Book Title: Karmvipak athwa Jambu Prucchano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 19
________________ श्रांबली, कोपे कुमति पडंत रे । सो० ॥ ११ ॥ श्वेतार कादिक औषधि, काढे तेहनी जडंत रे । सो ॥ पाप उदय जब आवियां, खूलो पंगु लोमंत रे । सो० ॥ १२ ॥ मूत्र कृबू करी महा कुःखी, पथरी रोग प्रचंमरे ॥ सो॥ अंतर्गल शोफो होय, कवण कर्मनो दंग रे ॥ सो ॥ १३॥ जे राजानी रमणीशु, सेवे विषयनां सुख रे। सो॥ मूत्र कृवनुं तेहने, परजव थाये छुःख रे ॥ सो ॥१५॥प्रेम करी परनारीशू, काम राग विलसंत रे॥सो । परदाराना पापथी, पथरी प्रबल दमंत रे ॥सो० ॥ १५॥ गुरुणीशं रंगे रमे, कामविषयना राग रे ॥सो॥ अंतर्गल होय तेहने, किहां न लहे सोनाग रें। सो॥१६॥ महिला मित्रनी जोगवे, वारे तेहथु वढंत रे ॥ सोनवि बीये अपवादथी, शोफो तास चढंत रे । सो॥१७॥ दीसंतो अति फूटरो, बोली न शके बोल रे॥ सो॥ मूंगो गूगो मूलथी, कवण कर्मनो रोल रे ॥ सो ॥ १० ॥ अनिर्वचन गुरुने कहे, महो टार्नु हरे मान रे॥ सोए । कूडी साख तिहां दीये, गूंगो इणे अनिमान रे । सो ॥ १ए॥ ए फूषण जे टाल शे सांजली ए उपदेश रे। सो० ॥ ढाल उठी कहे की रजी, सूषण नहि सवलेश रे । सोए ॥२०॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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