Book Title: Bhadrabahu Charitra
Author(s): Udaychandra Jain
Publisher: Jain Bharti Bhavan Banaras

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Page 114
________________ ።። भद्रबाहु चरित्र किन्तु इन्द्रिय सम्बन्धि विषयानुभवन करनेके लिये " की है ॥ २१-२४॥ ॥ तथा देखो ! इनलोगोंकी सूर्खता अथवा विवेक :- शून्यता जो श्रीवर्द्धमान' स्वामी के गर्भका अपहरण हुआ कहते हैं । जब श्रीवीरजिनेन्द्रको — वृषभदत्त ब्राह्मणकी - दिवानन्या नाम स्त्रीके गर्भमें आये हुये · : तिरासी ८३ दिन बीत गये तब इन्द्रने भिक्षुकका कुल :: समझ कर श्रीवीरनाथका गर्भ वहांसे लेजालर सिद्धार्थ राजाकी कान्ताके 'उदरमें स्थापित किया । परन्तु यह 'बात कैसे होसकती हैं ? अस्तु हमारा कहना है कि'पहले तुम यह कहो - इन्द्रने पहले उस कुलको जाना · था या नहिं १ यदि कहोगे जाना था तो पहिलेही " " : गर्भका हरण क्यों न किया ? यदि कहोगे नहिं जाना ; था तो गर्म शोधनादि क्रियायें कैसे की होगी ? यदि फिर भी कहोगे कि गर्भ शोधनांदि क्रियायें ही नहीं की गई → + मोन्यो यत्र फेलाविधारणम् ॥ १२३ ॥ नच गृहस्थकालेोऽयं कल्पितः पाण्डुराक ।। परमक्ष सौख्याय न चार्य शिवशर्मणे ॥ १२४ ॥ • ॥ इति सङ्गनिर्वाणनिराकरणम् कपयन्ति कथं मूढा वर्षमान जिनेशिनः । धर्मापहरणं निन्यं विवेकविलाश्रयाः . ॥१२५॥ दिवानन्यास्त्रिया गर्ने वृषदत्तद्विजन्मनः । भवतीर्णे जिन मिरे व्यसीति दिवसा - गताः ॥ १२६ ॥ ततो भिक्षुकुलं ज्ञात्वा शक्रस्तं गर्भमापयत सिद्धयनृपतेः पत्न्यां कथमे १. सद्वनो भवेत् ॥ १२७॥ वज्रिणा तत्कुलं पूर्व विदितं नाम कि बद । विदितं चत्पुरा किं -न. श्रणापहरणं कृतम् ॥१३८॥ न ज्ञातं चेत्कर्म, धर्म, प्रोभनाविक्रिया कृतानुशा

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