Book Title: Karmvipak athwa Jambu Prucchano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 49
________________ (४०) परिहरो, रयणीनोजन ते मत करो ॥११७॥ श्री सम केत शुं बारे व्रत, जाग्यवंत पाले ए चित्त ॥ अतीत अनागतने वर्तमान, ए त्रण काल करे जिन ध्यान । ॥११॥ कीधां कर्म जो बूटे तोय, दान शील तप मति जो होय ॥ मन शुझिविण सहु ए बाल, जेम जो जाणो होय इंजाल || १५० ॥ कर्म करे जीव काया सहे, हीये विचारी जो ते लहे ॥ एक मना समरो नवकार, पूरव चौदमाहे जे सार ॥११॥ ए संसार असारद अडे, विगते जाणशो तमे पडे ॥ श्रा जपमाली हियडे धरो, मुक्तिवधू जेम लीला वरो॥ ॥ १२ ॥ जपमालीशुं संख्या कही, को जाणे को जा णे नही ॥ कवि कहे कुणही म करशो रीश, सर्वे मली ने होये एकवीश ॥ ११३ ॥ अणजाणतां कडं होये अलि, अधिकुं उलु खमजो वली ॥ मुनि लावण्यसमय कहे इस्यु, धन्य मन जे जिन वचने वस्युं ॥१४॥ ॥ इति श्री गौतमपृष्ठा चोपाइ संपूर्ण ॥ * समाप्त. - Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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