Book Title: Shrimad Devchandraji Vistrut Jivan Charitra Tatha Devvilas
Author(s): Buddhisagar, Manilal Mohanlal Padrakar, Kaviyan
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal

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Page 222
________________ ४३ एकदिन वायुप्रकोपथी, वमनादिकनी व्याधि; अकस्मात उत्पन्न थइ, शरीरे थइ असमाधि. शास्त्र मरण दोउ कह्यां, पंडित मरण छे जेह; बाल मरण तो दुसरो, उत्तम पंडित मृत्यु नेह. ८ तव शरीरनि क्षक्षिणा, (क्षीणता ? ) शिथिल थयां अंगोपांग; बुद्धि करीने जांणी, अनित्य पदारथरंग. पुद्गळ तो अनित्यता, अनादिनो स्वभाव; मूरख तेपरिं रंग धरे, पंडित धरे विभाव. निज शिष्योने तेडीने, दे शिक्षा हितकार; मुज अवस्था क्षीण छे, ए पुद्गल व्यवहार. निंदडली वेरण हूइ रही ए देसी . शिष्य शिरोमणी जाणीइं, मनरूपजी हो वाचक गुणवंत; ७ ९ १० ११ चतुर चाणाक्य शिरोमणि, गुरु उपर बहु भक्तिवंत, धन धन ए गुरु वंदीए. १ धन्य पहनी चतुराइने, गुरु बेठा हो श्रावक करे सेव; पदकज सेवे जेड़ना, आज्ञा माने हो नित नित मेव. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat २ ५० www.umaragyanbhandar.com

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