Book Title: Kailas Shrutasagar Granthsuchi Vol 26
Author(s): Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publisher: Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba

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Page 430
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir हस्तलिखित जैन साहित्य १.१.२६ ४१५ सूत्रकृतांगसूत्र-हिस्सा वीरस्तुति अध्ययन, आ. सुधर्मास्वामी, प्रा., पद्य, आदि: पुच्छिस्सणं समणा; अंति: आगमसंति त्तिबेमि, गाथा-२९. सूत्रकृतांगसूत्र-हिस्सा वीरस्तुति अध्ययन का टबार्थ, मा.गु., गद्य, आदि: पु० पुछता हुया कोण; अंति: काले इम हुं कहु छुउ. ११९८०१. तेरह द्वार चर्चा, संपूर्ण, वि. १८६१, मार्गशीर्ष शुक्ल, १४, मध्यम, पृ. १४, ले.स्थल. सारोलानगर, प्रले. मु. रामचंद्र, प्र.ले.पु. सामान्य, जैदे., (२७४१२.५, ११४३०-३३). नवतत्त्व १३ द्वार विचार, मा.गु., गद्य, आदि: मूल १ दृष्टं २ कोण ३; अंति: तलावरुप मोक्ष जाणवो. ११९८०३. (#) कल्पसूत्र सह टबार्थ, अपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ. १६०-१५१(१ से १५०,१५६)=९, ले.स्थल. चंडावलनगर, प्रले. मु. विनयचंद; गुपि. आ. मेघराजसूरिजी (गुरु आ. जयराजसूरिजी, गुजराती लुकागच्छ-धनराजशाखा); आ. जयराजसूरिजी (गुरु आ. नगराजसूरिजी, गुजराती लुंकागच्छ-धनराजशाखा); आ. नगराजसूरिजी (गुरु आ. धर्मसिंघसूरिजी, गुजराती लुंकागच्छ-धनराजशाखा); आ. धर्मसिंघसूरिजी (गुरु आ. खेमराजसूरिजी, गुजराती लुकागच्छ-धनराजशाखा); आ. खेमराजसूरिजी (गुरु आ. चिंतामणिसूरिजी, गुजराती लुकागच्छ-धनराजशाखा); आ. चिंतामणिसूरिजी (गुरु आ. धनराजसूरिजी, गुजराती । लुंकागच्छ-धनराजशाखा); आ. धनराजसूरिजी (गुरु आ. दामोदरसूरिजी, गुजराती लुंकागच्छ-धनराजशाखा); आ. दामोदरसूरिजी (गुरु आ. रूपचंद्रसूरिजी, गुजराती लुंकागच्छ-धनराजशाखा); आ. रूपचंद्रसूरिजी (गुरु आ. जसवंतसिंघसूरि, गुजराती लुंकागच्छ-धनराजशाखा); आ. जसवंतसिंघसूरि (गुरु आ. वरसिंघसूरिजी-लघु, गुजराती लुकागच्छ-धनराजशाखा); आ. वरसिंघसूरिजी-लघु (गुरु आ. वरसिंघसूरिजी-वृहद, गुजराती लुकागच्छ-धनराजशाखा); आ. वरसिंघसूरिजी-वृहद् (गुरु आ. जीवराजसूरिजी, गुजराती लुंकागच्छ-धनराजशाखा); आ. जीवराजसूरिजी (गुरु आ. रूपसिंघजी, गुजराती लुंकागच्छ-धनराजशाखा); आ. रूपसिंघजी (गुजराती लुकागच्छ-धनराजशाखा), प्र.ले.पु. अतिविस्तृत, प्र.वि. अक्षरों की स्याही फैल गयी है, जैदे., (२७.५४१२, ८४३६-४०). कल्पसूत्र, आ. भद्रबाहुस्वामी, प्रा., गद्य, आदि: (-); अंति: भुज्जो उवदंसेइ त्तिबेमि, व्याख्यान-९, (पू.वि. साधु समाचारी से है.) कल्पसूत्र-टबार्थ*, मा.गु., गद्य, आदि: (-); अंति: कल्पसूत्र संपूर्ण वाच्यो. ११९८०४. (+) नंदीश्वरद्वीपस्थित जिनभवनपूजा, संपूर्ण, वि. १८८९, पौष कृष्ण, ११, बुधवार, मध्यम, पृ. १०, प्र.वि. पदच्छेद सूचक लकीरें-संशोधित., जैदे., (२७.५४१२.५, ११४२७-३२). नंदीश्वरद्वीपस्थित जिनभवनपूजा, आ. रत्नशेखरसूरि, सं., पद्य, आदि: श्रीमत्पार्था जिनाधीशं; अंति: प्राप्नुवंति परं पदम्. ११९८०८. (+#) स्नात्र पूजा, संपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ. ५,प्र.वि. संशोधित. अक्षरों की स्याही फैल गयी है, जैदे., (२७.५४१२.५, १३४३३-३६). स्नात्रपूजा संग्रह, मु. भिन्न भिन्न कर्तक, प्रा.,मा.गु.,सं., प+ग., आदि: नमो अरिहंताणं नमोर्हत्; अंति: श्रमहरामहरास्तु विभोपुरः. ११९८०९ (+#) सिद्धांतसार संग्रह सह टबार्थ, अपूर्ण, वि. १९५४, ज्येष्ठ शुक्ल, ८, शुक्रवार, मध्यम, पृ. १९-१(४)=१८, ले.स्थल. रामगढ, प्र.वि. टिप्पण युक्त विशेष पाठ-संशोधित. मूल पाठ का अंश खंडित है, दे., (२७.५४१२, ५४४५-५०). ५८ बोल संग्रह-आगमिकसिद्धांतचर्या, प्रा.,मा.गु.,सं., गद्य, आदि: धम्मोमंगल मुकिट्ठ अहिंसा; अंति: नविचइअन्नमिहेहकिचि, (अपूर्ण, पृ.वि. गाथा-३२ अपूर्ण से ४३ अपूर्ण तक नहीं है.) ५८ बोल संग्रह-टबार्थ, मा.गु., गद्य, आदि: (अपठनीय); अंति: किम हि छइ पुछइवला, संपूर्ण. ११९८१० (+#) सम्मेतशिखरतीर्थ पूजा, संपूर्ण, वि. १९०१, श्रावण अधिकमास कृष्ण, ७, मध्यम, पृ.१२, प्रले. श्राव. गंगादास; अन्य. मु. धर्मचंद्र भट्टारक (गुरु मु. विजयकीर्ति भट्टारक, मूलसंघ सरस्वतीगच्छ बलात्कारगण), प्र.ले.पु. सामान्य, प्र.वि. संशोधित. मूल पाठ का अंश खंडित है, दे., (२७४१३, १०४३३). सम्मेतशिखरतीर्थ पूजा, सं., गद्य, आदि: प्रणम्यसर्वज्ञमनंतबोध; अंति: संख्यात्र गणकै० कोत्तमै, ग्रं. १७४. ११९८११. सिंदूरप्रकर, संपूर्ण, वि. १८९६, कार्तिक शुक्ल, ११, रविवार, मध्यम, पृ. ११, ले.स्थल, मोजपुर, प्रले. श्राव. खूबराम, प्र.ले.पु. सामान्य, प्र.वि. हुंडी:सींप्र.,प्र.ले.श्लो. (२४) भग्न पृष्टिं कटी ग्रीवा, (५६) यादृशं पुस्तकं दष्टं, जैदे., (२८x१३, ९x४०). For Private and Personal Use Only

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