Book Title: Yashodhar Charitra
Author(s): Manikyasuri, 
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj

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Page 25
________________ चरित्रं यशोधर खजधारासहोदरं । यथा दु:खदमत्युग्र-'मयश्वणकचर्वणं ॥ ५५ ॥ किंच वत्सो गुणधर- स्त्यक्त्वा मयि गते सति ॥ स्थाप्यते कमेकाकी । रक्षणीयस्त्वया ततः॥ ५६ ॥ देवि त्व॥२३॥E यि समावj । स्थितायां पुत्रमात्मनः ॥ निश्चितः सर्वथा नत्वा । वनवासं ब्रजाम्यहं ॥५॥ न कार्य मम राज्येन । न पुत्रेण सुखेन च ॥ अहं सहैवायास्यामि । सा पुनर्मामन्नाषत ॥ ॥ ५० ॥ प्रतिपन्नं तया देव्या । सहैव गमनं मया ॥ नरेंइसुतया तन्व्या । मानिन्या रूपरंजया ॥१॥ अत्रांतरे विषयवर्जितमानसस्य | साकं तया सुकृतकृत्यकथाकुलस्य । सारस्व. तावतरणप्रवणेन पुण्यं । वैतालिकेन पठितं दिवसावसानं ॥ ६॥ सेयं विकीर्णतिमिरावलिकेशपाशा । काकोलकूजितविलापवती दिनश्रीः ।। चारप्रवेशमुपयाति विडं बिताशा । सूरस्य तस्य परलोकमुपागतस्य ॥ ६१ ॥ तूर्ण ततः स्वयमुपेक्ष्य मुहूर्तमेकं । सायं विधाय परमेष्टिनुति सुरम्यां ॥ शय्यातले विपुलकोमलतपशायी। निशसुखेन नृपते रजनीमनैषं ॥६॥ तम्यास्तमोतमरुणोदयकालवेलां । ज्ञात्वा स्फुटं समधिगम्य ततः प्रबुद्धः ॥ श्रीवीतरागचर १ लोहचणकचर्वणमित्ययः ।। +66EEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE FFEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE Jain Education Internatonal For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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