Book Title: Shrimad Devchandraji Vistrut Jivan Charitra Tatha Devvilas
Author(s): Buddhisagar, Manilal Mohanlal Padrakar, Kaviyan
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal

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Page 191
________________ दहा सोरठा. दंपती श्री गुरुपास, करजोडी करे विनती, तुम उपर विश्वास, यथार्थ कहो श्रीस्वामिजी. १ सुपनाध्यायना ग्रंथ, काढ्या गुरुए तखिणे; सत्य बोले निग्रंथ, लाभानुलाभ ते जोइने. श्री गुरु शिर धुणावीयु, चमत्कृति थइ चित्त; सामान्य घर ए सुपन स्युं ? पण इहां एहवि थीति.३ हे देवाणुप्रिय! सांभलो, सुपनतणो जे अर्थ; शास्त्र अनुसारे हुं कहुं, नवि बोलु अमे व्यर्थ. ४ देशी-मनमोहनां जिनराया. तुम धरणीमे गजपतिदीठो, तेतो शास्त्रे कह्यो गरीठोरे, कुंवर थास्ये लाडकडो, हारे सुपनप्रभावे थास्येरे; कुंवर धास्ये लाडकडो, गजपर बेसीने दान; पलि अनमिष सेवे विधानरे. १ कुं० दोय कारण छे ए सुपने, देवे जो प्रभावे ए तपनेरे. . Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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