Book Title: Karmvipak athwa Jambu Prucchano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 47
________________ (४६ ) ॥ चोपा॥ . ॥ वीरविमल केवलनुं गेह, नांज्या नविक तणा संदेह ॥ हरष्यो तव गोयम गणधार, सना सहु जंपे जयकार ॥ १० ॥ समयरत्न जयवंत मुणीश, एम जंपे जग तेहनो शिष्य ॥ सुणजो वर्णावर्ण अढार, उति सारु करजो उपकार ।। १०३ ॥ लहे अरथ गोयम गणधार, तो पण आणी पर उपकार ॥ वीर कन्हे बहु पृष्ठा कीध, नविक प्रत्ये प्रतिबोधज दीध ॥१४॥ एम जाणी कवि करे विचार, जून एह संसार असार ॥ पुत्र कलत्र पोढां घरबार, रहेशे सोवन धन शणगार ॥ १५ ॥ जातां जीव न लागे वार, काया कृटी कीजे बार ॥ जनमत' एहिज फल सार, कीजे काई पर उपकार ॥ १०६ ॥ हियडे अवर म घरजो नर्म, ते उपकार कहीजे धर्म ॥ पुण्य पाप साथे आवशे, सह आपणे काज लागशे ॥ १७॥ कवि कहे हुं शुं बोलू बहु, जिनवर तो जाणे हे सहु ॥ पुण्यकाज करशो एक ससा, शिवसुख लेहशो वीशे वसा ॥ १७ ॥ श्री मुख गौतम पृष्ठा करे, वीर सरीखा संशय हरे ॥ बेहुनी वाणी अमृत समान, अमृत वाणी एहनु अनि धानः ॥ १७॥ एह चोपावरची चौशाल, कोण संवत Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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