Book Title: Vairagyashatakama
Author(s): Ramchandra D Shastri
Publisher: Ramchandra D Shastri

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Page 245
________________ - यथा चिंतामणिरत्नं सुलानं न निश्चये नवति तुलविजवानां अल्पपुण्यानां % 3D जह चिंतामणिरयणं। सुलहं न दु होइ तुबविहवाणं ॥ गुणविनववर्जितानां जीवानां तथा धर्मरत्नमपि ए१०७ ११ गुणविहववजियाणं। जियाण तह धम्मरयणंपि एय॥ अर्थ-हे जीव ! (तुचविहवाणं कें) तुब विनववालाने (जद के.) जेम * (चिंतामणिरयणं के०) चिंतामणि रत्न जे ते (सुलहं के) सुलन एवं (न हु हो के) नज होय. (तह के) तेम (गुणविहववजियाणं के०) गुण रूप वै लवे करीने रहित एवा (जियाण के०) जीवोने (धम्मरयणंणि के०) धर्मरत्न जे ते पण, सुलत न होय. ॥ एए॥ नावार्थ-तुब विनववाला जीवोने एटले पशुपाल जेवा स्वल्प पुण्यवाला । प्राणियोने, जेम चिंतामतिरत्न सुखे पामवा जोग्य न होय, अर्थात् पुण्यहीन * १५३ XXXXXXXXXXXXX******** - - - - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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