Book Title: Karmvipak athwa Jambu Prucchano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 30
________________ (३७) प्रश्न ॥३॥ नणे गुणे कहो गुण किश्यो, एम कहीं वंदे प्राणी रे ॥ अजगरमांहे ऊपजे, मूरख मनुष्य निशाणी रे ॥ प्रभ० ॥४॥ रहे सदाये बीहतो, थोडे घणे कडाके रे॥ पशु पंखीने त्रासवे, बंधुक मेहेली जडाके रे ॥प्रभ० ॥ ५॥ पामे दास दासोपणुं, आ दर न लहे रेख रे ॥ निमुंडे सहु तेहने, कवण कर्मना लेख रे ॥ प्रश्न० ॥६॥ जाति मदे मातो फरे, विनय नही तसु पास रे॥ दानादिक पामे नही, हाड विक्र यी थाय दास रे ॥प्रश्न ॥ ७॥ वाला जेहने नीकले, एक बेत्रण चार पंच रे ॥ पामे वेदन अति घणी, क वण कर्मनो संच रे ॥ प्रभ० ॥॥ अणगल जल जे वावरे, गली संखारो नाखे रे ॥ गलतां टुंपो जे दीये, ए वालानी साख रे॥ प्रश्न ॥ए॥ नीच जातिमां ऊपजे, कुण करणीथी तेह रे ॥ अनाचार रातो सदा, निरख सरखमां रेह रे ॥ प्रभ० ॥१०॥ कूडां तोल कुंडां मापले, अधिकुं लेनटुं श्रापे रे ॥ क्रियाहीन कोइ नवी लहे, नीच जाति तेणे पापे रे ॥प्रभ॥११॥ ॥ श्लोक ॥ यत्र यत्र क्रिया श्रेष्टा, तत्र तत्र नरोत्तमाः॥ पत्र यत्र क्रिया नास्ति, तत्र तत्र नराधमाः॥१॥ कि पा बलवती लोके, सर्व धर्मानुसारिणी ॥ असा दया Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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