Book Title: Yashodhar Charitra
Author(s): Manikyasuri,
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj
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यशोधरा जवल्लनः ॥ १४ ॥ सर्वलक्षणसंपूर्णः । सर्वावयवसुंदरः ॥ स कोऽपि भुवमायातो । माया- चरित्रं
मय श्वापरः ॥ १५ ॥ अखर्वगर्वमर्वतं । सर्पतं पर्वतोपमं ॥ स चकंपे तमालोक्य । वैरज्व. रजरादितः ॥ १६ ॥ सहज कृत्रिमं चेति । धिा वैरं प्रचक्षते ॥ सहजं निर्विशेषेण । कृत्रिमं कारणांतरैः ॥ १७ ॥ हयकासरयोरजवानरयो-नकुलोरगयोः करिकेसरिणोः ॥ वृषदंशविनायकवाहनयोः॥ सहजं भुवि वैरमिह प्रथितं ॥१०॥ तद्राह्मणश्रमणयोः प्रतिवेश्मपुंसोस्तत्पितृव्यसुतयोरुनयोः सपत्न्योः ॥ नैसर्गिकं जगति वैरमकारणेन । केनापि कस्यचन किंचन नापराई ॥ १५ ॥ कृत्रिमं पुनरत्नावदोषतः । कारणांतरवशेन तत्तथा ॥ रामरावणसुन्नूमन्नार्गव-कृष्णकंसकुरुपांडुजन्मनां ॥२०॥ अतोऽस्य दैवदग्धस्य । महिषस्य हयंप्रति ॥ सृष्टिस्वन्नावदोषेण । रोषेण स्फुरितं हृदि ॥१॥ तमन्यधावदाबाद-स्फारपूत्कार नैरवः | ॥ स नूमंगलमुदं डैः । खुराप्रैः खंडयन्निव ॥ २२ ॥
जन्ने स्वविघ्ननिघ्नेन । शृंगान्यां शृंगिणायुधा ॥ एकजन्मगृहीतान्यां । कृपाणान्यामि| वोरसि ॥ २३ ॥ उस्सहेन प्रहारेण । तुरगस्य तरस्विनः ॥ साधोरिवापमानेन । बिन्नेदे हृदः ||
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