Book Title: Yashodhar Charitra
Author(s): Manikyasuri, 
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj

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Page 63
________________ चरित्र यशोधर रं || त्वमपि नौ नरनाथ सुदुःश्रवं । महिषमेषनवं श्रुतवानिति ॥६॥ ॥ इति श्रीमाणिक्यसूरिविरचित श्रीयशोधरचरित्रं षष्टः सर्गः समाप्तः ॥ श्रीरस्तु ॥ ॥ अथ सप्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ आवां महिषमेषौ तौ । विपत्तिमधिगम्य तां ॥ अंतर्मुहूर्नमात्रेण । पुनर्जन्मार्थमुछित्ती E॥१॥ अदृष्टमूलपर्यंते । चतुर्गतिचतुष्पथे ॥ भ्रमंतोऽमी नवपुरे । न विश्राम्यति जंतवः ॥ ॥२॥ प्रानिगोदाद्यदासिई । स्वस्वकर्मोपलंन्नतः॥ केत्रकालानुषंगेण । व्यन्नावव्यवस्थया | ॥३॥ किंधा त्रिधा चतुर्धा च । पंचधा बहुधाश्रवा ॥ हंत संनूय संनूय । न तथाप्यपुननवः॥४॥ ससंहननसंस्थानो । वर्णगंधरसान्वितः ॥ शब्दरूपस्पर्शयुक्तः। प्रपंचःपंचनौतिकः ॥ ५ ॥ रत्नत्रयमनासाद्य । सीदंतस्तु निरंतरं ॥ परापराः परायताः । सेवंते हंत जंतवः ॥ ६ ॥ अधिगम्य पुनः सम्यक् । तमनादिमनागतं ॥ अनेकमेकमव्यक्त-मनंतमजरामरं ॥ ७ ॥ लकाश्च चतुरशीति-योनयस्तासु निश्चितं ॥ न जातु जायते जन्म-क्लेशलेशोऽपि धीमतां ॥ ॥ सिहं बुइं शिवं शांतं । चेतनं ज्ञानकेतनं ।। क्षेत्र पुरुषं नित्य-मज FEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE CHEGEEFFEFFEFEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE Jan Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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