Book Title: Kailas Shrutasagar Granthsuchi Vol 15
Author(s): Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publisher: Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
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हस्तलिखित जैन साहित्य १.१.१५
४६३ सिंदरप्रकर-टीका, आ. हर्षकीर्तिसूरि, सं., गद्य, वि. १६५५, आदि: श्रीमत्पार्श्वजिन; अंति: (१)वृत्तिमिमामकार्षीत,
(२)व्यरचि कृति. ६२८००. (+) उत्तराध्ययनसूत्र सह टीका- अध्ययन १३, संपूर्ण, वि. १६४५, श्रेष्ठ, पृ. २२, प्रले. पं. हर्षविजय (गुरु पं. नाका गणि); गुपि.पं. नाका गणि, प्र.ले.पु. सामान्य, प्र.वि. टिप्पण युक्त विशेष पाठ-संशोधित., जैदे., (२६.५४११.५, १५४३६).
उत्तराध्ययनसूत्र, मु. प्रत्येकबुद्ध, प्रा., प+ग., आदि: (-); अंति: (-), प्रतिपूर्ण.
उत्तराध्ययनसूत्र-सुखबोधा टीका, आ. नेमिचंद्रसूरि, सं., गद्य, वि. ११२९, आदि: (-); अंति: (-), प्रतिपूर्ण. ६२८०१. (+) उत्तमकुमार चरित्र, संपूर्ण, वि. १७००, ज्येष्ठ शुक्ल, २, सोमवार, श्रेष्ठ, पृ. २२, प्रले. ग. वीरविजय (गुरु
पं. वर्द्धमानविजय); गुपि.पं. वर्द्धमानविजय (गुरु ग. शिवविजय); ग. शिवविजय, प्र.ले.पु. सामान्य, प्र.वि. संशोधित., जैदे., (२६४११, १३४३३).
उत्तमकुमार चरित्र, मु. चारुचंद्र, सं., पद्य, आदि: वंदित्वा स्वगुरुन; अंति: चारुचंद्रनंदतांचिरं, श्लोक-५५९. ६२८०२. कल्पसूत्र सह टबार्थ व व्याख्यान+कथा, अपूर्ण, वि. २०वी, श्रेष्ठ, पृ. १४९-१२७(१ से १२४,१२८,१३६ से १३७)=२२, पू.वि. बीच-बीच के पत्र हैं., दे., (२४.५४११, ६-१२४२६-३१). कल्पसूत्र, आ. भद्रबाहुस्वामी, प्रा., गद्य, आदिः (-); अंति: (-), (पू.वि. अरेष्टिनेमि का वर्णन अपूर्ण से स्थिविरावली
अपूर्ण तक है व बीच-बीच के पाठ नहीं हैं.) कल्पसूत्र-टबार्थ *, मा.गु., गद्य, आदि: (-); अंति: (-).
कल्पसूत्र-व्याख्यान+कथा*,मा.गु., गद्य, आदि: (-); अंति: (-). ६२८०३. (+) संग्रहणीसूत्र, अपूर्ण, वि. १७८५, पौष शुक्ल, १०, रविवार, मध्यम, पृ. २१-१(१३)=२०, प्रले. मु. विजयचंद (गुरु
मु. गिरधर); गुपि. मु. गिरधर (लोंकागच्छ); अन्य. मु. मलूकचंद ऋषि, प्र.ले.पु. सामान्य, प्र.वि. ऋषि मलूकचंदजी के द्वारा सं १८०१, आश्विन शुक्लपक्ष ३, गुरुवार को प्रत दिए जाने का उल्लेख है., टिप्पण युक्त विशेष पाठ-पदच्छेद सूचक लकीरें-अन्वय दर्शक अंक युक्त पाठ-संशोधित., जैदे., (२५.५४११, ९४३७).
बृहत्संग्रहणी, आ. चंद्रसूरि, प्रा., पद्य, वि. १२वी, आदि: नमिउं अरिहंताई ठिइ; अंति: जा वीरजिण तित्थं, गाथा-३४९,
___ (पू.वि. गाथा-८० अपूर्ण से ९७ अपूर्ण तक नहीं है.) ६२८०४. (+) चौवीस तीर्थंकरों के नाम, गण, योनि, नक्षत्रादि विवरण, अपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ. २०, पृ.वि. अंत के पत्र नहीं हैं., प्र.वि. संशोधित., जैदे., (२५.५४१०.५, १२-१६४१७-५८). २४ तीर्थंकरों के नाम, माता, पिता, नक्षत्र, यक्ष, यक्षणी, पूर्वभव आदि विवरण, मा.गु., को., आदि: (-); अंति:
(-), (पू.वि. अंत के कुछ पाठांश नहीं हैं.) ६२८०५. (+) सुसढ कथानक व गाथा संग्रह, संपूर्ण, वि. १७वी, मध्यम, पृ. २०, कुल पे. २, प्र.वि. टिप्पण युक्त विशेष पाठ-पदच्छेद
सूचक लकीरें-संशोधित., जैदे., (२६४१०, १३४४०). १.पे. नाम. सुसढ कथानक, पृ. १अ-२०अ, संपूर्ण. सुसढ कथानक-यतनाविषये, आ. देवेंद्रसूरि, प्रा., पद्य, आदि: राजग्रिहे गुणसिलए; अंति: जयणं चिय धम्मकामा,
गाथा-४१९. २. पे. नाम. जैनगाथा संग्रह, पृ. २०अ, संपूर्ण..
जैनगाथा संग्रह*,प्रा.,मा.गु.,सं., पद्य, आदि: समणीभव गयवेयं परिहार; अंति: तावयमाणं ध्रुवं होही, गाथा-२. ६२८०६. (+) नवतत्त्व सह बालावबोध, संपूर्ण, वि. १९वी, श्रेष्ठ, पृ. १९, प्र.वि. संशोधित., जैदे., (२५४१०.५, १२४३७).
नवतत्त्व प्रकरण, प्रा., पद्य, आदि: जीवाजीवा पुन्नं पावा; अंति: बुद्धिबोधिक्कणेगाय, गाथा-५२, संपूर्ण.. नवतत्त्व प्रकरण-बालावबोध, मा.गु., गद्य, आदि: जीवतत्त्व अजीवतत्त्व; अंति: (-), (पूर्ण, पू.वि. प्रतिलेखक द्वारा
अपूर्ण., वि. प्रतिलेखक ने अंतिम गाथा का बालावबोध नहीं लिखा है.) ६२८०७. श्रावकप्रतिक्रमणसूत्र संग्रह सह टबार्थ, अपूर्ण, वि. १८वी, मध्यम, पृ. २२-४(२ से ५)=१८, जैदे., (२५४११, ५४३३).
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