Book Title: Panchsutra Stabak
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: ZZ_Anusandhan

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Page 16
________________ अनुसन्धान ४२ उपैति-पामें छै जुग्गयं कहतां योग्यतानइं । तथा-तिम स्वकीय दोष भावनायें करी संसारथी विरक्त-संविग्न कहतां मोक्षार्थी थाय, ममतारहित, परने उपा(पता)प न करें ते अपरोपतापी-एहवौ थाय अपरोपतापी, 'विशुद्धाविशुध्यमानभावजाता:' विशुद्ध थाय, ग्रंथि प्रमुखनें भेदवई करीनई विशुध्यमान छे भाव जेहनो ते विशुध्यमानभाव शुभकंडकवृद्धिई करी थाय || साधुधम्मपरिभावणा सुत्तं ॥२॥ इति साधुधर्मपरिभावना सूत्रं ||२|| परिभाविए साहुधम्मे जहोदिअगुणे जइज्जा सम्ममेअं पडिवज्जित्तए अपरोवतावं । परोवतावो हि तप्पडिवत्तिविग्धं । अणुपाओ खु एसो । न खलु अकुसलारंभओ हिअं । 'परिभाविते सति साधुधर्मे' अनंतर सूत्रोदित विधिइं यथोदितगुण संसारथी विरक्त, संविग्न, अमम । हवै त्रीजा सूत्रनी व्याख्या कही छै । बीजा सूत्र साथै त्रीजा सूत्रनौ आ संबंध-जे अनंतर सूत्रे धर्मगुणप्रतिपत्ति-श्रद्धा थयें थकें, साधकनें जे कर्तव्य ते कर्ये थकें, साधुधर्म परिभावित थयो । हवई साधुधर्म परिभावित थय जे अकर्तव्य ते कहै छई । यत्न करी सम्यक् विधिइं ए धर्मनई पडिवजीनई परतें उपताप न उपजई तिम अपरोपतापं यथा स्यात् तथा । परोपताप जे ते निश्चयई धर्मप्रतिपत्तिना अंतराय छइं । धर्मप्रतिपत्ति करवा परोपताप ते अनुपाय छै निश्चयइं । ए परोपताप नही निश्चयइं अकुशलारंभथी आत्माने हित । ___अप्पडिबुद्धे कहिचि पडिबोहिज्जा अम्मापिअरे । उभयलोगसफलं जीविअं, समुदायकडा कम्मा समुदायफलत्ति । एवं सुही( दी हो अविओगो। अन्नहा एगरुक्खनिवासिसउणतुल्लामेअं । उद्दामो मच्चू पच्चासन्नो अ । दुल्लहं मणुअत्तं समुद्दपडिअरयणलाभतुलं । अइप्पभूआ अण्णे भवा दुक्खबहुला मोहंधयारी( रा) अकुसलाणुबंधिणो अजुग्गा सुद्धधम्मस्स । जुग्गं च एअं पोअभूअं भवसमुद्दे, जुत्तं सकज्जे निउंजिउं संवरइअच्छिदं नाणकण्णधारं तवपवणजवणं । अप्रतिबोध थकें कथंचित कर्मना विचित्रपणाथी "अकुशलारंभश्च Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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