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कुलीन और शीलवती पत्नी मित्र के समान है। घर मिलाने पर भी जो नही चिढ़ती, पति के प्रति जागविचार भी मन में नहानी, वह पत्नी दासी के समान है। १, सय वर्णाकी समानता:
बुद्ध धर्ण के अभिमान को नही मानांपामय मणी की मां का अधिकार है। वर्णका लेष्टर प्रमाणित का 43B मित आधार नहीं है। यात्रिय आदि पाप परेंगी ये ना में जायें और प्राण भादि पाप को तो ये न जायें? या आदि पुण्य कर्म करें नो रग में जाने और त्रिय आदि को नो न जावे ? माण रागपादित होमित्र भागमा रस चोर मनिय आदिन कर सरे? इन मप विश्नों में गारो नाममा अधिकार है, यह स्पष्ट है। फिर एक माण निरार हो पोर. दूसरा विद्वान हो तो या आदि में पाल सिकी प्राषित किया जायगा ? आप कहेगे किविद्वानको ना घिद्धमानी पूजनीय हुई. जाति नहीं।
लेकिन जो विद्वान बाबाग शीलगिात दुराचारी दो और निरनर मामण अत्यंत शीलवान हो नो पिसे पलमानोगे? उगा पष्ट है कि शोवान को।
लेकिन इस तरह जाति की अपेक्षा वित्ता मेट ठहरती है ६. तुलना कीजिए:
अहिंसा, सत्य, अस्तेय,निफाग-को-लामता। सर्व-भूत दित इन्छा-पदभार सय वणी का।।
(संत साहित्यपर से)