Book Title: Shrimad Devchandraji Vistrut Jivan Charitra Tatha Devvilas
Author(s): Buddhisagar, Manilal Mohanlal Padrakar, Kaviyan
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal
View full book text
________________
स०
सहसकूटनां नाम अप्रसस्ति, देवचंद्रे कीधा प्रसस्तिरे.
स० १८ प्रतिष्टा तिहां कीधी भव्य, ओच्छव कीधा नवनव्यरे. क्रिया उधार कीधो देवचंद्र, काढ्या पाप परिग्रहफंदरे.
स. १९ ढाळ कही ए पांचमी रुडी, ए वात न जाणस्यो कूडीरे. कवियण कहे आगळ संबंध, वळी सोनुने सुगंधरे.
स० २०
दुहा. क्रिया उद्धार देवचंदजी, कीधो मनथी जेह; ए परिग्रह सवि कारिमो, अंते दुःखनुं गेह. १ नवनंदनी नव डुंगरी, कीधी सोवनराशि; साथे कोइ आवी नहीं, जूठी धरवी आसि. २ धन धन श्री शालिभद्रजी, धन धन धन्नो सुजात, अगणित ऋधिने परिहरी, ए का थोडी वात. ३ बत्री को टसोवनतणी, धन्नो काकंदी जेह, मूकी श्री जिनवीरनी, दीक्षा लीधी नेह. ४
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com

Page Navigation
1 ... 200 201 202 203 204 205 206 207 208 209 210 211 212 213 214 215 216 217 218 219 220 221 222 223 224 225 226 227 228 229 230 231 232