Book Title: Shrimad Devchandraji Vistrut Jivan Charitra Tatha Devvilas
Author(s): Buddhisagar, Manilal Mohanlal Padrakar, Kaviyan
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal

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Page 223
________________ ४४ ३ ध० विनयी विषक्षणे पंडिते, गुणालंकृत हो जेहनु भयु गात्र, श्रीगुरु मनमे चिंतवे, मुझ मनरूप हो शिष्य घणु सुपात्र. मनरूप शिष्य विद्यमानता, रायचंदजी हो दुजला पूज्य; गुरुसेवामें विनयी घj, विद्याना हो जेह जाणे गुह्य. श्री रूपचंद शिष्य सुशीलता, विजयचंदजी हो पाठक गुणयुक्त; द्वितीय शिष्य विजयचंदजी, तर्कवादे हो जीत्या वादीबंद. विद्याभरे हस्ति मलपतो, मेघध्वनि सम हो उद्घोषणा छंद; तस सीस दोय सुसीलता, पूज्य पूजा हो सभाचंद विवेक; गुरुनो प्रेम शिष्य उपरे, गुरु विद्यमाने हो वादी कीया भेक. शिक्षादेवे उपाध्यायजी, सर्वशिष्यने हो कहे धारी प्रेम ५० ६ घ० Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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