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कोई एक दिशा या विदिशा को उद्दिष्ट कर भोजन-पानी की गवेषणा करने के लिये जाना कल्पता है। प्रश्न -हे भगवन् ! ऐसा किसलिये कहा है ? उत्तर-श्रमण भगवन्त वर्षावास में विशेष रूप से तपश्चर्या में संलग्न रहते हैं । तपस्वी शारीरिक दृष्टि से दुर्बल और थान्त होते हैं । कदाचित् वे मार्ग में चलते हुए मूर्छा को प्राप्त हो जाएं या भूमि पर गिर जाएँ उस दशा में यदि वे उस निश्चित दिशा या विदिशा में गये हों तो थमण भगवन्त उनकी खोज कर सकते हैं। २८६. वर्षावांस में रहे हए श्रमणों और थमरिणयों को ग्लान की वैयावृत्य सेवा के लिये यावत् चार अथवा पांच योजन (५२ किलोमीटर अथवा ६५ किलोमीटर) तक जाकर वापिस आना कल्पता है। अथवा इस मर्यादा के भीतर वहां रहना भी कल्पता है । किन्तु सेवादि कार्य पूर्ण होने पर, एक रात्रि भी वहां व्यतीत करना नहीं कल्पता है। २६०. इस प्रकार इस साम्वत्सरिक स्थविरकल्प को सूत्रानुसार, कल्प अर्थात् प्राचारशास्त्र की मर्यादानुसार, धर्ममार्ग के अनुसार, यथोपदिष्ट को भलीभांति मन, वचन, काया द्वारा आचरण कर, पालन कर, शुद्ध कर अथवा शोभन रीति से दीपित कर,
288. During paryusana, monks should chose aforehand a single specific direction in which they would set out for seeking alms. And why so? Because, during paryusana, monks undertake vigorous penances and become weak and frail of body. A monk may, perhaps, on his round fall down in a swoon. A search can then be readily made for him by other revered monks in the direction which he had predetermined for his round. 289. In case of urgent need, monks and nuns are permitted to travel upto a distance of four or five yojanas (approximately 52 to 65 kilometers) and then return. They may spend as much time as is necessary for the purpose of the journey but they should return the day their work is over and not spend another night.
290. Monks who follow these rules of conduct in conformity with canons, precepts, and pronouncements,
कल्पसूत्र ३६७
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