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प्रसिद्ध तत्त्वज्ञ समझा जाता था । सन् १८६० और १८६१ में उसके तत्त्वशास्त्र-विषयक व्याख्यान छपकर प्रकाशित हुए। इन्हीं व्याख्यानोंकी समालोचना करनेके लिए यह ग्रन्थ लिखा गया। इस समय तत्त्वज्ञोंके दो दल हो रहे थे-एक उपजतबुद्धिवादी और दूसरा अनुभववादी । इनमेंसे हेमिल्टन पहले दलका और मिल दूसरे दलका अनुयायी था। इन दोनों मतोंमें जो भेद है वह केवल काल्पनिक नहीं है । क्योंकि पहला मत सुधार और मानवीय उन्नतिके प्रतिकूल है और दूसरा अनुकूल है । जो बातें रूढ़ हो जाती है उनके विषयमें मनुष्योंका विश्वास बहुत ही दृढ़ हो जाता है। उन बातोंका उन्हें यहाँ तक अभिमान हो जाता है कि वे उनके विरुद्ध किसी कार्यके करनेको मनुष्य-स्वभावके विरुद्ध शैतानोंका काम कहते हैं। इस प्रकारके विचारोंपर अनुभववादियोंका शस्त्र खूब चलता है । इनका सिद्धान्त है कि ज्ञान, विश्वास, मनोभाव आदि सबकी रचना अनुभव या अभ्याससे होती है। अभिप्राय यह है कि जिन जिन बातोंको हम लड़कपनसे अथवा बहुत समयसे अच्छी या बुरी समझने और मानने लगते हैं, अभ्यासके कारण हमें वही अच्छी या बुरी मालूम होने लगती हैं। इसलिए अनुभववादी कहते हैं कि इस प्रकारके मनोभाव अभ्याससे बदले जा सकते हैं और फिर इच्छित सुधार किया जा सकता है। उपजतबुद्धिवादी इस बातको बिलकुल कहीं मानते। उनका मत है कि मनोभाव आप ही आप उत्पन्न होते हैं, उनके होनेमें अनुभव या अभ्या-- सकी अपेक्षा नहीं है। इसलिए वे किसी प्रकार बदले नहीं जा सकते। इससे उपजत-बुद्धि के विरुद्ध सुधार नहीं किया जा सकता। उसके करनेका यत्न करना शैतानोंका काम है। इससे पाठक समझ सकते हैं कि मिलको हेमिल्टनके विरुद्ध क्यों लेखनी उठानी पड़ी।