Book Title: Sagar Ke Javaharat
Author(s): Abhaysagar
Publisher: Jain Shwetambar Murtipujak Sangh

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Page 246
________________ के रूप में समस्त श्रागमों को बाँचने का काम चलाउ अधिकार भी जो मुझे प्रदान किया है वह भी आपकी महाकृपा है । उसके लायक में बनुं यह मेरी अंतर की अभिलाषा "" है । " आपकी कृपा से मिले आगम वांचन कच्चा परवाना ( लाइसेन्स) प्राप्त कर सकूं ऐसी आप कृपा करों । बाकि पन्यासपद जैसा पक्का परवाना (लाइसेन्स) के लिए मेरे में योग्यता अथवा तैयारी नहीं दीखती है । "" आपके चरणों के प्रताप से श्री महानिशीथ सूत्र तक योग की आराधना हुई तो हुई परन्तु अब तो पिछले 6-7 वर्षो से प्रांतों की खोटो गर्मी तथा उग्र कब्जियात के कारण आंबील अथवा छः माह के बड़े योग को वहन कर सकने की मेरी शारीरिक तैयारी नही लगती है । " ऐसा होने पर भी आप श्री के मंगल- पुनीत आशीष भरे वासक्षेप के बल पर " 'योग वहन के लिये शारीरिक अनुकूलता बढ़ जायगी ऐसा मुझे भरोसा है । परन्तु वास्तविकता मे पदवी के भार को उठाने की निर्वाह की तथा शासनानुकूल रीति से पदवी को सफल करने की पात्रता मुझ में नहीं है । ܕܙ अभी तो मेरे साधुता के मूल पद- समाचरण, सितरीकारण सितरी में अनेक दोष लगते हैं शारीरिकादि कारणों से बहुत दोष लगाने पड़ते है । " अतः ग्रापके चरणों में मस्तक रखकर मेरी नम्रता विनम्र प्रार्थना है कि इस सेवक को २२५

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