Book Title: Shrimad Devchandraji Vistrut Jivan Charitra Tatha Devvilas
Author(s): Buddhisagar, Manilal Mohanlal Padrakar, Kaviyan
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal
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२४
देवचंद मनमे चिंतवे, हुं पामर मनमाहि, मूर्छा धरुते फोक सवि,सत्यप्रभुमारगवांहिं (माहि?)५ संवतसतरसत्यासीये, आव्या अमदावाद; लोक सहु तिहावांदवा, आव्या मन आल्हाद. ६ नागोरीसरा जिहां अछे, तिहां ठवीया मुनिराज; निलोभी निकपटता, सकल साधुशिरताज. ७ साधुश्री देवचंदजी, स्यादवादनी युक्ति, जीवद्रव्यना भावने, देखाडे ते व्यक्ति. ८ ते हवे देशना सांभळो, श्रावक श्राविका जेह, वाणी जळ आषाढसम, वरसे ध्वनि घनगेह. ९ पाप स्थान अढार छे, ते मूको भविजन्न, जिनवरे भाष्यां जे अछे, ते सुणीये एक मन्न. १०
ढाळ. अळगी रहेनी. ए देशी. वीर जिणेसर मुखथी प्रकासे, पाप स्थान अढार; तेहथी दूर रहो भवि प्राणी, मुणीये आगार अणगार. जिनवर कहेजी, कहे जी. .२ जिनवर कहेजी.
टेक.
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