Book Title: Yashodhar Charitra
Author(s): Manikyasuri, 
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj

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Page 22
________________ यशोधर | ॥२०॥ FEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE । तस्यां विलासवसतौ निजवल्लन्नायां । जातो मया गुणधरस्तनयो विनीतः ॥ पुत्रोदये-चरित्रं न हृदयं मुदितं तदानू-येनोरिष्यति कुलं सकलं ममेति ॥ २७ ॥ सोऽहं सखे विततपुत्रकलत्रमित्र-व्यामोहमनहृदयो गमयामि कालं । निर्वाणवासिनमजं नगवंतमंतः । संचिंत. यामि मनसापि न वीतरागं ॥ ३॥ अन्यदा सह तया हरिणादया । कौतुकेन निषसाद गवादे ॥ मामके शिरसि सा सरसांग। । गर्नकं च कुसुमैर्विततान ॥ श्ए ॥ एकमाईपलितं मम केशं । सापसार्य पुरतो निदधे तं ॥ तं विलोक्य चकितोऽहमनूवं । धर्मदूतमिव पांडुर. वर्ण ॥ ३० ॥ ततो हृदि विरक्तोऽहं । नीतः संसारसागरात् ॥ सहसैव प्रपत्रोऽस्मि । सुप्तो छित इव स्मृति ॥ ३१ ॥ मन्ये कदापि जीवोऽयं । न सुखेन्यः पराङ्मुखः ॥ अतृप्तः पूर्वसंस्कारा-दिंधनेन्य श्वानलः॥ ३२ ॥ पुनः पुनरमी कामाः । सेव्यमाना नवा नवाः ।। तेषु । प्रवृत्तिः का नित्य-महो चर्वितचर्वणं ॥ ३३ ॥ जीवित्वा सुचिरं लोके । किमपूर्वं विलोक्यते ॥२०॥ ॥ दिवसो रजनी संध्या । वर्षा ग्रीष्मस्त एव हि ॥ ३४ ॥ हादशारमिदं चक्रं । समंतात्परि| वर्तते ॥ भ्रमंति यत्र नूतानि । स्थावराणि चराणि च ॥ ३५ ॥ EEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org Jain Education Intematonal

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