Book Title: Yashodhar Charitra
Author(s): Manikyasuri,
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj
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यशोधर || मन्यसे ॥ पपात पादयोरंबा । ममेति करुणस्वरं ।। ७२ ॥ मया विनिहित कोपा-तस्या वि- चरित्रं
नयलोपतः ॥ आत्मघाताय निस्त्रिंशं । व्याकोशं कंपकंदले ॥ ७३ !! सामंतमंत्रिवेन्याद्यै-रु. चाय तुमुलारवैः ।। बलादाछिद्य निस्त्रिंशं । दूरे विनिहितं मम ॥ G४ ।। दृष्टं ते मातृवात्सख्यं । विनीतः साधु पुत्रक ॥ इत्यादि तर्जयंतीव । सा पुनर्मामन्नापत ॥ ५ ॥ एतावदेव याचेऽहं । वत्स मे नणितं कुरु ॥ यद्यपि त्वं विरक्तोऽसि । जीवघातपराङ्मुखः ॥ ॥ .
- सांप्रतं यस्य कस्यापि । दूरादाकर्ण्यते रुतं ॥ स तव्यस्त्वया देव्याः । पुरः पिष्टमयः खगः ॥॥ आग्रहादस्पदोषत्वा-त्प्रतिपन्नं मया च तत् ॥ कुकवाकोवराकस्य । दूराच्च विरुतं श्रुतं ॥ 6 ॥ जनन्या कारितः पदी । यवपिष्टमयाकृतिः ॥ दारिश्चंचुचरणो । लादारागांबुशोणितः ॥ नए ॥ आताम्रगैरिकचूमो । रक्तचंदनचर्चितः॥ सजीव इव तैर्ना वै-श्वक्षुषालोकयन्निव ॥ ए ॥ ततोऽहं मईनान्यंग-स्नानपावनविग्रहः ॥ रक्तवस्त्रपरीधानः । का-॥ २६ ॥ लिकालवनं गतः ॥ १ ॥ गंधचंदनपुष्पाद्यै-धूपदीपविलेपनैः ॥ तदा त्वमिव नक्तात्मा । | चंकीर्चितवानदं ॥ ए ॥ सपंचशब्दनिघोषं । संकल्प्य मनसा मया ॥ आकृष्टकरवालेन।
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