Book Title: Jinabhashita 2005 01 Author(s): Ratanchand Jain Publisher: Sarvoday Jain Vidyapith Agra View full book textPage 2
________________ रज में पूज्यता आती है चरणसम्पर्क से o आचार्य श्री विद्यासागर जी नरच!न रच!न रच!... जहाँतकमाटी-रज की बात है, मात्र रज को कोई सर पर नहीं चढ़ाता मूढ़-मूर्ख को छोड़कर। रज में पूज्यता आती है चरण-सम्पर्क से। और वह चरण पूज्य होते हैं जिनकी पूजा आँखें करती हैं, गन्तव्य तक पहुँचाने वाले चरणों का मूल्य आँकती हैं वेही मानी जाती सही आँखें। चरण की उपेक्षा करने वाली स्वैरिणी आँखें दुःख पाती हैं स्वयं चरण-शब्द ही उपदेश और आदेश दे रहा है हितैषिणी आँखों को, कि चरण को छोड़कर कहीं अन्यत्र कभी भी चर न!चर न!!चर न!!! इतना ही नहीं, विलोम रूप से भी ऐसा ही भाव निकलता है, यानी च...र...ण न...र...च... चरण को छोड़कर कहीं अन्यत्र कभी भी हे भगवन्! मैं समझना चाहता हूँ कि आँखों की रचना यह ऐसे कौन से परमाणुओं से हुई हैजब आँखें आती हैं...तो दुःख देती हैं, जब आँखें जाती हैं...तो दुःख देती हैं! कहाँ तक और कब तक कहूँ, जब आँखें लगती हैं...तो दुःख देती हैं ! आँखों में सुख है कहाँ? ये आँखें दु:ख की खनी हैं सुख की हनी हैं यही कारण है कि इन आँखों पर विश्वास नहीं रखते सन्त संयत-साधु-जन और सदा-सर्वथा चरणों को लखते विनीत-दृष्टि हो चलते हैं ...धन्य! 'मूकमाटी' से साभार Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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