के पीछे सुयोग्य विद्वानों एवं ब्रह्मचारी भाईयों द्वारा प्रवचन कला का प्रशिक्षण, | निर्ग्रन्थ धर्म गुरुओं का आशीर्वाद एवं प्रेरणा भी रही है। संत जैन दर्शन का पठन-पाठन एवं व्रतविधनादि कराने का प्रशिक्षण | शिरोमणि आचार्य श्रेष्ठ श्री 108 विद्यासागर जी महाराज, मुनिपुंगव भी दिया जाता है। इसमें संस्थान के निर्देशक तथा दिगम्बर जैन | श्री 108 सुधासागर जी महाराज ससंघ का तो स्थापना से लेकर संस्कृत कॉलेज , जयपुर के प्राचार्य एवं देश के जाने-माने विद्वान | निरन्तर आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन मिलता ही रहा है, साथ ही अन्य
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छात्रावास में पधारने वाले संतों ने भी छात्रावास की प्रगति एवं | संस्थान द्वारा छात्रावास के छात्रों को ही संस्कारित नहीं उद्देश्यों को देखते हुये भरपूर आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन दिया है। किया जा रहा है अपितु समाज में या श्रावकों में धर्म के प्रति आ छात्रावास में गतवर्ष आचार्य श्री 108 बाहुबली सागर जी महाराज | रही उदासीनता को दूर कर उनके जीवन में सम्यक श्रद्धा जागृत ससंघ, उपाध्याय श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज ससंघ, मुनि श्री | करते हुये उन्हें पूजन, ध्यान, जैनदर्शन आदि का प्रशिक्षण देश के 108 तरुणसागर जी महाराज ससंघ, उपाध्याय श्री 108 समतासागर विभिन्न स्थानों पर शिविर लगा-लगाकर दिया जाता है । गतवर्ष के जी महाराज, मुनि श्री 108 क्षमासागर जी महाराज, मुनिश्री 108 | शिविरों एवं उनसे लाभान्वितों का विवरण निम्न प्रकार है : वरदत्तसागर जी महाराज ससंघ, मुनि श्री 108 रविनन्दी जी महाराज क्र. स्थान प्रांत | शिविरावधि शिवि. सं. आदि पधारे और छात्रों से सीधी बातचीत की तथा उनके ज्ञानार्जन
01 | शिवपुरी मध्यप्रदेश | 11 अक्टू. से 19 अक्टू. की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए छात्रों को एवं संस्थान को भरपूर
| भोपाल मध्यप्रदेश 21 अक्टू. से 29 अक्टू. ___350 आशीर्वाद दिया। आचार्य श्री 108 विद्यानन्द जी महाराज, आचार्य
03 | मेरठ
उत्तरप्रदेश
21 अक्टू. से 30 अक्टू. श्री 108 वर्द्धमान सागर जी महाराज, परम विदुषी आर्यिका
04 | कोटा
राजस्थान
21 दिस. से 31 दिस. 2200 सुपार्श्वमति जी व उनके संघस्थ साधुजनों का भी छात्रावास को
| सोलापुर महाराष्ट्र 02 मई से 14 मई आशीर्वाद प्राप्त हुआ है।
तारंगा जी गुजरात 19 मई से 28 मई छात्रावास के छात्र कॉलेज जाकर जो लौकिक शिक्षा प्राप्त
| मडावरा उत्तरप्रदेश 15 मई से 25 मई 350 कर रहे हैं, उनका गतवर्ष का परीक्षा परिणाम भी श्रेष्ठ रहा जो
| गुना
मध्यप्रदेश 25 मई से 1 जून निम्न प्रकार है:
09 कृष्णानगर दिल्ली 5 जून से 15 जून कक्षा छात्र सं.] उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण परीक्षा
10 | कैलाश नगर दिल्ली 16 जून से 23 जून प्रथम द्वितीय तृतीय
फल
गाँधी नगर, दिल्ली 16 जून से 23 जून श्रेणी श्रेणी श्रेणी
12 | आगरा,छीपीटोला उत्तरप्रदेश 20 जून से 30 जून कनिष्ठ उपाध्याय
100%
| रेवाड़ी हरियाणा 14 अप्रैल से 22 अप्रैल वरिष्ठ उपाध्याय 17 | 01 | 01 96%
|मांतीतुगी महाराष्ट्र 30 मई से 5 जून 300 शास्त्री प्रथम वर्ष
100%
15 | बारामती महाराष्ट्र 8 जून से 16 जून शास्त्री द्वितीय वर्ष | 08 | 13 |
100%
| उदयपुर राजस्थान 21 जून से 29 जून 400 शास्त्री तृतीय वर्ष | 16
94%
17 | सहारनपुर | उत्तरप्रदेश 22 जून से 30 जून 225 आचार्य प्रथम वर्ष 01 01 | -
100%
18 | विश्वास नगर, दिल्ली 23 जून से 30 जून | 400 इस वर्ष जुलाई 2002 में 37 छात्रों को परीक्षा एवं साक्षात्कार यहाँ के विद्वान छात्र पर्युषण एवं अन्य पर्यों पर प्रवचनार्थ लेने के बाद नवीन प्रवेश दिया गया जिन 15 छात्रों ने शास्त्री तृतीय | भी देशभर में जाते हैं। गत वर्ष दसलक्षण पर्व में प्रवचन हेतु वर्ष उत्तीर्ण कर ली उसमें से 3 छात्रों ने आचार्य में प्रवेश लिया है, दो
संस्थान के छात्रों एवं सम्बन्धित 129 विद्वानों को विभिन्न स्थानों छात्र बी.एड्. करने के लिये दिल्ली, एवं श्रेगरी (कर्नाटक) चले गये
पर भेजा गया था। इस वर्ष भी अभी तक बहुसँख्या में विभिन्न हैं। दो छात्रों ने एम.ए. में प्रवेश लिया है, शेष छ: छात्रों की सेवायें
स्थानों से पत्र प्राप्त हो चुके हैं। आशा है कि इस वर्ष और भी विभिन्न जैन कॉलेज एवं जैन संस्थाएं प्राप्त कर रही हैं। वर्तमान में
अधिक विद्वानों को भेज सकेंगें। छात्रावास में अध्ययनरत छात्रों की स्थिति निम्न प्रकार है :
संस्थान में छात्रों को सभी सुविधा निःशुल्क होने के कारण कक्षा
गत वर्ष की स्थिति | वर्तमान स्थिति | संस्थान पर आर्थिक भार स्वाभाविक है। संस्थान के लेखे यथा
(छात्र संख्या) (छात्र संख्या )। समय अंकेक्षित कराये जाकर आयकर विभाग को विवरण प्रस्तुत कनिष्ठ उपाध्याय 27
किया जाता है। संस्थान को दिया गया दान आयकर अधिनियम वरिष्ठ उपाध्याय
80जी के अन्तर्गत आयकर से मुक्त है। यह भी उल्लेखनीय है कि शास्त्री प्रथम वर्ष
यहाँ दिए गये सहयोग (दान) के एक-एक पैसे का सदुपयोग शास्त्री द्वितीय वर्ष
20
होता है तथा दातार को ज्ञानदान, आहारदान,औषधदान एवं अभयदान शास्त्री तृतीय वर्ष
(चारों प्रकार के दान) का लाभ प्राप्त होता है। अतः अनुरोध है आचार्य प्रथम वर्ष
कि संस्थान को अधिक-से-अधिक तन-मन-धन से सहयोग आचार्य द्वितीय वर्ष
प्रदान कर जीवन्त प्रतिमायें संस्कारित करने एवं जिनवाणी के 114
प्रचार-प्रसार में सहभागी बन पुण्यार्जन करें। इसके अतिरिक्त 8 अन्य साधर्मी युवक, जो केवल शिक्षण ही
मानद् मंत्री लेना चाहते हैं, भी छात्रावास में नियमित रूप से अध्ययन कर रहे हैं।
श्री दिग. जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर 24 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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समाचार
समन्तभद्र विद्या विहार का भव्य शभारंभ । सहित काफी विद्वज्जनों ने अध्यापन सेवाएँ दी। शिविर संयोजन नन्दनवन धरियावाद जिला उदयपुर (राज.) में जैन दर्शन
श्री शांतिलाल जी डागरिया सहित सम्पूर्ण टीम ने शिविर संयोजन के महान संत दूसरी सदी के वाग्भट आचार्य समन्तभद्र के नाम से
का भार सम्भाला। एक शिक्षण संस्थान 2 जुलाई से प्रारंभ किया गया है।
शिविरार्थियों की सेवामें नि:शुल्क भोजन एवं पाठ्य पुस्तकों परमपूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर जी महाराज
की सुविधा दी गयी। की पट्ट परम्परा के द्वितीय पट्टाधीश आचार्य शिवसागर जी महाराज
विदित रहे पिछले 5 वर्षों से ग्रीष्मावकाश में इसी तरह के की शिष्या, जैन सिद्धान्त एवं दर्शन की मर्मज्ञ विदुषी आर्यिका श्री
शिक्षण शिविर धरियावाद में लगाए जा रहे हैं। 105 विशुद्धमति माताजी (सतना) ने अपनी द्वादश वर्षीय सल्लेखना
_ शांतिलाल जैन,धरियावद के अन्तिम 5 वर्ष नन्दनवन की भूमि पर साधना करते हुए समाधि
अजमेर के महावीर सर्किल पर निर्मित भव्य पूर्वक मरण किया।
अहिंसा स्तूप का लोकार्पण इसी तप:पूत भूमि पर आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी
राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कहा कि महाराज के आशीर्वाद से संस्थापक श्री क्षेत्र सिद्धान्त तीर्थ संस्थान भगवान् महावीर के अहिंसा तथा जीओ और जीने दो के संदेश को नन्दनवन ने संस्था के अन्तर्गत समन्तभद्र विद्या विहार शिक्षण
देश के कोने-कोने के साथ-साथ देश की सीमा से बाहर पहुँचाएं। संस्था को प्रारंभ किया है।
श्री गहलोत बुधवार को दिनांक 31.7.2002 को मध्याह्न अजमेर संस्थापक श्री हंसमुख जैन प्रतिष्ठाचार्य के अनुसार निकट में महावीर सर्कल पर नगर सुधार न्यास द्वारा देश में एक मात्र भविष्य में इस शिक्षण संस्था को 300 बीघा जमीन पर फैला कर निर्मित अहिंसा स्तूप के लोकार्पण के पश्चात् आयोजित विशाल उच्चतम शिक्षा, छात्रावास आदि को रूप दिया जावेगा। इस शिक्षण | समारोह को संबोधित कर रहे थे। में एक कालांश जैन दर्शन की शिक्षा को अनिवार्य रखा गया है।
हीरा चंद जैन इस वर्ष इस शिक्षण संस्था में 175 बालकों ने प्रवेश लिया चतुर्थ आत्म-साधना शिक्षण शिविर है, संस्था तक लाने ले जाने के लिए वाहन सुविधा उपलब्ध है। दिनांक - 1-12-2002 से 8-12-2002
शिक्षण के साथ-साथ बालकों को नैतिक एवं चारित्रिक अत्यन्त हर्ष का विषय है परमपूज्य आचार्य 108 श्री उन्नयन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से सिद्धक्षेत्र श्री सम्मेद कलिकाल के बढ़ते हुए इस भौतिक माहौल में सुख- | शिखरजी के पादमूल में स्थित, प्राकृतिक छटा से विभूषित, उदासीन शांति एवं संतोष पूर्वक निरापद जीवन कैसे जी सकें, शिक्षा के आश्रम इसरी बाजार में बाल ब्र. पवन भैया, कमल भैया, विद्वान साथ-साथ कलाओं की सुगंधी जीवन में कैसे बढ़ सके इन सम्पूर्ण ] भाई श्री मूलचन्द्र जी लुहाड़िया आदि के सान्निध्य में चतुर्थ आत्मविषयों को मध्यगत रखते हुए अनुशासन, स्वच्छता एवं सादगी के साधना शिक्षण शिविर का आयोजन होने जा रहा है। इस शिविर साथ इस संस्था ने शिक्षण देने का संकल्प किया है।
का मुख्य लक्ष्य होगावर्तमान में कक्षा तीन तक के अध्ययन कराये जा रहे हैं। इस बहुमूल्य पर्याय का अवशिष्ट समय किस प्रकार बिताया प्रतिवर्ष 1-1 कक्षा की वृद्धि करते हुए कक्षा 6 से बालक- जाये ताकि आत्मा का विकास हो सके। बालिकाओं के पृथक् विभाग के साथ-साथ छात्रावास सुविधा भी समस्त इच्छुक धर्मानुरागी भाई बहनों से अनुरोध है कि दिये जाने का प्रावधान है।
15-11-2002 तक आश्रम में लिखित सूचना भेज देवें ताकि ए.के.जैन | आवास एवं भोजनादि की समुचित व्यवस्था की जा सके। जिला उदयपुर (राज.)
विशेष जानकारी के लिए सम्पर्क करें
___ 1. श्री नरेश कुमार जैन, सूरज भवन, स्टेशन रोड़, पटना धार्मिक शिक्षण शिविर सम्पन्न
फोन नं. 231693 2. श्री माणिक चंद जैन गंगवाल, मे. माणिक धरियावाद जिला उदयपुर में परम पूज्य आर्यिका | चंद, अशोक कुमार कुंजलाल स्ट्रीट अपर बाजार राँची, (झारखंड) सुप्रकाशमती माताजी के सानिध्य में एवं प्रतिष्ठाचार्य श्री हंसमुख
फोन नं. (आ.) 203796, 315420 3. श्री पारसमलजी पाटनी, जी जैन के निर्देशन में छह दिवसीय धार्मिक शिक्षण शिविर दिनाँक |
एफ ई./285 (टैंक नं. 12 के निकट) साल्ट लेक सिटि, कोलकाता22 से 27 जून तक सानन्द सम्पन्न हुआ।
700091 फोन नं. - 3349032 4. श्रीमती हीरामणी छाबड़ा इस शिविर में स्थानीय के अतिरिक्त 22 गाँवों के शिविरार्थियों | "पंकज' 188/1 जी, मनिकतल्ला मेंन रोड, कोलकाता 700054 ने भाग लिया शिविरार्थियों की संख्या 450 रही शिक्षणों में जैन | फोन - 3580755 धर्म 1,2,3,4 भाग, छहढाला एवं श्रावक संस्कार विषयों का निवेदक - अध्ययन कराया गया।
ट्रस्टी व कार्यकारिणी समिति के सदस्यगण श्री पार्श्वनाथ पूज्य माताजी सुप्रकाशमती जी, प्रतिष्ठाचार्य श्री हंसमुख | दिगम्बर जैन शांति निकेतन उदासीन आश्रम जैन, पं. भागचन्द्र जी जैन, पं. आदेश्वर जी, पं. मोतीलाल जी | इसरी बाजार (गिरिडीह) झारखंड फोन - 06558-33158
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वर्षायोग : चातुर्मास 2002
साहित्यमनीषी ज्ञानवारिधि दिगम्बर जैनाचार्य प्रवर श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज के द्वारा दीक्षित-शिक्षित जैन श्रमणपरम्परा के आदर्श सन्तशिरोमणि जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज तथा उनके द्वारा दीक्षित शिष्यों का वीर निर्वाण संवत् 2528, विक्रम संवत् 2059, सन् 2002 का वर्षायोग चातुर्मास विवरण:
(1) संतशिरोमणि आचार्य श्री 108 श्री विद्यासागर जी महाराज, (2) मुनि श्री समयसागर जी महाराज, (3) मुनि श्री योगसागर जी महाराज, (4) मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज, (5) मुनि श्री विनीतसागर जी महाराज, (6) मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज, (7) मुनि श्री प्रबुद्धसागर जी महाराज , (8)मुनि श्री प्रवचनसागर जी महराज, (9) मुनि श्री प्रसादसागर जी महाराज, (10) मुनि श्री अभयसागर जी महाराज, (11) मुनि श्री अक्षयसागर जी महाराज, (12) मुनि श्री प्रशस्तसागर जी महाराज, (13) मुनि श्री पुराणसागर जी महाराज, (14) मुनि श्री प्रयोगसागर जी महाराज, (15) मुनि श्री प्रबोधसागर जी महराज, (16) मुनि श्री प्रणम्यसागर जी महाराज, (17) मुनि श्री प्रभातसागर जी महाराज, (18) मुनि श्री चन्द्रसागर जी महाराज, (19) मुनि श्री सम्भवसागर जी महाराज, (20) मुनि श्री अभिनन्दन सागर जी महाराज, (21) मुनि श्री सुमतिसागर जी महाराज, (22) मुनि श्री पद्मसागर जी महाराज, (23) मुनि श्री चन्द्रप्रभसागर जी महाराज, (24) मुनि श्री पुष्पदन्तसागर जी महाराज, (25) मुनि श्री श्रेयांससागर जी महाराज, (26) मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज, (27) मुनि श्री विमलसागर जी महाराज, (28) मुनि श्री अनन्तसागर जी महाराज, (29) मुनि श्री धर्मसागर जी महाराज (30) मुनि श्री शान्तिसागर जी महाराज, (31) मुनि श्री कुन्थुसागर जी महाराज, (32) मुनि श्री अरहसागर जी महाराज, (33) मुनि श्री मल्लिसागर जी महाराज, (34) मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज, (35) मुनि श्री नमिसागर जी महाराज, (36) मुनि श्री नेमीसागर जी महाराज एवं (37) मुनि श्री पार्श्वसागर जी महाराज कुल : (1 आचार्यश्री + 36 मुनि महाराज) एवं बाल ब्रह्मचारीगण नोट - (1) आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के द्वारा दीक्षित प्राय: सभी साधुगण बाल ब्रह्मचारी हैं । जैन श्रमणपरम्परा के ज्ञात इतिहास/जानकारी में यह प्रथम श्रमण संघ है जिसमें वर्तमान दीक्षित 182 साधुगण एवं आर्यिकाएँ
भी प्राय: बाल ब्रह्मचारिणी हैं। (2) आचार्यश्री द्वारा ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करने वाले देश के विभिन्न नगरों में लगभग 100 बाल ब्रह्मचारी भाई एवं 300 बाल ब्रह्मचारिणी बहनें भी चातुर्मास कर रही हैं । (3) आचार्यश्री के द्वारा प्रतिदिन प्रातः काल 'षट्खंडागम' (वर्गणाखण्ड) पुस्तक नं. 12 का तथा अपराह्नकाल 'समयसार' ग्रन्थ का स्वाध्याय कराया जाता है। (4) प्रत्येक रविवार को अपराह्न 3 बजे से आचार्यश्री जी का सार्वजनिक प्रवचन होता है। (5) रावण के पुत्र आदि साढ़े पाँच करोड़ मुनिराजों की निर्वाणस्थली, रेवा-नर्मदा नदी के तट पर अवस्थित सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावार तक पहुँचने के लिए मध्य रेलवे के दिल्ली-मुंबई मार्ग (व्हाया-इटारसी (102 कि.मी.)-खण्डवा (135 कि.मी.) पर निकटवर्ती रेल्वे स्टेशन हरदा से 22 कि.मी. है। (6) नेमावर हेतु इन्दौर 130 कि.मी. (अच्छे रोड़ से आष्टा होकर 175 कि.मी.) भोपाल (व्हाया नसरुल्लागंज) 150 कि.मी. (अच्छे रोड़ से आष्टा होकर 165 कि.मी.), खातेगाँव 14 कि.मी. एवं संदलपुर 9 कि.मी. से वाहन द्वारा पहुँचा जा सकता है। (7) नेमावर से सिद्धवर कूट 210 कि.मी., ऊन (पावागिरी) 260 कि.मी., बावनगजा (बड़वानी), 360 कि.मी. (व्हाया इन्दौर) है। सतवास-पुनामा डेम होकर जाने से प्रत्येक की 55 कि.मी. दूरी कम हो जाती है। मक्सी जी 210 कि.मी. बनेडियाजी 160 कि.मी. एवं गोम्मटगिरी 130 कि.मी. दूरी पर अवस्थित है। चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन रेवा सिद्धोदय-सिद्धक्षेत्र नेमावर- 455336 (देवास) म.प्र. फोन-कार्यालय (07274) 77818,77990 सम्पर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष-सुन्दरलाल जैन बीड़ी वाले, 39/2, न्यू पलासिया, इन्दौर-1 फोन-(0731) (नि.) 530645 (का.)536765 (2) कार्याध्यक्ष- पद्मकुमार काला, श्री महावीर दाल मिल्स, बानापुरा-461221 होशंगाबाद (म.प्र.), फोन-(07570)(नि.)24655 (का.) 25155, 25255 (3) महामंत्री-बी.एल.जैन , देना बैंक के सामने, हरदा-46133 फोन-(07577)23003 (4)कोषाध्यक्ष- रमेशचन्द्र काला नवरंग वस्त्र भण्डार, भगवान महावीर मार्ग, खातेगाँव (देवास) फोन-(07274) (नि.) 32713 (दु.)32228 (1)मुनि श्री नियमसागर जी महाराज (2) मुनि श्री पुण्यसागर जी महाराज (3) मुनि श्री वृषभसागर जी महाराज
2.
26 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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कुल : 3 (3 मुनि महाराज) एवं बाल ब्रह्मचारीगण चातुर्मास स्थली : महावीर भवन, भिगवन चौक, बारामती422103 (पूना) महाराष्ट्र। सम्पर्क सूत्र : (1) बालचन्द्र नानचन्द संघवी, आनन्द नगर, पो.बा. नं. 11, बारामती-फोन (02112) 22426, 22618, (2) राजकुमार हीराचन्द्र शहा, 31, महावीर पथ, बारामती-24473 (का.), 22474 (नि.), (3)प्रशान्त संघवी, अरिहंत जनरल स्टोर्स, भिगवन चौक, बारामती-24753 (का.), 25519 (नि.), (4) जयकुमार पहाड़े-21170, 27170
7. (1) मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज (2) मुनि श्री भव्यसागर जी महाराज (दीक्षा गुरु-ऐलाचार्य श्री नेमीसागर जी महाराज) कुल : 2 मुनि महाराज + बाल ब्रह्मचारीगण चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन बंजी ठोलिया धर्मशाला, घीवालों का रास्ता, जौहरी बाजार, जयपुर-302003 राजस्थान फोन-(0141) 564932 सम्पर्क सूत्र : (1)हेमन्त सोगानी, एडवोकेट 2454, मरुजी का चौक, एम.एस. बी. का रास्ता, जौहरी बाजार, जयपुर मो. 98290-64506, फोन-(0141)560506, 570178 (2) भट्टारक जी की नसिया, सवाई रामसिंह रोड़,जयपुर फोन - 381586, 218554 (3) पारस जैन, मो. 9829054842 फोन नं. 705259, 705266 (1) मुनि श्री गुप्तिसागर जी महाराज
19. कुल - 1 मुनि महाराज चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन गुप्तिधाम, जी.टी. करनाल रोड, मु. पो. गन्नौर-131001 (सोनीपत), हरियाणा फोन-(01264)61961 (1) मुनि श्री सुधासागर जी महाराज (2) क्षुल्लक श्री
10. गम्भीरसागर जी महाराज (3) क्षुल्लक श्री धैर्यसागर जी महाराज कुल - 3 (1 मुनि महाराज +2 क्षुल्लक महाराज) एवं बाल ब्रह्मचारीगण चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, बिजौलिया मु.पो. बिजौलिया-311602 तहसील मांडलगढ़ (भीलबाड़ा) राजस्थान सम्पर्क सूत्र : (1) भंवरलाल पटवारी, जैन भवन
11. (01489)36042(2) नेमीचंद दिनेश कुमार काला, काला भवन-36029 (3) सुरेश लुहाड़िया-36381 (1) मुनि श्री समतासागर जी महाराज (2) मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज (3) ऐलक श्री निश्चय सागर जी महाराज कुल : 3 (2 मुनि महाराज + 1 ऐलक महाराज) बाल |
ब्रह्मचारीगण चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन,सेठ छदामीलाल का जैन मन्दिरजी, जैन नगर, बस स्टेण्ड के पास, फिरोजाबाद283203 (उत्तरप्रदेश) सम्पर्क सूत्र : (1) विजय कुमार जैन देवता-(05612) 98370, 25931 (2) प्राचार्य नरेन्द्र प्रकाश जैन-46146 (3) कश्मीरचन्द्र जैन मो. 98370-57611 (4) पुष्पेन्द्र जैन 'झिलमिल' मो. 98370-50737, फोन - 42099, 46493 (1) मुनि श्री स्वभावसागर जी महाराज कुल - 1 मुनि महाराज चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी, जुरेहरा (भरतपुर) राजस्थान (1) मुनि श्री समाधिसागर जी महाराज चातुर्मास स्थली : श्री नेमिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र- नवागढ़ (उखलद),पो. पिंपरी, जिला-परभणी (महाराष्ट्र) फोन-(02452)48901 फेक्स: 21880 सम्पर्क सूत्र : (1) मोतीलाल पाटनी, पाटनी निवास, जूना मोढा, नांदेड-431604 (महा.) फोन(02462)42407 (2) मंत्री-बसंतराव चंद्रनाव्य, अंबुरे, अंबुरे निवास, विद्यानगर पर भणी-431401 (महा.) फोन (02452)23477, 21880, 21909 (1) मुनि श्री सरलसागर जी महाराज चातुर्मास स्थली : श्री चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैन मन्दिर जी, पिपरई गांव- 473 440 (गुना) मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र : (1) नाथूराम सुरेशचन्द्र जैन, किराना मर्चेण्ट, पिपरई गांव (गुना) म.प्र. (07541)47223, 47208, 47272 (1) मुनि श्री आर्जवसागर जी महाराज चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन महावीर स्कूल, रेलवे स्टेशन के पास, शिमोगा-कर्नाटक संपर्क सूत्र : (1) एम. जगनागन, श्रुतकेवली विशाखाचार्य आश्रम, तपोनिलयं, कुंदकुंदनगर, तमिलनाडू (04183) 25912, 27018 (2) बुधराज कासलीवाल-पाण्डिचेरी(0413)33537, 333536 (3) सोहनलाल कोठारी,सेलम (0427)212060,212401,212179 (1) मुनि श्री उत्तमसागर जी महाराज (2) मुनि श्री पायसागर जी महाराज कुल : 2 मुनि महाराज चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मन्दिर महातपुरतालुका-माढा (सोलापुर) महाराष्ट्र संपर्क सूत्र : (1) देशभूषण बारे, महातपुर, फोन(02183) 34192, 34344
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12.
कुल : 2 मुनि महाराज
चातुर्मास स्थली : श्री शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर, पडाव रोड, मण्डला - 481661, मध्यप्रदेश
संपर्क सूत्र : (1) रायसेठ नन्दन कुमार जैन, फोन (07642 ) (नि.) 50012 (दु.) 50723 (2) मिट्ठनलाल जैन- 50156 (3) जयकुमार जैन 50085 (4) कन्छेदीलाल जैन 52551 (5) रमेश चन्द्र जैन 50930 मुनि श्री सुखसागर जी महाराज
-
चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी, नागनूर, तालुका-गोकाक, जिला वेलगांव, कर्नाटक संपर्क सूत्र : वी. जे. गंगई - मझगांव (बेलगांव) (0831)480625, 488823 (2) ए. ए. ने मन्नावर, बेलगांव (0831) 452712
मुनि श्री मार्दवसागर जी महाराज
चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, आदीश्वरगिरि, नोहटा 477204 (दमोह) मध्यप्रदेश सम्पर्क सूत्र (1) डॉ. सन्तोष गोयल, फोन (07606) 57224, 57222, (2) भाटिया जी- 57261, 97261 15 (1) मुनि श्री अपूर्वसागर जी महाराज (2) मुनि श्री सुपार्श्वसागर जी महाराज
13.
14.
16.
(1) मुनि श्री चिन्मयसागर जी महाराज ( 2 ) मुनि श्री पावनसागर जी महाराज
17.
कुल - 2 मुनि महाराज
चातुर्मास स्थली : श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर मु. पो. कोथली - 416101, तालुका - शिरोल (कोल्हापुर) महाराष्ट्र
संपर्क सूत्र : (1) दीपक बोरगावे, 1195, राजलक्ष्मी 9वीं लाईन, जयसिंगपुर (कोल्हापुर) महाराष्ट्र फोन (02322) (नि.) 27474 (का.) 28353 (2) बसन्त भीमगोंडा पाटिल, कोथली (02322) 25664 (3) ऋषभ पाटिल - 42243, (4) अभय कुमार इंगले- 42254, (5) अन्ना साहेब चौगुले - 42262
(1) मुनि श्री प्रशान्तसागर जी (2) मुनि श्री निर्वेगसागर जी
कुल 2 मुनि महाराज
चातुर्मास स्थली : सन्त निवास, महावीर विहार, भगवान महावीर मार्ग, स्टेशन रोड़ गंजबासौदा - 464221 (विदिशा) मध्यप्रदेश फोन (07594) 20464 संपर्क सूत्र (1) गुलाबचन्द्र जैन एडवोकेट, नेहरु चौक, गंजबासौदा- (07594 ) 20277, 20648, 22190 (2) सिंघई प्रभुदयाल जैन, महावीर मार्ग, गंजबासौदा (3) सागरमल जैन-20556 (4) श्रेयमल जैन 21796 मुनि श्री अजितसागर जी महाराज (2) ऐलक श्री निर्भयसागर जी महाराज
28 सितम्बर 2002 जिनभाषित
:
कुल 2 (1 मुनि महाराज + 1 ऐलक महाराज ) चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन प्राचीन मन्दिर जी, महावीर चौक, बैरसिया - 463106 (भोपाल) मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष- राजेन्द्र जैन, महावीर जनरल स्टोर्स, बाल विहार, फोन (07565) 62412, 62237 (2) अजित जैन - 62327 (3) सुभाष जैन- 62483 (4)62327 (5)62268 (6) 62217
(क) (1) आर्यिका श्री गुरुमति जी (2) आर्यिका श्री उज्ज्वलमति जी, (3) आर्यिका श्री चिन्तनमति जी (4) आर्यिका श्री सूत्रमति जी (5) आर्यिका श्री शीतलमति जी (6) आर्यिका श्री सारमति जी (7) आर्यिका श्री साकारमति जी (8) आर्यिका श्री सौम्यमति जी (9) आर्यिका श्री सूक्ष्ममति जी ( 10 ) आर्यिका श्री शान्तिमति जी ( 11 ) आर्यिका श्री सुशान्तमति जी ।
(ख) (1) आर्यिका श्री दृढ़मति जी (2) आर्यिका श्री पावनमति जी (3) आर्यिका श्री साधनामति जी (4) आर्यिका श्री विलक्षणामति जी (5) आर्यिका श्री वैराग्यमति जी (6) आर्यिका श्री अकलंकमति जी (5) आर्यिका श्री निकलंकमति जी (8) आर्यिका श्री आगममति जी (9) आर्यिका श्री स्वाध्यायमति जी ( 10 ) आर्यिका श्री प्रशममति जी (11) आर्यिका श्री मुदितमति जी (12) आर्यिका श्री सहजमति जी (13) आर्यिका श्री संयममति जी (14) आर्यिका श्री सत्यार्थमति जी (15) आर्यिका श्री समुन्नतमति जी (16) आर्यिका श्री शास्त्रमति जी (17) आर्यिका श्री सिद्धमति जी ।
18.
(ग) (1) आर्यिका श्री ऋजुमति जी (2) आर्यिका श्री सरलमति जी (3) आर्यिका श्री शीलमति जी ।
(घ) (1) आर्यिका श्री तपोमति जी (2) आर्यिका श्री सिद्धान्तमति जी (3) आर्यिका श्री नम्रमति जी (4) आर्यिका श्री पुराणमति जी (5) आर्यिका श्री उचितमति जी ।
(ङ) (1) आर्यिका श्री उपशान्तमति जी (2) आर्यिका श्री ॐकारमति जी ।
(च) (1) आर्यिका श्री अकम्पमति जी (2) आर्यिका श्री अमूल्यमति जी (3) आर्यिका श्री आराध्यमति जी (4) आर्यिका श्री अचिन्त्यमति जी ( 5 ) आर्यिका श्री अलोल्यमति जी (6) आर्यिका श्री अनमोलमति जी (7) आर्यिका श्री आज्ञामति जी (8) आर्यिका श्री अचलमति जी (9) आर्यिका श्री अवगतमति जी ।
कुल : 47 आर्यिकाएँ + 55 बाल ब्रह्मचारिणी बहनें । चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन चन्दाप्रभु बलात्कारगण मन्दिर जी, गाँधी चौक, चावली बाजार कारंजा (लाड़)444105 (वाशिम) महाराष्ट्र
संपर्क सूत्र : (1) जगदीश चौरे, राहुल एस. टी. डी. गाँधी
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19.
20.
21.
22.
चौक कारंजा, फोन - (07256) 22641, 22909 (2) अतुलजी जैन, महात्मा फुले चौक, भगवान महावीर मार्ग23956 (3) डोजस गुरुजी, राजपुरा (4) मनोहर भाऊ डाकोरे, गाँधी चौक- 22764, 22164 (5) शशिकान्त चौरे - 22711 (6) प्रदीप जैन-22682, 22642 (5) प्रमोद कुमार रुइवाले 22415
(1) आर्यिका श्री मृदुमति जी (2) आर्यिका श्री निर्णयमति जी (3) आर्यिका श्री प्रसन्नमति जी
कुल : 3 आर्थिकाएँ बाल ब्रह्मचारिणी बहनें चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला, वर्णी कालोनी, सागर- 470002, मध्यप्रदेश |
:
संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष निर्मल कुमार जैन पटना वाले (07582) 23031 (2) नाथूराम जैन पटनावाले-23056 (3) प्रमोद कुमार गुलाबचन्द्र पटनावाले 35469 (4) राकेश जैन 22643 (6) महेन्द्र सोधिया 23735 (1) आर्यिका श्री सत्यमति जी (2) आर्यिका श्री सकलमति जी
कुल 2 आर्यिकाएँ + बाल ब्रह्मचारिणी बहनें । चातुर्मास स्थली श्री शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर जी, मु. प्रो. पहाड़ी निवार (कटनी) मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र (1) रतनचन्द्र जैन (2) देवचन्द्र जैन (3) सुरेशचन्द्र जैन (07622)64205 (4) विजय कुमार जैन-64206
(1) आर्यिका श्री गुणमति जी (2) आर्यिका श्री कुशलमति जी (3) आर्यिका श्री धारणामति जी (4) आर्यिका श्री उन्नतमति जी
+
कुल 4 आर्यिकाएँ बाल ब्रह्मचारिणी बहनें। चातुर्मास स्थली : श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मन्दिर धर्मशाला, धैतल गली, भगवान महावीर मार्ग, सिरोंज464 228 (fafeen)
संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष- शीलचन्द्र जैन बगरौदा वाले, किराना व्यापारी, छोटा बाजार (दु.) 53068 (नि.), 53328 (वि.) (2) मंत्री जितेन्द्र कुमार जैन कोठावाले, कठाली बाजार - (07591) (नि.) 52881, (दु.) 53293 (3) भूपेन्द्र कुमार जैन, चाँदनी चौक, जवाहर बाजार (नि.) 53050 (दु.) 53850 (4) रवीन्द्र जैन विजयराज(नि.) 52696 (दु.) 53237
(1) आर्यिका श्री प्रशान्तमति जी (2) आर्यिका श्री विनम्रमति जी (3) आर्यिका श्री विनयमति जी (4) आर्यिका श्री अनुगममति जी (5) आर्यिका श्री संवेगमति जी (6) आर्यिका श्री शैलमति जी (7) आर्यिका श्री विशुद्धमति जी
कुल : 7 आर्यिकाएँ - + बाल ब्रह्मचारिणी बहनें । चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, बाजार मुहल्ला
23.
24.
बरेला - 483001 (जबलपुर) मध्यप्रदेश
संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष-कन्छेदी लाल जैन (2) मोतीलाल जैन (3) विमल जैन (0761)890431 (4) अमित जैन 890487, 890483, 890481
(1) आर्यिका श्री पूर्णमति जी (2) आर्यिका श्री शुभ्रमति जी (3) आर्यिका श्री साधुमति जी (4) आर्यिका श्री विशदमति जी ( 5 ) आर्यिका श्री विपुलमति जी ( 6 ) आर्यिका श्री मधुरमति जी (7) आर्यिका श्री कैवल्यमति जी (8) आर्यिका श्री सतर्कमति जी (9) आर्यिका श्री श्वेतमति जी
कुल : 9 आर्यिकाएँ + ब्राल ब्रह्मचारिणी बहनें । चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर के सामने, राघौगढ़ - 473226, (गुना) मध्यप्रदेश
संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष प्रदीप जैन, कमला हार्डवेयर स्टोर्स, फोन (07544) 62671, 62849 (2) अशोक जैन, संजय ट्रेडर्स- 62349 (3) 62516 (4) प्रशान्त जैन
62352
(क) (1) आर्यिका श्री अनन्तमति जी (2) आर्यिका श्री विमलमति जी (3) आर्यिका श्री निर्मलमति जी (4) आर्यिका श्री शुक्लमतिजी (5) आर्यिका श्री अतुलमति जी (6) आर्यिका श्री निवेंगमति जी (7) आर्यिका श्री सविनयमति जी (8) आर्यिका श्री समयमति जी (9) आर्यिका श्री शोधमति जी ( 10 ) आर्यिका श्री शाश्वतमति जी (11) आर्यिका श्री सुशीलमति जी (12) आर्यिका श्री सुसिद्धमति जी (13) आर्यिका श्री सुधारमति जी । (ख) (1) आर्यिका श्री आदर्शमति (2) आर्यिका श्री दुर्लभमति जी (3) आर्थिका श्री अन्तरमति जी (4) आर्यिका श्री अनुनयमति जी (5) आर्यिका श्री अनुग्रहमति जी (6) आर्यिका श्री अक्षयमति जी (7) आर्यिका श्री अमूर्तमति जी (8) आर्यिका श्री अखण्डमति जी (9) आर्यिका श्री अनुपममति जी ( 10 ) आर्यिका श्री अनर्घमति जी (11) आर्यिका श्री अतिशयमति जी (12) आर्यिका श्री अनुभवमति जी (13) आर्यिका श्री आनन्दमति जी (14) आर्यिका श्री अधिगममति जी (15) आर्यिका श्री अमन्दमति जी (16) आर्यिका श्री अभेदमति जी (17) आर्यिका श्री उद्योतमति जी ।
कुल 30 आर्यिकाएँ बाल ब्रह्मचारिणी बहनें : + + 70 प्रतिभा मण्डल की ब्रह्मचारिणी बहनें चातुर्मास स्थली श्री पार्श्वनाथ ब्रह्मचर्याश्रम गुरुकुल एलोरा- 431102 तालुका खुलताबाद (औरंगाबाद) महाराष्ट्र फोन - (02437) 44491, 44432
संपर्क सूत्र (1) अध्यक्ष-तनसुख लाल ठोले, मु.पो. सज्जनपुर ( कसाबखेड़ा), तालुका खुलताबाद -सितम्बर 2002 जिनभाषित 29
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26.
(औरंगाबाद) (2) व्ही. ए. मनोरकर जैन, ज्ञानविद्या, प्लॉट नं. 59, नई गजानन कॉलोनी, गारखेड़ा,औरंगाबाद, फोन - (0240)442795 (3) विजयकुमार महीन्द्रकर
जैन, छत्रपति नगर, गारखेड़ा, औरंगाबाद-441206 25. (1) आर्यिका श्री प्रभावनामति जी (2) आर्यिका श्री भावनामति जी (3) आर्यिका श्री सदयमति जी
31. कुल : 3 आर्यिकाएँ + बाल ब्रह्मचारिणी बहनें चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी, नौगामा (बांसवाडा) राजस्थान। संपर्क सूत्र - (1) सेठ लक्ष्मीलाल - (02968) 20103 (2) सेठ सागरमल 20092 (3) सेठ बदामीलाल - 20093 (4) प्रदीप जैन-20084, 20048, (5) राजेश
32. गाँधी-20035 (1) आर्यिका श्री आलोकमति जी (2) आर्यिका श्री सुनयमति जी कुल : 2 आर्यिकाएँ + बाल ब्रह्मचारिणी बहनें। चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी, बिलहरा राजा- 470051 (सागर) मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र : (1) प्रकाशचन्द्र नीलेश कुमार जैन, कपड़ा | 33. व्यापारी, फोन (07584) 48344 (2) शीतलचन्द्र
बड़कुल- 48329 27. (1) आर्यिका श्री अपूर्वमति जी (2) आर्यिका श्री अनुत्तरमति जी
34. कुल : 2 आर्यिकाएँ + ब्राल ब्रह्मचारिणी बहनें। चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी, बनवार - 470663, तहसील-नोहटा (दमोह) मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र : (1) मोहन लाल क्लाथ मर्चेण्ट, बनवार (07606)58235 (2) देवेन्द्र बमोरया -58206 (3)
लीलाधर जैन- 58225 28 . ऐलक श्री दयासागर जी महाराज
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी, बिजोरी मु.पो. बिजोरी, चरगवाँ रोड (जबलपुर) मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र : (1) कमल कुमार जैन (07621) 64230, | 36. 34230 (2) सुजन कुमार जैन (3) मगनलाल जैन ऐलक श्री नि:शंकसागर जी महाराज चातुर्मास स्थली : श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर जी तिलक नगर, इन्दौर- 452001, मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र - (1) डॉ. प्रकाशचन्द्र जैन- (0731) 490619 (2) प्रदीप गोयल - 491190 (3) भागचन्द्र लुहाड़िया
490151 30. (1) ऐलक श्री उदारसागर जी महाराज (2) क्षुल्लक श्री
नयसागर जी महाराज
कुल : 2 (1 ऐलक जी + 1 क्षुल्लक जी महाराज) 30 सितम्बर 2002 जिनभाषित
चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी बाँसातारखेड़ा- 470672 (दमोह) मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र : (1) माणिक चन्द्र जैन (2) सुरेश जैन, गल्ला व्यापारी- (07812)52248 (3) पद्म जैन, पद्म इलेक्ट्रिकल्स-52252 ऐलक श्री सिद्धान्तसागर जी महाराज चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी, खान्दृ कॉलोनी (बांसवाड़ा) राजस्थान संपर्क सूत्र - (1) अजित भाई फोन-(02992)(नि.) 41002 (दु.)42849 (2) अशोक जैन बैंकवाले (नि.) 43034 (का.)42965 ऐलक श्री सम्पूर्ण सागर जी महाराज चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी कुँआवाला, जैनपुरी रेवाड़ी-123401 (हरियाणा) संपर्क सूत्र : (1) प्रधान-अजित प्रसाद जैन- (01274) 53645 (2) राजकुमार जैन-55104 (3) देविन्दर जैन(नि.) 25764 (का.) 54912 ऐलक श्री नम्रसागर जी महाराज चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन बड़ा मन्दिर मु.पो. मोहनगढ़ - 472101 (टीकमगढ़), मध्यप्रदेश संकर्प सूत्र : (1) राजेन्द्र सिंघई- (07673)45752 ऐलक श्री प्रभावसागर जी महाराज चातुर्मास स्थली- श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर जी, बलेह, तहसील-रहली, मु.पो. बलेह (सागर) मध्यप्रदेश क्षुल्लक श्री ध्यानसागर जी महाराज चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला, चौक, भोपाल-462001, मध्यप्रदेश फोन (0755) 748935 संपर्क सूत्र - (1) अध्यक्ष-महेश सिंघई (नि.) 544985, 544986 (दु.)537072,534672 (2) नरेन्द्र जैन वंदना(नि.) 748426, 234104 (3) पप्पू भूरा- 510313 क्षुल्लक श्री पूर्ण सागर जी महाराज चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मन्दिर जी, खमरियाबिजौरा नोहटा (दमोह) मध्यप्रदेश संपर्क सूत्र - (1) अध्यक्ष-रमेश चन्द्र जैन (07606) 57215 (2) डॉ. आर.सी. जैन-23120, (3)सुभाष जैन नोट - आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित वर्तमान में 59 मुनि महाराज, 109 आर्यिकाएँ, 9 ऐलक महाराज तथा 5 क्षुल्लक महाराज जी, कुल-182 साधकगण मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, इन 6 प्रान्तों में वर्षायोग कर धर्मप्रभावना कर रहे
35.
29.
हैं।
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पृष्ठ 32 का शेषांश
चिह्न वस्तुओं पर दर्शाने का नियम लागू हो जाने के बावजूद के ऊपर नहीं दर्शाते हुए पृष्ठ भाग पर दर्शाया है। पापुलर बेकवेल, | जिन उत्पादों पर चिह्न नहीं दिखे उसकी सुचना अपने क्षेत्र के जबलपुर ने अपने पापुलर फ्रूट केक' उत्पाद में अण्डों का उपयोग | खाद्य/औषधि निरीक्षकों, उपभोक्ता फोरम मंत्री, सांसद, विधायकों होने पर न भूरे रंग का चिह्न लगाया है न उत्पाद बनाने व उसकी आदि से शिकायत करके दी जानी चाहिए। इस सवाल पर वकीलों मियाद की तारीख दी है।
को भी सतर्क रहते हुए स्वयं वैधानिक पहल करना चाहिए। विशेषकर शाकाहारी उपभोक्ताओं के हित में शाकाहारी अब तक खाद्य पदार्थों पर सिर्फ चिह्न प्रकाशित होने से वस्तुओं को हरा चिह्न देखकर ही खरीदने की जानकारी मिलना | कई उपभोक्ता शाकाहारी/माँसाहारी होने की पहचान नहीं कर पाए नितांत आवश्यक है। विभिन्न सामाजिक संगठनों, संस्थाओं को | हैं। काली स्याही से छपे चिह्न से तो शाकाहारी/माँसाहारी की जो शाकाहार में विश्वास रखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे पत्र
पहचान संभव नहीं है। इस संबंध में सागर (म.प्र.) के संसद पत्रिकाओं में विज्ञापन से, प्रचार पट्ट लिखवाकर, पर्चे वितरित
सदस्य श्री वीरेन्द्र कुमार, जो सांसद की स्वास्थ्य एवं परिवार करके टी.वी. केबल, सिनेमा स्लाईड्स पर शाकाहारी चिह्न की
कल्याण समिति के सदस्य हैं, ने स्वास्थ्य मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा के
समक्ष विभाग की 5 जुलाई की बैठक में सुझाव दिया कि खाद्य उपयोगिता का प्रचार करावें। सन्तों को चिह्न संबंधी जानकारी
पदार्थों के डिब्बों/पैकेटों पर हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में स्पष्ट देकर उनके व्याख्यानों से भी प्रचार हो सकता है। मतलब यह है
रुप से शाकाहारी/माँसाहारी लिखा जाना चाहिए। सुझाव को कि शाकाहार की भावना के हित में जैसे भी संभव हो हरे रंग के
व्यावहारिक मानते हुए स्वास्थ्य मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा ने खाद्य पैकेटों चिह्न की उपयोगिता और भूरे रंग के चिह्न वाले खाद्य पदार्थों से
पर शाकाहारी/माँसाहारी अनिवार्य रुप से लिखने व क्रियान्वित बचने की जानकारी सामान्यत: हर आदमी तक पहुँचाने की कोशिश |
करने का निर्देश संबंधित अधिकारियों को तत्काल दे दिया। की जाना आवश्यक है।
सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर से जनहितार्थ जारी
भगवान् महावीर स्वामी के नाम पर मार्ग का नामकरण व
सीमेंट कांक्रीट मार्ग का लोकार्पण
भगवान् महावीर स्वामी के 2601 वें जन्म जयन्ती | कार्यों की सराहना की। इस अवसर पर विशेष अतिथि के रूप में वर्ष में सिराज जिला (विादशा) म 2 कायक्रम सम्पन्न हुय। भोपाल से आये हुये भगवान् महावीर स्वामी 2600वें जन्म शताब्दी प्रथम पूर्व सांसद श्री राघव जी भाई की सांसद निधि से
समारोह के राज्य स्तरीय सदस्य एवं दिगम्बर जैन शाश्वत तीर्थराज सिंचाई विभाग द्वारा जैन बड़े मंदिर के सामने घेतल गली में
सम्मेद शिखर जी ट्रस्ट के मंत्री शरद जैन भोपाल ने समाज के निर्मित सीमेंट कांक्रीट मार्ग का लोकार्पण हुआ। द्वितीय,
बुजुर्गों एवं अध्यक्ष के मार्गदर्शन में युवा मण्डल के कार्यों की इसके पश्चात् सिरोंज नगर पालिका द्वारा घेतल गली में अतिशय क्षेत्र नसिया जी तक के मार्ग का नाम भगवान् महावीर स्वामी
सराहना करते हुए अनुकरणीय बताया। उल्लेखनीय है कि युवा मार्ग रखा गया। उपर्युक्त दोनों कार्यक्रम नामकरण एवं लोकार्पण
मण्डल सिरोंज द्वारा स्थानीय शासकीय अस्पताल में एक वार्ड करते हुये मुख्य अतिथि पूर्व सांसद श्री राघवजी भाई ने कहा | की गोद लेकर उसका नामकरण भी भगवान् महावीर स्वामी के कि भविष्य में समाजहित में जो भी कार्य मेरे द्वारा संभव होंगे। नाम पर किया गया। शरद जैन भोपाल ने बताया कि शासन के उन्हें प्राथमिकता के आधार पर पूरा करूँगा। कार्यक्रम की
निर्देशनुसार प्रत्येक शहर, पंचायत, ट्रस्ट के पदाधिकारियों द्वारा अध्यक्षता करते हुये क्षेत्रीय विधायक श्री लक्ष्मीकांत शर्मा जी
नामकरण के कार्य को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाये (सम्पर्क ने भरपूर यथासंभव सहयोग देने की घोषणा की और कहा
शरद जैन, 47, मारवाड़ी रोड़, भोपाल फोन 543522)। कि मैं भी समाज का एक अंग हूँ। पूर्व सांसद एंव विधायक
शरद जैन जी ने दिगम्बर जैन समाज, सिरोंज द्वारा धार्मिक, सामाजिक
80 जनकपुरी, जुमेराती, भोपाल
-सितम्बर 2002 जिनभाषित 31
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जरूरत है शाकाहार पहचान चिह्न के नियम पालन की
जीव दया, क्रूरता निवारण, शाकाहार एवं प्राणीरक्षा में | वह प्रतीक चिह्न को प्रदर्शित करने की बाध्यता आयातकर्ता पर आस्था, निष्ठा रखने वाले कार्यकर्ताओं एवं संस्थाओं के अथक | भी सुनिश्चित करें। प्रयासों से केन्द्रीय स्वास्थ्य तथा परिवार-कल्याण मंत्रालय (105
अनेक उत्पादकों ने अपने उत्पादों पर ये प्रतीक छापन ए, निर्माण भवन, नई दिल्ली) ने 'खाद्य अपमिश्रण निवारण | प्रारंभ कर दिया है। माँसाहारी खाद्य पदार्थों में दिल्ली की ब्रिटेनिय अधिनियम, 1954' में संशोधन किया है। संशोधन के बाद अब का उत्पाद 'गुड-डे, फ्रूट केक', मुम्बई के डोमिनोज पिज्जा के माँसाहारी/शाकाहारी खाद्य पदार्थों के डिब्बों/पेकिंग पर यह निश्चित अनेक उत्पाद, गुड़गाँव (हरियाणा) की कम्पनी फ्रीटो ले इण्डिय चिह्न प्रदर्शित करना अनिवार्य कर दिया है। इसमें माँसाहारी खाद्य का चिकन फ्लेवर युक्त 'पोटेटो चिप्स' (आलू पपड़ी), नई दिल्ली पदार्थ को परिभाषित करते हुए बताया गया है कि 'जिस खाद्य की नेस्ले इण्डिया लि. का 'मैगी रिच किचन सूप पाउडर तथ पदार्थ में एक संगठक के रूप में पक्षियों, ताजा जल अथवा समुद्री मैगी-एकस्ट्रा टेस्ट चिकन' आदि पर भूरे रंग से बना चिह्न देखने जीव-जन्तुओं अथवा अण्डों सहित कोई भी समग्र जीव-जन्तु या | में आया है। कुछ ऐलोपैथिक कैपस्यूल्स, गोलियाँ एवं पाउडर के उसका कोई भाग अथवा जीव-जन्तु मूल का कोई उत्पाद अन्तर्विष्ट पैकेटों पर भी माँसाहारी भूरे रंग का चिह्न प्रदर्शित हुआ है। उदाहरण होगा, तो वह पदार्थ 'माँसाहारी खाद्य' माना जावेगा। किन्तु इसके | के लिये-मुंबई की यूनिवर्सल मेडीकेयर का उत्पाद, 'फ्री फ्लेक्स', अंतर्गत दूध या दूध से बने पदार्थों को माँसाहारी खाद्य नहीं माना | 'इस्टोवन' व 'प्रिमोसा' केपस्यूल्स, दिल्ली की ईस्टर्न-केपस्यू प्रा. जायेगा।' इस परिभाषा में अण्डे को माँसाहार श्रेणी में शामिल | लि. के 'प्रोस्टोनिल' व 'मेगोमोस्ट' केपस्यूल्स, मुंबई के रेनबेक्सी किया गया है।
लेबोरेटरी के 'रेवीटाल', रेवीटल केपस्यूल्स, लूपिन लिमिटेड के माँसाहारी खाद्य पदार्थों के पेकिंग पर 'भूरे रंग' (ब्राउन | "रेकोविट' केपस्यूल्स, बेरगेन हेल्थ केयर के 'ओलेवान' केपस्यूल्स कलर) तथा शाकाहारी पदार्थ पर हरे रंग का एक जैसा चिह्न और बैंगलोर की बन्नेर फार्मा. ई. प्रा. लि. की 'सेट काल मोम' छापना अनिवार्य हो गया है। उपभोक्ता, वस्तु की पहचान चिह्न के टेबलेट्स आदि के बारे में कुछ जानकार बताते हैं कि उपरोक्त अलग-अलग रंग से कर सकेंगे। प्रतीक चिह्न का आकार उत्पाद दवाइयों में प्राणिज स्त्रोत से प्राप्त (हड्डियों से निर्मित) जिलेटिन, के नाम या ब्राण्ड नाम के लिए प्रयुक्त अक्षरों की ऊँचाई के बराबर | विटामिन्स प्रयोग होने से यह चिह्न दर्शाया है। दूसरी और नोवार्टिज होना चाहिए। चिह्न को उत्पाद के नाम या ब्राण्ड नाम के ठीक कन्जूमर हेल्थ इ.प्रा.लि. मुंबई के 'इम्पेक्ट' पाउडर में मछली तेल ऊपर प्रदर्शित किये जाने का प्रावधान है। सभी प्रकार के प्रचार- | के अतिरिक्त ऐसे ही अन्य विटामिन्स मिलाये जाते हैं। प्रसार, मीडिया, विज्ञापन आदि में प्रतीक चिह्न को नियमानुसार खुशी इस पहल से भी होती है कि कुछ उत्पादकों ने अनिवार्य रूप से दर्शन की बाध्यता रखी गई है। प्रतीक चिह्न | नियम प्रभावशाली होने की तारीख 20 जून, 2002 से पहले ही भरे हुए वृत्त जो व्यास से दुगनी परिधि का हो, उसे एक वर्ग के
अपने उत्पाद पर हरे रंग का शाकाहारी चिह्न चिह्नित कर दिया। मध्य में रहना चाहिए। माँसाहारी खाद्य पदार्थों पर प्रतीक चिह्न 4
इनमें नई दिल्ली की नेस्टेले ने मैग्गी 2 मिनिट्स नूडल्स', के.आई.सी. अक्टूबर, 2001 से तथा शाकाहारी पदार्थों पर 20 जून,2002 से
फूड्स प्रा. लि. मुंबई के 'मेक्स आरेंज', 'फूट पावर' पर तथा दर्शाना अनिवार्य हो चुका है। सरकार की खुली आयात नीति से
पारले बिस्कुट प्रा. लि. मुंबई ने अपने उत्पाद 'पारले मोनाको' आयातित खाद्य पदार्थों पर भी प्रतीक चिह्न को चिह्नित करने का
तथा 'पारले जी बिस्कुट एवं क्लासिक फुड्स ने 'फन ब्रेक'
नामक 'टामाटो बाल्स', लिप्टन की ताजा चाय, प्रिया गोल्ड कं. नियम लागू होगा या नहीं यह जानकारी अब तक सामने नहीं आ
की किड्स क्रीम बिस्कुट आदि शामिल हैं। सकी है। शाकाहारी उपभोक्ताओं, जिनकी संख्या अमेरिका की
कुछ उत्पादक उपभोक्ताओं को भ्रमित करने/चिह्नों की एक बाजार शोध कंपनी 'रोपर स्टार्च वर्ल्डवाइड' द्वारा 1997 में
जानकारी नहीं होने का लाभ उठाकर भूरे रंग की जगह लाल या किये गये विश्वव्यापी सर्वेक्षण अनुसार भारत में 82 प्रतिशत निकली |
भटा (मेजंटा) रंग से चिह्न बना रहे हैं। कुछ ने उत्पाद/ब्राण्ड नाम है। इनकी शाकाहारी भावनाओं के हित में सरकार को चाहिए कि |
शेष पृष्ठ 31 पर 32 सितम्बर 2002 जिनभाषित
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शाकाहारी खाद्य पदार्थ के पैकेट
पर चिन्ह
शाकाहारी एवं मांसाहारी खाद्य पदार्थो के पैकेट पर प्रतीक चिन्ह बनाना अनिवार्य
मांसाहारी खाद्य पदार्थ के पैकेट
पर चिन्ह
(Lehar
Nestle.
शाकाहारी खाद्य पदार्थों परहरे रंग (ग्रीन कलर)वाला चिह्न- देखें।
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ऐसा न पाये जाने पर तुरंत उपभोक्ता फोरम में शिकायत करें।
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________________ खाद्य पदार्थ-दवाएँ खरीदने से पहले चिह्नों को पहचानें मांसाहारी खाद्य पदार्थों एवं दवाओं पर बना भूरे रंग (ब्राउन कलर) वाला चिह्न - देखें RECOVIS IMPACT, IMPACT, O रजि.नं. UP/HIN/29933/24/1/2001-TC monginis SLICE CAKE SpotuNOMOOSTERT Domino's Pizza BMinerald berals Dietary s POWDER POWDER VINNINIS itaulatdan DAN BERURU rociencamewormDIOK arpanempera ROMone 12RUPENLOD Hungry Kyal meanwa IRA ./ (REVITAL MaggiD legato HTANISAKALLY Laus hd भोपाल (म.प्र.) से मुद्रित एवं सर्वोदय जैन विद्यापीठ 1/205, प्रोफेसर्स कालोनी, आगरा-282002 (उ.प्र.) से प्रकाशित। स्वामी, प्रकाशक एवं मुद्रक :रतनलाल बैनाड़ा द्वारा एकलव्य ऑफसेट सहकारी मुद्रणालय संस्था मर्यादित, जोन-I, महाराणा प्रताप नगर, Ole DOETRANSLCHOOLITMEVENTINERALS POPon Oleton BAB=3-402 Filc 10,5 emon PROSTONTE O PROSTON'L versai Universal Magg 4.SCAPITNO : 2312 Essasur ofhotHE Extra Taste CHICKEN O PROPRIETARYT000) Primosao TiNOISoud उCATEGOUNTRan (Magam Roz roz akuch speciall ESTOV FreeFlex SETCal Mon Vitamin D. & Minerals Tablets i Calcio डाक पंजीयन क्र.-म.प्र./भोपाल/588/2002 Zinfex-AO Popular MedicaIKA