Book Title: Jivvicharadi Prakaran Sangraha
Author(s): Jinduttasuri Gyanbhandar
Publisher: Jinduttasuri Gyanbhandar

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Page 285
________________ ASSASSIZISTAS परसङ्ग्रहः धर्माधर्माकाशपुद्गलजीवद्रव्याणामैक्यं द्रव्यत्वादिभेदादित्यादिद्रव्यत्वादिकं प्रतिजानानस्तविशेषान् निन्हुवानस्तदाभासः यथा द्रव्यमेव तत्त्वं तत्त्वपर्यायाणामग्रहणाद्विपर्यास इति सङ्ग्रहः अर्थ-हवे संग्रहनय कहे छे. सामान्यमात्र समस्तविशेषरहित सत्यद्रव्यत्वादिकने ग्रहेवानो छे. स्वभाव जेनो ते सं०] के. पिंडपणे विशेषराशीने ग्रहे पण व्यक्तपणे न ग्रहे स्वजातिना दीठा जे इष्ट अर्थ तेने अविरोधे करीने विशेष धर्मोने एकरूपपणे जे ग्रहण करवो ते संग्रहनय कहियें ए भावना छे तेना बे भेद छे १ परसंग्रह, २ अपरसंग्रह तेमां "अशे-18 पविशेषोदासीनं भजमानं शुद्धद्रव्यं सन्मात्रमभिमन्यमानः परसंग्रह इति" जे समस्तविशेषधर्म स्थापनानी भजना करतो एटले विशेषपणाने अणग्रहतो थको शुद्धद्रव्यसत्तामात्रप्रतें माने जेम द्रव्य ए परसंग्रह विश्व एक सत्पणा माटे एम कह्याथी छतापणाना एकपणानुं ज्ञान थाय छे एटले सर्व पदार्थनो एकपणो ग्रहण छे ते परसंग्रह कहियें. __तथा जे सत्तानो अद्वैत स्वीकारे अने द्रव्यांतरभेद न माने समस्त विशेषपणाने ना कहेतो थको जे ग्रहण करे ते अद्वैतवादि वेदांत तथा सांख्यदर्शन ए परसंग्रहाभास छे केमके जे भेदधर्म छता देखाय छे तथा द्रव्यांतरपणो तेने न माने माटे परसंग्रहाभास कहिये अने जैन तो विशेष सहित सामान्यने ग्रहे छे माटे संग्रहनय कहियें. . "द्रव्यत्वादिनयांतरसामान्यानि मत्त्वा तद्भेदेषु गजनिमीलिकामवलंबमानः अपरसंग्रह." द्रव्य जे जीव अजीवादिक जीववि.२४

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