Book Title: Chandraraj Charitra
Author(s): Bhupendrasuri
Publisher: Saudharm Sandesh Prakashan Trust

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Page 251
________________ 246 श्री चन्द्रराजर्षि चरित्र "हे राजन्, जंबुद्वीप के भरतक्षेत्र में विदर्भ नाम का एक अत्यंत रमणीय प्रदेश आता है। इस प्रदेश में तिलका नाम की एक नगरी है। इस नगरी के राजा का नाम था मदन भ्रम / राजा की रूपगुणसंपन्न कमलमाला नाम की पटरानी थी। राजा-रानी के एकमात्र संतान थी। यह संतान कन्यारूप में थी और अत्यंत रुपवान् इस कन्या का नाम 'तिलकमंजरी' रखा गया था। तिलकमंजरी बचपन से ही मिथ्या धर्म में आसक्त हो गई थी। वह भक्ष्याभक्ष्य का विवेक नहीं रखती थी। वह जैन धर्म का द्वेष करती थी। जैन धर्म की निंदा करने में उसे बड़ा आनंद . आता था। मिथ्या धर्म की प्रशंसा करने में भी उसे कोई जीव जैन धर्म पर श्रद्धा न रखते हुए उसकी निंदा करता है, तो उसके कारण जैन को कोई हानि नहीं पहुँचती है। इसके विपरीत जैन धर्म की निंदा करनेवाला जीव अपने दर्शनमोहनीय और अंतराय नाम के दो कर्मों को द्दढ कर जाता है। ऐसा जीव बोधिलाभ से भ्रष्ट हो जाता है। धीरे-धीरे काल क्रम के अनुसार राजकुमारी तिलकमंजरी बड़ी हुई / उम्र के साथ मिथ्याधर्म के प्रति उसकी श्रद्धा में वृद्धि ही होती गई। मदनभ्रम राजा के दरबार में सुबुद्धि नाम का मंत्री था। इस मंत्री के रूपवती' नाम की एक अत्यंत स्वरूपसुंदर कन्या थी। इस रुपवती ने जन्म से ही अपनी माता के स्तनपान के साथ साथ जिनमत का अमृतपान भी किया था। इसीलिए वह जैनधर्म के प्रति श्रद्धा और उसके पालन में अत्यंत दृढ़ थी। महाव्रतधारी साध्वियों की सत्संगति में रह कर उसने जैन धर्म के बारे में बहुत अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इसी के फलस्वरुप वह नव तत्त्व, कर्म-सिद्धान्त, स्याद्वाद सिद्धान्त, साधु धर्म और श्रावक धर्म के आचारों को बहुत अच्छी तरह से जानती थी। प्रतिदिन जिनदर्शन, पूजा, गुरुवंदन, नवकारमंत्र का जप, साधु-साध्वियों को आहारपानी देना आदि धार्मिक कार्यों में वह बहुत तत्पर रहती थी। हररोज साधु-साध्वी को आहरपानी परोसे बिना वह भोजन भी नहीं करती थी। पूर्वजन्म का संबंध और भाग्य के कारण राजपुत्री और मंत्रीपुत्री के बीच मित्रता हुई। उन दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति गहरा स्नेहभाव रहता था। उन दोनों को अब एक दूसरे के बिना एक क्षण के लिए रहना एक युग के समान प्रतीत होता था। प्रेम प्रेमी के निकट रहना हो पसंद करता है। इसके विपरीत द्वेष द्वेषी से बहुत दूर रहना ही पसंद करता है। यदि हमारे मन में परमात्मा के प्रति प्रेम है, तो क्या हमें परमात्मा के पास तन-मन-से रहना अच्छा लगता है ? क्या हम अपने हृदयरूपी सिंहासन पर परमात्मा को बिराजमान करते हैं ? परमात्मा की भक्ति में हम अपने तन-मन-धन का कितना व्यय करते है ? परमात्मा की भक्ति करने में हमें कैसा और कितना आनंद प्राप्त होता हैं ? ऐसे प्रश्न हमें कभी एकांत में अपनी अंतरात्मा से अवश्य पूछ लेने चाहिए / अस्तु / मा P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust

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