Book Title: Budhjan Satsai
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granth Ratnakar Karyalay

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Page 81
________________ ६५ - - विरागभावना। बग्नी जाहि न कर्मगति, भली बुरी जात । दोऊ अगरत होत है. बीच परका घात ॥९॥ बुरी करें ज्या भली, लसा करमर्क ठाट । नया गेग भाम्या जगत, फोरत सिरको भाट ॥१०॥ कर और भोग अवर, अनुचित विधिकी बात | छेड़ कर मो भागि ज्या, पागेसी मर जात ॥११॥ एक कर दुग मब लहै. ऐसे विधिके काम | एक हरत है कटक धन, मारा जावे गाम ॥१२॥ बहत करें फल एक ले. ऐमा कर्म अनूप । कर फांज संग्रामकों, हार जीत भूप ॥१३॥ को जान को कह सके, हे अचिंत्य गति कर्म । यात गचं ना छ, छटै आदर धर्म ॥१४॥ धर्म मुखांकर मूल है, पाप दुसांकर सान । गुगनायन धर्म गहि, कर आपा पर नान ॥१५॥ गुगन्नाय विन होत नहि. आपा परका ज्ञान । मान विनाका न्यामा, ज्या हाथीको न्हाने ॥१६॥ नीव विना मंदिर नहीं, मूल विना नहिं रोस । आपा पर मरधा बिना, नहीं धर्मका पोख ॥१७॥ सुलभ मुनृपपद देवपट, जनम-मरन-दुसदान । दुलभ सरधाजुन धरम, अद्भुत सुसकी खान ॥१८॥ १म्नान, २ रूस-वृक्ष।

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