Book Title: Karmvipak athwa Jambu Prucchano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 41
________________ (४०) मन विश्वास नही केह तणो, वीर नणे गोयम तुमे सुणो ॥ एहवां कर्म करे नर जेह, परनव महिला थाये तेह ॥ ४०॥ मानव तुरी समारे ढोर, वींधे नाक परोवे दोर ॥ गल कंबल बेदे अज्ञान ॥ कौतुक का रण कापे कान ॥ भए ॥ इस्यां कर्म जे करे नवीन, सविहु माणसमांहे हीन ॥ नवि नारी ते नहि नर मांय, गोयम सोय नपुंसक थाय ॥ ५० ॥ जीव वि पासे नितुरजपणे, जे परलोक न माने गणे ॥ चित्त मांहे जस घणो कलेश, ते नर आयु लहे लवलेश ॥ ॥५१॥ राखे जीवदया नर थई, अजयदान ऊपर मति रही। कार्ये थायु आहे नर तेह, गोयम ए तुम धर संदेह ॥ ५५ ॥ तुं अन्न देवा मांमे व्याप, देने मने करे संताप ।। मुजने पडियो वरांसो घणो, आप्यो अर्थ शोक थापणो ॥५३॥ आपणने मति देवा टली, बीजा देतां वारे वली ॥ गोयम एहवे कर्मे जोय, जो गरहित नव पूरे सोय ॥ ५४॥ वारु वस्त्र पाटो पाट ला, जात पात्रने पाणी नलां ॥ इषिने दे हियडे गह गही, परजव जोग खहे ते सही ॥५५॥ गुरु गिरथा तीर्थकर साध, हनो जे न करे अपराध ॥ विनय वहे मूकी अधिमान, दर्शन जेतुं सोम. समान ॥ ५६ ॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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