Book Title: Jain Ratnakar
Author(s): Keshrichand J Sethia
Publisher: Keshrichand J Sethia

View full book text
Previous | Next

Page 110
________________ जैन रत्नाकर - - पद्मावती आराधना दोहा मोटी सतो पद्मावती, लीनो संजम भार । अथिर संसार ने जाण के, छोड्या विषय विकार ॥१॥ विरह पड्यो राजा तणो, सती गई बन माय । पाप-चितारे पाछला, ते सुणजो चित लाय ॥२॥ ( राग-वेराडी) हिवे राणी पद्मावती, जीवरास खमावे । जाणपणो जग दोहिलो, इण वेला आवे ॥ ते मुझ मिच्छामि तुकडं ॥१॥ अरिहन्तनी साख, जे मैं जीव विराधिया, चौरासी लाख । ते मुझ ॥ २॥ सात लाख पृथ्वी तणा, साते अपकाय । सात लाख तेउ कायना, साते बली वाय । ते० ॥ ३ ॥ दश प्रत्येक वनस्पति, चउदे साधारण धार । बी ती चउरिन्द्री जीवना, बेबे लाख विचार | ते० ॥४॥ देवता तिर्यश्च नारकी, चार चार प्रकाशी। चउदे लाख मनुष्य ना, ए लाख चौरासी । ते ॥५॥ हिंसा कीधी जीवनी, बोल्या मृषावाद। दोष अदत्ता दान ना, मैथुन ने उल्माद् । ते० ॥ ६॥ परिग्रह मेल्यो कारमो, कीधो क्रोध विशेष । मानं माया लोभ मैं किया, बली राग ने द्वेष। ते ॥७॥ फलह करों जीव दुहव्या, दीधा कूड़ा कलङ्क । निन्दा कीधी

Loading...

Page Navigation
1 ... 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137