Book Title: Karmvipak athwa Jambu Prucchano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 32
________________ (३१ ) पम सुरवरा रे ॥ अ॥ थर थरंग रसाल | हां। नाचे बहु अपनरा रे ॥ ना० ॥ गर्न नहीं सुख सेज ॥हां०॥ तिहां ऊपजे सदा रे ॥ ति० ॥ आणंदे सहु देव ॥ हां ॥ कहे जय जय तदा रे ॥ कण् ॥ १॥ मन मान्यां करे रूप ॥ हांग ॥ स्वरूप विविध परे रे ॥स्व०॥ जरा न व्यापे वाल ॥हा॥ के स्वेद नहिं शिरे रे ॥ के ॥ कहो स्वामी.शे पुण्य ॥ हां॥के कि हां कीधां मुदा रे ॥ के कि०॥॥ तजी घरना व्यापार ॥हा॥के पंचेंद्रिय दमे रे । के पंचें ॥ मुक्कर तप बार नेद ॥ हां०॥ सत्तर जेद संजमे रे ॥स०॥ नावे जषक चित्त ॥ हां ॥आणा जिननी वहे रे ॥श्रा॥ दान दया दाक्षिण्य ॥ हां०॥ अमर पदवी लदे रे।। अ॥३॥ नाना विधनानोग ॥ हांग ॥ नला जे जो गवे रे ॥ज॥ फुःख नहीं लव लेश ॥ हां०॥ दीर्घ श्रायु जोगवे रे ।। दी० ॥ सोजागी शिरदार ॥ हां। सहु माने घणुं रे ॥ के स० ॥ जगगुरु नाखो तेह ।। हांग ॥ कारण कोण पुण्यनुं रे ॥ का॥४॥ वस्त्र पात्र अन्न पान ॥ हां०॥ शय्या मुनिने दीये रे॥श॥ अजय दान दातार ॥ हां०॥ जीवदया हीये रे ॥ के जी०॥ खोपे नही गुरु वाण ॥ हां ॥ मीतुंमुख उचरे Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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