Book Title: Shrimad Devchandraji Vistrut Jivan Charitra Tatha Devvilas
Author(s): Buddhisagar, Manilal Mohanlal Padrakar, Kaviyan
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal

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Page 214
________________ धन०३ धन०४ धन० ५ भंडारीजी लाहो लेता, ए गुरु सम नही दुजारे. विधियोगे ते राजनगरमें, मृगी उपद्रव व्याप्योरे; गुरुने भंडारी सर्व व्यवहारी, अरज करी सीस नमाव्योरे. स्वामी उपद्रव राजनगरमें, थयो छे सर्व दुःख कारे; तुम बेठा अमे केहने कहीये, तुमे छो दुःखना हारे. जैनमार्गना मंत्र यंत्रादिक, करीने खीला गाडयारे; मृगी उपद्रव नाठो दुरिं, लोकना दुःख नसाड्यारे. जिनशासननो उदय ते करता, दुःखम आरे देवचंदरे, प्रसंसा सघले शाशनकेरी, टाल्यो दुःखनो दंदरे. एहवे समे रणकुंजी आव्या, बहुलुं सैन्य लेइनेरे; धन०६ भन० ७ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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