Book Title: Shrimad Devchandraji Vistrut Jivan Charitra Tatha Devvilas
Author(s): Buddhisagar, Manilal Mohanlal Padrakar, Kaviyan
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal

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Page 209
________________ माणिकलालजी जालिमी, ढुंढकनो मन पास, तेहने गुरुए बुझव्यो, टाली मिथ्यात्वनीका(वा?)स.२ नौतन चैत्य करावीने, पडीमा थापी ता सिस, देवचंद उपदेशथी, ओछव हुया उलास. ३ श्री शांतिनाथनी पोलमें, भूमिगृहमें विंब, सहसफणा आदे देइ, सहसकोड जिनबिंब. ४ तेहनी प्रतिष्टा तिहां करी, धन खरचाणां पूर, जैनधरम प्रकासीयो, दिन दिन चढते नूर. ५ संवत १७७९ सतर ओगणीस (एग्न्याऐंशी?) मे __चातुर्मास खंभात, तिहांना भविने बुझवा, जेहना अवदात.. रसीयानी देशी. . श्री देवचंद्र मुनींद्र ते जैननो, स्तंभ सदृश थयो सत्य सुज्ञानी; देशनामें श्री शत्रुजयतीर्थनो, महिमा प्रकाशे नित्य. तीर्थ महिमा शत्रुजयनो सुणो. १ श्री सिद्धाचळ महिमा मोटको, श्री रुषभ जिणंदनी वाणी. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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