Book Title: Jivvicharadi Prakaran Sangraha
Author(s): Jinduttasuri Gyanbhandar
Publisher: Jinduttasuri Gyanbhandar

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Page 300
________________ नयचक्रसार मूळ बालावबोधसहित ॥१४६॥ * उपयोगसहकारेणैव शेषगुणानां प्रवृत्त्यभ्युपगमात् इत्येवं खतत्त्वज्ञानकरणे खरूपोपादानं तथा है खरूपरमणध्यानैकत्वेनैव सिद्धिः । अर्थ-हवे श्रीवीतरागना आगमथी जाण्यो जे वस्तु स्वरूप तेने हेयोपादेयपणे निर्धार करवो ते सम्यक् दर्शन कहिये तिहां तत्त्वार्थने विषे कह्यो छे के जे तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यक् दर्शनम् । उक्तं च उत्तराध्ययने जीवा जीवा य बंधो ॥ पुन्नं पावासवो तहा ॥ संवरो निज्झरा मुक्खो ॥ संति एतहिया नव ॥१॥ तहियाणं तु भावाणं सदभावे ऊवएसण ॥ भावेण सद्दहंतस्स ॥ समत्तंति वियाहियं ॥२॥ इत्यादिक दशरुचिथी सर्व जाणवू जे तत्त्वार्थ जीवादि पदार्थनो श्रद्धान निर्धार ते सम्यक् दर्शन कहियें अने जे सम्यक् दर्शन ते धर्मर्नु मूल छे. तथा जे हेंय ते तजवा योग्य, अने उपा| देय ते ग्रहण करवा योग्य, एहवी परीक्षा सहित जे जाणपणो ते सम्यक् ज्ञान छे. जेमां हेयोपयोग संकोच अकरण बुद्धी नथी पण उपादेयने उपयोगें एहवी चिंतवणा थाय जे हवे किवारे करूं? ए विना केम चाले ? एहवी जो बुद्धि नथी तो ते संवेदन ज्ञान छे तेथी संवर कार्य थाय एवो निर्धार नथी. तथा स्वरूप रमण परभाव राग द्वेष विभावादिकनो त्याग ते चारित्र कहिये, ए रत्नत्रयीरूप परिणाम ते मोक्षमार्ग छे. ए मार्गने साधवाथी साध्य जे परम अव्याबाधपद तेनी सिद्धि निष्पत्ति थाय. जे आत्मानो पोतानुं रूप ते यथार्थ ज्ञान छे. तथा चेतना लक्षण तेज जीवपणो छे, अने ज्ञाननो प्रकर्ष बहुलपणो ते आत्माने लाभ छे; ज्ञान तथा दर्शननो ROSARIGAMAPAPAGOS ॥१४६॥

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