Book Title: Yashodhar Charitra
Author(s): Manikyasuri,
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj
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यशोधर
॥३०॥
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महिषीमवमन्यते ॥ १ ॥
चरित्रं अथवायं त्वसंबई । सामान्यं वदति भ्रमात् ॥ मन्ये देवीमविज्ञाय । वक्ति सुप्तोनितो | जमः ॥ २२ ॥ स धृत्वा कबरीबंधे । तां कंबानिरताडयत् ॥ विनेयं वै नयप्रह्वा । गुरुरंतःसद
यथा ॥ २३ ॥ प्रसीद परतंत्रास्मि । मंतुमेकं सहस्व मे ॥ नैवं पुनः करिष्यामि । सापीति प्रणनाम तं ॥ २५॥ नन्नयोरपि नतळपे । गाढालिंगनबंधनः॥ संजोगः सरसो जझे । कोकिलाकाकयोरिव ॥ २५ ॥ एतहीदय गृहस्वरूपमखिलं दष्टाधरेण क्रुधा ॥ निःश्वासान् सृ. जता विकृष्य जगृहे पाणौ कृपाणं मया ॥ एनं किं पुरुषाधमं प्रथमतः स्वामिद्रुहं कुजकं । किं वा इन्मि कलंकिनी नु कुलटां पापामिमां स्त्रीमिति ॥ २६ ॥ जातं पुनर्मनसि मे यदहो विरुई । कर्मेदमीदृशमनार्यमनात्मरूपं । स्त्रीघातपातकपरः परलोकमेनं । कस्मादहं तु सुकृती मलिनं करोमि ॥ ५७ ॥ पूर्व येन वितिरवतता सांमुक्ताफलौघै-नित्वा युझे रिपुग-॥ ३ ॥
जघटास्थूल कुंनस्थलानि ॥ सोऽयं शूरः समरचतुरो दा न किं लऊते मे । नारीब्जप्रमु| खशिरसि प्रेर्यमाणः कृपाणः ॥ २० ।।दा कदर्यमधमं विचेष्टितं । हा महत्वतरुकंदकंतनं ॥
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