Book Title: Yashodhar Charitra
Author(s): Manikyasuri,
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj
View full book text
________________
यशोधर
॥ १५ ॥
कैलासाचल मेखला परिसरे गंगातटे पावने । शृंगे हैमवते विनिकुसुमे सांदे च जातीवने ॥ गायंत्यो वनदेवताः प्रमुदिता यत्कीर्त्तिकोलाहलं । तत्र स्थानविशेषमेव न पुनर्वतिरं गाइते || १८ || शब्दरूप रसस्पर्श-गंधादीन् विषयानपि || लोकोत्तरचरित्रेषु । बुभुजे समहाभुजः ॥ १७ ॥ सोऽहमेवंविधो राजा । पुरेऽनूवं जवांतरे ॥ अवलंबेन पुण्याना - मारूढः पदवीं परां ॥ २० ॥ न जानामि दिनं रात्रि - मुदयं वास्तमेव च ॥ महैश्वर्य सुखव्यग्रः । का लं निर्गमयाम्यहं ॥ २१ ॥ संजातापूर्व संपत्ति - पुरुषार्थपरायणः || परमं सौख्यमासाद्य । देवत्वेऽपि हि निःस्पृहः ॥ २२ ॥ रमामि रमणीयांगीं । स्नेहपूर महानदीं । अमृतानामवामाकीं । पट्टदेवीं दिवानिशं ॥ २३ ॥ तदा सा रोचते मह्यं । नायका नयनावली ॥ सल्लकीव कइस्य | सरसा शौर्यशालिनः ॥ २४ ॥ तां विना न दि जीवामि । कणमेव वियोजितः ॥ परित्याज्य नदीं नीतो । मदामत्स्य इव स्थले ॥ २५ ॥ पुष्पावचायजल के लिकलाविलासैदोला धिरोदशशिवर्णन सीधुपानैः ॥ साकं तया दरिलोचनया गतो मे । कालः सुखोदधियो बहुरत्र नीतः ॥ २६ ॥
Jain Education International
For Personal & Private Use Only
चरिवं
॥ १५ ॥
www.jainelibrary.org

Page Navigation
1 ... 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130