Book Title: Jain Sahitya Sanshodhak Khand 01 Ank 01 to 02
Author(s): Jinvijay
Publisher: Jain Sahitya Sanshodhak Samaj Puna

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Page 226
________________ ७४ जैन साहित्य संशोधक . [भाग १ एकत्रित करवानी छ, के जे द्वारा ते एक स्वतंत्र ीना लगभग सघळा चातुर्मासो तेमणे ए प्रदेशोऐतिहासिक पुरुष तरीके तथा घणीक महत्त्वनी मां आवेलां नगरोमांज गाळ्या हतो. केटलीक वखते बाबतोमा बुद्धथी ते एक भिन्न पुरुषरूपे सिद्ध करी आ देशोनी पश्चिममा श्रावस्ती सुधी अने उत्तरमा शकाय. हिमालयनी तळेटी लगी पण तेओ पोतानुं परिभ्र. ___ वर्धमान पोताना पितानी माफक एक काश्यप मण लंबावता हता. तेमना जे मुख्य ११ शिष्यो गण(कश्यप गोत्रना) हता. वळी तेओ, पोताना मातापि- धरो तरीके ओळखाय छे अने जेमनां नामो कल्पताना मरणसुधी तथा तेनी पछी पण पोताना मो- सूत्रनी स्थविरावली (१) मां आपेलां छे ते टा भाई नंदिवर्धनने पैतृकसंस्थाननो उत्तरा- श्वेताम्बर तेमज दिगम्बर नामना बन्ने जैन संप्रदा धिकारी बनतां सुधी, गृहस्थावस्थामा रह्या हता. योने समान मान्य छे. आ बाबतो उपरांत महात्यार बाद अट्ठावीश वर्षनी उमरे, सर्वे सत्ताधारी- वीरना जीवनसंबंधी जे हकीकतो जैन सूत्रोमां ओनी अनुमती लई तेमणे दीक्षा ग्रहण करी हती. मळी आवेछे ते उपर; तेमज मक्खलिपुत्र गोसारोमन केथोलिक देशोमां जेवी रीते नाना पत्रोनी लनी साथे चालेली तेमनी स्पर्धा अने तेमां थएमहत्त्वाकांक्षानुं क्षेत्र देवालय बन्युं हतं तवीज रीते ला तेमना विजय वाळी हकीकत उपर, अने अंते हिंदुस्थानना नाना पुत्रोतुं ध्यान आध्यात्मिक तेमना निर्वाण स्थान तरीके जे पापा नामनी नानी प्रवृत्तिए खच्युं हतुं. नगरी प्रसिद्ध थएली छे ते बाबत उपर आपणे विसंसार छोड्या पछी महावीरे बार वर्ष सुधी चार करवानी जरूरत छे. आ बधी बाबतो उपर तपस्वी जीवन गाळ्युं हतुं अने ते दरम्यान तेमणे विचार करवामां आपणे मात्र जैनोनीज परंपराओ राढा नामना देशनी जंगली जातोमां पण परि. उपर आधार राखवानो छे, एम नथी. आमांनी भ्रमण कर्यु हतुं. तेमना आ जीवननुं प्रथम वर्ष पतं केटलीक बाबतोना संबंधमां बौद्ध ग्रंथोमांथी पण थया बाद तेओ अचेलक थया हता. आवी रीते उल्लेखो मळी आवे छे. तेथी ते प्रमाणोने पण लक्ष्यसिद्धिसाधन अर्थे बारवर्ष पर्यंत करेला आत्मदम- मां राखवानी जरूरत छे बौद्ध ग्रंथोमां महावीरने नने अंते वर्धमानने केवळेशान उत्पन्न थयं इतं. तेमना सुप्रसिद्ध नाम 'नातपुत्त ' थी उल्लेखेला छ त्यार बाद तेओ सर्वज्ञ तीर्थकर तरीके ओळ- अने तेमने निग्गण्ठो (जैन यतिओ) ना नायक खावा लाग्या अने ते उपरांत जिन, महावीर विगेरे. तरीके तथा बुद्धना एक प्रतिस्पर्धी तरीके जणावे. ना बिरुदोथी पण संबोधावा लाग्या के जे ला छे. ए ग्रंथोमा तेमना विषयमा जो कोई भूल शाक्यमुनिने पण लगाइवामां आवे छे. जींदगीनां थएली होय तो ते फक्त तमना गोत्रना संबंधमां छल्लां त्रीश वर्षो तेमणे पोताना धर्मनो उपदेश छे. तेमना गोत्रन नाम, बौद्ध ग्रंथोमां अग्निवश्याय. आपवामां तथा यतिमार्गनी व्यवस्था करवामां न आपेलुं छे, जे वास्तविकमां महावीरना सुधर्म गाळ्यां हतां. आ कार्यमां, आपणे उपर जोई गया नामे शिष्यनुं गोत्र हतुं. बौद्ध ग्रंथकारोए भूलथी तेम, तमने, विदेह मगध, अने अंगदेशना चेटक, अथवा भ्रांतिथी शिष्यना गोत्रने गुरुनुं गोत्र लख्यु श्रेणिक अने कृणिक नामना राजाओ के जेमनी छ. महावीरनिर्वाण बाद तेमना गणधरोमांथी मात्र सार्थ तेओ पोताना मातृपक्षद्वारा सगपणनो संबंध आ सुधर्म गणधर ज एकला विद्यमान रह्या हता धरावता हता, तेमना तरफथी खास सहायता तेमज पुष्टि मळी हती ए देशमां आवेलां नगरोमां १ जुओ कल्पसूत्र, जिनचरित्रो, ६ १२२; चम्पा, ३; तेओए पोतानी आध्यात्मिक जीवननी कारकी । वैशाली, १२, मिथिला, ६; राजगृह, १४; भद्रिका, २; आलभिका, १; पणितभूमि, १; श्रावस्ती, १; पापा, १; १ तेमना जीवनना आ विभागना संबंधमां लखाएल पणितभूमि, श्रावस्ती अने कदाच आलभिका आत्रण शिएक प्रकरण आचारांग सूत्रमा आवेलुं छे. जुओ वाय उपरनां सघळां स्थळो, उपर निर्दिष्ट थएल त्रण आचारांग (१,८). राज्योनी सरहदोनी अंदरज आवेला हता. Aho! Shrutgyanam

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