Book Title: Shrimad Devchandraji Vistrut Jivan Charitra Tatha Devvilas
Author(s): Buddhisagar, Manilal Mohanlal Padrakar, Kaviyan
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal
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२६
७ जि०
८ जि०
झुठ बोल्याथी वसुभूपतिनु, सिंहासन भुइं पडीयु; काल करीने दुरगति पोहतो, झुठ वयण ते जडीयु. झुटु मिंटु लागे जनने, कडुयां फळ छे तेह आगारी अणगारि मुखथी, झुठ न बोलस्यो रेह. त्रीजु थानिक कहे जिनवरजी, नाम अदत्तादान; अगदीधी वस्तुनी जयणा, धरवानो करो स्यान. चोरी व्यसने दुरगति पामे, तेहनो को न साखी; चोरद्रव्य खातां नृप जो जाणे, जिम भोजनमा माखी. तृण जाच्युं कल्पे साधुने, नवि ले अदत्तादान; घोरतणो वली संग न कीजे, श्म कहे जिन वर्धमान.
९ जि०
१० जि०
११ जि०
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